भारतीय संस्कृति में जीते जी सेवा कार्यों के साथ मृत्यु के बाद भी सत्कर्म की प्रेरणा दी जाती है. यही कारण है कि उत्तराखंड की दधीचि देहदान समिति ने लोगों को प्रेरित कर चिकित्सा शिक्षा के लिए लोगों को देहदान के लिए प्रेरित करने का कार्य किया है. महर्षि दधीचि ने सदियों पूर्व देवताओं और मानवता की रक्षा के लिए अपना शरीर दान किया था और अब के देहदानदाता चिकित्सा शिक्षा को और प्रभावी बनाने के लिए देहदान कर मानवता के लिए महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं..
दधीचि देहदान समिति गत 27 वर्षों से देहदान, अंगदान और नेत्र दान क्षेत्र में कार्यरत है। समिति उत्तराखंड, दिल्ली, एनसीआर, बिहार, झारखंड आदि राज्यों में यह कार्य सफलतापूर्वक सम्पन्न कर रही है। वर्ष 2021 के अंतिम माह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक विजय जुनेजा के मार्गदर्शन में यह समिति गठित हुई. 27 फरवरी 2022 को देहरादून में गठित यह समिति 2024 तक 400 से अधिक देह, नेत्र और अंग दानियों की संख्या पार कर चुकी है। 52 कॉर्निया का दान महंत इंदिरेश अस्पताल, महंत निर्मल आश्रम ऋषिकेश में हो चुका है जबकि 16 देह दानियों का दिव्य दान राजकीय दून मेडिकल कॉलेज देहरादून में सम्पन्न हो चुका है. 11 दिसम्बर 2024 को देहदानी मात्र ढाई दिन की बच्ची थी, जिसका देहदान 11 दिसम्बर 2024 को हुआ जो सबसे कम उम्र के देहदानी के रूप में अंकित है. देहदान के इस समाचार को पूरे देश के समाचार पत्रों और मीडिया ने मुखरता से उठाया. यह बच्ची दो दिनों की थी जिसका नामकरण भी नहीं हुआ था इसीलिए दधिचि देहदान समिति ने इसका नाम विद्या व ज्ञान की देवी सरस्वती जी के नाम पर बालिका का नाम सरस्वती रखा.
देहदान क्या है, यह अपने आप में जटिल प्रश्न है. देहदान का प्रारंभ महर्षि दधिचि के कार्यकाल से माना जाता है. शरीर दान जिसे देहदान भी कहा जाता है. चिकित्सा अनुसंधान और शिक्षा के उद्देश्य से मृत्यु के बाद पूरे शरीर का दान है. शरीर का यह दान चिकित्सा छात्रों और शोधकर्ताओं को मानव शरीर को समझने में मदद करने और विज्ञान की उन्नति के लिए महत्वपूर्ण है. चिकित्सा अनुसंधान के लिए अपना शरीर दान करने वाले महापुरुषों में कुछ भारतीय न्यायविद, शिक्षाविद और राजनेता भी शामिल है. न्यायविद लीला सेठ का नाम इनमें प्रमुख है. राजनेताओं में भारतीय जनसंघ के प्रमुख नेता रहे श्री नानाजी देशमुख, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक एवं भूगोलवेत्ता डॉ. नित्यानंद का नाम शामिल है। इसी क्रम में सीपीआईएसम नेता सोमनाथ चटर्जी, पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु का नाम भी शामिल है, जिन्होंने अपने शरीर को दान कर दिया.
मृत मानव शरीर जिसे शव कहा जाता है उसका उपयोग छात्रों को एनाटॉमी, शरीर की संरचना और उसके काम करने के अध्ययन के बारे में पढ़ाने के लिए किया जाता है. यह चिकित्सकों, शल्य चिकित्सकों, दंत चिकित्सकों और अन्य स्वास्थ्य व्यवसाइयों की शिक्षा में सबसे महत्वपूर्ण पाठयक्रमों में से एक है. शवों का उपयोग अनुसंधान चिकित्सा द्वारा नई जीवन रक्षक शल्य चिकित्सा प्रक्रियाओं के विकास में भी किया जाता है। विज्ञान को अपना शरीर दान करने के विकल्प विचार करने वाले किसी भी व्यक्ति को जानकारी होनी चाहिए कि उसके दान का बहुत बड़ा महत्व है, यह परम दान है जो मेडिकल छात्रों को मानव शरीर की जटिल शारीरिक रचना में महारथ हासिल करने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इससे शोधकर्ताओं को भविष्य के रोगियों की मदद के लिए आवश्यक जानकारी मिलती है.
दधिचि देहदान समिति मानवता हित में पूरे देश में गत 27 वर्षों से प्रयासरत है. मानवता के लिए हो रहे इस कार्य का और विस्तार हो, इसके लिए समिति प्रयासरत है. देहदान, अंग दान और नेत्र दान ऐसा महादान है जिसको केवल वही कर सकता है जिस पर ईश्वरीय कृपा हो. एक अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष अंग दान की कमी से पांच लाख लोगों की असामयिक मृत्यु हो जाती है. समिति मानती है कि ऐसे ही लोगों से सम्पर्क कर मानवता हित में देह, नेत्र दान करने का शुभ संकल्प लेने वालों को प्रेरित किया जाए. अंगदान के प्रति जागरूकता की कमी के कारण प्रति दस लाख लोगों में मात्र 0.26 प्रतिशत लोग ही अंगदान कर पाते हैं. इसी संदर्भ में समिति उत्तराखंड में प्रथम अंग कोष स्थापित करने की दिशा में प्रयासरत है.
धर्म की दृष्टि से देहदान, अंग दान, नेत्रदान वर्जित नहीं है। सनातन में कोई भी व्यक्ति जीवित अवस्था में अपना श्राद्ध कर सकता है. अगला शरीर पाने के लिए परिजनों को पिण्डदान नियमानुसार करना पड़ता है. केवल शरीर के दाह संस्कार से कुछ नहीं होता. गोस्वामी तुलसीदास ने इस संदर्भ में लिखा है कि परहित बस जिनके मनमाही, तिन कहू जग दुर्बल कछु नाही तनु तजि तात जाउ मम धामा, देहूं काह तुम पूरन कामा. यानी जो परोपकार करते हैं उनके लिए कुछ भी असंभव नहीं है वह पूर्ण काम होते हैं.
इसी पंक्ति को पूरा करते हुए इस समिति ने अंगदान, देहदान, नेत्रदान जैसी प्रक्रिया को पूरा कराने का निर्णय लिया है. समिति के सदस्य देहदान, अंगदान अथवा नेत्रदान का संकल्प लेने वाले महादानी के घर जाते हैं और उसके परिजनों की समस्याओं का निराकरण करते हैं. उसके बाद संकल्प पत्र भराया जाता है. उनकी स्वतंत्र सहमति के बाद उनके हस्ताक्षर लिए जाते हैं. संकल्प पत्र में एक निष्पादक का मोबाइल नम्बर लिया जाता है. समिति संकल्प के बाद एक प्रमाण पत्र और एक परिचय पत्र संकल्पित देहदानी के लिए दिया जाता है जिसमें उसका पूरा ब्यौरा होता है. महादानी से अपेक्षा की जाती है कि वह घर में उस प्रमाण पत्र ऐसी जगह लगाए जहां आने वाले अतिथियों को सहजता से दिख जाए ताकि परमधाम गमन के बाद महादानी के परिजनों को लोग याद रखें. संकल्पित महादानी के परिजनों द्वारा जब उसके देहावसान की सूचना मिलती है तो समिति के लोग सारे कार्यों को छोड़कर देहदान की प्राथमिता को पूरा कराते हैं. संकल्पि महादानी के शरीर को घर से मेडिकल कॉलेज तक पहुंचने में सारे कार्य धैर्यपूर्वक करना होता है. कई बार मोहवश लोग मृत शरीर को मेडिकल कॉलेज को सौंपने को तैयार नहीं होते.
वर्तमान संदर्भ में देखें तो राज्य में अंगदान हार्ट, लीवर, किडनी, स्किन दान की न तो कोई समुचित व्यवस्था है और न ही कोई ऑर्गन स्किन कोष लेकिन दधिचि देहदान समिति के प्रयासों से राजकीय दून मेडिकल कालेज में जल्द ही यह बैंक खुलने जा रहा है. नेत्रदान के मामलों में केवल 15 मिनट का समय लगता है लेकिन यह ध्यान रखना पड़ता है कि संकल्पित महादानी के घर में समय से नेत्र सर्जन अपनी टीम के साथ पहुंच जाए और प्रक्रिया पूर्ण कर ली जाए. दधिचि देहदान समिति के महासचिव नीरज पांडे और अध्यक्ष डॉ. मुकेश गोयल के नेतृत्व में प्रदेश में कार्य कर रही है. उनका कहना है कि महादान की अंतिम समय में प्रशंसा होनी चाहिए जिससे औरों को प्रेरणा मिलेगी. नेत्रदान,अंगदान व देहदान का संकल्प लेने हेतु इन नम्बरों पर सम्पर्क करें:- 9412438100, 9897287021, 7906600421, 9837894998, 9411362624
हिन्दुस्थान समाचार
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