Day-1: तीन दिवसीय व्याख्यानमाला, 100 वर्ष की संघ यात्रा ‘नए क्षितिज’
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना का शताब्दी वर्ष मना रहा है। इस अवसर पर नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में तीन दिवसीय व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया। संघ के इस कार्यक्रम का विषय ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ रखा गया है। पहले दिन कार्यक्रम की शुरुआत वंदे मातरम् के साथ हुई। कार्यक्रम में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत, सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले, पवन जिंदल (उत्तर क्षेत्र के क्षेत्रीय संघचालक), और डॉ. अनिल अग्रवाल (दिल्ली के प्रांत संघचालक) शामिल हुए।
इस मौके पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने संघ की 100 वर्ष की अविस्मरणीय यात्रा और इसके अनुभवों पर प्रकाश डाला। नीचे उनके पूरे व्याख्यान को पढ़ें।
माननीय सरकार्यवाह जी, माननीय क्षेत्र संघचालक जी, माननीय प्रांतसंघ चालक जी। उपस्थित सभी संघ के माननीय अधिकारी गण। और राष्ट्र जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले सभी गणमान्य जन। विदेशों का प्रतिनिधित्व भारत में करने वाले सभी डिप्लोमेट्स, पूज्य संतचरण, माता भगिनी।
2018 में इसी प्रकार का एक कार्यक्रम इसी सभागृह में हुआ था। संघ के बारे में बहुत सारी चर्चाएं चलती ही हैं। ध्यान में आया कि चर्चा में जानकारी कम है। जो जानकारी है, वो ऑथेंटिक नहीं है और इसलिए अपने तरफ से संघ की सत्य और सही जानकारी देना, जो भी संघ के बारे में चर्चा हो, परसेप्शन के आधार पर ना हो, फैक्ट्स के आधार पर हो। वो मालूम होने के बाद निर्णय क्या करना, निष्कर्ष क्या निकालना, वह तो जो सुनेगा, उसका अपना अधिकार है।
किसी को कंविंस नहीं करना है, बस बताना है। इस उद्देश्य से वो संवाद हुआ और वह संवाद अपेक्षाकृत बहुत अच्छी तरह हुआ। संघ के बारे में सत्य जानने के बाद बहुत सी बातें, जो मन में बिना कारण थीं, वह चली गईं। उस सभा में आए हुए सब लोग संघ के बन गए, ऐसा नहीं कह सकते, लेकिन वो उद्देश्य भी नहीं था।
अभी शताब्दी के कार्यक्रमों का विचार जब हो रहा था, तब फिर से यह कल्पना आई कि फिर से ऐसा एक संवाद उस समय एक ही स्थान पर हुआ था, अब देश में चार स्थानों पर हो, ताकि अधिक लोग उसमें सहभागी हो सकें, बाद में प्रश्न पूछ सकें। लेकिन जो पहले बताया है, उस समय भी मीडिया ने बहुत अच्छी तरह, उसे सारे देश में पहुंचाया था। तो वही सारी बातें फिर से बतानी हैं क्या?
संघ एक विषय है, तो संघ के बारे में हर साल नया बताने का कुछ नहीं रहता है। तो, इस बार यह हुआ कि 100 वर्ष पूरे हो गए हैं। आगे हम संघ के कार्य को कैसा देखते हैं, हमारे मन में क्या चल रहा है? यह भी रखा जाए। इसलिए न्यू होराइजंस (नए क्षितिज) ऐसा शब्द व्याख्यानमाला के टाइटल में है। और दूसरा यह किया जाए कि 70-75% नए लोगों को बुलाया जाए। तो इसलिए जो दो व्याख्यान होने वाले हैं, उसमें आज के व्याख्यान में संघ के बारे में मैं बताऊंगा। पिछली बार, जो दो भाषणों में बताया, वह एक भाषण में बताऊंगा।
100 साल की संघ की यात्रा हो रही है, क्यों हो रही है? संघ चलाना है, ऐसा नहीं है। संघ चलाने का एक उद्देश्य है। और यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क्यों शुरू हुआ? इतनी सारी बाधाएं वगैरह आईं, स्वयंसेवकों ने सारी कठिन परिस्थितियों में से रास्ता निकालकर, इसको चलते क्यों रखा? और 100 साल चलने के बाद भी नए क्षितिजों की बात क्यों कर रहा है? इसका अगर एक वाक्य में आपको उत्तर देना है, तो वह वाक्य संघ की प्रार्थना के अंत में हम स्वयंसेवक लोग रोज कहते हैं- ‘भारत माता की जय’।
अपना देश है। उस देश की जय-जयकार होनी चाहिए। उस देश को विश्व में एक अग्रगण्य स्थान मिलना चाहिए। लेकिन क्यों मिलना चाहिए? अग्रगण्य स्थान तो एक ही देश प्राप्त करेगा और विश्व में सैकड़ों देश हैं। उसके लिए भी एक नई स्पर्धा उत्पन्न करनी है क्या?
तो ऐसा कोई इरादा नहीं है। लेकिन उसके पीछे एक सत्य है। दुनिया में इतने देश हैं, क्यों हैं? विश्व बहुत पास आ गया है। अभी ग्लोबल बात होती है। विश्व पास आ गया है, इसलिए ग्लोबल विचार करना ही पड़ता है। तो एक देश के बड़े होने का महत्त्व क्या है? तो यद्यपि, सारे विश्व का जीवन एक है, मानवता एक है, फिर भी वो एक जैसी नहीं है। उसके अलग-अलग रूप है, अलग-अलग रंग है और ऐसा होने के कारण विश्व की सुंदरता बढ़ी है, क्योंकि हर एक रंग का अपना-अपना कंट्रीब्यूशन है, योगदान है।
और अगर विश्व के इतिहास को देखते हैं, तो स्वामी विवेकानंद का वो कथन कि ‘Every Nation has a Mission to Fulfill’। प्रत्येक राष्ट्र का एक मिशन होता है, दुनिया में जो फुलफिल करना है। प्रत्येक राष्ट्र का विश्व में कुछ योगदान होता है, जो समय-समय पर उसको करना पड़ता है।
वैसे भारत का भी अपना एक योगदान है। विश्व के किसी देश को बड़ा होना है, अपने बड़प्पन के लिए नहीं होना है। उसके बड़े होने से विश्व के जीवन में जो एक आवश्यक नई गति चाहिए, वह पैदा होती है, उसका उस प्रकार का योगदान होता है, इसलिए योगदान करने लायक उसको बनना है, इसलिए बड़ा होना है।
और इसलिए संघ के निर्मिती का प्रयोजन भारत है। संघ के चलने का प्रयोजन भारत है और संघ की सार्थकता, भारत के विश्व गुरु बनने में है। क्योंकि भारत का एक योगदान दुनिया में है वह योगदान उसको देना है, उसका समय आ गया है। इसके बारे में कल हम अधिक चर्चा करेंगे। परंतु यह भारत के उत्थान की शुरुआत कब हुई? तो यह एक धीमी और लंबी प्रक्रिया है जो अभी भी चल रही है।
हमारे इतिहास में हम जानते हैं कि हम वैभव के शिखर पर थे, स्वतंत्र थे। फिर आक्रमण हुए, हम परतंत्र हुए और दो बार बड़ी परतंत्रता झेलकर हम स्वतंत्र हुए। उस परतंत्रता में से मुक्त होना, यह पहला काम था। अपने देश को बड़ा करना है, तो स्वातंत्र आवश्यक है। श्रृंखलाओं में बंधा आदमी स्वतंत्रता प्राप्त नहीं कर सकता और इसलिए अपने लिए कुछ कर भी नहीं सकता है। तो, ये स्वातंत्र्य के लिए प्रयास शुरू हुए और एक व्यापक अखिल भारतीय प्रयास, उसके लिए युद्ध 1857 में हुआ। वह युद्ध, कुल मिलाकर विफल हुआ और उस विफलता के कारण देश में विचार शुरू हुआ कि यह हमारा देश है, हमारी जनसंख्या प्रचंड है। हमारे अपने राजा-महाराजा हैं। हजारों मील दूर से आकर मुट्ठी भर लोग, जो इस देश को जबरदस्ती चला रहे थे, उनके सामने हम हार कैसे गए? हार क्यों गए?
तो बहुत आशावादी लोगों का उत्तर था कि इस बार हार गए, तो क्या हो गया? फिर से एक बार ऐसा ही प्रयास करना चाहिए- सशस्त्र क्रांति। तो एक धारा वो फिर से बह चली, क्रांतिकारियों की धारा। देश के लिए अपना जीवन, अपना यौवन हवन करने वाले लाखों उदाहरण उस धारा में से निकले, जो हम सबके आज भी प्रेरणा स्रोत हैं, आदर्श हैं, जीवन के बारे में। देश समर्पित जीवन कैसा होता है। परंतु उस धारा का प्रयोजन समाप्त हो गया, स्वतंत्रता मिलने के बाद। और इसलिए सावरकर जी उस धारा के एक देदीप्यमान रत्न थे, उन्होंने स्वतंत्रता के बाद पुणे में अपने उस क्रांतिकारक अभियान का समापन विधिवत कर दिया, सार्वजनिक कार्यक्रम करके।
तो वह धारा अब नहीं है, उसकी आवश्यकता भी नहीं है। परंतु देश के लिए जीने-मरने के लिए प्रेरणास्रोत वो धारा बनी है। लेकिन कुछ लोगों को लगा कि इस लड़ाई में हम कम थे, इसलिए नहीं हारे हैं। हमको राजनीति का पता नहीं है, लोगों में राजनीतिक जागृति नहीं है। केवल सैनिक लड़ेंगे, तो काम नहीं होता है। सामान्य व्यक्ति भी खड़ा होना चाहिए। और इसलिए हम परतंत्र है, इसका उनको भान करा देने वाला राजनीतिक उपक्रम करना चाहिए।
तो उस स्वतंत्रता के युद्ध के बाद, 1857 के बाद भारतीय असंतोष, ठीक से व्यक्त हो और वह हानि ना करे, इसलिए कुछ व्यवस्थाएं हो रही थीं लेकिन इन सब लोगों ने उसको अपने वश में कर लिया और उसको स्वतंत्रता के लड़ाई का हथियार बनाया। इंडियन नेशनल कांग्रेस के नाम से वह धारा चली। उसी में से अनेक प्रकार के राजनीतिक प्रवाह निकलकर आज हम देखते हैं, इतने सारे राजनीतिक दल अपने देश में हैं।
स्वतंत्रता के पहले स्वतंत्रता के लिए लोगों की राजनीतिक जागृति ये लक्ष्य उनका था और वो अच्छी तरह से हो गई। सामान्य व्यक्ति भी चरखा तो अपने देश का परंपरागत है, वो नई बात नहीं थी, लेकिन देश के लिए चरखा चलाना, ये बात सिखाई उस राजनीतिक आंदोलन ने। देश के लिए जीना-मरना, हर काम में देश का विचार करना, यह वातावरण सारे देश में हो गया। फलस्वरूप स्वतंत्रता मिली, सशस्त्र संघर्ष भी चल रहा था, उनका भी बड़ा योगदान था, कुछ दुनिया की परिस्थितियां भी थीं। स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद उस धारा को, जिस प्रकार जैसे प्रबोधन करना चाहिए, उस प्रकार होता, तो आज का दृश्य ही कुछ अलग होता, लेकिन वैसा हुआ नहीं। ये हम सब लोग देख रहे हैं। दोषारोपण करने की बात नहीं, यह फैक्ट है।
एक धारा थी, उन्होंने कहा कि ये सब होगा, लेकिन अपने समाज में कुछ कमियां हैं, रूढ़ि-कुरीतियों से ग्रस्त अपना समाज है, उसको आधुनिक शिक्षा का स्पर्श नहीं है, अंधविश्वासों से भरा है, उसको ठीक करना चाहिए। और इसलिए तरह-तरह के सुधार आंदोलन अपने देश में हुए। और कुछ आज भी चल रहे हैं। उनका परिणाम तो हुआ, प्रभाव तो हुआ, लेकिन सब कुछ ठीक नहीं हुआ। अभी भी ऐसे सुधार के उपक्रम, सुधार के अभियान, सुधार के आंदोलन करने पड़ते हैं।
और एक धारा थी, जिन्होंने कहा कि पहले अपने मूल पर चलो, फिर से हम उसको भूल गए। स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, दो मुख्य नाम उसमें लिए जाते हैं, जिन्होंने अपने मूल पर समाज को खींचने का प्रयास किया, उसके चलते जो-जो हुआ, पहले की तीन धाराओं सहित भारत में आज जो कुछ चल रहा है, उस पर इनका प्रभाव है। कहीं ना कहीं प्रेरणा स्रोत वहां पर है, कहीं ना कहीं विचार का जो प्रवाह है, वो वहां से जुड़ता है। परंतु ये चारों धाराएं चलीं, जैसा भारत हमको चाहिए। 75 वर्ष आजादी के पूरे हुए। लेकिन हम अभी ऐसा नहीं कह सकते कि वैसा खड़ा हुआ। इसका कारण क्या है?
संघ के निर्माता जो थे डॉ. हेडगेवार, वह इन चारों धाराओं में काम कर चुके थे। उनको हम जन्मजात देशभक्त कहते हैं क्योंकि बचपन से ही ये चिंगारी उनके मन में थी कि देश के लिए जीना चाहिए, देश के लिए मरना चाहिए। स्वयं बचपन में ही अनाथ हो गए थे, दरिद्रता में आगे बढ़ना पड़ा। लेकिन देश के लिए चलने वाले कामों में भाग लेना उन्होंने कभी नहीं छोड़ा और विद्यार्थी के नाते उनका जो कर्तव्य था, अपनी पढ़ाई अच्छी तरह से पूर्ण करना, उसमें अपने विद्यालय में पहले दस में आना, ये भी कभी उनका छूटा नहीं।
वंदे मातरम् आंदोलन उन्नीस सौ पांच-छह में जो हुआ, उस समय उन्होंने नागपुर के सारे विद्यालयों में उस आंदोलन का संगठन किया। जब इंस्पेक्टर लोग, स्कूल इंस्पेक्शन के लिए आते थे, तो हर क्लास में उनका स्वागत ‘वंदे मातरम्’ से होता था। चिढ़कर उन्होंने सारे विद्यालय बंद कर दिए। कौन है इसके पीछे, पता लगाने का प्रयास किया। चार महीने स्कूल बंद रहें, पता नहीं लगा। अंत में कॉम्प्रोमाइज हो गया। जो अभिभावक, गार्डियंस थे और सरकार में, कि एक nominal apology हो जाए स्कूल में एंटर करते समय गेट पर। और शिक्षक खड़ा रहे, वह पूछें, ‘गलत हुआ ना? माफी चाहते हो ना?’ तो मुंडी हिलाना। nominal apology।
स्कूल शुरू हुए लेकिन दो छात्र नागपुर के थे, जिन्होंने ये भी करने से इंकार कर दिया। भाई भारतवासी हम हैं- भारत माता हमारी, उसकी स्वतंत्रता की बात को नकारना सपने में भी हम नहीं कर सकते। वो हमारा श्रद्धा स्थान है। वंदे मातरम् कहना, ये हमारा अधिकार है और इसलिए हम सपने में भी उसको ना नहीं कह सकते, तो हम माफी कैसे मांगेगे?
तो स्वाभाविक वो दोनों रेस्टीकेट हुए, उसमें एक डॉ. हेडगेवार थे, जो बाद में डॉक्टर बने। फिर उस समय राष्ट्रीय विद्यालय चलते थे, उनमें जाकर, उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की, मैट्रिक में इस परिस्थिति में भी वो फर्स्ट क्लास में पास हुए। नागपुर के लीडर लोगों ने उनका ये स्पार्क देखकर, ये चिंगारी देखकर, तय किया कि इनको कलकत्ता जाना चाहिए, मेडिकल पढ़ना चाहिए। मेडिकल की पढ़ाई का बहाना है, परंतु करना है वहां क्या? क्रांतिकारकों की कॉर्डिनेशन कमिटी वहां है-अनुशीलन समिति। उससे सम्बंध स्थापित करना और क्रांतिकार्य पूर्वी भारत में भी शुरू करना।
तो उनकी योजना के अनुसार, पास में पैसा न होते हुए भी चंदा करके जो थोड़ा जमा हुआ, उसके आधार पर डॉक्टर साहब कलकत्ता गए, किसी लॉज में जगह नहीं थी, तो अपने दो मित्र जो एक कमरे में रहते थे, उनके बिस्तर के बीच की जगह में अपना बिस्तर लगाया और उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई भी अच्छी तरह पूरी की, फर्स्ट क्लास में पास हो गए और क्रांतिकारक समिति से सम्बंध भी स्थापित कर लिया।
स्वर्गीय त्रैलोक्यनाथ जी चक्रवर्ती, स्वर्गीय राज बिहारी बसु, इनके लिखे पुस्तकों में, उनका उल्लेख आता है, उनका कोड नेम कोकेन था। कोकेनचंद्र एक जीवित वास्तविक व्यक्ति थे, जो चंद्रनगर में रहते थे लेकिन उनके नाम से इनका वहां का चलता। CID को पता लगा, तो कोकेन को अरेस्ट करने, वो चंद्रनगर जाके उनको लेकर आए दूसरे को, ऐसी कहानी भी है वो। ये सब उन्होंने किया।
लेकिन क्रांतिकारक आंदोलन भी बंद हो गया। अनेक लूपहोल्स (loopholes) के कारण, अनेक कमियों के कारण, अंग्रेज सरकार ने उसको दबाने में यश प्राप्त किया। इनके मेडिकल की पढ़ाई भी पूरी हो गई। तीन हजार रुपए, मासिक की एक नौकरी बर्मा में उनके लिए तैयार थी, प्रिंसिपल ने कहा, तो इन्होंने कहा ‘मैं नौकरी करने के लिए नहीं आया हूं, मैं तो अपने देश के लिए काम करने वाला हूं’ और इसलिए नागपुर वापस आए।
चाचा जी ने विवाह के बारे में पूछा। चाचा जी को पत्र लिखा कि इस जीवन में मुझे दूसरा कोई काम करना नहीं है, क्योंकि उन्होंने प्रतिज्ञा की थी, अनुशीलन समिति में प्रवेश करने के पहले कि ‘यह जन्म मेरा देश के लिए है, अपने सुख का विचार अगले जन्म में करेंगे’
और इसलिए कांग्रेस का जो आंदोलन चल रहा था, उसमें उन्होंने भाग लिया। 1920 में उस आंदोलन का प्रचार करते समय जो भाषण किए, उसके चलते सेडिशन का मुकदमा उनपर चला और उसमें उन्होंने अपना डिफेंस दिया। डिफेंस देते नहीं थे लेकिन उन्होंने कहा कि मैं डिफेंस दूंगा, तो कोर्ट में मेरा और एक भाषण होगा। पत्रकार वगैरह आएंगे और एक बार मेरे प्रचार की मुझे संधि मिलेगी। और उन्होंने भाषण किया। वो भाषण करने के बाद जो जजमेंट आया, उसमें जज ने लिखा कि जिन भाषणों के कारण इनपर आरोप लगा है, उन भाषणों से इनका बचाव का भाषण ज्यादा सेडिशियस है। क्योंकि उन्होंने यहीं से शुरुआत की कि ‘अंग्रेज लोग हमारे ऊपर राज कर रहे हैं, ये किस कानून के तहत कर रहे हैं, उनको किसने अधिकार दिया? स्वतंत्रता तो प्रत्येक व्यक्ति का जन्म सिद्ध अधिकार है। मैंने लोगों को यही बताया है, स्वतंत्रता प्राप्त करने के उपाय बताए हैं, किसी के विरोध में कुछ नहीं कहा है। जो आपके भाषण लिखने वाले लोग हैं, उनको मराठी भी ठीक से नहीं आती, मेरे भाषण मराठी में हुए। आरोप तो आपका झूठा है, लेकिन ये कोर्ट भी बेकानूनी है। इस न्याय को, इस न्यायाधीश को, इस न्यायालय को मैं नहीं मानता’- ऐसा उन्होंने कहा। और इसलिए उनको एक वर्ष सश्रम कारावास हुआ।
सब ऐसे जो आंदोलन थे, क्रांतिकारकों का आंदोलन था, राजनीतिक जागृति के आंदोलन थे, समाज-सुधार के काम थे, धर्म जागृति के काम थे, अपने मूल पर वापस आने के लिए। इन सबमें उन्होंने प्रामाणिकता से निस्वार्थ बुद्धि से कार्यकर्ता के नाते काम किया। कार्य पद्धति जान ली, कैसा काम करते हैं, समाज की स्थिति क्या है? ये करने से समाज में क्या होता है? ये सब उन्होंने जान लिया, अनुभव लिया। और इस लंबे समय के दौरान उनका इन सब काम में काम करने वाले, जो श्रेष्ठ लोग थे, धुरीण थे, लीडर लोग थे, उनसे संपर्क आया, चर्चा भी हुई।
उनकी ये सक्रियता संघ स्थापना के बाद भी कायम थी। संघर्ष शुरू होने के बाद 1930 में जंगल सत्याग्रह हुआ। उस जंगल सत्याग्रह में भी वो, संघ के सर संघचालक हो गए थे, उसको छोड़कर नया सरसंघचालक नियुक्त करके आंदोलन में गए। वहां भी उनको एक वर्ष सश्रम कारावास की सजा हुई। वो सजा काटकर वापस आए, फिर जो सरसंघचालक बने थे, उन्होंने अपना कार्यभार वापस कर लिया, फिर संघ का नेतृत्त्व किया। तो उनको अनुभव था और इस दौरान सबसे बात हुई, सुभाष बाबू से, महात्मा जी से, लोकमान्य तिलक से, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह। राजगुरु जी को तो महाराष्ट्र में अंडरग्राउंड उन्होंने रखा, नागपुर में रखा। बाद में लगा कि नागपुर सेफ नहीं उनके लिए, तो अकोला में भेजा।
ये सब करते हुए, इन सब लोगों से चर्चा होती थी, तो उनको ध्यान में आया कि सब लोगों को ऐसा लगता है कि हमारे उपाय अधूरे रहेंगे, अगर इस समाज के जो कुछ दुर्गुण हैं, जो घुस गए हैं इसमें उसको दूर ना किया जाए, क्योंकि एक बात तो स्वतः सिद्ध है कि देश को बड़ा करना है, देश को स्वतंत्र करना है, कुछ भी करना है, तो नेताओं के भरोसे, संगठनों के भरोसे नहीं होता। वो सहायक जरूर होते हैं, लेकिन सबको लगना पड़ता है। सब में एक गुणवत्ता आनी पड़ती है, पूरे समाज के प्रयास से कोई भी परिवर्तन आता है। आज अपने देश को बड़ा करना हम चाह रहे हैं, वो किसी के भरोसे छोड़कर नहीं होगा। सब सहायक होंगे। नेता, नीति, पार्टी, अवतार, विचार, संगठन, सत्ता सब। सब इनका रोल असिस्टेंस का है लेकिन मुख्य कारण जो बनता है, वो समाज का परिवर्तन है। समाज की गुणात्मक उन्नति है। और बिना उसके हुए हमारे काम फुलफिल नहीं होंगे, जो इश्यूज लिए हैं, वो शायद रिजॉल्व हो जाएंगे, लेकिन वो फिर से खड़े नहीं होंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है, क्योंकि स्वतंत्रता की बात लें, तो हम देखते हैं कि कितना लंबा तांता है, आक्रमकों का। हर बार कोई आता था, हमको देखते-देखते जीत लेता था, फिर हम जागृत होकर उसको खदेड़ देते थे, दूसरा आता था, ये सब बार-बार क्यों होता है? क्योंकि कुछ ऐसे दोष है, जिनको निकालना चाहिए, कुछ ऐसे गुण हैं, जिनको विकसित करना चाहिए। और इसलिए ये काम किसी को करना पड़ेगा। हम लोग नहीं कर सकते, क्योंकि हमने अपना-अपना काम चुन लिया है।
इनका भी अध्ययन, डॉक्टर हेडगेवार का भी अध्ययन, चिंतन, वो इसी निष्कर्ष पर आया था। जिन महानुभावों के मैंने नाम लिए हैं, उन सबको आप पढ़ लीजिए, तो आपको ये भाव मिलेगा। उसके बारे में बहुत लोगों ने लिखा है। स्वदेशी समाज नाम का श्री रवींद्रनाथ ठाकुर जी का निबंध पढ़िए। उसमें उन्होंने कहा है कि समाज की जागृति राजनीति से नहीं होगी, हमारे समाज में समाज का स्थानीय नेतृत्त्व खड़ा करना पड़ेगा, उन्होंने शब्द का उपयोग किया है- नायक। जो स्वयं शुद्ध चरित्र है, जिसका समाज से निरंतर संपर्क है, समाज जिस पर विश्वास करता है और जो अपने देश के लिए जीवन-मरण का वरण करता है, ऐसा नायक चाहिए, ऐसा उन्होंने कहा है। इतने बड़े खंडप्राय देश में, गांव-गांव में, गली-गली में ऐसा नायक चाहिए, जिसके जीवन से एक वातावरण बनता है, वातावरण में समाज अपनी कृति बदलता है। ऐसे नायकों का निर्माण होना चाहिए। रवींद्रनाथ ठाकुर ने स्वदेशी समाज में बहुत स्पष्ट रूप से ये बताया है।
इन सबके बोलने में, लिखने में ये बात आई है कि राष्ट्र को खड़ा करना है, तो अपना राष्ट्र नया नहीं बनाना है, हमारे यहां पहले से है, हिन्द स्वराज्य में गांधी जी ने लिखा है कि ‘युवा वृद्धों को प्रश्न पूछता है कि अंग्रेजों के आने के कारण रेल लाइन वगैरह आ गई, सारा देश एक बन गया’ तो वृद्ध के रूप में वो गांधी जी उत्तर देते हैं हिंद स्वराज में, कि ‘ये भी बात तुमको अंग्रेजों ने ही सिखाई है। अंग्रेजों के आने के बहुत पहले हमारा देश एक था।’ तो हमारे देश का अस्तित्व ये बहुत प्राचीन है।
परिस्थितियां बदलती हैं। उसमें परिस्थिति बदलती है, इसलिए वो एकत्व नहीं बदलता, स्वदेशी समाज में ही रवींद्रनाथ जी ने लिखा है कि ‘कोई नया व्यक्ति हम में आने से, हम भारत के लोग डरते नहीं, क्योंकि सबके प्रति अपनेपन का हमारा स्वभाव है। इस देश में हिन्दू, मुसलमान, बौद्ध आदि-आदि आपस में संघर्ष नहीं करेंगे, इसी देश के लिए जिएंगे, इसी देश में मरेंगे। आपस में संघर्ष करते-करते कोई एक हल वो इसका निकाल लेंगे और साथ में जिएंगे’। आगे वो कहते है कि ‘ये हल अहिन्दू ना होकर विशिष्ट रूप से हिन्दू होगा’, ये उन्होंने लिखा है।
उस शब्द के बारे में क्या है, बाद में बताता हूं। परंतु ये विचार सबमें था कि अपना देश प्राचीन समय से एक है। अपने समाज को उन्नत बनाना चाहिए, वो सदा के लिए संकट परंपरा का निवारण करने का एकमात्र उपाय है। लेकिन फुर्सत नहीं है, तो डॉक्टर हेडगेवार ने सोचा कि किसी को फुर्सत नहीं है। तो मैं इसके लिए प्रयोग करता हूं। ये बात उन्होंने त्रिलोकनाथ चक्रवर्ती जी को बहुत पहले, 1911 से 14 जब वो कलकत्ता में रहे, शायद उस समय बताई थी।
और नागपुर वापस आने के बाद मेडिकल की पढाई पूरी करके आंदोलनों में भाग लेते-लेते उन्होंने इसके कई प्रकार के प्रयोग किए कि ये कैसे हो सकता है, संपूर्ण देश को जोड़ा कैसे जा सकता है, संपूर्ण देश को बड़ा कैसे किया जा सकता है। देश के व्यक्ति में गुणवत्ता का निर्माण कैसे किया जाता है? इसके अनेक प्रयोग किए उन्होंने।
उन्होंने भारत सेवाश्रम संघ के काम को देखा था। वह जिस अनुशीलन समिति के सदस्य थे, उनके भी कई ऐसे मनुष्य निर्माण के कार्यक्रम चलते थे। ये सारा अनुभव लेकर उन्होंने एक चिंतन किया, एक उपाय निकाला, उसका प्रयोग किया और उस प्रयोग के यशस्वी होने के बाद उसकी चर्चा की। उनके जो तरुण साथी, सार्वजनिक जीवन में सक्रिय तो थे ही, बहुत सारे तरुण, उनके व्यक्तित्व के कारण उनके साथ रहते थे, उनसे चर्चा की और 1925 में घोषणा की।
सौ वर्ष हम आज मना रहे हैं, लेकिन प्रत्यक्ष ये इस संघ का बीजारोपण उसके कई वर्ष पहले डॉक्टर साहब के मन में हुआ था। मन में उस बीज ने एक आकार धारण किया। अंदर एक अंकुर धारण किया और 1925 के विजयादशमी के बाद डॉक्टर साहब ने घोषणा की कि आज से यह संघ हम प्रारंभ कर रहे हैं। उद्देश्य, उन्होंने कहा, संपूर्ण हिन्दू समाज का संगठन। अब यहां प्रश्न खड़ा होता है, बाकी लोगों को क्यों छोड़ा? तो पहली तो बात है कि जिनको हम हिन्दू समाज कहते हैं आजकल, हिन्दू समाज, हिन्दू नाम लगाना जिसको है, उसको इस देश के प्रति जिम्मेवार रहना पड़ेगा। ये रिस्पांसिबल समाज है क्योंकि इसको नाम मिला है। इस देश के लोगों को वो नाम मिला है, बहुत पहले मिला है।
महावीर प्रसाद जी द्विवेदी हैं। उन्होंने लिखा है कि जरथुस्त्र के काल में, बाहर के लोगों ने हमको ये नाम दिया। हमको तो जरूरत नहीं थी, अलग नाम की। हमने अपना धर्मशास्त्र लिखा, तो मानव धर्मशास्त्र। यही उसका नाम है क्योंकि हमारे यहां यही कहते थे, ‘माता च पार्वती देवी, पिता देवो महेश्वरा, बांधवा शिवभक्ताश्च, स्वदेशो भुवनत्रया’ या ‘अम निज परोवेति गणनाम लघुचेतसाम उदार चरित नाम तु वसुधव कुटुम्बकम’ हम मनुष्यों में अंतर नहीं करते थे, सारे मानव। विचार तो हमारा ऐसा था कि व्यक्ति, मानवता, सृष्टि, ये सब परमात्मा के कारण जुड़ी हैं, एक दूसरे से संबंधित है। एक का जो होता है, वो दूसरे पर भी परिणाम करता है और इसलिए मनुष्य को अपने विकास का विचार करना है, तो इन तीनों के विकास में अपना विकास है, ये मानकर अपने विकास का प्लान करना पड़ता है। इस देश का स्वभाव है।
तो हमको अलग नाम की जरुरत नहीं थी, लेकिन जरथुस्त्र वहां गए, उनको पूछा गया, कौन हो? तो उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वज किर्गिस्तान में भारत से गए थे, सिंधु नदी के उस पार से गए थे। अब उस समय ईरान के लोग सिंधु नदी के उस पार वालों को हनत कहते थे। उसका हनदू हो गया, हिन्दू हो गया। ये एक कथा है।
दूसरी कथा है कि ऐसा कहने के बाद ईरान के लोगों ने इजरायल के लोगों के पूछने पर यहूदियों को कहा कि हमारा एक हिन्दू गुरु है और वो बात घूमते-घूमते अपने पश्चिम किनारे पर व्यापार के जरिए आ गई। व्यापारियों ने पकड़ा वो शब्द। लेकिन ठीक है, उनको शब्द से क्या करना है, सौदा पटने से काम है, व्यापार चलता रहा। इंटेलेक्चुएल लोगों के पास वो आ गया, तब अपने पुराणों में आ गया। ‘तम देव निर्मित देश हिंदुस्थानम प्रचक्षते’, लोकभाषा में आने को बहुत समय लगा और लोकभाषा में जो शब्द आते हैं, वो संतों की पकड़ में आते हैं। इसलिए गुरुनानक देव जी की वाणी में पहले ये मिलता है, ‘खुरासान खसमाना किया, हिंदुस्तान डराया’। उन्होंने वर्णन किया है, बाबर के अत्याचारों का और कहा है कि ना ही हिन्दू महिलाओं का शील बचा, ना मुस्लिम महिलाओं की अस्मत बची।
अब ये सोचते हैं, तो ध्यान में बात आती है कि उन्होंने दो क्यों शब्द उपयोग किए? क्योंकि जैसे उस समय मुसलमान थे, हमारे देश में, हमारे देश के कनवर्टेड मुसलमान थे। लेकिन दूसरी तरफ मुसलमान क्यों कहा होगा, तो स्वाभाविक है- अल्लाह को मानते हैं, कुरान को मानते हैं, पैगम्बर साहब को मानते हैं, वही होते हैं मुसलमान। तो हिन्दू कहने से कोई मान्यता नहीं है। एक ईश्वर को मानने वाला हिन्दू नहीं है। नहीं, ईश्वर के अनेक रूप हैं हिन्दुओं में, 33 करोड़ हैं ऐसा कहते है। और एक ग्रंथ नहीं है। ना कोई एक गुरु है, तो अनेक थे उस समय। बौद्ध थे, जैन थे, शैव थे, शाक्त थे। अनेक प्रकार के पंथा संप्रदाय, रिलीजन अनेक थे, लेकिन एक स्वभाव था, जो इन सबको जोड़ता था, वो स्वभाव ये था कि इन सबको स्वीकार करते थे।
विश्व में जितने तरीके हैं पूजा के, वो सब एक ही जगह पहुंचेंगे। कोई तरीका गलत नहीं है। हां, ये हो सकता है- कहीं देर से पहुंचेंगे, कहीं जल्दी पहुंचेंगे, कोई तरीका बड़ा सरल है, कोई तरीका बड़ा जटिल है। ‘रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिल नानापथजुषां’ मनुष्य अलग-अलग होते है, बुद्धि अलग-अलग होती है, रुचि अलग-अलग होती है, रुचि के वैचित्र्य के कारण रुजु कुटिल अनेक प्रकार के रास्ते होते हैं।
अब यहां इस सभागृह में आने के लिए कहां से चले? एक ही रास्ता थोड़ी था। जहां से चले, वैसा रास्ता था। और कोई रास्ता ठीक भी था, कोई रास्ता खराब भी था। रास्ता खराब है, इसलिए आप घूमकर भी आए होंगे। रास्ता खराब है, तो भी समय पर पहुंचेंगे, इसलिए उसी खराब रास्ते से भी आए होंगे। ये अपना-अपना मन है।
ऐसे अनेक पथ है ‘रुचि नाम वैचित्रत रुजु कुटिलाना पत न नृणाम’। यानी आदमियों का एक गम्या, एक ही जगह जाना है सबको। भगवान को कहते हैं- त्वमसि, तुम ही हो, जो सबके गन्तव्य हो। कैसे- ‘पैसाम अरण युवन’। विश्व में कहीं भी पृथ्वी पर वर्षा होती है, तो अंत में सागर में जाती है। ये श्रद्धा रखने वाले, सबको उन्होंने एक नाम दिया- हिन्दू।
तो हिन्दू यानी क्या? इसमें जो विश्वास करता है। अपने-अपने रास्ते से चलो भाई, अपना जो रास्ता मिला है, स्वाभाविक रूप से, उस पर श्रद्धा रखो। बदलो मत, दूसरों को बदलो मत, इस पर श्रद्धा रखो। दूसरों की भी श्रद्धा है। उसका पूर्ण सम्मान करो, उसको स्वीकार करो, उसका अपमान कभी मत करो। और रास्तों को लेकर झगड़ा मत करो, आपस में मिल-जुलकर चलो। ये परंपरा जिनकी है, ये संस्कृति जिनकी है, वो हिन्दू हैं। और ये परंपरा-संस्कृति ऐसी क्यों बनीं? इसका कारण भारतवर्ष है।
भारत का भूगोल ऐसा था कि हम प्रोटेक्टेड थे, चारों तरफ से। पहले आक्रामक आते ही नहीं थे। कौन आएगा? सागर लांघकर कौन आएगा? जहाज नहीं थे। तो इतनी बर्फीली चोटिया लांघकर कौन आएगा? पूरा सैन्य लेकर तो नहीं आ सकता। इसलिए हम सुरक्षित थे और अंदर भरपूर था। जनसंख्या भी इतनी नहीं थी जितनी आज है। और इसलिए, सब लोग इस वृत्ति के बने कि भाई मिल-जुलकर रहो, फालतू झगड़ा क्यों करते हो? दुनिया को शायद परिस्थिति मिली होगी। ‘struggle for existence or survival of the fittest’ इसकी। लेकिन हमारे प्राचीन समय में भारत में ये स्थिति नहीं थी। ‘There was no struggle. It was abundant for everybody’ और जो परंपरा थी, उसमें संयम था। इसलिए ‘there was abundance’। तो झगड़ा क्यों करना है? क्यों नहीं करना है? जीना है ना, तो मिल-जुलकर जी सकते हैं। झगड़ा कौन करेगा? और इसलिए हमको फुर्सत भी मिली, हमको सुरक्षा भी मिली, हमको समृद्धि भी मिली। तो हमने जो एक human search सारी दुनिया में चलता है और दुनिया बाहर का देखकर रुक गई। जो दिखता है उसके आगे कुछ नहीं है। माइक्रोस्कोप लगाओ, तो ज्यादा दिखता है उसके, परे कुछ नहीं है, ऐसा सोचकर दुनिया रुक गई। हम वहां रुके नहीं, हमने दृष्टि को अंदर कर लिया और अपने अंदर की सत्य को खोजा हमने। और उसने हमको बताया कि सर्वत्र एक ही है। दिखता अलग-अलग है, सब एक है। और इसलिए अपना स्वाभाविक धर्म क्या है? समन्वय, संघर्ष नहीं।
तो ये जो संस्कृति थी, उस संस्कृति का उपजाव क्यों हुआ? वो इसी के कारण हुआ है और इसलिए इस मातृभूमि के प्रति भक्ति है। मां ने हमको अन्न-पोषण केवल इतना नहीं दिया। संस्कार दिए हैं, भारत माता ने हमको ये संस्कार दिया है, वो हमारी मां हैं। और ये केवल कपोलकल्पित बात नहीं है। इसके आधार पर प्राचीन समय से हमारे पूर्वज जीते आए हैं। ऐसा जीवन खड़ा करने के लिए उन्होंने खून-पसीना सब बहाया, प्राणदान भी किया है। इस भूमि के संरक्षण, संवर्धन के लिए भी बलिदान दिया है। परिश्रम किया है। वो इतिहास हमको प्रेरणा देता है, वो पूर्वज हमारे पूर्वज हैं। इनको मानने वाला वास्तव में हिन्दू है।
लेकिन जब संघ शुरू हुआ, तब ये परिस्थिति थी कि ऐसे सब लोग अपने आप को हिन्दू नहीं कहते थे और आज भी नहीं कहते, कुछ लोग। तो हिन्दू के हम प्रकार मानते हैं, जो जानते हैं वो हिन्दू हैं, उनको गौरव है। जो जानते हैं वो हिन्दू है लेकिन गौरव क्या करना भाई, दुनिया में होते हैं। हम हिन्दू हैं, चलो। और जो जानते हैं लेकिन किसी कारण नहीं कहते। कारणों में नहीं जाता, नहीं कहते। और जो जानते नहीं हैं कि वो हिन्दू हैं।
लेकिन ऐसे लोगों को भी जो जानते नहीं है, हिंदवी कहने से बुरा नहीं लगता। भारतीय कहने से बुरा नहीं लगता। सनातन का भी कुछ लोग स्वीकार करते हैं। ये शब्द क्या है? समानार्थी शब्द है। और इसलिए हम लोग ऐसा नहीं कहते कि आप हिन्दू ही कहो। आप हिन्दू हो, ये हम बताते हैं। नहीं, भाई हम हिन्दवी है, हम भारतीय हैं, ठीक है। इसका कंटेंट समझो। इन शब्दों के पीछे केवल शब्दार्थ नहीं है एक कंटेंट है। वो कंटेंट geographical नहीं है। उस कंटेंट में एक भक्ति है-भारत माता की। उस कंटेंट में एक परंपरा है- पूर्वजों की, जो हम सब समान हैं। डीएनए को भी देखो, वही है। 40 हजार वर्ष पूर्व से भारतवर्ष के लोगों का डीएनए एक है। अखंड भारत की भूमि पर जो-जो हैं और हमारी संस्कृति है मिल-जुलकर रहने की। ये बातें अलग-अलग रूप जो है, वो हम मे अलगाव पैदा नहीं करते। क्योंकि हम ये मानते ही नहीं कि एक होने के लिए यूनिफॉर्म होना पड़ता है। यूनिफॉर्मिटी से यूनिटी आती है, ऐसा नहीं है। डाइवर्सिटी में भी यूनिटी है, क्योंकि डाइवर्सिटी भी यूनिटी का ही प्रोडक्ट है। लेकिन कोई परीक्षा है और प्रश्न आ गए 4, दो तो बड़े कठिन हैं, दो आसान है। पहले कौन सा? पहले आसान प्रश्न छोड़ो।
इसलिए, जो अपने आपको हिन्दू कह रहे हैं, पहले उनको संगठित करो, उनका जीवन अच्छा बनाओ। तो किसी कारण जो अपने आपको हिन्दू नहीं कहते, वो भी कहने लगेंगे। वो तो होने लगा है। और किसी कारण जो भूल गए, उनको भी याद आएगा। वो भी होगा। लेकिन करना क्या है? संपूर्ण समाज का संगठन, संपूर्ण हिन्दू समाज का। हिन्दू शब्द का आग्रह क्यों है हमारा, क्योंकि ये जो कंटेंट है, ये कंटेंट पूर्णतः व्यक्त करने वाला वो एक ही शब्द है। और हिन्दू कहने से ‘हिन्दू वर्सेज ऑल’ ऐसा नहीं होता है। हिन्दू बनाम कोई ऐसा नहीं है। क्योंकि हिन्दू इसका मतलब inclusive, inclusivity की मर्यादा क्या है? कोई मर्यादा नहीं है। जब आगे एक व्यक्ति नहीं, पूरा परिवार, पूरा परिवार नहीं, पूरा गांव, गांव नहीं भैया, जनपद, जनपद नहीं, भैया प्रांत, प्रांत नहीं देश, देश नहीं विश्व, मानवता नहीं, केवल सृष्टि भी। अनंत के साथ एक हो जाओ। वहां जो पहुंचा, उसे सर्वश्रेष्ठ मानने वाला अपना समाज है और इसलिए यह कोई संकुचित बात नहीं है। उलटा ये अपने सारे विकास को संपूर्ण विश्व के साथ एकरूप होने को एक खुला रास्ता देने वाली बात है। उनका संगठन करना, इसलिए संघ निकला, क्योंकि पूरा समाज ऐसा होगा, तभी होगा।
लेकिन होने के लिए तो कुछ करना पड़ेगा, केवल तैयार होने से कार्य नहीं चलता तैयारी का उपयोग करना पड़ता है। तो ये विचार किया गया की तैयारी जो करनी है, उसके दो भाग हैं। एक तो मनुष्यों को तैयार करना, दूसरा मनुष्यों में काम करना। तो जो मेथोडोलॉजी डेवलप हुई मनुष्यों को बनाने की, उसपर लग कर काम करने वाला एक संगठन। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, उसको दूसरा कुछ नहीं। उसकी शाखा है, उसके स्वयंसेवक हैं। और बाकी सब जो होना है, तैयारी के चलते, वो करने वाले स्वयंसेवक रहेंगे। संघ, संघ के नाते उसमें जाएगा नहीं। स्वयंसेवक बहुत है संग चलाने के लिए जो लगते हैं, उनको छोड़ दिया तो भी, बहुत सारे स्वयंसेवक हैं वो सक्रिय हो जाएं, समाज जीवन में जहां जिसकी आवश्यकता है, वो करें।
ये तो सपने से भी ज्यादा दुष्प्राप्य बात लगती थी। स्वयंसेवक भी पूछते थे कैसे होगा? डॉक्टर साहब कहते थे, वो होगा। संघ कुछ नहीं करेगा सब कुछ होगा और हो रहा है। अनेक क्षेत्रों में अपने स्वयंसेवक काम कर रहे हैं। वो जो विचार मिला है जो संस्कार मिला है उसके आधार पर उस-उस क्षेत्र की आवश्यक है वहां पुनर्रचना करके आगे बढ़ रहे हैं। भारतीय मजदूर संघ में स्वयंसेवक काम करने के लिए गए। उन्होंने पूरी दुनिया के लिए लेबर फील्ड का एक नया दर्शन दिया है। हर जगह वहां के परिवेश में सकारात्मक सुधार और अपने देश के स्वत्व के आधार पर वहां की पुनर्रचना। क्यों ये पुनर्रचना आवश्यक है? उसमें कल जाएंगे।
लेकिन ये वो स्वयंसेवक करते हैं वो उनका है स्वतंत्र हैं, अलग हैं स्वायत्त हैं। उसका क्रेडिट उनको है, संघ को नहीं। डिस्क्रेडिट वो संघ को शेयर करना पड़ता है क्योंकि माल हमारे यहां से गया है। क्रेडिट उनका है। संघ उनको कंट्रोल नहीं करता, डायरेक्टिली भी नहीं, रिमोटली भी नहीं। एक ही बात है स्वयंसेवकों का सम्बंध संघ से अटूट है। जन्म जन्मांतर का है।
वो संघ की प्रार्थना कहीं भी गा लेंगे। वो टूटता नहीं है। उसके चलते स्वयंसेवक मिलते हैं, बात करते हैं, हम भी बात करते हैं, पूछते हैं, हम बताते हैं, हमको ध्यान में आया, बताते हैं। मदद मांगते है, मदद देते हैं। अच्छे काम को सर्वत्र मदद करते हैं। हम केवल स्वयंसेवकों को ही करते है, ऐसा नहीं है। किसी को भी कर सकते हैं। की है, बहुत उदाहरण है। परंतु हमारा कहा वो माने ही, ये उन पर हमारा दबाव नहीं है। हमारा कहना वो समझेंगे, समझने के बाद उनको जो लगता है, वो करेंगे। क्योंकि उनके क्षेत्र में वो काम कर रहे हैं उनका अनुभव है, उनकी एक्सपर्टाइज है। हमारी नहीं है, ऐसा नहीं है, लेकिन करना तो उनको है।
जो करने वाला है। उसको जो स्वतंत्रता मिलनी चाहिए करने की, तो उनको मिलती है और संगठन में केवल स्वयंसेवक नहीं है। उनके साथ बहुत सारे लोग हैं। संगठन तो संघ के नहीं है वो जनता के है। स्वयंसेवकों ने खड़े किए हैं अथवा पहले से जो थे, उसमें स्वयंसेवक है। उसमें उनका प्रभाव कम-ज्यादा होता है। अन्य लोग भी साथ हैं, सबको साथ लेकर चलना स्वयंसेवकों के नाते यही सिखाया हमने। मतभेद हो, तो भी मनभेद ना हो, साथ में लेकर सबको चलें, ये स्वभाव सबका रहे, इसी को तो संगठन कहते हैं। हमारी अपेक्षा उनसे ये है कि संगठन ठीक रहे स्वयंसेवक ठीक रहें। वो करते है हम बताते रहते हैं। वो स्वतंत्र अलग स्वायत्त और धीरे-धीरे स्वावलंबी होते हैं, मदद मांगने की स्थिति नहीं रहती उनकी।
विचार, संस्कार और आचार, ये ठीक रहें, इतनी हम स्वयंसेवक की चिंता करते हैं। संगठन की चिंता वो करते हैं, वो हमारी नहीं है। इस प्रकार हम आगे जाते हैं और ये हमको एक दबाव गुट नहीं बनाना है सबका मिलके भारत में। पूरे भारत में सबको संगठित करने के लिए संग्रह है। तो आपको भी अनुभव आया होगा कि तीस साल, चालीस साल पहले शायद आप में से बहुत लोग संघ के धुर विरोधी रहे होंगे और शायद उनमें से कुछ लोग आज संघ के समर्थक बन गए। आप धुर विरोधी थे, तब भी अपने थे और आज हमारे हैं, तब भी अपने ही हैं। एक देश है, एक सौ बयालीस करोड़ का देश है। कितने मत होंगे, बहुत मत होते हैं। मत अलग होना, ये अपराध नहीं, ये तो प्रकृति ने दिया हुआ गुण है। अलग-अलग विचार एक साथ जब सुनते हैं और कोई सहमति बनती है, तो उसमें से प्रगति होती है, अंग्रेजी में एक वाक्य बताते है। ‘coming together, staying together and working together. coming together is beginning, staying together is progress, and working together is success’ तो ये जो बात है इसको संगठन कहते हैं और पूरे समाज का ही हमको संगठन करना है। क्योंकि संघ के मन में ये बात है कि अगर इस देश में ऐसा लिखा गया कि भाई, संघ के कारण देश बच गया या देश का उद्धार हो गया, तो ये हमारे लिए ठीक नहीं है। कि ये हम करना नहीं चाहते, ये करना चाहते तो बहुत है पहले से, रावण से त्रस्त दुनिया, राम नहीं होते तो क्या होता? शिवाजी नहीं होते तो क्या होता?
अरे भाई कब तक आएंगे शिवाजी, कब तक आएंगे राम। भगवान भी god helps those who help themselves हमको इसके कारण जो ठेका देने की आदत लग गई है। नेता को ठेका दो, पार्टी को ठेका दो, सरकार को ठेका दो, तुम देश का कल्याण करो। हम क्या करेंगे? हम-तुम जो कर रहे हैं, उसमें से मीन-मेख निकालते ही चर्चा करने बैठेंगे। ये ठीक नहीं है। देश का जिम्मा हम सबका मिलकर है। जैसे हम हैं, वैसे हमारे प्रतिनिधि होंगे। वैसे हमारी पार्टियां होंगी, वैसे हमारे नेता होंगे।
तो हम अच्छे बनें और हम करें देश के लिए। संपूर्ण समाज का संगठन इसके लिए। हम कहते हैं, प्रार्थना में विजय त्री च संत: कार्यशक्ति हमारी संगठन शक्ति के आधार पर हमारी यानी किसकी? संपूर्ण हिन्दू समाज की क्योंकि हमने परिचय दिया है उसके पहले वयम् हिन्दू राष्ट्रांग भूत। हम हिन्दू राष्ट्र के अंगभूत हैं। तो पूरे हिन्दू समाज का दायित्व है, तो पूरा हिन्दू समाज ऐसा बनना चाहिए। हमारी संगठित कार्यशक्ति यानी पूरे समाज का संगठित कार्य शक्ति। और हिन्दू राष्ट्र की बात करते हैं हम, तब भी प्रश्न खड़े हो जाते हैं। क्योंकि राष्ट्र का हम ट्रांसलेशन करते हैं नेशन, वो कंसेप्ट वेस्टर्न कंसेप्ट है। नेशन के साथ स्टेट जुड़ता है। राष्ट्र के साथ स्टेट आवश्यक नहीं है। हमारा राष्ट्र है पहले से। हिन्दू शब्द निकालकर आप विचार करो, हमारा राष्ट्र पहले से है, गांधी जी ने भी कहा है।
एक राष्ट्र के नाते हम लड़े हैं, बार-बार लड़े। उत्तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम हमारा संचार रहा है। पूरे देश के साथ हमारी सेंसीटीविटी जुड़ी है। हम एक राष्ट्र है। इस राष्ट्र में हम सर्वदा स्वतंत्र नहीं थे, लेकिन राष्ट्र था। सदा हमारे राजा नहीं थे, अंग्रेज भी राजा हो गए। तुर्क अरब भी राजा हो गए, लेकिन राष्ट्र था। एक राजा नहीं था, अनेक राजा थे अनेक राज्य थे, अनेक व्यवस्थाएं थी, लेकिन राष्ट्र था। मंत्र पुष्पांजलि में हम कहते है ना कि ‘स्वस्ति साम्राज्यम भजम, स्वराज्यम वैराज्यम राज्य पार महाराज महागणाधिपत्य। स्वस्ति साम्राज्यम। वैराजम’ पूरी लम्बी मालिका। राज्य व्यवस्थाओं की इतने-इतने प्रकार हैं और फिर भी आगे कहते हैं पृथ्वई समुद्र पर्यन्तायाह: एक विराट थी। समुद्र पर्यंत जो पृथ्वी है, पृथ्वीराज यानी कृषि योग्य बनाई भूमि, उसमें एक राठ है और चक्रवर्ती थे, तब भी हम यही कहते थे। चक्रवर्ती नहीं थे, अलग-अलग राज्य थे, तब भी हम यही कहते थे। अंग्रेज राजा थे, तब भी हम यही कहते थे। विदेशी आकर राज करते थे, तब भी हम यही कहते थे। राष्ट्र था, सत्ता बदलती रही। हिन्दू राष्ट्र शब्द का सत्ता से कोई मतलब नहीं है, और हिन्दू राष्ट्र के प्रखर होते, विद्यमान रहते, जो जो शासन रहा है, वो शासन हमेशा पंथ संप्रदाय का विचार करने वाला शासन नहीं है। उसमें सबके लिए न्याय समान है। पंथ संप्रदाय, भाषा कुछ भी नहीं, कोई भी भेद नहीं, प्रजा के लिए समान है।
और इसलिए, जब हम हिन्दू राष्ट्र कहते हैं, तो हम किसी को छोड़ रहे हैं ऐसा नहीं है। हम हिन्दू कहते हैं तो किसी का विरोध कहते हैं ऐसा नहीं है। संघ इसमें से हुआ ही नहीं है। संघ किसी विरोध में, प्रतिक्रिया में नहीं निकला है। गुरुजी के प्रेस कॉन्फ्रेंस में गुरुजी को पूछा गया कि हमारे गांव में तो मुसलमान और ईसाई तो हैं नहीं हमारे यहां शाखा का क्या काम है।
गुरुजी ने कहा कि भैया, तुम्हारे गांव की छोड़ दो, पूरे दुनिया में भी मुसलमान-ईसाई नहीं होते तो भी हिन्दू समाज अगर इस अवस्था में रहता, तो संघ की शाखा की आवश्यकता थी, क्योंकि संगठन किसी के विरोध में नहीं होता। आप सब लोग कुछ ना कुछ तो व्यायाम करते होंगे। कम से कम मॉर्निंग वॉक, इवनिंग वॉक करते होंगे। आपको कोई पूछे कि आप ये व्यायाम कर रहे हैं किसको पीटने का इरादा है ? अरे भाई, व्यायाम अपने आप को तंदुरुस्त रखने के लिए है। कभी मारपीट होती है तो व्यायाम का शरीर काम में आता है, ये बात अलग है। लेकिन व्यायाम का उद्देश्य किसी को मारना नहीं है, स्वस्थ होना शरीर की स्वाभाविक अवस्था है, संगठित होना समाज की स्वाभाविक अवस्था है। बिना उसके कोई काम सफल नहीं होता। इसलिए सम्पूर्ण समाज का संगठन ये करता है, संघ। ये सौ साल से कर रहा है।
और सौ साल की यात्रा के बारे में कहें तो क्या बताएं, पहले ही हमको डॉ. हेडगेवार ने बताया कि संगठन के जीवन में तीन स्थितियां को पार करनी पड़ती है, तब उसके बाद कार्य सिद्धि होती है। पहली अवस्था रहती है उपेक्षा की। संघ की भी उपेक्षा, विचार की मान्यता नहीं थी कि संघ शुरू हुआ था। डॉ. हेडगेवार कोई पूरे देश में प्रसिद्ध लीडर नहीं थे। देखने में व्यक्तित्व भी ऐसा बहुत, एक भरभक्कम शरीर वाला आदमी, काला ही था, चेचक के दाग थे चेहरे पर। सामान्य वेश, मध्यम वर्गीय महाराष्ट्रियन के जैसा रहता था, उस समय, वैसा और सामान्य भाषा। ऐसे ही थे। प्रचार का कोई साधन नहीं था। विचार मान्य बिल्कुल नहीं था। लोग तो कहते थे कि डॉ. हेडगेवार पागल हो गया है, बच्चों को लेकर देश को बनाने की बात कर रहा है।
हिन्दू राष्ट्र बिल्कुल मान्य नहीं था। अच्छे-अच्छे हिन्दू लोग कहते थे हिन्दू तो मरने जा रहा है, छोड़ो। THIS IS A DEAD SOCIETY, ऐसे बोलते थे क्योंकि इसकी उपेक्षा थी। हमारे प्रचारक थे। संघ कार्य के लिए निकले, कोई प्रचारक शब्द नहीं था लेकिन अंदर एक चिंगारी जग गई, निकल गए। निकल गए, तो कुछ था ही नहीं, ठाव ठिकाना, ठौर ठिकाना। भागलपुर में बिहार में पहली बार प्रचारक गए नागपुर से। जैसे-तैसै जुगाड़ करके उनको टिकट का पैसा तो डॉ. साहब ने दिया। कुछ उस समय 3 रुपया बारह आना, भागलपुर तक का टिकट था, तो उनके पास में सवा रुपया बचा। भागलपुर में कोई परिचित नहीं, बिहार में कोई परिचित नहीं, काम शुरू नहीं हुआ था शायद। रहने का ठिकाना नहीं कुछ भी। पटना से भागलपुर एक पैसेंजर ट्रेन जाती थी, रात को पहुंचती थी वहां। रात पर पड़ी रहती थी, सुबह निकल आती थी। उस पैसेंजर में रात को सोते थे। स्टेशन पर ही सारा सुबह वाला निबटते थे। फिर गांव में घूमते रहते थे रात तक। इसके घर जाओ उसके घर जाओ, इससे बात करो उससे बात करो। खाने को कुछ नहीं था, तो एक भुना चना बेचने वाला था, उससे दोस्ती कर ली।एक पैसे का वह थोड़ा ज्यादा चना रोज देता था, उससे उनका भोजन चलता था।
शाखा शुरु हो गई, तो एक बाल स्वयंसेवक के घर कोई पर्व था। भोजन के लिए कोई चाहिए था। इसने उनसे पूछा, आप ब्राह्मण हैं क्या ?
उन्होंने कहा हां। तो वह बोले, चलिए हमारे यहां एक ब्राह्मण चाहिए। तो वह उसके घर गए. उसके माताजी को पता चला कि ये एम.कॉम है और सब छोड़कर हिन्दू समाज को संगठित करने देश के लिए आया है। तो, उन माता जी ने बताया कि भागलपुर में 11 बजे दोपहर और रात के 8 बजे तुम्हारा भोजन होना चाहिए। कहीं नहीं, तो हमारे यहां आओ। मैं 11 बजे के बाद एक घंटा राह देखूंगी, गांव में घूमूंगी, तुम्हारा भोजन हुआ है कि नहीं, देखूंगी, हुआ होगा तो मैं भोजन करूंगी नहीं तो नहीं करूंगी।
अभी-अभी, मैं वहां क्षेत्र प्रचारक बनकर गया, तब मैंने देखा, वो जो बालक था, आठवीं में उस समय, वह हमारे विभाग संघचालक बन गए थे उनके घर में यह चलता था। उस समय तो हमारी यह हालत नहीं थी।
एक बड़े प्रसिद्ध नेत्र शल्य विशारद के यहां हमारा भोजन था, वहां हमारा भोजन हो रहा था। महाशय हमारे विभाग संघचालक जी बैठे थे। हमने बोला, आइए।
तो बोले, हमारा घर में भोजन है।
हमने कहा फिर जाइए, समय हो गया।
उन्होंने कहा नहीं, आपका भोजन पूरा होने के बाद मुझे रिपोर्ट करना पड़ेगा, तब घर में बहुएं घर में भोजन करेंगी
समाज ने हमें संभाला। जैसा संभाला वैसा हम रहे है। किसी बात की मान्यता नहीं, एक श्रद्धा लेकर चले। डॉ. हेडगेवार के विश्वास पर चले। फिर विरोध शुरू हुआ। क्या विरोध हुआ, वाह। किसी स्वयंसेवी संघ का इतने लंबे समय तक इतना कड़ा विरोध और कटु विरोध। इसका भी कोई पुस्तक आप देखकर तैयार कर सकते हैं। क्या-क्या नहीं हुआ। झूठे आरोप मढ़े गए, हत्याए हुईं, संघर्ष हुआ। अपने को बचाने को जितना लड़ना था, उतना लड़ते थे, पर हमें बताया जाता था कि अपना ही समाज है.
गुरुजी के घर पर हमला हुआ फरवरी में, 48 में। तो स्वयंसेवक रक्षण करने गए, तो गुरुजी ने उन सबको घर वापस भेज दिया कि जाओ, अपना समाज है। इस समाज ने जब अपने को सराहा तो अच्छा लगा ना ? वही अगर मारने को आता है, तो मेरे घर के आंगन में मेरा रक्त बहेगा, समाज का नहीं बहेगा। आप सब लोग जाओ वापस।
यह वृत्ति थी, क्योंकि आधार क्या है हमारा ? संघ के कार्य का आधार कोई विरोध, कोई प्रतिक्रिया नहीं, शुद्ध सात्विक प्रेम अपने कार्य का आधार है। जिस आधार पर हम विविधता में एकता देखते हैं, वह तो सत्य रूप है, प्रेम रूप है, करूणा रूप है। संघ के स्वयंसेवकों ने हमेशा यही मन में बात रखी कि ये सब होगा, लेकिन सब अपने हैं।
और जैसा मैं कहता हूं, संघ हिन्दू के नाते चलता है, तो हिन्दू का ये अपनापन केवल हिन्दू के लिए नहीं है। वसुधैव कुटुम्बकम् है। वही बीज रूप में हम परिवार में अपनेपन के आधार पर चलते हैं। हम गांव को अपना गांव मानकर चलते हैं, देश को अपना देश मानकर चलते हैं, ये क्रमिक विस्तार हमारा होता है। यह मनुष्य जीवन के क्रमिक विकास का आलेख है। यह ध्यान में रखकर स्वयंसेवकों ने हमेशा बरता है। पास में कुछ नहीं था। स्वयंसेवकों की निष्ठा, स्वयंसेवकों की श्रद्धा, उनका विश्वास, इसके आधार पर संपूर्णत: स्वयंसेवकों के आधार पर हम चले। हमने अपनी पद्धति में भी यही रखा है, संघ को स्वयंसेवक चलाएंगे।
हम परावलंबी नहीं है। हम सब मामलों में स्वावलंबी हैं। man, money and ambition। हमारे पास कार्यकर्ता नहीं थे। हमने रेडिमेड कार्यकर्ता नहीं लिए, हमने अपने कार्यकर्ता खुद बनाए और बन रहे हैं। कार्यकर्ता बनते हैं, शाखाएं चलाते हैं, शाखाएं चलती हैं, कार्यकर्ता बनते हैं। वो बनते हैं, अधिक शाखाएं खुलती हैं, अधिक कार्यकर्ता बनते हैं।
पैसा हमारे स्वयंसेवक साल में एक बार गुरु-दक्षिणा करते हैं। संघ को चंदा नहीं देते, दान नहीं देते। देश के लिए समर्पित होने की मेरी प्रतिज्ञा है, तो वास्तव में समर्पण मेरी भावना की दृष्टि उत्कटता पर है, इसका टेस्ट करते हैं, साल भर जमा करते हैं, बढ़ता रहे, उसके लिए सब्जी खाना छोड़ देते है, दाल खाना छोड़ देते हैं चाय पीना बंद कर देते है। बच्चा अपनी एक-एक पाई कहीं से मिले, जमा करके उसको गुरु-दक्षिणा में डालता है। शामू पवार नामक एक युवक था, नौवी में पढ़ता था, माता-पिता दोनों मजदूर थे, रोज की रोटी रोज बनती थी, रोज की कमाई से। ऐसा घर, ऐसी झोंपड़ी घर काहे का। और गुरु-दक्षिणा में उसके गण ने तय किया कि देखो, प्रत्येक ने 21 रुपए गुरु-दक्षिणा तय करनी चाहिए। अपने गण का यह टार्गेट है। तो उसने माता जी से मूंगफली बनवाई, चीना बादाम या क्या सॉल्टेड पीनट्स। और तीन महीना इंटरवल में सिनेमा टॉकिज में जाकर बेचता था। 21 रुपए जमा हो गए, बंद कर दिया। घर में 21 रुपए रख दिए। 15 दिन बाद था गुरु-दक्षिणा समर्पण का कार्यक्रम। घर को बताया कि गुरु-दक्षिणा है। 15 दिन उस घर में, जहां हाथ पर उनका पेट था, वहां पर वो 21 रुपया पड़ा रहा, किसी ने हाथ नहीं लगाया। उसने गुरु-दक्षिणा में डाल दिए।
एक-एक स्वयंसेवक ऐसा करता है। नागपुर में डॉ. साहब का स्मारक स्मृति मंदिर खड़ा हुआ। मैं बचपन में शाखा में जाता था, तो मुझे याद है, वहां एक डिब्बा रखा था। हम कुछ मिलता है, उस समय ज्यादा कुछ मिलता-उलता नहीं था घर से। पर कभी-कभार कुछ मिल गया, कोई मेहमान आ गए, जाते समय रख दिया कुछ हाथ पर। रखते भी ज्यादा नहीं थे, वो पुराना एक छेद वाला पैसा रहता था तांबे का, तो वो हम डिब्बे में डाल आते थे।
पूरा रेशमबाग का परिसर जो बना है, या कहीं का भी, दिल्ली का कार्यालय स्वयंसेवकों ने बनाया है। स्वयंसेवक चलाते है। संघ को चलाने के लिए संघ किसी के आगे हाथ नहीं फैलाता। सम्पूर्ण स्वावलंबी संगठन। और इसलिए हम लोग जो है, हमारी दृष्टि से विचार करके जो अच्छा लगता है, बोल सकते हैं, जो खराब लगता है, वो भी बोल सकते हैं। लेकिन उस बोलने के पीछे कोई विरोध की भावना नहीं, ना काहू से दोस्ती ना काहू से वैर। दोस्ती कहें तो सब अपने हैं, सबके प्रति प्रेम है। उस प्रेम के आधार पर, और स्वयंसेवकों की निष्ठा, तपस्या के आधार पर हम यहां पर पहुंचे हैं। कितने बड़े त्याग हुए, कितने बड़े बलिदान हुए हैं, उस पर हम खड़े हैं, ये हम जानते हैं। उनके प्रति मन में और उस भाव का वर्णन मैं नहीं कर सकता और ऐसे भाव हम सबके मन में है। और इस संघ को हमको आगे ले जाना है। क्यों ले जाना है ? क्योंकि भारत को खड़ा करना है। भारत का अपना योगदान है। वो योगदान क्या है, उसकी चर्चा हम कल के व्याखयान में करेंगे।
पूरा व्याख्यान वीडियो में देखें-













