Day-2: तीन दिवसीय व्याख्यानमाला, 100 वर्ष की संघ यात्रा ‘नए क्षितिज’
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना का शताब्दी वर्ष मना रहा है। इस अवसर पर नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में तीन दिवसीय व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया। संघ के इस कार्यक्रम का विषय ‘100 वर्ष की संघ यात्रा : नए क्षितिज‘ रखा गया है। कार्यक्रम के दूसरे दिन सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत, सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले, पवन जिंदल (उत्तर क्षेत्र के क्षेत्रीय संघचालक), डॉ. अनिल अग्रवाल (दिल्ली के प्रांत संघचालक) शामिल हुए। इस मौके पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने संघ की 100 वर्ष की अविस्मरणीय यात्रा और इसके अनुभवों पर प्रकाश डाला। नीचे उनके पूरे व्याख्यान को पढ़ें।
(10:27-18:00) माननीय सरकार्यवाह जी, उत्तर क्षेत्र के माननीय संघचालक जी, दिल्ली प्रांत के माननीय संघचालक जी, संघ के अन्य अधिकारीगण। उपस्थित समाज जीवन के सभी क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति की सार्थकता को दर्ज करने वाले सभी सुधीजन, माता भगिनी।
कल, संघ की 100 साल का वर्णन मैंने किया था, यात्रा का वर्णन किया था। किस प्रकार उपेक्षा और विरोध के वातावरण में संघ स्वयंसेवकों ने अपनी निष्ठा के बलबूते स्वयं को दांव पर लगाकर संघ को इन सभी कालाखंडों से पार किया। और ये सारा करते समय कई कटु अनुभव आए, विरोध हुआ। ये सारा होने के बाद भी संपूर्ण समाज के लिए उनके हृदय में शुद्ध सात्विक प्रेम ही रहा, आज भी है। यही संघ है। शुद्ध सात्विक प्रेम अपने कार्य का आधार है। और इसलिए आज वो समय नहीं रहा, अनुकूलता है, समाज की मान्यता है। विरोध बहुत कम हो गया है और जो है, उसकी भी धार भोथरी हो गई है, उसका परिणाम नहीं होता। परंतु इसमें भी स्वयंसेवक यही सोचता है कि अनुकूलता मिली है, तो सुविधा भोगी नहीं होना है।
अनुकूलता मिली है, इसलिए आराम नहीं करना है। तो संपूर्ण हिंदू समाज को संगठित करने के अपने लक्ष्य को पाने तक सतत चलते रहना है और चलते रहना है। किस तरीके से, तो तरीका मैंने बताया। चार शब्दों में उसका वर्णन भी होता है। मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा।
जो सज्जन लोग हैं, उनसे मैत्री करना। जो हमारे प्रति सज्जनता नहीं बरतते, उनकी उपेक्षा करना। कुछ अच्छा होता है, किसी ने भी किया हो। अपने विचार का समर्थक हो, ना हो, विरोधी भी हो लेकिन अच्छा करता है, तो आनंद जताना। और जो दुर्जन हैं, पाप होता है, कुछ होता है, तो दुर्जनों की करुणा करना, घृणा नहीं करना। इस प्रकार से ये काम चलता है और ये काम करते समय जैसा मैंने कहा, स्वयंसेवकों को मिलता कुछ नहीं, संघ में incentive नहीं है। disincentives बहुत सारे हैं। जब पूछते हैं लोग कि आपको क्या मिलेगा संघ में? संघ में आकर हमको क्या मिलेगा? तो मैं तो सीधा जवाब देता हूं, तुमको कुछ नहीं मिलेगा। तुम्हारे जो पास है, वो भी चला जाएगा। हिम्मत है, तो करो, हिम्मत वालों का काम है। स्वयंसेवक कर रहे हैं और इसलिए करते हैं कि ऐसी निस्वार्थ सेवा समाज की करने के कारण उनको जो जीवन में एक सार्थकता प्राप्त होती है, उसका उनको आनंद होता है। और हम जो कर रहे हैं, वो सबके हित की बात है, ये अनुभव से वो जानते हैं। उनको तर्क से समझाना नहीं पड़ता है। करते समय उनको अनुभव आता है। और इसलिए आत्मनो मोक्षार्थम जगत हितायच। अपनी जीवन की सार्थकता के लिए, मुक्ति के लिए और पूरी दुनिया के हित के लिए।
ऐसा हम काम कर रहे हैं, ये अनुभूति उनको और इस पद पर सतत् परिश्रमशील रहने के लिए प्रेरित करती है। क्योंकि ध्येय के लिए सभी स्वयंसेवक हैं। शुद्ध सात्विक प्रेम का संबंध है लेकिन वो मोह का संबंध नहीं है। ये व्यक्तिगत प्रेम नहीं है। एक ध्येय के पथिक हैं और ध्येय बहुत भव्य है।
हमारे पुराने कार्यकर्ता थे दादा राव परमार, अब नहीं रहे। उनको अंग्रेजी में ही बोलने की आदत पड़ी, पहले से दक्षिण भारत में काम किया। तो उनकी मातृभाषा मराठी थी। हिंदी भी अच्छी जानते थे लेकिन शुरू होते थे और दो लाइनों के बाद अंग्रेजी शुरू होती थी। तो उन्होंने एक बार संघ के कार्य का वर्णन एक लाइन में ऐसे किया कि ‘RSS is evolution of life mission of Hindu nation’ स्वयंसेवक जानता है, हिंदू राष्ट्र के जीवन कार्य का विकास हम कर रहे हैं, अपने राष्ट्र में। so what is the life mission of Hindu nation? तो हमारा हिंदुस्तान जो है, उसका प्रयोजन ही है विश्व कल्याण।
जैसा मैंने कहा राष्ट्र, nation नहीं हमारे यहां। nation, state होता है। हमारा, state के बावजूद बना राष्ट्र है। क्योंकि जैसा मैंने कहा कि विकास के क्रम में खोजते-खोजते दुनिया ने अंदर खोजना बंद कर दिया, भारत ने चालू रखा। बहुत प्राचीन समय की बात है, हिस्ट्री के पहले है। और खोजते-खोजते उनको अंदर एक तत्त्व मिल गया जो सबको जोड़ता है। सब स्तरों पर जोड़ने वाला चौथा तत्त्व। शरीर, मन, बुद्धि सब जानते हैं। क्योंकि उनको जोड़ने वाला क्या है? व्यक्ति है, समूह है, सृष्टि है। व्यक्ति है, मानवता है, सृष्टि है। जोड़ने वाला क्या है? वो चौथा तत्व तत्त्व । वो हमारे ऋषि मुनि पूर्वजों को मिल गया और उसके जरिए उनको एक तो पता चला कि वास्तविक और शाश्वत सुख, इससे मिलेगा। उपभोग से नहीं मिलेगा। उपभोग इंद्रियां करती हैं, देह नश्वर है, वो समाप्त हो जाता है। और दुनिया अगर चलनी है, तो सब लोग अगर उपभोग के पीछे लगे, तो स्पर्धा होती है, आपस में झगड़े होते हैं, दुनिया नष्ट होने की नौबत आती है, जैसा हम आज देख रहे हैं।
और इसलिए इन उपभोगों पर बाहरी सुख के दौड़ पर संयम लगाकर हम लोग अंदर खोजें, तो अंदर अपने को शाश्वत कभी फीके ना पड़ने वाले सुख का उगम मिल जाएगा, स्रोत मिल जाएगा। उसको पाना, ये मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य है। और इससे सब लोग सुखी होंगे। सब लोग समन्वय के साथ, बाकी सब के साथ रह सकेंगे। दुनिया के कलह समाप्त होंगे, दुनिया में शांति और सुख रहेगा। और दूसरी बात उस तत्व तत्त्व ने सिखाई कि दिखते सब अलग-अलग हैं लेकिन सब एक हैं। एक हैं, यानी सब अपने हैं।
(18:03- 20:45) तो हिंदुत्व क्या है? हिंदूनेस क्या है? हिंदू की विचारधारा क्या है? सारांश अगर एक कहना है, तो दो शब्द हैं- सत्य और प्रेम, अपनापन। दुनिया अपनेपन से चलती है, सौदे पर नहीं चलती। contract पर नहीं चलती, चल नहीं सकती। उस अपनेपन को सिखाना सारी दुनिया को ये उन्होंने तय किया। अब ये करना है, तो इक्के-दुक्के का काम नहीं है। उसके लिए full fledge apparatus चाहिए, एक पूरा राष्ट्र इसमें लगना चाहिए। इसलिए उनकी तपस्या से अपने राष्ट्र का निर्माण हुआ, ऐसा वेदों में वर्णन है। ‘भद्रमंतऋष स्वविदा’ विश्व कल्याण की इच्छा रखने वाले, सृष्टि के रहस्य को जानने वाले ऋषियों ने ‘तपो दीक्षाम् उपसे दुरग्रे’ दुर्धर तप की दीक्षा धारण करके तप किया ‘ततो उससे राष्ट्रम बलम ओजस्य जातम’। हमारे राष्ट्र का, हमारे बल का, हमारे ओज का निर्माण हुआ। और इसलिए परंपरा से हमारी संस्कृति ने सिखाया है हमको पूर्वजों का आदेश। ‘एतद् देश प्रसुतस्य सकाशाद जन्मनाथ स्वं स्वं चरित्रम शिक्षन पृथिवाम सर्व मानव’। प्राचीन देश होने के नाते बड़े भाई जैसा इस देश के लोग ऐसा जीवन जिये कि दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति आए और जीवन की विद्या भारत के लोगों से सीखे।
ये जीवन की विद्या क्या है? तो जीवन में विविधता है, सृष्टि में विविधता है, परस्पर विरोध भी है। वो विविधताएं टकराती भी हैं। लेकिन ये सब विविधता एकता का ही आविष्कार है, तो उन सबको मानना, उन सबको संभालना और संभालते हुए साथ लेकर सबको चलना, सब सुखी हों। ‘maximum good of the maximum people’ नहीं ‘सर्वे सुखी नसतो’, सब सुखी हो। सर्वत का भला, हमारी विचारधारा में यही है।
और ऐसे चलना, तो एक समन्वय स्थापित करना पड़ेगा। उस समन्वय स्थापित करने के लिए मनुष्य को क्योंकि वो बुद्धिमान है, सृष्टि का स्वामी वो बना है, सृष्टि उससे चलती है, बनती है, बिगड़ती है। उसको अपने ऊपर संयम लाना पड़ेगा, अपना कुछ छोड़ना पड़ेगा।
(20:47- 26:19 ) कबूतर है और बाज है। बाज का भक्ष कबूतर है। बाज, कबूतर का पीछा करने लगा। कबूतर शिवि नाम के राजा के पास जाके बैठ गया। राजा ने पहचान लिया, इसके पीछे बाज लगा है, डर गया है, उसको छुपा लिया। बाज आया, उसने राजा को कहा कि यहां एक कबूतर आया था, मुझे भूख लगी है, उसको खाने वाला हूं मैं, वो कहां है? तुमने छुपा के रखा है, उसको छोड़ो।
तो शिब राजा ने कहा, वो शरणागत है, उसकी रक्षा करना मेरा धर्म है, मेरी प्रजा है। उसकी रक्षा करना मेरा धर्म है। मैं तुमको उसे खाने नहीं दूंगा। अब देखो, सृष्टि में विविधता है और परस्पर विरोधी भी है। एक तरफ बाज है, एक तरफ कबूतर है।
कानून से चलते, केवल कानून से। तो तो बुद्धि का तर्क है। वो क्या कहेगा या तो कबूतर को मारो या तो बाज को मारो। there is no solution. वो बात कहता है शिवि राजा को कि तुम धर्म की दुहाई दे रहे हो लेकिन मुझे प्रकृति ने धर्म दिया है मांस खाना, मैं उसको नहीं खाऊंगा, तो तुम्हारे जैसे साग-सब्जी खा के नहीं जी सकता। तुम मेरे धर्म की हानि कर रहे हो और अपने धर्म की दुहाई दे रहे हो, ये धर्म नहीं है क्योंकि धर्म, पहले, मध्य में, अंत में, सदा, सर्वदा-सर्वत्र सबके लिए सुखदायी ही होता है। जहां दुख पैदा होता है, वो धर्म नहीं है। अब ये समस्या है और इसका धार्मिक निदान क्या है?
शिवि राजा कह गए तुम्हारी बात ठीक है। तुमको मांस खाए बिना तुम्हारा जीवन नहीं चलेगा और अपना जीवन चलाना है, प्रत्येक का धर्म है। तो तुम्हारा भी धर्म रहे, कबूतर भी बचे, मेरा भी धर्म रहे। तो तुमको मांस खाना है, कबूतर का ही खाना है, ये नियम नहीं है। कबूतर के वजन के बराबर मेरा मांस काट के मैं देता हूं, तुम खाओ।
मनुष्य को, धर्म को रखना पड़ता है। उसके लिए त्याग करना पड़ता है और धर्म की रक्षा करने से सबकी रक्षा होती है, सारी सृष्टि ठीक चलती है। जो diversities है, उसका management ठीक से होता है। बिना किसी diversity को समाप्त किए होता है। आज का विश्व अगर हम देखते हैं, तो ये बात अभी नहीं है विश्व के पास। भूल गया हैं विश्व। 300-350 वर्षों के पहले से जो धीरे-धीरे जड़वाद बढ़ा और अति पर पहुंच गया। व्यक्तिवाद बढ़ा और अति पर पहुंच गया। केवल जड़वादी और उपभोगवादी विचारों के कारण, consumer और crash materialism के कारण, जो जीवन की विधा बनी, उसमें भद्रता नहीं रही, संस्कार नहीं रहा। तो हम देखते हैं आज, विश्व के देशों की स्थिति समाज में धीरे धीरे क्या बढ़ रहा है। जो सात सामाजिक पाप गांधी जी ने कहे थे, वो बड़े हैं। सभी जगह हो रहा है। wealth without work, pleasure without conscience, knowledge without character, commerce without morality, science without humanity, religion without sacrifice और politics without principles। महात्मा जी ने कहे हैं- ये सात सामाजिक पाप है। ये पाप सर्वत्र बढ़ रहा है। उपाय क्या है? अगर उपभोग ही जीवन का लक्ष्य है और अगर जड़ दुनिया में सत्य कुछ नहीं है, ये नष्ट होगा, बाद में किसने देखा है, तो फिर जीवन का कुछ अर्थ ही नहीं रहता, क्योंकि जन्मे हम अपनी इच्छा से नहीं हैं और मरेंगे कैसे, हमको पता नहीं है।
इन दो पॉइंट्स के बीच में जीना है और खूब उपभोग करना है, तो जैसे भी जीना है, जी लो। किसी को गला काट के, किसी के पेट पर पैर दे के बीच जी लो, उतना ही करना है ना। मृत्यु के बाद कुछ पता नहीं है। तो जंगल का राज होगा दुनिया में और होता है, ये हमने देखा है। अपना उपभोग ही प्रमुख है बाकी लोगों का क्या होगा, इसकी चिंता मत करो, इसलिए विकास अमर्याद होता है, तो पर्यावरण की खराबी होती है।
ये जो सारी समस्या आज दुनिया में दिखती है, दुनिया में कलह दिखता है। पहले महायुद्ध के बाद league of Nations बनी। दूसरा महायुद्ध फिर भी हुआ, UNO बनी। तीसरा महायुद्ध सीधा वैसे नहीं होगा लेकिन नहीं चल रहा है आज, ऐसा हम नहीं कह सकते। दुनिया में अशांति है कलह है। कट्टरपन बढ़ गया है।
( 26:22- 34:08) जीवन में किसी प्रकार की भद्रता, किसी प्रकार का संस्कार ना हो, ऐसी इच्छा रखने वाले लोग, वो इस कट्टरता का प्रचार करते हैं। हमारे मत के विरोधी जो बोलेगा, उसको हम कैंसल कर देंगे। ये जो नए शब्द आये ना वोकिजम, वगैरह-वगैरह। ये बहुत बड़ा संकट है, सब देशों पर है। अगली पीढ़ी पर है, सब देशों के अभिभावक लोग चिंतित हैं। बड़े लोग चिंतित है। क्यों? क्योंकि संबंध ही नहीं कुछ, हम सब अलग-अलग हैं। जोड़ने वाला तत्त्व नहीं है। पर्यावरण का नाश और विकास, मेल कैसे बैठा? जानते नहीं, इसलिए चर्चा तो बहुत होती है, उपाय भी बहुत बताए जाते हैं लेकिन हो रहा है क्या? नहीं हो रहा है। क्योंकि उपाय तब होगा, जब हम अपनी आवश्यकताओं पर संयम नहीं डालेंगे, नहीं होगा, संयम करना पड़ेगा। और इसलिए इस एक अधूरी दृष्टि से चल रही दुनिया को 180 डिग्री, अपने आउटलुक को बदलना पड़ेगा।
और वो आउटलुक है- धर्म। धर्म यानी religion नहीं। पूजा-पाती, खानपान वगैरह, इन सबसे परे धर्म है। मोक्ष की तरफ ले जाने वाला रास्ता, रास्ता यानी religion है। परंतु सभी religions पर, उनको चलाने वाला religion on the top of religion, वो धर्म है। उसमें विविधता का स्वीकार है। वो धर्म एक संतुलन सिखाता है, हमको भी जीना है, प्रकृति को भी जीना है, मुझे भी जीना है, समाज को भी जीना है। सबकी सत्ता है। अतिव्यक्तिवाद नहीं चाहिए लेकिन व्यक्ति का महत्त्व है, व्यक्ति की सत्ता है।
व्यक्ति की सत्ता है, समाज की सत्ता है, सृष्टि की सत्ता है। उनकी अपनी-अपनी जगह है, अपनी-अपनी मर्यादा है। उसको पहचान कर संतुलित ढंग से जीवन जीना, संतुलित ढंग से जीवन जीना सिखाना, वो जो नियम है संतुलन का, वो धर्म है। धर्म ये बैलेंस है। वो किसी एक्सट्रीमिटी पर जाने नहीं देता। इसलिए धर्मों को हमारे यहां कहते हैं मध्यम मार्ग ( the middle way)।
ये सारा जो आचरण है। अपने जीवन को धार्मिक जीवन बनाकर सारी दुनिया को देना, इसकी आवश्यकता है, आज की दुनिया संबंधों को तरस रही है और संबंध आज भी जतन किए जाते हैं। देखे जाते हैं, माने जाते हैं। ऐसा दुनिया का सबसे आगे देश कौन-सा है? वो भारतवर्ष है और ऐसा क्यों है? क्योंकि भारतवर्ष की ये परंपरा है। स्वामी विवेकानंद कहते थे ‘every nation has a message to deliver’ A mission to accomplish a destiny to fulfill। भारत की डेस्टिनी क्या है? वो कहते थे भारत धर्मपरायण देश है, दुनिया को समय-समय पर धर्म देना, ये भारत का कर्तव्य है। उसके लिए भारत को तैयार करना पड़ेगा। क्योंकि विश्व की आज इन समस्याओं का निदान अगर देना है, तो हमको धर्म तत्त्व का विचार किए बिना हमारा काम नहीं होगा।
कई प्रकार के प्रश्न आते हैं। आर्थिक उन्नति के प्रश्न आते हैं लेकिन आर्थिक उन्नति पर्यावरण के लिए नाशक बनती है। आर्थिक उन्नति के कारण गरीब और अमीरी इनमें जो दूरी है, वो बढ़ रही है सर्वत्र और आर्थिक उन्नति में दक्षिण के देश शिकायत करते हैं कि हमको लूटा जा रहा है। चर्चाएं होती हैं, उपाय सुझाए जाते हैं।
कुछ लीपापोती के जैसे उपाय हो भी जाते हैं। परंतु समस्याएं गयी नहीं हैं, इसकी चर्चा बहुत हो रही है, इन सब बातों की। शांति की चर्चा हो रही है, पर्यावरण की चर्चा हो रही है, उदारता की चर्चा हो रही है। उपाय भी बहुत सुझाए जा रहे हैं, अच्छे-अच्छे लोगों ने इसमें काम किया है परंतु Result is Far Away and Going Far Away.
क्योंकि प्रामाणिकता से इसको सोचकर इसके लिए आवश्यक संयम त्याग जीवन में लाना, इसके लिए आवश्यक संतुलित विचार अपने बुद्धि का बनाना, ये काम करना पड़ेगा, उसके लिए धर्म दृष्टि को जानना पड़ेगा। ये धर्म ये यूनिवर्सल है। वो हम भारत के लोग धर्म की बात करते हैं, तो भारतीय खोज नहीं है। सृष्टि के प्रारंभ से वो अस्तित्व में है- जैसे गुरुत्वाकर्षण है। गुरुत्वाकर्षण है, आप मानो या आप मत मानो, वो तो आपकी मर्जी है। गुरुत्वाकर्षण पहचान कर, मान कर चलेंगे तो बहुत बातें आपकी सरल हो जाएंगी, नहीं मानेंगे तो आपको ही ठोकर लगेगी।
ऐसे एक छोटे से कण का स्फोट होके इतना सारा विश्व बना। उसकी जो गति है, उसको पहचानकर, उसको ठीक से चलाने वाला जो एक प्राकृतिक नियम है, वो धर्म है। उसको पहचानकर अपने जीवन में एक अनुशासन लाना पड़ता है, संयम लाना पड़ता है, त्याग लाना पड़ता है और इसलिए ये धर्म विश्व धर्म है। हिंदू समाज संघटित होगा, तो क्यों होगा?
“विश्वधर्म प्रकाशेन विश्वशांति प्रवर्तक” विश्व शांति का प्रवर्तन करने वाला, विश्व धर्म दुनिया को देने के लिए, धर्म सर्वत्र जाना चाहिए, इसका मतलब सब जगह जाके कन्वर्जन नहीं करना है। धर्म में कन्वर्जन होता नहीं।
धर्म एक सत्य तत्त्व है, जिसके आधार पर सब चलता है, वही धर्म है, उसको स्वभाव कहते हैं, उसको कर्तव्य कहते हैं। और पानी का धर्म है बहना, अग्नि का धर्म है जलाना, ऐसा हम कहते हैं। तो एक प्राकृतिक गति जो है, उसको पहचान के उसके आधार पर पुनर्रचना, मनुष्य जीवन की करनी पड़ेगी, वो प्राकृतिक गति पहचान कर चलना यानी धर्म से चलना है। इस धर्म जीवन को देना है और नॉट बाय प्रीचिंग, नॉट बाय कन्वर्जन, बाय एक्जाम्पल, बाय प्रेक्टिस।
और इसलिए भारतवर्ष का जो लाइफ मिशन है। वो ऐसा जीवन जीना है ऐसा मॉडल खड़ा करना है, जिसका अनुकरण विश्व कर सके। अपनी-अपनी प्रकृति के आधार पर, अपने-अपने वैरायटी में उसका पुनरुत्पादन कर सके, पुनर्निर्माण कर सके।
(34:10- 40:55) मुझे याद आता है। 1991 में मैंने लक्ष्मणराव भिड़े जी, जो उस समय हमारे क्षेत्र के भी प्रचारक थे। उनका एक बौद्धिक वर्ग सुना, एक संघ शिक्षा वर्ग के उद्घाटन में। तो भारत के बाहर रहने वाले लोग थे, उनका था वर्ग। तो उन्होंने उनको कहा कि देखो सब जवान लोग थे (Below Thrity) उनको कहा कि ये बाहर जो हिंदू संगठन का काम चलता है, उसमें आपकी ये तीसरी पीढ़ी है। पहली पीढ़ी ने ये दिखा दिया कि संघ की शाखा सब जगह चल सकती है। जहाज पर शुरू हुई और आज विदेशों में संघ के स्वयंसेवक वहां के हिन्दुओं को संगठित करने का काम अलग-अलग संगठनों के माध्यम से कर रहे हैं। ये शाखा पद्धति ही लेकर चलते हैं। वो सब जगह अच्छा जीवन उत्पन्न कर सकती है। दूसरा उन्होंने कहा कि दूसरी पीढ़ी ने ये सिद्ध किया कि संघ के स्वयंसेवक बनने के बाद ये शाखा ट्रेनिंग है, उससे मनुष्य अतिरेकी उपभोग व्यसन आदि बुरी आदतों से दूर रहता है, उसका परिवार अपने प्रकृति के अनुसार चल सकता है। उन्होंने कहा आपकी तीसरी पीढ़ी है, आपके कंधे पर ये दायित्व आ रहा है अब कि आपको ऐसा संघ वहां-वहां अपने देश का खड़ा करना है, जिसको देख के उस देश के वासी जो हैं, वो कहेंगे हमारा ऐसा एक आरएसएस होना चाहिए और अपने मूल पर खड़े होकर अपने प्रकृति के आधार पर अपने परिस्थिति और प्रकृति के अनुसार वो अपने देश का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बनाए। ये प्रोसेस होगा और मुझे बड़ा आनंद है। मैं समझता था एक थियेराइजेशन है, कहां होगा लेकिन पिछली बार हमारा संघ शिक्षा वर्ग नागपुर का देखने के लिए कुछ लोग आए थे। उन्होंने जाते समय ये कहा, हमारा भी एक RSS होना चाहिए। वो सब देख के।
ये भारत को करना है, क्योंकि भारत उस प्रकृति में अभी भी चलता है। भारत ने सदा अपने नुकसान की अनदेखी करते हुए संयम बरता है। अपने नुकसान की अनदेखी करते हुए मदद की है, जिन्होंने नुकसान किया। उनको भी संकट में मदद की है।
व्यक्ति का अहंकार, उसके कारण शत्रुता बनती है, राष्ट्रों के अहंकार के कारण शत्रुता राष्ट्रों की बनती है और कायम रहती है। उस अहंकार के परे हिंदुस्तान है। लेकिन व्यक्ति जीवन से लेकर तो पर्यावरण तक सारी बातों में कैसा रास्ता हो, ये दिखाने के लिए भारत के समाज को अपना उदाहरण पेश करना पड़ेगा।
अब ये बात चालीस साल पहले भी हमारे द्वितीय सरसंघचालक पूजनीय गुरुजी, उनके भाषणों में कई बार आयी है। रज्जू भैया सरसंघचालक थे। उसके बाद उन्होंने सुदर्शन जी को सरसंघचालक बनाया। उसके पहले एक दो प्रतिनिधि सभा पहले उनका प्रतिनिधि सभा में उन्होंने कहा था कि अब हमको विश्व की बात करनी चाहिए।
तो विचार तो पहले से था। परंतु ये विचार बोलने में तो था हमारे लेकिन हम कहते किसी को, आज जो मैं बोल रहा हूं, वो उस समय अगर मैं बोलता, एक तो वो बुलाने से आप आते नहीं। क्योंकि हमारी वो स्थिति नहीं थी और आकर भी आप सुनते नहीं, अगर सुनते तो कहते कि ये कुछ सपना देख रहे हैं ये होने वाला है नहीं। भारत की भी वैसी स्थिति नहीं थी। आज है, आज भारत की ऐसी स्थिति है। आज संघ की ऐसी स्थिति है, जो मैंने कहा अनुकूलता है, क्यों है, सारा समाज मानता है, विचार को मानता होगा, नहीं मानता होगा, परंतु हमारी साख को मानता है, उसका विश्वास है।
और इसलिए हम कुछ बात कहते हैं तो समाज सुनता है और इसलिए 100 साल पूरे हो रहे हैं आगे का पड़ाव क्या है? तो आगे का ये पड़ाव रहेगा हमारा कि जो हम संघ में कर रहे हैं, वो सारे समाज में हो। चरित्र निर्माण का काम, देशभक्ति जगाने का काम और सारे समाज में हो नहीं रहा है, ऐसा नहीं है करने वाले लोग है। यही काम अन्य-अन्य पद्धति से करने वाले लोग हैं। व्यक्तिशाह करने वाले लोग हैं संगठन भी है।
उत्तम चारित्र्य संपन्न जीवन निर्माण करना अपने उदाहरण से ऐसा, जीवन जीने वाले व्यक्ति हैं। ये हैं, सामने नहीं आए। जो हम सुनते हैं, जो हम पढ़ते हैं, जो हम देखते हैं, वो क्या होता है? कभी-कभी एयरपोर्ट पर बैठने का मौका होता है। TV पर वो आता है। क्या, हाफ मिनट में एक-एक न्यूज सौ न्यूज लगातार, उसमें 80% होती हैं- ये घर जल गया, वहां बच्चा मर गया, यहां एक्सीडेंट हो गया, इसने उसको मारा, उसने इसको मारा, यही सब होता है। अब ये न्यूज है। कुत्ता आदमी को काटे, तो न्यूज नहीं है, आदमी काटे तो न्यूज है। तो न्यूज वही आती है। हमको लगता है कि बहुत खराब हो रहा है, बहुत खराब हो रहा है। खराब तो हो रहा है, ये जो सारे सात पापों के संकट हैं, भारत सहित सब पर है और सबको चिंता करनी पड़ेगी। परंतु भारत में आज जितना बुरा दिखता है, उससे चालीस गुना ज्यादा अच्छा समाज में है।
(41:00- 45:05) कोई केवल मीडिया रिपोर्ट के आधार पर भारत का मूल्यांकन करेगा, तो वो गलत ही होगा। ये हम प्रत्यक्ष जानते हैं, मिलते हैं हमको, जो अपना कुछ बिना लाभ के सेवा कर रहे हैं। गरीब लोग सेवा कर रहे हैं। अरे भाई, तुम्हारे अपने खाने के लाले, ये क्यों करता है तू, पूछा मैंने एक को, प्राइमरी टीचर था, नौकरी छोड़ दी। उसकी पत्नी नौकरी करके घर चलाती थी और ये क्या करता था, रास्ते पर कोई अनाथ मिला, किसी भी आयु का हो, उसको घर में लेकर आता था और वो अच्छा बन जाए अथवा वो समाप्त हो जाए, तब तक उसकी, सेवा करता था। हमने उनको पूछा कि आप तो लोअर इकोनॉमिक ग्रुप में हो, आय की दृष्टि से, तो कैसे चलता है? और चालीस लोग उसके घर में पड़े थे उस दिन, कि क्यों करते हो?
तो बोले, मुझे अच्छा लगता है, मुझे समाधान मिलता है। ऐसे बहुत लोग हैं भारत में। धर्म का व्याख्यान मैं यहां दे रहा हूं लेकिन धर्म को जीने वाले गांव-गांव में मिलेंगे, आपको शहरों की झुग्गी-झोंपड़ियों में भी मिलेंगे।
ये सारा जो भारत का बल है, जो आज बिखरा है लेकिन सक्रिय है। उसको एक पूरक रचना में बांधना है और इसलिए क्या होना चाहिए? सौ साल के बाद, अब जो मैं कहूंगा, वो तो पहले संघ में अप्रूव होना पड़ेगा वो संघ की प्रतिनिधि सभा तय करती है, मैं तय नहीं करता हूं। लेकिन उनके सामने क्या है, ये मैं बता सकता हूं, उनके विचार में क्या है। ये अगर हमको करना है, तो हमको समाज के कोने-कोने में पहुंचना पड़ेगा।
कोई व्यक्ति, कोई कुटुंब अनटच्ड ना रहे, ऐसा हमारे कार्य का विस्तार हमको करना पड़ेगा। भौगोलिक दृष्टि से सब तरफ एक-एक गांव में, एक-एक गली मोहल्ले में, एक-एक घर तक, समाज के सब वर्गों में और समाज के सब स्तरों में गरीबी रेखा के नीचे वालों से लेकर तो अमीरी रेखा के ऊपर वालों तक और अपने समाज की इतनी विविधताएं, जाति, पंथ, संप्रदाय सबकी, उन सब तक। ये विस्तार द्रुत गति से करना जल्दी से जल्दी संपूर्ण समाज में समाज को संगठित करने वाला संघ का उपकरण शाखा पहुंच जाए। वो शाखाएं अपनी-अपनी बस्ती की, अपने-अपने गांव की संभाल करें इस दृष्टि से, ऐसा एक संगठन का जाल जल्दी से जल्दी उत्पन्न करना, ये पहली बात रहेगी, उसी के भरोसे सब होगा। और ये जो सज्जन शक्ति बिखरी पड़ी है, समाज के सब वर्गों में है, सब स्तरों में है, उनको संपर्कित करना।
हम उनसे संपर्क करेंगे और उनका आपस में संपर्क भी बनाएंगे। ताकि वो लोग करें काम, अपना-अपना काम करें, अपने-अपने रीति से करें। संघ में आकर ही उनको करना चाहिए, ऐसा नहीं है। केवल नेटवर्किंग रखें। उनको पता रहे कि और भी लोग हैं। और भी लोग हैं ये पता रहने से और उत्साह बढ़ता है, आदमी काम करता है। और इन सब का करना परस्पर पूरक हो जाए। बाधक तो होता ही नहीं, अच्छा ही काम करते हैं सब लोग। लेकिन कॉन्शियसली एक कॉम्प्लीमेंटेशन उनका हो जाए, उनमें कोआर्डिनेशन आ जाए ताकि सब लोग मिलकर समाज के परिवर्तन के काम में अग्रसर हो जाएं।
(45:08- 54:23) दूसरी बात है कि ये होना है, तो इतना बड़ा समाज है, इतनी सारी विविधताएं हैं और जैसा मैंने कहा कि सृष्टि की विविधताएं परस्पर विरोधी भी होती हैं। किसी कारण टकराव भी पैदा होते हैं। तो समाज में अविश्वास और दुर्भावना है, तो समाज इकट्ठा होके कोई काम डिलीवर नहीं कर सकता। इतना बड़ा काम समाज को करना है। तो उसको तैयार होना पड़ेगा, उसके लिए आपस में सद्भावना अतिशय आवश्यक काम है। तो हम प्रयास करेंगे कि समाज के ऐसे सब जो वर्ग हैं, उनको चलाने वाले लोग होते हैं, उनके मुखिया लोग होते हैं, उनके ऑपिनियन मेकर्स होते हैं, ऐसे लोगों में परस्पर नित्य संबंध बना रहे। और परस्पर नित्य संबंध के चलते वो मिलते रहें। मिलकर वो तीन काम करें। जिस वर्ग से वो संबंधित है, उस वर्ग की उन्नति भौतिक और नैतिक दोनों प्रकार की। रूढ़, कुरीतियों से उनकी मुक्ति उनके जीवन में सुधार। उसके साथ-साथ उनको ये एहसास हो, सबको, अपने वर्ग के लोगों को कि हमारा एक वर्ग है, समाज की हमारी एक विशिष्टता है लेकिन उसके बावजूद हम इस पूरे समाज के अंग हैं।
पार्ट एण्ड पार्सल, ये पूरा समाज रहेगा, तो हमारा अस्तित्व रहेगा। और हमारा बढ़ना पूरे समाज के बढ़ने का कारण होना चाहिए। ये एक समझदारी उनकी बने, ये पहला विषय है। दूसरा विषय है कि ऐसे सब वर्गों के लोग मिलकर जब बात करेंगे, तो सोचेंगे कि जिस भौगोलिक कार्यक्षेत्र में हम हैं, उस कार्यक्षेत्र में अगर कोई अभाव है और अगर कोई समस्या है, तो समस्या का निरसन और अभाव की पूर्ति हम अपने बलबूते कितनी कैसी कर सकते हैं। उसको तय करना और अगले मिलने के पहले उसको पूरा करना है।
तो जो पहली बात कही मैंने कि हम पूरे समाज के अंग हैं, ये भाव और पक्का होगा वो अनुभूत बात हो जाएगी और तीसरी बात है कि हम सब लोग मिलते आपस में, हम वर्गों में कोई दुर्बल वर्ग अगर है, तो उसके लिए हम सब मिलकर अगली बैठक के पहले क्या करेंगे? क्या आवश्यक है? वो हम हमारे बलबूते कितना और कैसा कर सकते हैं? वो तय करके उसको पूरा करना है।
ये एक समाज के स्वभाव में आ जाए, वो एक सहज स्वाभाविक प्रक्रिया बन जाए, इसका प्रयास हम लोग करेंगे। सद्भावना सकारात्मकता की बात आती है। सकारात्मकता भी चाहिए क्योंकि सारा सुनके समाज भी कभी-कभी निराश हो जाता है, निराशा नहीं आनी चाहिए। इन दोनों बातों को जब सोचते हैं तो और एक विषय आता है कि अपने देश में अपने समाज के इतने सारे परंपरा से ही वर्ग हैं और बाहर से भी वर्ग आए हैं। विशेषकर रिलीजियस वर्ग हैं। तो बाहर से विचारधाराएं आयीं, आक्रमण के नाते आयीं लेकिन किसी कारण उनको स्वीकार जिन्होंने किया, वो तो यहीं के हैं और आज हैं, यही हैं।
तो विचारधारा भले रहे विदेशी, क्योंकि हिंदू विचार तो वसुधैव कुटुम्बकम वाला होता है। हर रास्ते को अच्छा मानता है। बोलने की बात नहीं है। संतों ने साधना करके दिखा दिया, रामकृष्ण परमहंस ने और इस्लाम की, ईसाईयत की भी साधना की और कह दिया कि वो भी वहीं पहुंचते हैं “जोतो मत तोतो पथ”। समाज का सामान्य स्वभाव ऐसे विचार करने का है।
लेकिन जो दूरियां बनी है, वो दूरियां पाटने के लिए दोनों ओर से कुछ करने की आवश्यकता है। वो होने के लिए कुछ संवाद बने। परस्पर दर्द समझ लें, परस्पर के प्रति दूरी विश्वास दूरी बनी हैं, अविश्वास जो है, उसको पाट कर निशंक होकर सब लोग एक देश के एक समाज के एक राष्ट्र के अंग के नाते अपनी विविधताओं के बावजूद समान पूर्वजों के अवसर समान संस्कृति की विरासतदार बनकर आगे बढ़ें।
ये तो सद्भावना और सकारात्मकता के लिए अत्यंत आवश्यक बात है। उसमें भी हम संभल-संभल के सोच-समझ के एक-एक कदम आगे बढ़ाने की बात कर रहे हैं। ये सब स्वयंसेवकों के विचार में है।
और अभी मैंने इतना दिया कि धर्म दृष्टि लेके ऐसा विकास होगा वैसा, तो भाई होगा, ये थ्योरी ठीक है उदाहरण दिखा दो। तो हम जो बोल रहे हैं उसके आधार पर हमको चिंतन करना पड़ेगा बहुत, क्योंकि ये दृष्टि तो एक जनरल ठीक है, उसको अब एप्लाई करना है, तो परिस्थितियां क्या हैं, समय क्या है, देशकाल परिस्थिति के अनुसार क्या बदलना है, क्या नहीं बदलना है ये सब सोच के, आज की परिस्थिति में, आज के समाज में, ये कैसे हो सकता है, इसके उदाहरण खड़े करने पड़ेंगे।
ये अपने देश को भी करना पड़ेगा राष्ट्रीय स्तर पर, क्योंकि अगर विश्व को ये रास्ता मिलना है, तो एक पूरा देश इन तत्त्वों के आधार पर कैसे चल सकता है, इन मूल्यों को कायम रखते, उसका देशकाल परिस्थिति अनुरूप प्रतिमान क्या होगा? अर्थनीति की बात आती है, हम कहते हैं कि हमारी अर्थनीति तो विकेंद्रित उत्पादन वाली होगी, एबंडेंट उत्पादन वाली होगी, मास प्रोडक्शन नहीं, production by masses होगा, less energy consumption पर्यावरण के लिए हितकारी होगी, रोजगार देने वाली होगी, मानवीय होगी, तकनीकी भी होगी तो मानवीय होगी, होगी, होगी ठीक है लेकिन अभी बताओ।
तो इसके प्रतिमान खड़े करने में स्वयंसेवक लगे हैं पहले से, पूरे देश के लिए कैसा हो सकता है, इसका पहले चिंतन होना चाहिए। उस चिंतन में केवल संघवाले रहें ऐसा नहीं है। बहुत सारे आर्थिक दृष्टि से प्रवीण लोग हैं, जानने वाले लोग हैं, अलग अलग मत होते ही हैं, इश्यूज पर मत हमेशा अलग-अलग होते हैं मूल्यों की, इन मूल्यों के बारे में किसी का मतभेद नहीं रहता है लेकिन इसका application कैसा करें, इसके हजार तरीके हो सकते हैं, हज़ार मत हो सकते हैं। उन सबने बैठकर इसकी चर्चा चलाकर एक प्रतिमान खड़ा करना, जो व्यावहारिक है और जो एक रास्ता दिखाएगा। ये राष्ट्रीय स्तर पर भी होने की बात है, स्थानीय स्तर पर भी होने की बात है, छोटे-छोटे स्थानीय प्रतिमान खड़े करने में तो अब स्वयंसेवक आगे बढ़े हैं। केवल स्वयंसेवक नहीं और भी लोगों ने ऐसे प्रतिमान खड़े किए हैं, उन सबसे नेटवर्किंग करना, एक्सचेंज करना, ये सब चल रहा है। परंतु इन सबके एक सुसूत्रता के आधार पर पूरे देश का ऐसा चिंतन बनाना। एक प्रतिमान प्रस्तुत करना, इसकी आवश्यकता है, इस दिशा में हमको आगे बढ़ना पड़ेगा, हम लोग बढ़ेंगे।
फिर ये हम बोल रहे हैं लेकिन ये बात समझ में तब आएगी, क्योंकि अपरिचित आदमी बोलता है, तो लोग सोचते हैं बोल तो ठीक रहा है, इसके अंदर क्या है और अपरिचित आदमी बोलता है, तो परिचय तो होता है, जैसे मंच से मेरा परिचय हुआ। अब उन्होंने जो बताया वो आपको पता है लेकिन मैं कैसा हूं ये आपको अभी पता नहीं है। वो आप मिलेंगे, दस बार मिलेंगे, इस स्थिति में क्या क्या, ऐसा सब देखेंगे, तब आपको पता चलेगा कई सालों के बाद। तो बताया जाता है लेकिन बताया जो जाता है, उसका विचार हो, जिनको सुनाते हैं, इसके लिए भी एक संबंधों की स्थिति आवश्यक है। तो इस विचार के आधार पर सर्वत्र संपर्क होना पड़ेगा और सबसे पहले पड़ोसी देशों में होना पड़ेगा। भारत के अधिकांश पड़ोसी देश पहले कभी भारत ही थे। लोग, वही हैं, Geography वही है। नदियां वही हैं, जंगल वही हैं, सब कुछ वही है, बस नक्शे पर रेखाएं खींची गयीं।
(54:26- 1:04:09) तो पहला तो कर्तव्य बनता है कि ये जो अपने ही हैं, वो अपनत्व की भावना से जुड़ जाएं। देश रहेंगे, अलग-अलग पहले भी थे। लेकिन जो विरासत में मूल्य मिले हैं, उनके आधार पर इन सबकी प्रगति हो, इन सबकी प्रगति हो, इसमें भारत का अवदान हो, कुछ योगदान हो। सबसे बड़ा भारत है, और इसलिए उनको जोड़ना, उनके यहां ध्यान देना, वहां शांति रहे, वहां स्थिरता रहे, वहां विकास हो, वहां का पर्यावरण ठीक रहे, वहां लोगों में संस्कार हो, पंथ-संप्रदाय अलग-अलग होंगे। परंतु संस्कार के बारे में किसका मतभेद है क्या(,) ऐसा बिल्कुल नहीं है। इसके लिए हम प्रयास करते हैं तो सभी जाति वर्ग के सभी पथ-संप्रदायों के लोग इसमें सहमत हैं, ये सब हो। इस दृष्टि से जिसको आज की भाषा में outreach कहते हैं, हम कहते हैं संपर्क, जीवंत संपर्क, मनुष्यों का मनुष्यों से मिलना।
हृदय से हृदय की बात करना। man to man contact, heart to heart talk, ये शुरू होना चाहिए। उसमें से जो विकसित होगा, उस वातावरण के चलते ये संबंध परस्पर पूर्वक बनेंगे, अच्छे बनेंगे, विश्व के लिए उपकारक बनेंगे। इस दृष्टि से हम क्या कर सकते हैं? ये भी स्वयंसेवकों के मन में चलता है।
अब ये सब करना है, तो मुख्यतः जो भारत वर्ष आज है, उसके समाज की गुणवत्ता काम करेगी। उसका जो चित्र दिखेगा, नहीं तो हम ये भाषण तो हम कर सकते हैं लेकिन लोग कहेंगे आपके यहां क्या हैं। आपके यहां कैसा है? तो शुरू तो अपने घर से करनी पड़ेगी, इसलिए इस हमारे विस्तार के आधार पर हमने सोचा है कि एक संगठित कार्यशक्ति खड़ी हो और संगठित कार्यशक्ति के आधार पर समाज का परिवर्तन हो, समाज का परिवर्तन यानी व्यवस्थाओं का परिवर्तन नहीं होता है। समाज का परिवर्तन यानी समाज के आचरण का परिवर्तन होता है। समाज की संगठित अवस्था का निर्माण होता है। उसके आधार पर व्यवस्था बदलती है। नहीं तो व्यवस्था बदलती नहीं है। कोई व्यवस्था अपने-आप को बदलती नहीं है। समाज तब बदल सकता है, जब वो गुण संपन्न हो, संगठित हो, उसके सामने एक स्पष्ट दृष्टि हो, उसका आचरण वैसा हो।
तो आचरण से बात शुरू करनी है, तो इस आचरण में परिवर्तन लाने वाले कुछ काम हमने शुरू किए हैं, आपके कान पर आए भी होंगे लेकिन फिर एक बार मैं उल्लेख करता हूं क्योंकि अब हम स्वयंसेवक और उनके घरों में ये काम हो, उसके आधार पर अड़ोस-पड़ोस के समाज को उसमें सहभागी करते हुए समाज में ये प्रवर्तित हो। उन पांच कामों को हम कहते हैं पंचपरिवर्तन, बहुत सरल काम है। कोई साधन नहीं चाहिए, कुछ नहीं चाहिए करने की इच्छा चाहिए। करना कैसा है, उसका एक उदाहरण चाहिए। उदाहरण स्वंयसेवक बनें, एकदम 100 प्रतिशत नहीं बन सकते, सौ प्रतिशत बनने तक रुक भी नहीं सकते, क्योंकि अर्जेंट नीड है, इसलिए स्वयंसेवक पांच कदम आगे जाएं, आज है और समाज को हम साथ में बुलाएं, इसका एक फायदा है। स्वंयसेवक दस हजार कदम आगे जाकर समाज को बुलाएंगे, समाज आएगा नहीं। हमारे बस की बात नहीं कहेगा लेकिन पांच कदम आ गया, तो आसानी से आता है। ऐसे ही ये पांच काम हैं। आपको पता है, जो सामाजिक पापों की बात है, संस्कारहीनता के कारण संबंधों के अज्ञानता के कारण जो होती है, उसको ठीक करने के लिए कुटुंब प्रबोधन।
बच्चे, विशेषकर नई पीढ़ी पढ़ी-लिखी, उसका mindset individualistic बनते चला जा रहा है। उसका मोबाइल क्या कर रहा है, वो मोबाइल में देखने के लिए परमिशन लेनी पड़ती है आजकल, ऐसा है। सब प्राइवेट रहता है, वो क्या कर रहा है, वो बताता नहीं, हम पूछेंगे तो लिमिटेड बताता है, ज्यादा पूछेंगे तो उसको लगता है कि ये टायरनीय है, जो उसको फीड किया गया है, वैसा कर रहा है वो। अब ये सबंधहीनता की ओर जाने वाला रास्ता है, जिसके दुष्परिणाम हम देख रहे हैं सर्वत्र। उसको ठीक करना है, तो बचपन से अपने परिवार में उसको इसका ज्ञान होना चाहिए और इसलिए परिवार के सब लोगों ने सप्ताह में एक बार बैठना, निश्चित समय पर घर पर रहना, श्रद्धानुसार भजन करना, घर में बनाया हुआ भोजन मीन-मेख निकाले बिना करना और उसके बाद तीन-चार घंटा गपशप करना। डिक्टेशन कुछ नहीं देना, गपशप करना और उसमें हम कौन हैं? हमारे पूर्वज कौन थे? हमारी कुल रीति क्या है? अपने घर की रीति क्या है? क्या भद्र है, क्या अभद्र है। ये जो चलता आया है, उसमें आज के समय में क्या-क्या टिक सकता है, क्या-क्या हो सकता है, क्या-क्या आवश्यक है, जो बदलना चाहिए, वो क्या है? इसके आधार पर अपने घर में आज कैसा है, उसको कैसा होना चाहिए। इसकी कुछ सहमति बनी, तो उतनी बात को लागू करना, हर हफ्ते बैठना। सबने बैठना, दूध पीता बच्चा भी है उसको कुछ समझ में नहीं आएगा लेकिन वो वहां रहे, श्रवण संस्कार भी एक होता है।
माता-पिता ने ध्यान रखना है कि जो अपने को चाहिए, वो होना है, तो पहले खुद को वैसा बनना पड़ेगा। बच्चे इस चर्चा में प्रश्न पूछेंगे, उत्तर देने के लिए अपनी तैयारी चाहिए। लेकिन बैठना, गपशप करना। दूसरी बात, अपना देश, अपना राष्ट्र हमारा सबका मिलकर एक सत्व है। उसका परिचय, हमारे पूर्वजों के आदर्श क्या थे? ये जो सारी दृष्टि है, वो तो हमारी परंपरा की दृष्टि है। उसका काल सुसंगत विवरण, इतिहास आदि बताना अच्छी कहानियां बताना, हमारे घर में हम इसमें से क्या लागू कर सकते हैं, इसकी सहमति बनाना और लागू करना। और तीसरी बात है कि रोज मैं मेरे लिए कमाता हूं, मेरे परिवार के लिए कमाता हूं, खर्चा भी करता हूं, रोज मेरा समय भी मैं मेरे लिए परिवार के लिए खर्चा करता हूं। मैं और मेरा परिवार जिसके कारण है, उस अपने राष्ट्र के लिए, समाज के लिए, धर्म के लिए हम क्या करते हैं? रोज, छोटे-छोटे काम हैं, बच्चे भी कर सकते हैं, ऐसे काम हैं।
नौवीं में पढ़ने वाली लड़की, वो अपने कॉलोनी में जो काम करने के लिए कर्मचारी आते हैं, उनके बच्चों को वो सिखाती है, छोटा बच्चा भी कर सकता है। घर में एक पौधा लगाना, उसकी चिंता करना, छोटा बच्चा भी कर सकता है। सोचना, क्या-क्या हो सकता है, कौन क्या कर सकता है, कौन कितना समय देता है समाज के लिए।
ये चर्चा करना और चर्चा में से सहमति बनाना, सहमति लागू करना, जब ऐसे काम बच्चे करने लगेंगे, तो अपने आप उनको संबंधों का महत्त्व ध्यान में आएगा। भाषण से नहीं आएगा। अनुभूति देनी पड़ेगी। अनुभूति देनी पड़ेगी, कभी जाते है घूमने के लिए, तो जैसे सिंगापुर जाते हैं, पैरिस जाते हैं, वैसे कभी ले जाओ कुम्भलगढ़ में ले जाओ, कारगिल की सीमा दिखा के लाओ, अपने शहर में कोई झुग्गी-झोंपड़ी है, वहां लोग रहते हैं, कैसे रहते हैं, दिखा के लाओ।
sensitize करने से बच्चे इन बातों को बहुत मूलतः सतप्रवृत्त होते, वो इधर ही जाएंगे। बारह साल तक उसकी अपने घर मे एक mental position बन जाती है वो बननी चाहिए, ये है कुटुंब प्रबोधन। दूसरा, जो सबको समझ में आता है और तुरंत लोग उसका अनुकरण भी करते हैं और पकड़ लेते हैं, वो है पर्यावरण। अब नीतिगत बाते तो बड़ी हैं, उसको बदलने में बहुत समय लगेगा। इतने आगे बढ़ गए हम लोग कि अगर तुरंत मुड़ेंगे तो गाड़ी उलट जाएगी। वो तो एक लम्बा घुमावदार आर्क लेके धीरे-धीरे ही घूमना पड़ेगा लेकिन अपने जीवन में कुछ करने की छोटी बातें तो हम कर सकते हैं। अभी तीन बताई हैं, पानी बचाओ, सिंगल यूज प्लास्टिक हटाओ और हरियाली पेड़ लगाओ और उत्साह से लोग करते हैं। इससे मनुष्यों में एक मानवीयता भी आती है। पर्यावरण का सुधार भी होता है। इसके सामूहिक उपक्रम चलते हैं, उसमें भाग लेना, अपने घर में ये करना।
(1:04:12- 1:06:52) तीसरी बात है, सामाजिक समरसता, जो करने में कठिन है लेकिन करनी ही पड़ेगी। समानता समता की बात करना तो आसान है लेकिन ये विषमता कहां है? व्यवस्थाएं विषमता वाली क्यों बन जाती हैं। मनुष्य बनाता है, ये विषमता मनुष्य के मन में है।
मुझे किसी मनुष्य को देखकर या उसका नाम सुनकर, अच्छा, ये जाति होगी, ऐसा लगता है, ये गड़बड़ है। मनुष्यों को देखकर, मैं एक मनुष्य को देख रहा हूं, ऐसा मुझे नहीं लगता। मैं एक जाति वाले को देख रहा हूं, ऐसा मुझे लगता है। क्लास वन है कि क्लास फोर है, ऐसा मुझे लगता है। इसको मन से जाना चाहिए, तो इसके लिए कुछ व्यवहार करना पड़ेगा और इसलिए जिस इलाके में हम रहते हैं, हमारा संचार है, जाना-आना है, उठना-बैठना है, कार्यालय हो, अपना ऑफिस हो, अपनी बस्ती हो, वहां जितने प्रकार के लोग रहते हैं, हम तो पूरे समाज को एक ही मानते हैं लेकिन लोग उसमें प्रकार मानते है, जात-पात मानते है, सब बातें मानते हैं। जातिगत विषमता की समस्या है। सब प्रकार के लोगों में अपने मित्र होने चाहिए व्यक्तिगत, और उनके कुटुंबों में अपने कुटुंब की मित्रता होनी चाहिए। उनका घर में आना-जाना, उठना-बैठना, पर्व-त्योहारों पर, सुख-दुख में सहभागी होना, जैसे मित्रों का चलता है, वैसे हमारा और हमारे परिवार का सब प्रकार के परिवारों में, सब प्रकार के लोगों में होना चाहिए।
आज शुरू करो, तीन चार साल में पूरा बन जाएगा। लेकिन शुरू करना पड़ेगा, सबको करना पड़ेगा और जहां अपना एक ऐसा समूह बन जाता है, उसकी साख है। वो कहेगा। तो बातें होती है, वहां पर मंदिर, पानी, श्मशान में कोई भेद नहीं होना चाहिए, वो सबके लिए है। मंदिर, मंदिर के भक्तों के लिए है। भक्त किस जात का है, वगैरह नहीं पूछा जाता। पानी, पानी सब मनुष्यों के लिए है, उसमें भेद नहीं होता। मरने के बाद भी श्मशान में भेद क्यों होना चाहिए। ये करना, अपने गांव में, अपनी बस्ती में।
(1:06:54- 1:12:04) और चौथी बात है कि आत्मनिर्भरता सब बातों की कुंजी है, विकास भी करना है, तो हर बात में अपना देश आत्मनिर्भर होना चाहिए, अपने घर से ही शुरू करना। जब ये स्वदेशी की बात करते हैं, तो लगता है कि विदेशों से संबंध नहीं रहेंगे वहां पर, ऐसा नहीं है, आत्मनिर्भर होना यानी बाकी लोगों को बंद करना नहीं है, आत्मनिर्भर होना है लेकिन दुनिया परस्पर निर्भरता पर चलती है। कुटुंब भी परस्पर निर्भरता पर चलता है। और इसलिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार तो चलेगा और उसमें लेनदेन होगी, बस इसमें दबाव नहीं होना चाहिए, स्वेच्छा होनी चाहिए।
और इसलिए स्वदेशी का पालन करना, यानी क्या है, जो घर में बनता है, वो बाहर से नहीं लाना। गर्मी के दिनों में आप अच्छा नींबू की शिकंजी बनाकर पी सकते हो, कोका कोला क्यों लाना या स्प्राइट भी, बाहर का पेय क्यों लाना, अपने घर का लाना। पिज्जा वगैरह, घर में बहुत अच्छा भोजन मिलता है, पोषक भोजन मिलता है, उसके अच्छे परिणाम स्वास्थ्य पर होते हैं। सारे डॉक्टर लोग जानते हैं और बताते भी हैं। लेकिन बार-बार, हां, एक आधा बार गए, मजा करने के लिए, पिज्जा खाया, चल सकता है। उतना उसमें लचीलापन रखना चाहिए लेकिन हर इतवार को बाहर जाके खाना, क्यों खाना? ऐसा नहीं करना है। ऐसी कुछ बातें और जो अपने गांव में होता है, बाहर से लाने से अपने गांव के रोजगार को मार पड़ती है। अपने गांव का खरीदो।
अपने राज्य में कारें बनती हैं, वहीं से खरीदो, सस्ती मिलती है इसलिए बाहर के राज्य से क्यों खरीदते हो। हरियाणा से सस्ता पेट्रोल, ऐसा बोर्ड मिलता है कभी-कभी। अरे भाई, हम जहां के हैं, वहां का खरीदो। क्योंकि उस पर पेट चलता है, ऐसे ही अपने देश में जो बनता है, वो बाहर से लाने की जरुरत नहीं है। जीवन आवश्यक है और अपने देश में नहीं बनता, बाहर से लेंगे। देश की नीति में स्वेच्छा से अंतरराष्ट्रीय व्यवहार होना चाहिए, दबाव में नहीं जाना चाहिए।
ये स्वदेशी है, क्या लेना, कितना लेना, बाहर से इन्वेस्टमेंट लाना, नहीं लाना, ये इश्यूज है, उस समय के प्रश्न हैं। परंतु तत्त्व ये होना चाहिए, ये स्वदेशी है और दूसरी भाषा बात है, अपने घर के चौखट के अंदर अपनी भाषा चाहिए, अपनी वेशभूषा चाहिए, स्वभाषा स्वभूषा, भाषा, भूषा, भजन, भोजन। अपने घर के अंदर अपना चाहिए, अपनी परंपरा का चाहिए। भ्रमण और भवन भी, अपना भवन अपनी परंपरा से होना चाहिए। बहुत अच्छा घर बनाया और पूजा घर नहीं बनाया, तो हिंदू परंपरा का घर नहीं होगा। पूजा घर रहता है अच्छे स्थान पर रहता है। ये पूजा घर बनाने को कहा, तो सीढ़ी के नीचे त्रिकोणक आता है ना, उसमें बना दिया, ऐसा नहीं करना। ठीक से, भाषा, भूषा, भजन, भवन, भ्रमण, भोजन, भ्रमण यानी वही मैंने कहा, लोगों को कुम्भलगढ़ लेकर जाओ और जाओ पैरिस, सिंगापुर भी देखो, दुनिया देखनी चाहिए। लेकिन कुम्भलगढ़ भी देखो और झुग्गी झोंपड़ी भी देखो, अपने लोग हैं वहां रहने वाले, अपने बंधु हैं। कल हो सकता है, उसमें से एक आधा अरबपति बने और अपने सामने बड़ी बिल्डिंग बनाए।
इस अपनत्व के साथ, अपने घर के चौखट के अंदर अपना व्यवहार करना। ठीक है, फुल पैंट में रहना पड़ता है, पाश्चात्य वेश में रहना पड़ता है, कोई विरोध नहीं। वैसे देखा जाए, तो अपना वेश पराया वेश नहीं होता। जो विधिवत कन्वीनिएंट है, वो पहनना। परंतु हमको धोती पहननी आती ही नहीं, ऐसा नहीं होना चाहिए। हमारे देश के आबोहवा के अनुसार हमारे ये परंपरागत वेश बने हैं। कम से कम पर्व-त्योहारों पर उसको पहनना चाहिए।
ये स्वबोध है। अपना हस्ताक्षर हम कर नहीं सकते अपनी भाषा में, छोटी बात है, बदल दो। अगर अंग्रेजी में करते हो, तो अपनी भाषा में करो। जहां आवश्यक है, वहां अपनी भाषा के शब्द प्रयोग करो। ये वृत्ति है, स्व का बोध होने से जो आदमी बनता है। स्व के आधार पर ही प्रगति होती है। ये चौथा है।
(1:12:04- 1:16:04) और पांचवा है, हर हालत में संविधान, नियम, कानून इसका पालन करके चलना। कोई भड़काऊ बात हो गयी, कानून हाथ में नहीं लेना। उसने हमको चिढ़ाया, उसने हमारा अपमान किया, उसने हमारी श्रद्धा को गाली दी। इसलिए हम उसको, ये नहीं करना है, ये गुनाह है। पुलिस में जाओ, पुलिस कुछ करे इसके लिए छोटा सा आंदोलन करना पड़ेगा, तो करो। तरीके हैं, ये सारे विरोध करने के तरीके हैं। अपवाद केवल एक है, अभी सामने प्राण पर ही संकट है, कुछ किया नहीं तो मार ही देगा, तब तो आत्मसंरक्षण का अधिकार सबको है। परंतु ऐसा बहुत कम बार होता है।
ऐसा एकाध मौका हर एक की जिंदगी में आता है, तब की बात अलग होती है लेकिन सामान्य रूप से कुछ भी Provocation (उकसावा) हुआ कि तुरंत टायर जलाओ, पत्थर फेंको, ये नहीं होना चाहिए। हाथ में कानून लेकर बात नहीं करनी चाहिए। इसका लाभ लेते हैं उपद्रवकारी लोग। हमको तोड़ने में इसका उपयोग करते हैं। वो Provoke नहीं होना और गैर कानूनी आचरण नहीं करना, अपने बिल समय पर भरना, लाइसेंस आदि एक्सपायर होने के पहले रिन्यू करना, ये सब अपने देश के लिए करने के काम है। दैनिक जीवन में देशभक्ति क्या होती है?
एक जमाना था, तब देश के लिए फांसी झूलना पड़ता था, तो हंसते-हंसते फांसी गए अपने पूर्वज। लेकिन आज देश के लिए 24 घंटा जीने की जरूरत है और वो जीना ऐसे होता है, छोटी-छोटी बातों में भी समाज का, देश का, सबका ख्याल करके अपने आपको रखना है।
मैंने एक लोटा पानी डाला, तो क्या होगा? अकाल पड़ा, तो राजा ने कहा कि शिव जी का अभिषेक करो दूध से, सब लोग एक एक लोटा दूध लेकर आओ। तो एक चतुर आदमी था, उसने सोचा सब लोग दूध डालेंगे, मैं एक लोटा पानी डालूंगा। किसको समझ में आएगा? तो गया, देखता है, तो सब पानी ही है वहां क्योंकि सभी लोग अक्लमंद थे। ऐसे विचार नहीं करना है। मेरे से शुरू होगा, मेरे घर से शुरू होगा समाज में जाएगा। समाज में जाएगा, तो भारत में आएगा, भारत दिखेगा, तो फिर दुनिया देखेगी, तो फिर हमारी इन बातों में कुछ दम है, ऐसा उनको लगेगा।
इस दिशा में समाज को अग्रसर करने का काम करना हमारे संघ ने ये करना चाहिए। हम इसको करेंगे, इस प्रकार की चर्चा स्वयंसेवकों में चल रही है। उस चर्चा के बाद निर्णय होगा और निर्णय में, इतना लग रहा है लोगों को इसमें से कई बातें तो होंगी, पंच परिवर्तन बात तो होगी ही होगी लेकिन बाकी भी बातें मैंने की हैं उस दिशा में। आज नहीं कल होना है आज होना है कि नहीं उसका निर्णय हमारी प्रतिनिधि सभा करेगी, हमारे सरकार्यवाह जी बताएंगे। परंतु ये सब करना है क्योंकि, भारत बने, “हम रहें या ना रहें, भारत यह रहना चाहिए”। ये मेरे लिए भी रहना चाहिए, आपके लिए भी रहना चाहिए। ये भारत के अपने लिए भी चलना चाहिए, ये दुनिया के लिए भी रहना चाहिए क्योंकि इस धर्म को देने वाला दूसरा नहीं है, हमको देना पड़ेगा। ये हमारा काम है अहंकार नहीं इसमें करना। हम कोई तीसमारखां हैं? सारी दुनिया को छड़ी लेकर सिखाएंगे, ये विश्व गुरु पद नहीं है। विश्व गुरु पद है अत्यंत विनम्रता से जाना। अपने आचरण से सिखाना।
(1:16:06- 1:99:55) एक बंगाली कविता में कहा है ‘हिंदू कीर्ति सिंधु मतति, अमृत भांडा हाथी, बाहिरे विश्वे त्ववीर तो माए आशीष मांगे’। हे भारत माता, तुम्हारी कीर्ति से मथित ये पात्र लेकर बाहर विश्व में तुम्हारे जो लोग हैं, तुम्हारे जो पुत्र हैं वो तुमसे आशीर्वाद मांग रहे हैं। ‘तादेर मुखेर मधुमय बानी सुने थमे जाए सोब हाना-हानि’। उनकी मधुर वाचा सुनकर विश्व के कलह समाप्त हो रहे हैं। श्री महादिनेर महा इतिहास चित्तभोर्या ऐसा इतिहास जिस दिन बनेगा उसको चित्त भर के श्रवण करो। भारत का ये विश्व में समय-समय पर अवदान होना, ये ईश्वरीय योजना है। उसके लायक हम सबको बनना है, अपने देश को बनाना है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसीलिए हैं। The evolution of life mission of Hindu Nation और इसलिए ये किसी का है और किसी का नहीं, ऐसा नहीं है, सबका है। मतांतर अनेक होते हैं, पार्टियां अनेक होती हैं, स्वार्थ अलग-अलग होते हैं। इन सबसे परे जाकर केवल और केवल देश का तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहे न रहे, इस प्रकार का विचार करके अपनी सारी योजना करके संपूर्ण समाज को ही संघ बनाने का ये काम है। संघ को अहंकार नहीं है, संघ को ये चाहिए भी नहीं कि कल क्रेडिट बुक में लिखा जाए कि ये संघ के कारण हुआ। संघ चाहता है कि इस देश के समाज ने एक ऐसी छलांग लगाई, ऐसी छलांग दिखाई जिसके चलते भारत का कायापलट तो हुआ ही, संपूर्ण विश्व में एक सुख शांतिपूर्ण नई दुनिया खड़ी हो गई। ये करने के लिए संघ का काम है।
इसको आप संघ के अंदर आकर देख सकते हैं, जो मैं बोल रहा हूं, वो सारा वहां है। कभी भी बताकर, बिना बताए संघ के घरों में जाइए, शाखा में जाइए, संघ के कार्यक्रमों में रहिए, आपको ये सारी बातें वहां बीज रूप में या धीरे-धीरे विकसित होते हुए मिलेंगी। मैं ये जो सब बता रहा हूं, संघ का प्रचार करने के लिए नहीं बता रहा हूं। मैं ये सब बता रहा हूं संघ क्या है? आपको बता रहा हूं ये फैक्ट्स है। आप जो भी सोचेंगे संघ के बारे में वो फैक्ट्स पर आधारित होना चाहिए। Convince (सहमत) आप हो, ये मेरा आग्रह नहीं है।
ये सब सुनकर आप विपरीत मत भी बना सकते हैं लेकिन सरसंघचालक ने ये जो बताया या संघ में हमने जो जाके देखा, उसके आधार पर हम ये कर रहे हैं। ऐसा कहने की आपको मोहलत होनी चाहिए। इसलिए ये आपने सुना है, यहां रुकिए नहीं, समय-समय पर एकदम सब लोग आएंगे, तो हमारे पास जगह नहीं है। बारी-बारी आप सब लोग आकर संघ को अंदर से देखिए। संघ को समझिए और अगर ये बात आपको ठीक लगती है, जो मैंने बताई वहां मिलती है, तो अपने व्यक्तिगत जीवन से लेकर, तो सारे विश्व के जीवन को संभालने वाला, विश्व धर्म विकसित करने के इस काम में भारत को तैयार करने वाला ये अभियान, उसके आप सहयोगी कार्यकर्ता बनिए, इतनी एक बात आपके सामने अनुरोध के रूप में रखता हूं।
दो दिन लंबे भाषण आपने मेरी सुन लिए। इसलिए आपका धन्यवाद करता हूं और कल आपसे प्रश्नों को आमंत्रित करता हूं। इतने सारे प्रश्न आएंगे, तो उसको थोड़ा बनाना पड़ेगा। छूटेगा कुछ नहीं, विषय सब आएंगे लेकिन प्रश्न कंडेंस्ड होंगे। इतनी एक बात बताता हूं और मेरे चार शब्द समाप्त करता हूं।
उनके पूरे व्याख्यान को नीचे दिए गए लिंक पर देखें-













