Day-3: तीन दिवसीय व्याख्यानमाला, 100 वर्ष की संघ यात्रा ‘नए क्षितिज’
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना का शताब्दी वर्ष मना रहा है। इस अवसर पर नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में तीन दिवसीय व्याख्यानमाला का आयोजन गया। संघ के इस कार्यक्रम का विषय ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज‘ रखा गया है। तीसरे दिन कार्यक्रम की शुरुआत वंदे मातरम के साथ हुई। कार्यक्रम में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत, सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले, पवन जिंदल (उत्तर क्षेत्र के क्षेत्रीय संघचालक), डॉ. अनिल अग्रवाल (दिल्ली के प्रांत संघचालक) शामिल हुए। इस आखिरी सेशन में प्रश्न-उत्तरों को लिया गया। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने प्रश्नों का बेबाकी और फैक्ट के साथ जवाब दिया। आइए जानते हैं।
प्रश्न 1 : जो पहला प्रश्न है, ये शिक्षा में संस्कार को लेकर है। जिन बंधु, बहनों के प्रश्न आए हैं, मैं नाम पढ़ देता हूं आपके समक्ष।
प्रश्नकर्ता हैं- रविंद्र सिसोदिया जी, संजय शर्मा जी, रजनी खंडेलवाल जी, अनूप कुमार त्रिवेदी जी, हरपाल सिंह डांगर जी, विनोद कुमार जी, विकास गौड़ जी।
पहला प्रश्न है- तकनीक और आधुनिकीकरण के युग में संस्कार और परंपराओं के संरक्षण की चुनौती को संघ किस प्रकार देखता है? क्या आपको लगता है कि देश की शिक्षा प्रणाली में गुलामी वाली मानसिकता की झलक है? शिक्षा और प्रशासनिक प्रणाली, दोनों में काफी सुधार की गुंजाइश है। संघ के नाते हम कैसे इस प्रणाली में सुधार कर सकते हैं?
इसी से जुड़ते हुए कुछ और भी प्रश्न हैं, वो भी मैं पूजनीय सरसंघचालक जी के सामने रख देता हूं। मिशनरी स्कूल एवं पब्लिक स्कूल में शिक्षा के नाम पर जिस तरह हजारों वर्ष पुरानी संस्कृति को धूमिल किया जा रहा है। They are reading English novels, history school books written by leftist writers. How to bring them to the mainstream?
क्या रंगमंच को स्कूल और विश्वविद्यालय स्तर पर केवल curricular गतिविधि के रूप में रखने के बजाय अनिवार्य विषय बनाया जा सकता है, ताकि छात्र बचपन से ही अपनी कला और संस्कृति से जुड़ सकें? इस पर आपका मार्गदर्शन क्या है?
दो प्रश्न इससे और जुड़ते हुए हैं। भारतीय वैदिक गुरुकुल शिक्षा को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने और वैदिक कला की 64 कलाएं विद्यार्थियों को सिखाने के लिए क्या प्रयास हो रहे हैं? जो लोग इस दिशा में निष्ठापूर्वक कार्य कर रहे हैं, उनकी सहायता किस प्रकार से की जा सकती है?
इस समूह में अंतिम प्रश्न है, कक्षा 6 से 12 तक संस्कृत भाषा को अनिवार्य करने में संघ का क्या मत है?
उत्तर : तो तकनीकी और आधुनिकता, इनका शिक्षा से विरोध नहीं है। जैसे-जैसे मनुष्य का ज्ञान बढ़ता है, नई तकनीक आती है। उसको आने से कोई रोक नहीं सकता और वो आती इसलिए है कि मनुष्यों का कुछ भला उसके हाथ से हो। इसलिए उसको खोजा जाता है। उसका उपयोग करना मनुष्य के हाथ में है। कोई भी तकनीक आती है, तो उसका मनुष्य के हित के लिए उपयोग करना, अगर उससे कुछ दुष्परिणाम होने वाले हैं, तो उन दुष्परिणामों से बचना और बचाना यानी तकनीकी के मालिक मनुष्य बने रहें। तकनीकी, मनुष्य की मालिक ना बन जाए।
पुराने जमाने में कहते थे कि पहले लाठी पहलवान घुमाता है, बाद में लाठी पहलवान को घुमाती है। आज हम कहते हैं कि पहले मोबाइल हम सुनते हैं, आजकल मोबाइल हमको सुनाता है। तो ये ना हो, इसीलिए शिक्षा आवश्यक है। अशिक्षित हाथ में पड़ जाए, तो सारा ज्ञान क्या दिशा लेगा, बता नहीं सकते, वो विध्वंस हो सकता है। सुशिक्षा यानी केवल literacy नहीं, education यानी केवल schooling, information cramming नहीं। तो मनुष्य सुसंस्कृत बने, मनुष्य वास्तविक मनुष्य बने। इसको शिक्षा कहते हैं। वो शिक्षा मिलती है, तो मनुष्य विष का भी उपयोग दवाई के रूप में कैसा करना है, ये खोज लेता है। ऐसी शिक्षा अपेक्षित है। अपने देश की शिक्षा बहुत पहले लुप्त हो गई, लुप्त की गई। एक नई शिक्षा पद्धति इसलिए लाई गई कि हमलोग सदा विदेशी आक्रमकों के या विदेशी हमारे उस समय जो शासनकर्ता थे, हम उनके गुलाम थे, उनकी गुलामी में हम सदैव बने रहे। इस देश पर उनको राज्य करना था, इस देश का विकास नहीं करना था।
और इसलिए सारी जो प्रणालियां उन्होंने बनाईं, उसमें हम इस देश पर राज्य कैसा कर सकें, इसको ध्यान में रखकर उन्होंने बनाया। उन्होंने इस देश को जीता था, इस देश को उनको अपने अधीन रखना था, उसके लिए जो करना है, वो उन्होंने किया। लेकिन अब हम स्वतंत्र हो गए, तो हमको केवल राज्य चलाना नहीं है, प्रजा-पालन करना है। उसकी मानसिकता निर्माण होना, उसके लिए आवश्यक वो सारी जानकारी, भूतकाल की भी, बच्चों को मिलना, जिससे उनमें ये गौरव पैदा हो सके कि हम भी कुछ है, हम भी कर सकते हैं, हमने करके दिखाया है।
ये सब परिवर्तन होना आवश्यक था। थोड़ा-बहुत, थोड़ा- बहुत होते-होते पिछले सालों में और इसका अवेयरनेस ज्यादा बढ़ा है और इसलिए नई शिक्षा नीति में ये सारी बातें लाएं, ऐसा प्रयास चल रहा है। कुछ-कुछ बातें हो गई हैं, ऐसा मैं सुन रहा हूं, कुछ बातें होने वाली हैं लेकिन शिक्षा में ये प्रणाली इस प्रकार बदलना, प्रशासन में भी इस प्रकार की प्रणाली बदलना, ये आवश्यक है। उदाहरणार्थ, मैंने सुना, अब वो पुरानी बात है, अब होगी, ऐसा नहीं।
नागपुर में, मैं नागपुर का प्रचारक था। तो एक सज्जन आ गए, वहां इनकम टैक्स कॉलेज है। केरल से आए थे, IPS कैडर के थे। वो कार्यालय ढूंढ़ते-ढूंढ़ते आ गए। और बोले, मुझे अटल बिहारी वाजपेयी से मिलना है।
तो हमारे कार्यालय प्रमुख ने कहा कि वो यहां नहीं मिलेंगे।
नहीं-नहीं, यहां से उनके पास मेरा संदेश जा सकता है।
तो वो जनसंघ का कार्यालय, उस समय बीजेपी थी, बीजेपी का कार्यालय है, वहां जाइए।
तो उसने कहा, वहां गया था, वहीं से यहां भेजा है।
तो अब क्यों भेजा, मुझे मालूम नहीं। मैं नागपुर का प्रचारक था इसलिए मेरे सामने ही उनको भेज दिया। मैंने कहा, आपको अटल जी से काम क्या है? तो मुझे ‘LAQ’(Long Answer Question) करना है?
क्या LAQ (Long Answer Question) करना है?
तो उन्होंने कहा कि मैं केरल से आता हूं। केरल में हमलोग अपनी वेष्टी मुंडू को लपेटकर, एक कुर्ता, हाफ शर्ट अथवा फुल कुर्ता, पहनकर, हम ऑफिस में जाते हैं। ऑफिस में काम करते हैं। पुलिस वाला हूं, इसलिए कभी-कभी वर्दी में जाना पड़ता है, जाता हूं।
यहां मैं आया, नागपुर इतना गरम प्रदेश है। गरमी के दिन भी थे। वो मैं ऐसे ही गया, तो मुझे डांटा गया कि ‘you have to follow the etiquettes ‘ और ड्रेस कोड है। तो मुझे लगा, ठीक है। तो मैंने जाकर खादी भंडार में कुर्ता-पायजामा, जैकेट खरीदा, वो पहनकर गया। उन्होंने कहा, ये नहीं चलता है, ड्रेसकोड ऐसा है, पूरा सूट चाहिए। कोट-टाई वगैरह-वगैरह, सब। तो मुझे ये समझ में नहीं आया कि यहां नागपुर में गरमी के दिनों में ये कैसे चलेगा भाई? हम तो उबल-उबलकर आलू हो जाएंगे, अंदर ही अंदर। तो मुझे ‘LAQ’ करना है, कि ये कब बदलेगा।
तो जब मैंने फिर उनको बताया, अटल जी को क्या पत्र भेजो, वहां दिल्ली में जाओ यहां से, वो बीजेपी का कार्यालय अलग है, बीजेपी अलग है, हम अलग हैं, सब समझाया। वो मान गए, अच्छे थे। गए होंगे पता नहीं। लेकिन इसकी चर्चा मैंने की, तो लोगों ने बताया कि हमारे प्रशासनिक सेवा में drinking etiquettes सिखाए जाते हैं।
ड्रिंकिंग एटिकेट्स ठीक है, पाश्चात्य देश ठंडे देश हैं। वहां ये उपाय करने पड़ते होंगे, तो वहां उसका एटिकेट्स भी है। हमारे यहां foreign service में जो लोग जाते हैं, शायद उनको ये ट्रेनिंग लेनी पड़े। लेकिन सदा सर्वदा, सबको ये सिखाने की क्या जरूरत है?
तो कुछ परिवर्तन होना चाहिए, सब ऐसा ही है, ऐसा मैं नहीं कह रहा हूं। स्वतंत्रता के बाद कुछ तो बदला ही होगा, क्योंकि अब लोगों का पालन भी करना है। लेकिन अभी भी गुंजाइश है, तो वो सारे परिवर्तन होने चाहिएं और इसमें बहुत ज्यादा एप्रहेंसिव (चिंतित) होने की जरूरत नहीं है। सब जगह अपनी परंपरा की, अपने मूल्यों की, अपने मूल्यगत आचरण की, संस्कृति की शिक्षा देनी चाहिए, वो रिलीजियस नहीं है, वो सोशल है। हमारे रिलिजन अलग-अलग हो सकते हैं, सोसाइटी के नाते हम एक हैं। ये समझकर, वो कॉमन है, जैसे माता-पिता को सम्मान देना।
किसी रिलीजन में इसकी मनाही है क्या? बड़ों के सामने नम्रता रखना, अहंकार के अधीन नहीं होना। आदि-आदि बातें, एक विशेष हैं और अलग दिखती हैं। दूसरी जगह दूसरा है, उसके वहां कारण होंगे। उसके कारण होगा वो, मैं उसको खराब नहीं कह रहा हूं। लेकिन अपना अच्छा है, तो ये शिक्षा मिलनी चाहिए और ये एक तरह से यूनिवर्सल है। बहुत थोड़ा अंतर है। ‘Good manners, they are nearly universal’ बस भोजन करते समय हाथ से भोजन करना कि नहीं, ये अलग है। लेकिन ऐसी छोटी बातें छोटी-छोटी यूनिवर्सल हैं। तो इंग्लिश नॉवल्स आप पढ़ेंगे, तो ये नहीं मिलेगा, ऐसा नहीं है। हम अंग्रेज नहीं हैं। हमको अंग्रेज नहीं बनना है लेकिन इंग्लिश एक भाषा है। भाषा सीखने में क्या दिक्कत है? हमारे घर में हमारी तीन पीढ़ी से संघ का घर है। और इन संस्कारों की कोई कमी हमारे घर में नहीं है।
मैं आठवीं क्लास में था, तब पिताजी ने मुझे Oliver Twist पढ़ाया, Prisoner of Zenda पढ़ाया। अनेक इंग्लिश नॉवल्स मैं पढ़ चुका हूं। इससे मेरे हिंदुत्व प्रेम में रत्ती भर भी अंतर नहीं आया है, नहीं आ पाया। एक भाषा के नाते, जो कथावस्तु है, उससे बोध लेने के नाते, हम पढ़ते हैं, तो उसका दुष्परिणाम नहीं होता। लेकिन हमने Oliver Twist, Charles Dickens का पढ़ा और प्रेमचंद की कहानियां छोड़ दीं, ये ठीक नहीं है। हमारे यहां भी हैं। साहित्य की कितनी उच्च परंपरा है। रामायण, महाभारत से लेकर उपनिषदों की कथाएं देखो, आज तक चलती आ रही हैं, हर भाषा में एक लंबी, अच्छी परंपरा है। वो सीखना चाहिए और इसकी शिक्षा सब में मिलनी चाहिए क्योंकि Missionary स्कूल हो, मदरसा हो, कुछ भी हो, Religious education एक अलग बात है लेकिन Social merit के नाते हमारा सबका Syllabus एक है।
वो भारत की परंपरा है, प्राचीन काल से चलती आई है। जैसे श्रीमान आरिफ बेग आए थे, मैं नगर प्रचारक था अकोला में। विजयादशमी उत्सव के अध्यक्ष के नाते वो आए थे। तो उन्होंने कहा था कि इस देश की परंपरा कैसी है, सबके लिए कितनी अच्छी है। तो उन्होंने उदाहरण दिया था कि सुग्रीव और अन्य वानरों के पास अलंकार, मिले, वो सीता जी के हैं कि नहीं, पहचानना था। लक्ष्मण को बुलाया कि तुम भी पहचानो। उसने कहा कि मुझे केवल पैर की पैजनिया दिखाओ क्योंकि मैंने कभी सीता जी के मुख्य की ओर दृष्टि नहीं डाली। मैंने हमेशा उनके चरण ही देखे।
अब इसमें जो एक संस्कृति झलकती है, वो कितनी बड़ी है। वो सबकी समान है। उसकी शिक्षा सब में होनी चाहिए। उससे हमारा रिलीजन मार नहीं खाता, उलटा अधिक अच्छा बनता है। ये समझना चाहिए और ये संस्कार सब में होने चाहिए।
ठीक है, आपकी जितनी ताकत है, मेरी जितनी ताकत है, मिशनरी स्कूल में जब होंगे, तब होंगे। मेरे घर में तो होनी चाहिए ना, यहां से हम शुरू कर सकते हैं, वो करना चाहिए। और हमारे यहां, अभी जो नई शिक्षा नीति में पंचकोषीय शिक्षा का तत्त्व मान्य किया है, उसमें सभी कोषों का विकास, सर्वांगीण विकास उसमें कला, क्रीड़ा, योग, ये सब हैं। तो धीरे-धीरे इसको विकसित करना पड़ेगा। जैसा मैंने कहा कि विपरीत शिक्षा में हम इतने आगे गए थे कि एकदम मुड़ना संभव नहीं, तो turning शुरू हो गया है। वो रुके नहीं, चलता रहे। और पूरा टर्न होगा, उसको समय लगेगा। इसलिए curricular गतिविधि नहीं, प्रत्येक मनुष्य को कला का अंग चाहिए। संगीतकलाविहीनः साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः ऐसा कहते हैं। जिस मनुष्य को संगीत, नाट्य, नृत्य कला का अंग नहीं है। सभी का नहीं, किसी एक का। उसमें वो ट्रेंड ही होना चाहिए, ऐसे नहीं है। लेकिन अच्छा गाना समझ में आना चाहिए। सुर, कान को पकड़ में आनी चाहिए, बुद्धि को नहीं समझे, चलता है। इतना भी हो गया, ये भी जिसका नहीं होता, वो कौन है? तो बिना पूंछ सिंह वाला पशु है, ऐसा अपने यहां कहा है परंपरा में।
तो ये तो होना ही चाहिए, लेकिन इसमें एक अनिवार्य, ये विषय जो है, उससे काम नहीं होगा, ऐसा मुझे लगता है। क्योंकि मेरा अनुभव जो है, आप जिस बात को अनिवार्य करते हैं, उसकी प्रतिक्रिया होती है और छोटे बच्चों को।
एक आदमी को कुत्ता था, उसको दवाई पिलाने को डॉक्टर ने कहा और कहा, कैसे पिलाए? तो ये आसान है उसको पकड़ो, घुटने में पक्का बंद करो। हिलेगा-डुलेगा नहीं। फिर यहां दबाओ, तो मुंह खोलेगा। दवाई डाल दो और मुंह बंद कर दो और जब तक वो निगल नहीं लेता, छोड़ो मत।
पहले दिन उसने कुत्ते को पकड़ा, ये सब किया, तो कुत्ता जान गया। दूसरे दिन भी किया, तो कुत्ता जान गया कि 8 बजे ये दवाई पिलाता है तो वो भाग जाए। फिर उसको पकड़कर लाना पड़े, तो छटपटाए, ये करे, वो करे, कभी काट लें। लेकिन इसने तय किया था।
ऐसा तीन-चार दिन हो गई खटपट, उसके बाद एक दिन वो कुत्ते के झटके से वो दवाई की कटोरी गिर गई, तो सारी दवाई जमीन पर गिर गई। फिर इसने छोड़ दिया, गाली देते-देते। उसने देखा, कुत्ता जाकर दवाई चाट रहा है। यानी, वैसे देते है तो वो ले लेता।
तो ये कंपल्शन का ये भी परिणाम होता है। उसको हर आवश्यक, संगीत जैसे विषय में नाट्य-नृत्य इन विषयों में, ये मनुष्यता का एक स्वाभाविक झुकाव उसमें रखता है, उसको जागरूक करना पड़ता है। कंपल्सरी नहीं करना पड़ता है। इसकी टेस्ट लगानी पड़ती है। वो होना चाहिए। वो घरों में भी हो सकता है, विद्यालय में और अच्छी तरह हो सकता है। हमको संगीत की रुचि कैसी लगी? हमारे चाचा गाते थे। अच्छे गीत गायक थे, रेडियो स्टार भी थे। उनके चलते उनके अभ्यास के लिए घर में रिकॉर्डस आती थीं। वो हम चाहें ना चाहें, वो सुननी पड़ती थीं, सुनते थे। कविता सिखाने वाले शिक्षक कविता हमसे गवा लेते थे। तो हम सारी क्लास मिलकर गाते थे एक-एक कविता और अपनी भाषाओं की कविता में वृत्त-छंद होता है, उसमें एक स्वर रहता है। तो, उससे हमारा काम तैयार हो गया, स्वाभाविक आकर्षण पैदा हो गया।
तो ये होना चाहिए, आज हम उस जीवन से अपने परिवार को दूर लेकर आए हैं। ये सब हमारे यहां नहीं होता, वो होना चाहिए। विद्यालय में भी ये होना चाहिए। कभी-कभी विद्यालय के सिलेबस में ऐसी कविताएं होती ही नहीं कि जिनको गा सकें, और सुंदर सुंदर कविताएं हैं। ये सब देखना पड़ेगा। केवल compulsory करने से काम नहीं होगा।
वैदिक काल की 64 कलाएं जो relevant हैं, वो सिखानी चाहिए। गुरुकुल शिक्षा को मुख्य धारा उलटा करना चाहिए। मुख्य धारा को गुरुकुल शिक्षा से जोड़ना चाहिए। क्योंकि अपनी गुरुकुल शिक्षा है ना, वैसा ही मॉडल शिक्षा का फिनलैंड में है और फिनलैंड शिक्षा में दुनिया में अग्रणी देश है, उस शिक्षा पद्धति के कारण। उस शिक्षा पद्धति को चलाने वाले शिक्षकों की अलग यूनिवर्सिटी उनकी है। और उस देश में बाहर से बहुत सारे लोग आते हैं क्योंकि वहां जनसंख्या कम है, तो वो लेते हैं, सभी देशों की। तो जितनी भाषाओं के लोग आते हैं उतनी भाषाओं में आठवीं क्लास तक शिक्षा वहां होती है। आठवीं क्लास तक मातृभाषा में शिक्षा होती है और दस छात्रों पर एक शिक्षक, एक शिक्षिका। पहले चार क्लास, उनके साथ रहना और घूमना, यही काम होता है। क्लास वर्क नहीं होता है। बिल्कुल गुरुकुल पद्धति के पास वाली है, केवल आश्रम में जाकर रहने की बात इसमें नहीं है।
तो शिक्षा पद्धति में सर्वोत्कृष्ट वो पद्धति है, जो गुरुकुल पद्धति से पास आती है। इसलिए अपनी शिक्षा की मुख्य धारा को गुरुकुल पद्धति से जोड़ने का प्रयोग करना पड़ेगा और संस्कृत भाषा की भी बात वही है। अनिवार्य क्यों करें भाई?
अपनी परंपरा जाननी है, भारत को जानना है, तो संस्कृत भाषा का ज्ञान बहुत अच्छा है। होना ही चाहिए। तब हम जान सकते हैं, मूल स्रोतों से जा सकते हैं। हमको भाषांतर पढ़ने नहीं पड़ते और भाषांतर बहुत सारे गलत किए गए हैं। किए हैं अथवा किए गए हैं। तो मूल स्रोत जानना है, तो संस्कृत पढ़ना अनिवार्य है। लेकिन स्कूल में, मुझे घर से भेजा संस्कृत परीक्षा दो। किल्ला पारड़ी की परीक्षाएं चलती है। तो मेरा मन नहीं लगा। लेकिन घर में मुझे संस्कृत स्तोत्र सिखाए गए, वो मैंने याद कर लिए। और संस्कृत भारती की पद्धति जब मैंने देखी, तो मैंने देखा कि संस्कृत के बारे में शंकित लोग भी उनके प्रशिक्षण वर्ग में आते हैं। दस दिन में बोलचाल की संस्कृत सीख लेते हैं, बड़े आनंद से। सिखाने का तत्त्व ये है कि सिखाने वाला, उसकी उत्कृष्टता चाहिए और छात्र के लेवल पर उतरकर उसको सिखाने की, उसकी कला चाहिए, तो वो रस उत्पन्न कर सकता है शिक्षा में। क्योंकि शिक्षा बाहर से देना नहीं है। शिक्षा मनुष्य के अंदर के ज्ञान को प्रस्फुटित करने की कला है। ये सब संस्कृत परंपरा से ही आता है तो उसका उपयोग करके हम संस्कृत प्रमोट करे। अपने घर में संस्कृत स्तोत्र वगैरह करें। उसकी बारीकियां या उसके कुछ बड़े मनोरंजक हैं।
‘तम शक्रस्य दुर्लभा’ ऐसा एक अंतिम पंक्ति है, यानी मट्ठा इंद्र को भी दुर्लभ है, पीने वाला मट्ठा। उसके पहले तीन प्रश्न हैं। क्या?, उसमें दो आ गए हैं एकदम, जयंत कसा सुता कथम विष्णुपदम प्रोक्तम’ तो जयंत किसका लड़का है? ये दूसरे नंबर का प्रश्न है। उसके पहले नंबर का प्रश्न है, उसका उत्तर है- मट्ठा। हां, भोजनते किम पे- मट्ठा। भोजन के बाद क्या पीना है? जयंत कस सुता इंद्र? जयंत इंद्र का पुत्र है और कथम विष्णुपदम प्रोक्तम, विष्णुपद कैसा है? दुर्लभा। तो तीन-तीन प्रश्न पूछे। अंतिम पंक्ति में तीन उत्तर लिखे। तक्रम् शक्रस्य दुर्लभा। उसका वाचता है, मट्ठा इंद्र को दुर्लभ है।
अब ये ऐसा बताते, तो इंटरेस्ट उत्पन्न होता है। ये सारी बातें होती थीं, ये करनी चाहिए, तो अपनेआप बच्चे संस्कृत पढ़ेंगे लेकिन संस्कृत का कामचलाऊ ज्ञान कम से कम भारत को समझने के चाहने वाले प्रत्येक को होना चाहिए।
प्रश्न 2 : भारतीय ज्ञान परंपरा, डॉ. राजगोपाला आर्युवेदा वैद्य एंड टीचर, What is the initiative taken by RSS or It’s Subordinate organization in propagation of Popularisation of Indian knowledge system? What measures are and visions taken for the future?
उत्तर : RSS has no Subordinate organisation. The organizations in which Swayamsevaks are working are independent, autonomous and they are expected to be self-dependent. But there is no subordination of any kind in RSS. As an organization, in RSS we daily sing Ekatmata Stotram.
तो एकात्मता स्तोत्रम, उसमें पहले सच्चिदानंद रूप आए। भगवान को वंदन है, फिर मातृभूमि का वंदन है, उसके बाद भारत की नदियां, भारत के पहाड़, इनके नाम हैं, फिर ऋषि-परंपरा से लेकर तो वैज्ञानिक तक, सबके नामों का उल्लेख है। वैज्ञानिक आश्रय कपिला आखिरी बता रहा हूं, मैं ऋषि परंपरा को छोड़ देता हूं लेकिन यहां –
वैज्ञानिकाश्च कपिलः कणादः सुश्रुतस्तथा
चरको भास्कराचार्यो वराहमिहिरः सुधीः ॥२६॥
नागार्जुनो भरद्वाजः आर्यभट्टो वसुर्बुधः
ध्येयो वेंकटरामश्च विज्ञा रामानुजादयः ॥२७॥
तो पूरी तब से लेकर अब तक की वैज्ञानिक की परंपरा रिप्रेजेंटेटिव रूप में उसमें आ गई। और इसको हम रोज कहते हैं और वर्गों में हमारे प्रशिक्षण में एक-एक नाम के बारे में जानकारी देते हैं। ये संघ में नित्यक्रम है, अनेक वर्षों से और जैसे-जैसे समय बीतता है, वैसे-वैसे ये लिस्ट थोड़ी बदलते हैं, अत्याधुनिक करते हैं उसको।
अभी की जो चल रही है, वो मैंने बताया। तो भारतीय नॉलेज क्या था? हमारे यहां विषय रहता बौद्धिक वर्गों में, भारत की ज्ञान, परंपरा, आध्यात्मिक ज्ञान से लेकर, तो विज्ञान की परंपरा तक, सारी बातें।
सोनी जी बैठे हैं, उनकी पुस्तक हैं। वो बड़ी लोकप्रिय है, संघ के बाहर भी। तो हमारा तो ये विषय पहले से है, भारत की ज्ञान परंपरा का ध्यान रखना। अब शिक्षा में भी वो चार संगठन काम कर रहे हैं।
शिक्षा क्षेत्र में, उनके प्रयासों से नई शिक्षा नीति में भी वो विषय आया है और पहले तो ये सुनाई नहीं देते थे शब्द, भारतीय ज्ञान परंपरा कहना इट वाज ए टाबू, लेकिन आज मैं शिक्षा सम्मेलनों में जाता हूं, इधर-उधर जाता हूं। कई जगह, सारे देश के, यूनिवर्सिटीज में लोग चर्चा करते हैं भारतीय ज्ञान परंपरा, IKS ऐसा कहते हैं। तो बस इस प्रयास को और गति बढ़ाएंगे, तो और अच्छा होगा। वो हमारे संगठन इसकी चिंता करेंगे।
प्रश्न 3 : संघ एवं भाजपा के बिना जिज्ञासा समाधान जो है, वो पूरा नहीं होता है। काफी प्रश्न आए हैं। तीन हिस्सों में मैं इन प्रश्नों को आपके समक्ष रख देता हूं, जिन्होंने प्रश्न भेजे हैं, जिनकी जिज्ञासा है, उनके पहले मैं नाम पढ़ देता हूं।
अजय रस्तोगी जी, अभिषेक दुबे जी, रीमा शर्मा जी, जोगिंदर सोलंकी जी, रजनीश झा जी, आशिक हुसैन जी, राजेश कुमार बंसल जी, अतुल तारे जी, जो सुदेश समूह के संपादक है। जोगिंदर सोलंकी जी, जो मीडिया पर्सनालिटी हैं। संजय झा जी सीनियर जर्नलिस्ट हैं। वसुधा वेणुगोपाल जी सीनियर जर्नलिस्ट हैं। डॉक्टर राजेश बंसल जी डायरेक्टर हैं, हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन में। अभिषेक दुबे जी, आप भी सीनियर जर्नलिस्ट हैं भारत 24 में। रीमा शर्मा जी भी मीडिया पर्सन हैं। डॉक्टर प्रभा कुमारी जी, हरपाल सिंह डांगर जी, आप सोशल सर्विस के अंदर हैं। मंगेश जयंत वैश्य पायन जी, आप महाराष्ट्र टाइम्स में हैं
Why are we not getting good coordination with the government? We should make good or more efforts to make good adjustments with some compromises to achieve the goals of the country. The RSS has more responsibility than the government. इसी से ही जुड़ता हुआ जो प्रश्न है, वर्तमान केंद्र सरकार और संघ के मिलते-जुलते विषय और मतभेद के मुद्दे क्या हैं, इसी में आगे चलते हैं।
भाजपा के व्यापक विस्तार और उसके चलते बनी अनुकूल परिस्थितियों को देखते हुए क्या संघ-भाजपा संबंधों की समीक्षा कर, उन्हें पुनः निर्धारित करने का समय आ गया है?
अंतिम है, इसमें हर जगह यह बात होती है कि भाजपा का अध्यक्ष, रोड मैप सब, कुछ संग तैयार करता है। क्या यह सच है?
उत्तर : We are having good coordination with every government, not only with this one — the state governments as well as the central government. But there are systems which have some internal contradictions.
As I said, the system in general is the same, which was invented by the British for Bharat so that they could rule. So we have to bring in some innovations; otherwise, it will not happen the way we want it to happen.
Even if the man in the chair is 100% for us, he has to execute it, and he knows what the hurdles are. So he may be able to do it, or he may not be able to do it. We have to give him that independence. There is no quarrel anywhere. And thirdly, the prevalent.
क्या कहती है दुनियादारी की रीति. The prevalent flow of all these ongoing things in the world is such that there are contradictions. For example, there is one labour organization, and there is one small-scale industries organization. Now, they are naturally at loggerheads under the present system of life.
Struggle for struggle, for resistance, survival of the fitness – so struggle has to be there. And a certain line of thought says that only through struggle only progress happen. Knowingly or unknowingly, willingly or unwillingly, we are in that system.
So, a labour organization, a small-scale industries organization, the government, and the party – all four have to be on the same page, which is very rare. And if they say we should compromise, then why not you? So, when we talk of compromise, the struggle depends. So, we say, “Okay, you all have your own say, make the experiment. Proceed on your lines. If you get the desired result, then that will be accepted by all,” because we know our Swayamsevaks work honestly.
They don’t believe in etc. Yes, there is some thought behind every action, that thought is there, but there is no struggle. That thought has to be tested practically, and the thing that yields the result is to be accepted.
So, when that is there, there is no struggle. It only appears that these two are at loggerheads. They are trying to extract the truth, and that involves some struggle. For example, in a railway yard, if they want to take a rail from here to there, from this side to that side, they will never go in a straight line in that direction, because there are so many railway lines and obstacles. All sorts of hurdles are there. So, they will pull the rail here, then take it there. They are like that. They will reach there. They know we have to reach there. But they can’t go straight away to that spot.
So all these things create an appearance that there is struggle, or that there is quarrel. Rather, struggle might be there, but there is no quarrel. The goal is the same – the good of our country, the good of our people. If that understanding is there, there is always coordination, and we have that understanding in our Swayamsevaks.
So, there might be difference of opinion also. It is not required that myself and Dattaji should think on the same lines. But we will discuss, we will form a consensus, and together whatever we decide – whether it is according to my opinion or against my opinion – this collective decision I will follow. When that nature is there, there is no problem.
तो मतभेद के मुद्दे क्या हैं? मतभेद के कोई मुद्दे नहीं होते। इश्यूज में मतभेद होता है, सबका होता है। हमारे यहां मतभेद के विचार कुछ हो सकते हैं, मनभेद बिल्कुल नहीं है और एक-दूसरे पर विश्वास है कि जो प्रयत्न कर रहे हैं, वो प्रमाणिकता से कर रहे हैं, निस्वार्थ बुद्धि से कर रहे हैं, क्षमता अपनी-अपनी है, परिस्थिति अपनी-अपनी है। अलग-अलग चलेंगे तो भी अलग-अलग जाना नहीं है। सबको एक जगह जाना है।
और सब कुछ संघ तय करता है, यह पूर्णतः गलत बात है। यह हो ही नहीं सकता। क्योंकि हम इतने दिनों से, मैं 50 साल से शाखा चला रहा हूं। तो कोई शाखा के बारे में मुझे सलाह दे, तो मैं एक्स्पर्ट हूं। लेकिन वो राज्य चला रहे हैं अनेक वर्षों से, तो राज्य के बारे में एक्स्पर्ट वो हैं।
मेरी एक्स्पर्टाइज़ वो जानता है, उसकी एक्स्पर्टाइज़ मैं जानता हूं। तो इस मामले में सलाह तो दे सकते हैं। देखने से भी सीखते हैं लोग? परंतु डिसीजन तो उस फील्ड में उनका है, इस फील्ड में हमारा है। इसलिए हम तय नहीं करते, हम तय करते, इतना समय लगता क्या? हम नहीं करते, हमको करना नहीं है। टेक योअर टाइम, हमको कुछ कहना नहीं।
प्रश्न 4 : राजनेता रहते, जेल में रहने पर पदमुक्त करने के कानून के बारे में संघ का मत क्या है?
उत्तर : देखिए जो हमारे नेतृत्व हैं वह नेतृत्व पारदर्शी होना चाहिए। स्वच्छ होना चाहिए। ये बेसिक तत्त्व है। मैं समझता हूं, इसमें सब सहमत हैं। संघ का भी वैसा मत है।
अब ये कानून है, उससे होगा नहीं होगा, इसका डिबेट चल रहा है। जो तय करने वाली बॉडी है, वो अपनी संसद है, वो जैसा तय करेगी, वैसा होगा। लेकिन इसका परिणाम क्या होना चाहिए? परिणाम ये होना चाहिए कि हमारा नेतृत्त्व पारदर्शी और स्वच्छ है, ऐसा सबके मन में विश्वास होना चाहिए। तो उसको तो देखना है।
प्रश्न 5: भाग तीन के दो भाग हैं। ये दो प्रश्न हैं – अन्य राजनीतिक दलों का संघ साथ क्यों नहीं देता है और उसके साथ में जुड़ता प्रश्न है। कुछ राजनीतिक दल संघ के विरोधी नजर आते हैं। क्या आप उनके मन में परिवर्तन की संभावना देखते हैं?
उत्तर : संभावना होते हुए भी देखते हैं ना? 1948 में हाथ में जलती मशाल लेकर जय प्रकाश बाबू संघ का कार्यालय जलाने के लिए चले थे। बाद में हमारे संघ शिक्षा वर्ग में आकर इमरजेंसी के बाद, उन्होंने कहा कि परिवर्तन की आशा आप लोगों से ही है।
कितने आप अभी शताब्दी के निमित्त कुछ प्रकाशन निकलेंगे? कुछ पहले निकले हैं। मौलाना अबुल कलाम आजाद से लेकर, तो अभी-अभी प्रणब दा हमारे मंच पर आए। उन्होंने अपने मन नहीं बदले, मत नहीं बदले। लेकिन संघ के बारे में उनके जो कुछ गलतफहमी आई थी, वो दूर हुई। इसलिए आए।
तो मन-परिवर्तन, अगर मनुष्य है, वास्तव में मनुष्य है, तो उसका मन होता है और मन में हमेशा परिवर्तन संभव है। किसी का बहुत जल्दी हो जाता है, किसी को देर लगती है। तो मन-परिवर्तन की संभावना को कभी भी नकारना नहीं चाहिए। ये हमारा रवैया रहता है।
और अच्छे काम के लिए, जो हमको सहायता मांगते हैं, उनको हम सहायता देते हैं। हमसे सहायता मांगने वाले, उनको सहायता मिलती है। हम सहायता करने जाते हैं, तो जो दूर भागते हैं, उनको सहायता नहीं मिलती। अब हम क्या करें?
तो कोई अच्छा काम है, करना है, मांगते हैं, करते हैं। और सब मांगते हैं। आपको केवल एक पार्टी दिखती है, जिनको हम सहायता कर रहे हैं लेकिन कुल मिलाकर देश चलाने में या कभी-कभी पार्टी का कुछ काम चलाने के लिए भी वो अच्छा अगर है, तो हमारे स्वयंसेवक, संघ के कहने से लगते हैं और जाकर मदद करते हैं।
नागपुर में NSUI का अधिवेशन हुआ था। भोजन की व्यवस्था में गड़बड़ हुई। बहुत मारपीट हो गई। जो थे, उस समय उनको मालूम है। राजीव गांधी उस समय NSUI के अध्यक्ष थे। तो थाली फेंकना वगैरह, सब हो गया। मैसेस बंद पड़ गईं और तीस हजार लोग थे। कुछ लोग तो घुस गए बाजारों में लूटपाट करने। मार खाए, तो वापस आ गए। तो मुझे फोन आया था, मैं नागपुर का प्रचारक था। उस समय वहां के जो एमपी थे, उन्होंने मुझे फोन किया कि भागवत जी, वो मैसेस हमारी शुरू करने के लिए आपकी मदद चाहिए।
11 मैसेस थीं। सात मैसेस में हमने अपने स्वयंसेवक भेजे। वो मैसेस बंद हो गई थीं। दोपहर 2:00 बजे तक हमने शुरू कर दिए। तो हमको कोई परहेज नहीं है, सारा समाज हमारा है। हम किसी को पराया नहीं मानते। हमारी तरफ से कोई रुकावट नहीं है। उधर से रुकावट है, तो हम उनकी इच्छा का सम्मान करके रुक जाते हैं।
प्रश्न 6 : अगला प्रश्न रोजगार से संबंधित है। प्रश्न करता हैं कमल घनशाला जी, सीए संजीव नंदा जी, पंडित राम कुमार शर्मा जी।
पिछले कुछ वर्षों में भारत में निजी विश्वविद्यालय की संख्या तेजी से बढ़ी है। शिक्षा के व्यवसायीकरण से शिक्षा का स्तर तेजी से गिर रहा है। एक डिग्रीधारी बेरोजगार फौज तैयार हो रही है, जो पूरी तरह से अनस्किल्ड है। संघ इस समस्या का क्या समाधान देखता है?
उत्तर : शिक्षा नौकरी के लिए है। ये मानसिकता इसके लिए जिम्मेवार है। डिग्री चाहिए, क्यों चाहिए? नौकरी के लिए चाहिए।
तो मैं कृषि विद्यापीठ में पढ़ा हूं। हमारी यूनिवर्सिटी में इतने सारे ऐग्रिकल्चर वेटरिनरी के छात्र थे। मेरे साथ आज भी हैं कुछ। मैं पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहा था। ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट होने के बाद ये लोग खेती में नहीं गए। वो लोग नौकरी में गए, बैंक में लोन ऑफिसर बन के साइन करते रहे। सफेद कागज पर स्याही की खेती करते रहे। घरों में 70 एकड़, 100 एकड़ अच्छी खेती थी। पानी था, पंप थे लेकिन अपने व्यवसाय में वापस नहीं गए। क्योंकि कमाना यानी नौकरी करना। वो भी सरकारी रहे, तो बहुत अच्छा है। और मेरे घर के पास रहे ऑफिस, तो बहुत अच्छा है। ये मानसिकता सबको नौकरी की तरफ बढ़ाती है।
वास्तव में कमाना है, तो कमाने का हुनर चाहिए, स्किल्स चाहिए। हम गुलाम नहीं बनेंगे, हम नौकर नहीं बनेंगे, हम नौकरी देने वाले बनेंगे। ऐसी अगर सोच है, तो ये नौकरी की तरफ जो बड़ा प्रवाह जा रहा है, आधा लोड तो कम हो जाएगा। और जो ऐसा करते हैं, वो बड़े बनते हैं। मुझे एक यूनिवर्सिटी रजिस्ट्रार मिले। उन्होंने कहा कि मैं, जो ऊंची पढ़ाई-लिखाई कमर्शियल होने के कारण महंगी पड़ती है, सीख नहीं सकते, उनको मैं व्यवसाय सिखाता हूं। 400 बच्चों को मैंने खड़ा किया, अपने पैर पर।
और एक उदाहरण उन्होंने बताया कि
होटल में एक बर्तन मांजने वाला लड़का। उसको पूछा उन्होंने,
क्यों, ये क्यों? सीखा नहीं।
आठवीं में छोड़ दिया।
क्यों छोड़ दिया?
होता नहीं, एक तो पढ़ाई में रुचि नहीं। दूसरा पैसा नहीं।
तो उन्होंने कहा, क्या करना चाहते हो?
तो बोला, मैं कोई उद्योग करना चाहता हूं।
कौन सा उद्योग कर सकते हो?
उसने कहा, मैं पान-ठेला चला सकता हूं।
तो उन्होंने उसको पान- ठेला, पान-ठेला खड़ा करने में, कितना धन लगता है, 4- 5 हजार रुपया लगाया।
उन्होंने उस समय, यानी 10-11 साल के पहले की बात है। और फिर रोज 1 साल वो जाते थे, वहां पान खाने। और फिर उसको पूछते थे– आज कितना सामान लाया, कहां से लाया, कैसा एकाउंट रखा, उधारी दी, क्या कितनी दी, वसूली कैसे कर रहे हो?
1 साल उन्होंने उनको बिजनेस सिखाया। रोज दो बार जाते थे, भोजन के बाद और उस लड़के की, उस दिन उन्होंने बताया कि आज की तारीख में पास ही, शिरडी के पास गांव है, वहां 29 लाख की प्रॉपर्टी है।
तो काम करने से आजीविका चलती है। काम करने से समाज का भी उपकार होता है। उसमें एक काम छोटा सा काम रहता है। कोई भी दुनिया का समाज प्राइवेट और गवर्नमेंट मिलकर 30% से ज्यादा जॉब्स नहीं दे सकते।
बाकी सब अपने हाथ से कमाने वाले छोटे-बड़े लोग रहते हैं लेकिन और एक कठिनाई है कि ये छोटा-बड़ा वाला मामला काम में आ गया। प्राचीन समय में ही आ गया, ये काम हलका है, इस काम में अस्वच्छता है। इसलिए ये काम हलका है, हलका नहीं, नीच है।
ये जब से आ गया, तब से हमारे समाज की गिरावट शुरू हो गई। तो श्रम-प्रतिष्ठा नाम की चीज धीरे-धीरे कम हो गई। अभी श्रम-प्रतिष्ठा आवश्यक है। मेहनत से काम करने वाले को सम्मान देना है। खेती में नहीं गए लोग, क्यों नहीं गए? किसान को लड़की नहीं देता कोई। अच्छा किसान है, अच्छा कमा रहा है लाखों, लेकिन देहात में रहता है, किसानी करता है। पढ़ा-लिखा है लेकिन लड़की नहीं मिलती, ये क्या है? श्रम-प्रतिष्ठा नहीं है।
तो श्रम-प्रतिष्ठा उत्पन्न करें। आजीविका यानी नौकरी के भ्रम नष्ट करें। और अपने हाथ से कमाकर अपने को और अपने परिवार को खड़ा करने का दम भरें, युवकों में। तो भारतवर्ष अपने यहां के सब काम निपटाकर, अन्य देशों के काम करने के लिए भी वर्कफोर्स दे सकता है, इतनी अपनी तैयारी है। उसको ठीक से, उस पोटेंशियल को सामने लाकर उसका उपयोग करना चाहिए।
प्रश्न 7 : जैसे भाजपा और संघ के बिना जिज्ञासा समाधान पूरा नहीं होता है, वैसे डेमोग्राफी, डीएनए, अखंड भारत, इसकी जिज्ञासा के बिना भी समाधान पूरा नहीं होता। मैं कुछ नाम ले रहा हूं, जो प्रश्नकर्ता हैं-
अंजलि रॉय मेहता जी, फिल्म निर्माता। जितेन्द्र शर्मा जी, सीनियर जर्नलिस्ट। ममता चतुर्वेदी जी, सीनियर जर्नलिस्ट। सुरेश वन केजी, सीनियर जर्नलिस्ट। डॉक्टर ग्लेडबिन त्यागी जी, रमनपुरी जी, रिटायर्ड वाइस अडमिरल, इंडियन नेवी। डॉक्टर ममता त्यागी जी, अशोक श्रीवास्तव जी, सीनियर जर्नलिस्ट। आर. के, गुप्ता जी, रिटायर्ड आइआरएस। जितेन्द्र तिवारी जी, हर्षवर्धन त्रिपाठी जी, प्रोफेसर अनिल मित्रा जी, प्रोफेसर केजी सुरेश जी, सीनियर जर्नलिस्ट। पीटर हॉर्न (जर्मन जर्नलिस्ट). लेफ्टिनेंट जनरल वेद चतुर्वेदी जी, प्रोफेसर मंजूषा राजगोपाल जी, सैयद शेरवानी जी, पवन गौड़ जी, सीनियर जर्नलिस्ट। मौलाना ए. आर. शाहीन कासमी, मुस्लिम स्कॉलर। सुकेश रंजन जी, सीनियर जर्नलिस्ट। विजय त्रिवेदी जी, सीनियर जर्नलिस्ट। कर्नल ताहिर मुस्तफा, रजिस्ट्रार हमदर्द यूनिवर्सिटी। सेंड्र पीटर्समैन, जर्मन जर्नलिस्ट। अनिल त्यागी जी, त्यागी समाज। चौधरी सुरेंद्र सोलंकी जी, प्रधान पालम 360, खाप के डॉक्टर टी. एस. क्लेव, एम्बेसडर सूजन और आर्चनॉय, गोपाल किशन जी रिटायर्ड आई ए एस। दो भागों में है ये जो डेमोग्राफी डीएनए और अखंड भारत का है। पहले भाग के प्रश्न पढ़ता हूं मैं-
अवैध घुसपैठियों को भारत से निकालने तथा जनसंख्या असंतुलन की चिंता से भारत कैसे निपटेगा एवं संघ इस विषय में क्या सोचता है?
आप कहते हैं कि हिंदू एवं मुस्लिम का डीएनए एक है लेकिन उस पर फिर कट्टरवाद हावी हो जाता है।
कुरान, सुन्नत और हदीद, इस पर आधारित पॉलिटिकल इस्लाम मानने वालों के साथ हम कैसे व्यवहार करें?
यदि डीएनए एक है, तो बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकालना क्या सही है?
संघ ने विभाजन का विरोध क्यों नहीं किया एवं पाकिस्तान जैसे देश पर संघ का क्या विचार है?
अखंड भारत को लेकर संघ का क्या विचार है?
भारतवर्ष हमेशा वसुदेव कुटुम्बकम के सिद्धांत पर रहा है। फिर भी कुछ शताब्दियों में भारत की सीमाएं संकुचित क्यों हुई हैं?
‘इज द यूनिफिकेशन विद नेबरिंग कंट्री थिंकेबल’ ये पहला भाग है।
उत्तर : तो, डेमोग्राफी की चिंता होती है और होने का कारण है कि डेमोग्राफी बदलती है, तो उसके कुछ परिणाम निकलते हैं। देश का विभाजन एक परिणाम है। मैं केवल भारत की बात नहीं कर रहा हूं। तिमोर हो गया, इंडोनेशिया में, सर्वत्र सब देशों में डेमोग्राफिक इम्बैलेंस की चिंता रहती है। लेकिन ये चिंता भी क्यों उत्पन्न होती है कि संख्या से ज्यादा इरादा क्या है, इसके बारे में शंका रहती है मन में।
तो पहली तो बात संख्या की है। तो जनसंख्या के असंतुलन में, वास्तव में उसके कारण क्या है?
पहला कारण है, मतांतरण, कनवर्जन, जो भारतीय परंपरा का हिस्सा नहीं है और कैथोलिक चर्च के लोग हमको बताते हैं कि हम नहीं करते हैं। तो कहीं ना कहीं क्रिश्चनिटी में भी उसको ठीक नहीं माना जाता, ऐसा एक प्रवाह है। और परसों उलेमाओं से बात हुई, तो उन्होंने हमको बताया, मदरसों के टीचर्स से बात हुई कि इस्लाम में भी मना है। पैगम्बर साहब के चाचा, उनको कलमा पढ़ाने के लिए अनुयायियों ने कहा, तो मना किया उन्होंने, ये नहीं करना है। अगर ऐसा है, तो ये होना नहीं चाहिए।
रिलिजन अपना-अपना चॉइस है, जिनको जिस रिलिजन में जाना है, जबरदस्ती गए, वापस आना चाहते हैं, आओ अपने मन से आओ, लोभ लालच जबरदस्ती नहीं है लेकिन ये होता है। तो इसको रोकना, ये करना पड़ेगा।
दूसरी बात है घुसपैठ। तो ये ठीक है कि हमारा डीएनए सबका एक है लेकिन व्यवस्थाएं होती हैं। अब यूरोप में भी तीन-तीन देश, चार-चार देश ऐसे हैं, जो समान एनएसएस फ्री रखते हैं, लेकिन देश एक व्यवस्था है, उसकी सीमा होती है। उसमें आना-जाना। आप पूछते हो घुसपैठियों को रोकना सही है क्या? मैं कहता हूं अगर डीएनए एक है तो परमिशन लेके आना गलत है क्या, परमिशन लेकर आना चाहिए ना। परमिशन नहीं मिलती, तो नहीं आना चाहिए, लेकिन विधि विधान, नियम बाजू रखकर घुस जाना, ये अपने आप में गलत बात है। आने पर उपद्रव होता है। ये अनुभव है, तो इसलिए, इस घुसपैठ को रोकना चाहिए। कुछ तो सरकार रोक सकती है। सरकार कुछ प्रयास कर रही है। धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं। परंतु समाज के हाथ में है कि हम अपने देश में रोजगार, अपने देश के लोगों को देंगे। अपने देश में भी मुसलमान नागरिक हैं, उनको भी रोजगार की जरूरत है। मुसलमान को रोजगार देना है, तो उनको दीजिए, जो बाहर से आए, उसको क्यों दे रहे हो? उनके देश की व्यवस्था उन्होंने करनी चाहिए या फिर है, परमिशन लेकर आकर जॉब करने वाले लोग, सब देशों में हैं। हमारे यहां भी ऐसे हो सकते हैं।
तो इसलिए अवैध लोगों को पहचानना, अगर सुरक्षा की कुछ बातें उसमें से खड़ी होती हैं, तो रिपोर्ट करना कि ये लोग अवैध हैं। आप उन पर निगरानी रखिए और उनको देना नहीं रोजगार, ये हम कर सकते हैं। तो वो कारण भी कम हो जाएगा।
तीसरा नंबर जन्मदर का है। अब उसके बारे में आपको, प्रचारक को नहीं पूछना चाहिए वास्तव में, परंतु पूछा है आपने, तो दुनिया में सब शास्त्र कहते है कि जन्मदर तीन से कम जिनका होता है, वो धीरे-धीरे लुप्त हो जाते हैं, तो तीन से ऊपर मेंटेन करना चाहिए। सब देशों में ऐसा होता है, सब समाज ऐसा करते हैं।
दूसरा डॉक्टर लोग मुझे बताते हैं कि तीन संतान होने से, बहुत देर नहीं करना, विवाह में और तीन संतान होना, इससे माता-पिता का, संतानों का, तीनों का स्वास्थ्य अच्छा रहता है और जिस घर में तीन संतान है, उस घर की वो संतान आपस में इगो मैनेजमेंट सीख लेती है, इसलिए आगे चलकर उनकी फैमिली लाइफ में कोई डिस्टर्बेंस नहीं होता। ये डॉक्टर ने बताया है, मैं तो जानवरों का डॉक्टर हूं, उधर ये विषय ही नहीं है। मनुष्यों के डॉक्टर मुझे ये बताते हैं, फिर अपने देश की पॉलिसी हैं। पॉपुलेशन पॉलिसी, वो 2.1 रेकमेंड करती हैं, अब वो देश का एवरेज 2.1, ये तो ठीक है लेकिन संतान होती है, तो पॉइंट वन संतान कभी होती नहीं, गणित में 2.1 का 2 होता है लेकिन मनुष्य के जन्म में 2 के बाद पॉइंट वन होता नहीं है, तीन ही होता है। इसलिए 2.1 मीन्स 3, तो भारतवर्ष के प्रत्येक नागरिक को ये देखना चाहिए कि अपने घर में तीन होनी चाहिएं। ये देश के दृष्टि से कह रहाहूं।
दूसरा एक कंसर्न भी है। जनसंख्या एक एसेट है, बोझ भी हो सकता है। कल खिलाना पड़ेगा ना सबको, तो उसी के लिए पॉपुलेशन पॉलिसी रेकमेंड कर दी है। तो दोनों तरफ से जनसंख्या नियंत्रित रहे और जनसंख्या पर्याप्त रहे, तो तीन होने चाहिए। तीन से बहुत ज्यादा आगे बढ़ना नहीं चाहिए। उनकी परवरिश वगैरह ठीक होने की दृष्टि से, ये सब लोगों के करने वाली बात है। जन्मदर कम होने की बात है, तो वो सबका कम हो रहा है। हिंदुओं का पहले से कम था और ज्यादा कम हो रहा है। बाकी लोगों का उतना कम नहीं हो रहा था, तो आज उनका ज्यादा दिखता है लेकिन उनका भी कम हो रहा है।
प्रकृति ऐसा करती है, संसाधन कम हैं, जनसंख्या ज्यादा हुई, तो प्रकृति में ऐसा कुछ होता है, तो इसका संदेश लेकर सब लोगों ने तीन से कम नहीं करना और तीन से आगे करना, इसके लिए नई पीढ़ी को तैयार करना चाहिए और जिनके हाथ में अभी भी हैं, उन्होंने ऐसा करना चाहिए, और क्या कह सकते हैं जनसंख्या का।
और तीसरा भी पूछा ना आपने विभाजन?
संघ ने विभाजन का विरोध क्यों नहीं किया? ये रॉन्ग इन्फॉर्मेशन है? शेषाद्रि जी की एक पुस्तक है ‘ द ट्रैजिक स्टोरी ऑफ पार्टीशन ‘, आप सब लोग पढ़िए, उसमें विभाजन कैसे हुआ? विभाजन क्या करने से हुआ और क्या करने से रुक सकता था। विभाजन में किसका क्या रोल था, ये सारी बातें हैं।
संघ का मत क्या है, इसके बारे में इसका ठीक-ठीक पता उस पुस्तक के पढ़ने से आपको पता चलेगा। विदाउट मिंसिंग वर्ड्स वो किताब लिखी गई है। उसको आप पढ़िए। तो संघ ने विरोध किया था, लेकिन संघ की ताकत क्या थी उस समय?
पूरा देश महात्मा जी के पीछे था। महात्मा जी ने तो कह दिया था ‘मेरी लाश पर होगा विभाजन’। गुरुजी से पूछा किसी स्वयंसेवक ने, अच्छे कार्यकर्ता ने पूछा, कि ये तो इधर जा रही है गाड़ी, तो गुरुजी ने कहा था, ‘नहीं, गांधी जी ने सहमति नहीं दी है, विभाजन नहीं होगा’।
लेकिन कुछ हुआ, जो उन्होंने भी मान्य कर लिया। उनके मान्य करने के बाद संघ के कहने से समाज समर्थन नहीं करता और इसलिए विभाजन रुक नहीं सका। यानी उसको रोकने के लिए हम भी कुछ नहीं कर सके, तो अखंड भारत एक सत्य है। विभाजन होने से क्या-क्या होता है, मौलाना अबुल कलाम आजाद का एक लेख, चट्टान नाम का उस समय एक पेपर था लाहौर में, उसके पत्रकार ने उनका इंटरव्यू लिया। 1946 का इंटरव्यू है वो, डेट मैं भूल गया, मिल जाएगा, वो आप पढ़िए। उन्होंने इस विभाजन के विरोध में अपना मत देते हुए विभाजन के परिणाम क्या होंगे, इसका कुछ प्रिडिक्शन किया है। वो अक्षरशः सत्य आज हम देखते हैं।
पाकिस्तान की क्या हालत होगी, भारत में मुसलमानों का क्या होगा, ये सब उन्होंने लिखा है। लेकिन उनके जैसे लोगों का नहीं सुना गया। लेकिन भारत अखंड है, ये एक सत्य है। फैक्ट ऑफ लाइफ है। जबरदस्ती उस सत्य को नकारकर जो लोग चल रहे हैं, उनका क्या हो रहा है? नहीं, हम एक नहीं, हम अलग हैं। ऐसा मानकर जो अलग हुए, जिस दिन से अलग हुए, उस दिन से शुरू कीजिए, अभी इस क्षण तक की हालत देखिए, क्या वो सुखी हैं? मटेरियली, स्पिरिचुअली, नहीं है, क्या इतने सालों में कुछ प्रयास नहीं हुए, बहुत प्रयास हुए, लेकिन उपाय नहीं निकला। क्योंकि उपाय कैसे निकलेगा भाई, मैंने एक हाथ को जबरदस्ती अलग पूरा जकड़कर रखा हैं, तो वो तो सुन्न हो जाएगा ना? मृतप्रायः हो जाएगा, क्योंकि जिस जीवंत शरीर का वो अंग हैं, उससे उसका संबंध आपने काट दिया। उपाय एक ही है संस्कृति से, पूर्वजों से, मातृभूमि से हम एक हैं। ऐसा हम समझें और वैसा व्यवहार चालू किए।
अखंड भारत, ध्यान में रखना is not only political, क्योंकि अखंड भारत जब अखंड भारत था, तब भी अनेक राजा यहां थे, अनेक राज्य थे, सीमाएं थीं, आने-जाने की परमिशन लेनी पड़ती थी और पुरातन काल में आपस में कुछ युद्ध लड़ाइयां भी हुई थीं लेकिन पब्लिक, नेचर उस देश का, वो उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम बेरोकटोक जाता था, कहीं भी रह के कमाता था, खाता था और इस देश के साथ अपनेआप को एकाकार मानता था, इसलिए कर पाता था। वो भावना अगर फिर से आ जाए, तो उस समय का पोलिटिकल, इकोनॉमिक डिस्कशन कोई भी हो, सबकी उन्नति होगी, सब सुखी रहेंगे, सब शांतिपूर्ण वातावरण में रहेंगे और सबके दोस्त बढ़ जाएंगे।
तो ये जो अखंडित भारत का दुस्वप्न है, जिस नींद में हमको पड़ रहा है, उस नींद से जागना बहुत आवश्यक है और सोया हुआ आदमी कभी ना कभी जागेगा, इसलिए अखंड भारत है ये समझकर हमको चलना चाहिए।
प्रश्न 8 : डीएनए व डेमोग्राफी के भाग दो में पांच-छह प्रश्न हैं मैं आपके समक्ष रखता हूं।
अनेक मुसलमानों के लिए हिंदू शब्द की भौगोलिक पहचान को मानना आज आसान नहीं है, जबकि उन्हें भारतीय मुसलमान कहने में कोई आपत्ति नहीं है। मुस्लिम धर्म स्थलों की खुदाई हो रही है तथा मुस्लिमों पर अत्याचार में संघ के स्वयंसेवक ही आगे रहते हैं, यदि ये दूरी और अविश्वास बना रहा, तो भारत मजबूत और विश्वगुरु कैसे बनेगा?
स्वतंत्रता के 70 वर्ष बाद भी आपस में हिंदू मुस्लिम संघर्ष क्यों? क्या हम सभी भारतीय के नाते संगठित होकर नहीं रह सकते ? who Is to be blamed for communal violence and who can stop it.
क्या आप मुस्लिम आक्रांताओं के नाम पर रखे गए मार्ग एवं शहरों का नाम बदलना उचित मानते हैं? संघ भारत के मुस्लिमों एवं ईसाई समुदायों के विरोध में नहीं है। ये विश्वास संघ उन्हें क्यों नहीं दिला पा रहा है?
How do we ensure that minorities in India like Muslims and Christians subscribe to a common consciousness of our past and shared culture
अंतिम है – – don’t you think that our emphasis on Vasudev Kutumbakam is diluted our stand on illegal migration.
उत्तर : तो, परसों के भाषण में मैंने कह दिया कि हिंदू शब्द कॅन्टेंट व्यक्त करता है, इसलिए हम आग्रहपूर्वक हिंदू कहेंगे, लेकिन कोई हिंद भी कहता है, कोई भारतीय कहता है, कोई आर्य कहता है,, कोई इंडिक कहता है, तो ये सब सिनोनिम्स हैं, ये हम जानते हैं। वो भी अगर जानते हैं, तो उनके इस शब्द के उपयोग को हम मान्यता देते हैं। हम तो इन सबको समानार्थी मानते हैं, लेकिन जो कॅन्टेंट मैंने बताया, खासकर सांस्कृतिक कॅन्टेंट, पूर्वज परंपरा, उसको व्यक्त करने वाला एक ही शब्द आज है- हिंदू, इसलिए उसका आग्रह हम रखेंगे। आप भारतीय कहेंगे ठीक बात, आप जानो कि एक ही बात है और उसी शब्द का उपयोग करो। हिंद भी कहना, कहो, कोई दिक्कत नहीं हमको, शब्दों के झगड़े में हम नहीं पड़ते। हमारा मतलब कॅन्टेंट से है, वो कॅन्टेंट आप समझ लीजिए, तो शब्दों के उपयोग में हमको कुछ नहीं है और इन शब्दों के कारण ही हिंदू-मुस्लिम ऐसा आ गया। हिंदू-मुस्लिम एकता वगैरह, मेरे मन में आता है कि जो अलग है उनको एक करने के लिए एकता की बात होती है। जो एक ही हैं, उनकी क्या एकता करना है? क्या बदला है, पूजा बदली और क्या बदला है? लेकिन जो डर भर दिया गया कि भाई, ये लोग रहेंगे, तो क्या होगा, बता नहीं सकते। इतनी लड़ाई हुई, इतने अत्याचार हुए, इतने कत्लेआम हुए, देश भी टूटा, सावधान रहो। एक तरफ ये। दूसरी तरफ, अरे भाई, ये हिंदुओं के साथ जाएंगे, तो तुम्हारा इस्लाम चला जाएगा। तुम अलग हो, अलग रहो, अलग मांगो, नहीं तो तुम्हारी कोई आइडेंटिटी नहीं है। गलत बात है ये, मौलाना अबुल कलम आजाद के इंटरव्यू में है, रिलिजन बदलने से कौम नहीं बदलती और मुझे अरशद मदनी साहब ने बताया था कि उनके चाचा ने भी ये बात कही थी।
तो हमारे आइडेंटिटी तो एक ही है, हम हिंदू हैं, हम भारतीय हैं, हम हिंदवी भी हैं, जो भी आपको कहना है वो एक आइडेंटिटी है, वो हमारी संस्कृति को, मातृभूमि को और पूर्वजों को, परंपरा को बताती है। ये जब भूल जाते हैं तब 70 वर्ष के बाद भी इस अविश्वास के कारण, एक तरफ अविश्वास है हिंदुओं में, उनकी दुर्बलता के कारण। उनको ये कॉन्फिडेंस नहीं है कि ठीक है भाई, हैं मुसलमान लोग, लेकिन अपने ही है, पूजा बदली ना? हमारी संस्कृति में तो जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत तिन देखी तैसी, तो हम अब संगठित हैं, अब साथ चलाएंगे, साथ चलेंगे।
और उधर कॉन्फिडेंस नहीं है कि इनके साथ चलेंगे, तो हमारा इस्लाम बचेगा कि नहीं बचेगा, क्योंकि स्पिरिचुअलिटी भूल गए, अपनी शक्ति को भूल गए। एक जगह शक्ति जागरण करना आवश्यक है। समाज का संगठन करना आवश्यक है, दूसरी जगह ये गलतफहमी हटानी आवश्यक है। भाई पहले दिन इस्लाम भारत में आया, तब से आज तक इस्लाम यहां है और रहेगा। ये मैंने भी पिछली बार भी कहा था इस्लाम नहीं रहेगा, ऐसे सोचने वाला, हिंदू सोच का नहीं है, हिंदू सोच ऐसी नहीं है। दोनों जगह ये कॉन्फिडेंस बने, तब ये संघर्ष खत्म होंगे।
तो पहले ये मानना होगा कि हम सब लोग एक हैं, हमारी भाषाएं अलग हैं, जाति- पाति अलग है, पूजा अलग है, ये सब है, विशिष्टताएं हैं हमारी, लेकिन सबसे ऊपर ये हमारा राष्ट्र है, सबसे ऊपर ये हमारा देश है, हमारा समाज है, हमारी संस्कृति है और वो अलग- अलग नहीं है। We are not a federation of communities or societies, we are one people, we the people.
अब शहरों के और रास्तों के नाम बदलना, वहां-वहां के लोगों की भावनाओं के हिसाब से होने चाहिए, आक्रांताओं के नाम नहीं होने चाहिएं। आप ये समझकर तालियां मत बजाओ कि मैंने मुसलमानों के नाम नहीं होने चाहिए, ऐसा कहा है, ऐसा नहीं कहा है मैंने। आक्रांताओं के मत हो, लेकिन शहीद हवलदार अब्दुल हमीद का नाम होना चाहिए, डॉक्टर अब्दुल कलाम, नाम होना चाहिए, ये प्रश्न किसका क्या रिलिजन है इसका नहीं है। कौन देशभक्त है, कौन नहीं है, उसका है। हमको प्रेरणा किससे मिलती है, जितनी रामप्रसाद बिस्मिल से मिलती है, उतनी अशफाक उल्ला खान से भी मिलती है, मिलनी चाहिए क्योंकि पूजा-पद्धति, खानपान, रीति-रिवाज के भेद, ये हमारी संस्कृति में भेद के नाते नहीं स्वीकार करते, वो विशिष्टताएं हैं, ये मान्य किया जाता है। इसलिए उसका सम्मान भी किया जाता है, उसका स्वीकार भी किया जाता है, परंतु देश के नाते हम एक हैं, समाज के नाते हम एक हैं। ये झगड़े जो हुए हैं, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण धीरे-धीरे इनको समाप्त करना पड़ेगा, तो रास्तों का नाम बदलना, इसमें मुसलमान विरोध नहीं है और रास्तों का नाम बदलना, इसमें आक्रामकों को छोड़कर बाकी सब स्वीकार है, ये ध्यान रखना।
अब ये कहा गया स्वयंसेवक ही अत्याचार पर आगे लड़ रहे थे और इधर विश्वास संघ क्यों नहीं देता?
आप ये कह दो, कितने जगह संघ के स्वयंसेवक अत्याचार करते हुए दिखे? मैं प्रूफ की बात नहीं कर रहा हूं, वो तो एक अलग बात है। कोई प्रूफ ही नहीं है इसका, लेकिन प्रूफ नहीं मिल सकता, लेकिन हमने देखा है ऐसा होता है क्या यहां?
जब झगड़ा होता है रास्तों पर, तब झगड़े में एक-दूसरे को मारता है, तो दूसरे को प्रतिकार करना पड़ता है, वो एक अलग बात है लेकिन हिंदू ने आक्रमण किया, मुसलमानों पर या संघवालों ने आक्रमण किया, कोई सबूत है क्या? मान लीजिए एक-आध जगह है, तो आपने दूसरी तरफ ये नहीं देखा कि चरखी दादरी में विमान टूटे, तब प्रवासी मुसलमान थे, उनकी कितनी सेवा की संघ के लोगों ने? केरल में बाढ़ आई, गुजरात में भूचाल आया। किसी का रिलिजन नहीं देखा, सबकी सेवा की, तो ये एक तरफा दृष्टि के कारण ये अविश्वास है, जो नैरेटिव के कारण परसेप्शन बना है, उसके कारण उस परसेप्शन का पर्दा बाजू रखकर थोड़ा सा हिम्मत करके, दो कदम अंदर जाकर देखने का साहस हम करें, तो आपको दिख जाएगा ‘what is fact’। जिन्होंने ऐसा किया है उनको पता है, तो ये आरोप सरासर गलत है, संघ का स्वयंसेवक किसी अत्याचार में विश्वास नहीं रखता, ना किसी अत्याचार का समर्थन करता है। ऐसा जब हुआ है संघ की ओर से तो कभी नहीं हुआ। हिंदू समाज के कुछ क्षोभ के कारण अगर कुछ हुआ है, गलत हुआ है, तो मैंने स्वयं सार्वजनिक मंचो से उसकी निंदा की है, ये आप जानते हैं। तो आप कैसे कह सकते हैं संघ करता है? नहीं कहना चाहिए, और विश्वास तो फिर, आपको देखना पड़ेगा। हम तो छुपते नहीं हैं, हम जो करते हैं खुला है, डंके की चोट पर है, आज भाषण में बहुत सारे हमारे मुसलमान भाई भी निमंत्रित हैं। हिंदू राष्ट्र की बात मैं करता ही नहीं, लेकिन हम ऐसे छुपकर नहीं करते, हम जो हैं सो बता रहे हैं। अब हम बता रहे हैं, कभी भी आप आ सकते हैं, देख सकते हैं, आपको आकर देखना चाहिए वो नहीं होता है। उधर से कुछ होना आवश्यक है, तो हिंदू समाज का संघ का विश्वास बनेगा, क्योंकि संघ तो ऐसा बिल्कुल नहीं है। हिंदू समाज भी प्रकृति से ऐसा नहीं है ये ध्यान में रखना पड़ेगा और ये होने से हमको पता है कि मुस्लिम और क्रिश्चियन ये Common Consciousness of Our Past and Shared Culture से जुड़ेंगे। बशर्ते उनको ये पट्टी पढ़ाने वाला काम बंद हो, या वो उसको रिजेक्ट करें कि हम पूजा से अलग है, इसलिए समाज से अलग है, संस्कृति से अलग है, हम मुसलमान हैं, हम ईसाई हैं, लेकिन हम यूरोपियन नहीं हैं, हम अरब तुर्क नहीं हैं, हम भारत के हैं, हमारे पूर्वज भारतीय हैं। ये जब उनके नेतृत्व की भाषा होगी, ये जब वहां सिखाया जाएगा, तब ये बात सब ठीक हो जाएगी।
हिंदू समाज मन में आतुरता से इसकी राह देख रहा है, ये होना चाहिए और वसुधैव कुटुंबकम् का एक तरह से उत्तर मैंने पहले दे दिया, देश की व्यवस्थाएं होती हैं, पृथ्वी एक कुटुंब है, लेकिन कुटुंब में व्यक्ति है अनेक देश, ये व्यक्ति स्वरूप है, तो अपने कुटुंब में पूरा कुटुंब एक रहता है, लेकिन कुटुंब की व्यवस्था का सम्मान प्रत्येक व्यक्ति को करना पड़ता है, व्यक्ति के अपनी स्वतंत्रता पर भी संयम रखना पड़ता है, निर्बंध रखने पड़ते हैं। तुमको पूरी स्वतंत्रता है, तुम्हारा हाथ है, कैसा भी घुमाओ लेकिन मेरे गाल तक आया तो रुक जाना, वो स्वतंत्रता तुमको नहीं है। स्वतंत्रता भी एक मर्यादित बात है। वो अनुशासन का नाम है, केवल मुक्तता का नाम नहीं है, ये ध्यान में रखना और वैसे करना इसलिए Illegal Migrants नहीं आना चाहिए देश में। इसमें कोई वसुधैव कुटुंबकम के तत्त्व के साथ कोई प्रताड़ना नहीं है, उसके अनुसार ही है, वो कुटुंब की व्यवस्था ठीक चले इसलिए सबके लिए जो नियम है उस नियम का पालन सबने करना चाहिए।
प्रश्न 9 : सामाजिक समरसता और पहचान, प्रश्नकर्ता हैं-
गोपाल कृष्ण जी, गुरु रविदास विश्रामधाम मंदिर, करोलबाग। डॉ. धर्मपाल जी, आई.ए.एस रिटायर्ड। लेखाराम दिवाकर जी, डॉ. शिवचरण सिंह पीपल जी, आचार्य, डॉ. कौशल पंवार जी, अभय कुमार तिवारी जी, श्री मनमोहन पदम् जी, अखिल भारतीय बलाई महासभा के जनरल सेक्रेटरी है आप। प्रदीप कुमार मोहंती जी, गोपाल कृष्ण जी, रिटायर्ड IAS हैं। प्रभात कुमार जी, रतन लाल बैरवा जी। संजीव कुमार जी। ये इनके कुछ प्रश्न हैं, जो दो भागों में विभाजित किए हैं। पहला भाग के प्रश्न पढ़ता हूं मैं, आप सब के समक्ष।
‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत ‘ हमारा संकल्प है, लेकिन क्या जातिवाद इस राह में रुकावट नहीं है? क्या संघ ये महसूस करता है कि हिंदू समाज की एकता में वर्ण व्यवस्था बाधक है? एक मंदिर, एक कुआं, एक श्मशान, WAS THE SLOGAN PROPOUNDED BY श्री मोहन भागवत जी At Aligarh, Yet its Impact Is Not Visible On The Ground. Could Deep Rooted Cast Practice with the reason For The Gap Implementation ?
उत्तर: जातिवाद तो रुकावट है। किसी भी बात का वाद होता है, तो रुकावट ही बनता है, किसी भी विवाद में। ये जो जाति और वर्ण नाम की चीज है, वो कभी व्यवस्था थी। आज वो व्यवस्था है नहीं, वो अव्यवस्था बन गई है। और जाति और वर्ण व्यवस्था के नाम पर जाति और वर्णनों के अभिमान अपना खेल, खेल रहे हैं। वास्तव में, एक काल सुसंगत नई व्यवस्था, नया रूप लेकर कोई आनी चाहिए, जो शोषण मुक्त और समता युक्त रहे। इसकी आवश्यकता है, तो जो Out Of date है, काल भाई है, वो जाने वाला है, उसकी बहुत चिंता करने की आवश्यकता नहीं। ठीक से जाए, जाते-जाते उपद्रव न करे, ये देखना है। व्यवस्था तो है नहीं, हमारे मन में वो अहंकार है, मैं इस वर्ण का हूं, मैं इस जाति का हूं। और न्यूनगंड (हीन भावना या अपर्याप्तता की भावना, inferiority complex) भी है। अरे…रे, मैं इस वर्ण का हूं, मैं इस जाति का हूं। ये अहंकार समाप्त होना चाहिए, तो वो न्यूनगंड भी समाप्त होगा। व्यवहार होना चाहिए। कल मैंने बताया, समरसता के लिए करना क्या है? जाना-आना शुरू हो जाए, घर में उठना-बैठना, एक स्वाभाविक व्यवहार हो। भाषण होने की जरूरत नहीं है। यशवंत राव जी केलकर थे हमारे विद्यार्थी परिषद में, विद्यार्थी परिषद का एक नया कार्यकर्ता अनुसूचित जाति का था, उसको भड़का दिया वहां पर कि ये लोग तुम्हारा उपयोग कर रहे हैं। कल फिर से तुमको झाड़ू लगाने के लिए ही बताएंगे।
वो तिलमिला गया और भरी दोपहर उनके घर गया, प्रश्न पूछने के लिए। घर की बेल दबाई, उन्होंने दरवाजा खोला।
अरे इतनी दोपहर गरमी में आ गए। आओ, बैठो क्या बात है ?
उसने कहा, बताता हूं, लेकिन मुझे प्यास बहुत लगी है, पानी चाहिए। सच में उसको प्यास लगी थी।
उन्होंने भी सहज कहा, अंदर जाओ किचन में। वहां पानी है, तुम पी लो, आते समय एक ग्लास, मेरे लिए भी लेना।
उसने वो सब किया। बाद में केलकर जी ने पूछा, कैसे आए थे, तो वो बोला, कुछ नहीं, काम हो गया।
इस प्रकार का व्यवहार चाहिए, अपने भाषण में, बुद्धि में तर्क में, नहीं रहा, तो भी चलेगा। लेकिन जो भी आपको दिखता है, वहां होता है inspite of that, ये अपनापन जाना वहां तक। हृदय का हृदय से स्पर्श हो, इस प्रकार का सहज स्वाभाविक व्यवहार होना इसकी आवश्यकता है। ये होता है, तो सारी बातें होती हैं। स्वयंसेवक यह प्रयत्न कर रहे हैं, लेकिन धीर-धीरे अब इतनी डीप रूटेड (गहरी जड़ों वाला) है सारी बातें, तो उखड़ने में और जो प्रयास चल रहे हैं, उसका असर दिखने में समय लगेगा।
फिर देश अपना, इतना विस्तृत है और आजकल मीडिया तो रीजनल हो गया। तो इधर जो हो रहा है, उसकी खबर उधर नहीं होती है। इसलिए अच्छी बातों का भी असर कम होता है। कभी-कभी जो जाना नहीं चाहिए, सर्वदूर, वो जाता है, लेकिन जो सर्वदूर जाना चाहिए पॉजिटिव न्यूज, उसमें कमी है।
अभी आप में ही एक निमंत्रित सज्जन बैठे हैं, वो संघ के स्वयंसेवक हैं, वो भोपाल गए। गणेश उत्सव, कल गणेश चतुर्थी थी। उनके पास चंदा मांगने के लिए लोग आए। उन्होंने कंडीशन डाली कि आप मूर्ति के लिए चंदे की बात कर रहे हैं, पूरी भव्य मूर्ति, आप जितनी बोलेंगे, उतनी बड़ी मैं खरीदकर आपको दूंगा। लेकिन एक शर्त है। इस बस्ती में जितने समाज के लोग हैं। उस समाज के सब लोग, सब के सब लोग, पूजा और आरती में साथ में रहें, तो मैं करूंगा। और उस बस्ती में उन्होंने ये वातावरण खड़ा किया और वैसे ही हुआ।
ये स्वयंसेवक हमारे, ऐसा प्रयास करते हैं और समूह के रूप में भी करते हैं। मंदिर पानी, श्मशान कहां-कहां भिन्न है, सर्वे हुआ और मध्य प्रदेश में। और मध्य प्रदेश में अनेक गांवों में लोगों ने इसको बदल दिया। अनेक गांव अभी करने बाकी है क्योंकि ये काम जबरदस्ती नहीं होता, लड़कर नहीं होता, मन बनाकर होता है, उसको समय लगता है। पालामूर जिला तेलंगाना का, उसमें ऐसे कई उदाहरण हैं। मैंने दो बताए, बाकी जगह नहीं है, ऐसा नहीं है।
अभी राम जन्मभूमि के लिए महाराष्ट्र के देहातों में हमारे कार्यकर्ता गए, तो उन्होंने इस प्रकार सारा कार्यक्रम रचित किया कि उस बहाने उस गांव के मंदिर में गांव के सब जाति वर्ग के लोग एकत्रित हुए। तीन-चार बार, तो वहां पर जो दर्शन पर प्रतिबंध था, अपनेआप ही टूट गया बिना कुछ बोले।
हम ये करते हैं, कोई देखे, कोई ऐसा इम्पैक्ट हमारे काम से हो रहा है क्या? सर्वे करें और ठीक से सर्वे करें, रिजल्ट छापें। रिजल्ट अच्छे आए, तो आप सब लोगों का उत्साह बढ़ेगा। समझो, कम आए, तो हम लोगों के लिए सोचने की बात रहेगी कि क्या सुधार करें कि रिजल्ट ठीक आए? लेकिन हम कर रहे हैं और उसका इम्पैक्ट भी जहां कर रहे हैं, वहां तो हो रहा है। बाकी जगह इसको मालूम होना और यह हवा बनना, इसके लिए थोड़ा आपकी तरफ से भी सहयोग आवश्यक है। तब वो हो जाएगा।
प्रश्न 10- विषय पर भाग दो मैं आपके समक्ष रखता हूं-
क्या आरक्षण जातिवाद को बढ़ाता है या समरसता में बाधक है? इस विषय पर संघ का क्या विचार है?
आपने कहा कि हम भिन्न होकर भी एक हैं, हिंदू हैं लेकिन जब निम्न वर्ग की स्त्री के साथ शीलभंग होता है, तो संघ की ओर से संतोषजनक विरोध क्यों नहीं दिखाई देता?
भारतीय समाज में एक वर्ग ने सदियों से समाज में सफाई बनाने का कार्य किया, फिर भी आज वे बदहाल हैं। उनके प्रतिनिधित्व के लिए संघ क्या प्रयास करेगा?
There are References of cast Division in Manusmriti and Vedas Please Express Your Views On this.
संघ के 100 वर्षों के सघन जागृति कार्यक्रम करने के उपरांत भी समाज में जातिगत समीकरण प्रमुख होते जा रहे हैं। इससे हमें कब मुक्ति मिलेगी?
उत्तर : आरक्षण वगैरह-वगैरह, ये जो विषय हैं, ये विषय तभी समझ में आते हैं, जब मन में संवेदना हो। हमारे जातिगत आरक्षण पर प्रस्ताव है। पहली बार जब प्रस्ताव हुआ, तब जैसे समाज में घमासान चलता है इसको लेकर, वैसा घमासान हमारे यहां भी चला, नहीं, घमासान मारपीट नहीं, लेकिन दो परस्पर एक दम सिरे से अलग विरोधी मत और उनका विवाद। तो सरसंघचालक हमारे बाला साहेब जी थे उस समय। तो उन्होंने एक सारा सत्र सुना और फिर उन्होंने कहा कि देखो, 1000 वर्षों से इस जातिगत भेद का दंश जिन्होंने झेला है, उनके परिवार में अपना जन्म हुआ है, ऐसी कल्पना करके सोचो और अगले सत्र में बोलो।
अगले सत्र में आरक्षण के समर्थन का प्रस्ताव सर्वसहमति से पारित हो गया।
ये संवेदना का प्रश्न है। इसमें जमा-खर्च किसको कितना लाभ। तर्क करेंगे आप, तर्क से इसका हल नहीं है, अन्याय हुआ, परिमार्जिन होना चाहिए। ये भी तर्क है। अन्याय जिन्होंने किया, वो तो चले गए, आज तो हम इसको मानते ही नहीं। हमको क्यों तकलीफ? अब ये भी एक तर्क है। दोनों तर्कों में दम है। इसका हल ये नहीं है। दीनदयाल जी उपाध्याय ने बताया कि भाई खड्ढ़े में कोई गिरा है और उसको ऊपर निकालना है, तो जो खड्ढ़े में गिरा है, वो हाथ ऊपर करेगा, अपने पंजों पर खड़ा रहकर ऊंचा होने का प्रयास करेगा और ऊपर जो है, वो नीचे झुककर उसको हाथ देगा, तभी होगा।
इसकी आवश्यकता है, ये जो बाहर से वाद-विवाद चलते हैं सारे, इन विषयों के बारे में, उसमें तर्क चलता है। लेकिन मैं कहता हूं, मैं सार्वजनिक रूप से कहता हूं। युवकों से बात करते हुए कहता हूं कि भाई, अगर 1000 वर्ष हमारे लोगों ने ही झेला है, वो हमारे लोग हैं। उनको ऊपर लाने के लिए अगर 200 वर्ष हमने झेला, तो क्या फर्क पड़ेगा? अपने लोगों के लिए कुछ छोड़ना होता है भाई, यही धर्म है ना? परसों धर्म का उदाहरण दिया मैंने, शिबी राणा ने अपना मांस काटकर दिया। तो हम कुछ छोड़ेंगे, तब हमारे सब लोगों को मिलेगा। तो इसलिए करो, कुछ बात नहीं, होगा थोड़ा नुकसान। ये जब तक भावना नहीं आती, तब तक इस बात को समझ नहीं सकते।
संविधान सम्मत जितना आरक्षण है, उसको संघ का पहले से समर्थन है, सदा रहेगा, और जब तक उस आरक्षण के लाभार्थियों को यह नहीं लगता कि इसकी आवश्यकता नहीं है, अब समाज से भेद समाप्त हो गया, अब हम अपने बलबूते खड़े रहेंगे। ये दूसरे किसी को दो, ऐसा जब तक उनको लगता नहीं, हम उसके समर्थन में रहेंगे। मैं कई बार बोल चुका हूं। ये संघ की भूमिका पहले से है।
अब, भेद समाप्त हुआ, कब लगेगा? तो ये जो घटना है, जिसका उल्लेख है, प्रश्न में, अत्याचारों की। ये बंद होगी। ये अभी भी चलती है और जहां चलती है, वहां संघ के स्वयंसेवक उसका पुरजोर विरोध करने के लिए खड़े हो जाते हैं। उन सबका विचार है कि ऐसी बातों में हमको जाना चाहिए। देखना चाहिए, सत्य और न्याय के पक्ष में खड़ा होना चाहिए। लेकिन सब जगह उनकी ताकत नहीं है। पूरे संघ की ताकत ठीक है, लेकिन मेरे गांव में संघ का क्या प्रभाव है? ये अलग-अलग है। और जहां ताकत है, वहां खड़े रहने के बाद भी वो खड़े रहे, ऐसा आता नहीं, ये भी हो सकता है या कहीं पर वास्तव में वो नहीं आए हों, तो ये उनकी कमी है। ये उनकी त्रुटि है, वो हमको ठीक करनी पड़ेगी। लेकिन मन तो हमारे यही है कि ऐसा जहां-जहां होता है, वहां स्वयंसेवक जाएं, समाज में इसके कारण आपस में झगड़े होने न दें, सत्य और न्याय के पक्ष में खड़े होकर न्याय दिलवाए। यह सब स्वयंसेवकों ने करना अपेक्षित है। विभिन्न कारणों से नहीं होता है, बिना कारण नहीं होता है, तो हमारी कमी है। स्थानीय संघ कार्यकर्ताओं के ध्यान में आप ला दीजिए, उसका इलाज होगा।
जो ऐसे दुर्बल वर्ग हैं, उनके आरक्षण के लिए प्रयास हम करेंगे। लेकिन करते तो एक बात होती है, लोग कहते हैं कि बीजेपी की वोट बैंक बढ़ाने के लिए संघ कर रहा है। तो ये भी होना नहीं चाहिए। उसके कारण दोनों ओर गलतफहमियां होती हैं, विषय बाजू रह जाता है। तो हम ज्यादा उचित ये समझते हैं कि समाज में अपने वर्ग की उन्नति के लिए उस वर्ग की लीडरशिप खड़ी है, वो प्रामाणिकता से, निस्वार्थ बुद्धि से। हम एक वर्ग के नेता हैं लेकिन हम पूरे समाज के अंग हैं, ये मानकर करें। ऐसा नेतृत्व खड़ा हो, इस दिशा में हमारे प्रयास चल रहे हैं, चलते रहेंगे। उससे इसका हल होगा और इसमें जो न्याय और सत्य का पक्ष है, उसके साथ संघ नीतिगत रूप से सदैव खड़ा रहेगा।
बाकी, ग्रंथों में ये रेफरेंस अगर हैं, तो हम उनको नहीं मानते। ऐसा हो सकता है, लेकिन हमारे सब धर्माचार्यों ने 1972 में उडुपी में एकत्र होकर यह कह दिया है कि हिंदू शास्त्रों में छुआछूत, ऊंच-नीच, अछूताई यानी अस्पर्शता, इसका कोई स्थान नहीं है। तो ऐसा रेफरेंस कहीं मिल भी जाए, तो भी उसका अर्थ कुछ गलत लगा होगा, ऐसा मानना। उन ग्रंथों को छेड़ना नहीं, क्योंकि पूरे हिंदुओं के इतिहास में ग्रंथ तो बहुत हैं, मनुस्मृति सहित। उसके अनुसार हिंदू ने व्यवहार किया है, ऐसा कम है। हमारे यहां दो प्रमाण हैं, एक शास्त्र है, दूसरा लोक है और शास्त्रार्थ “रुडिर बलि” ऐसा है, यानी लोक जो चाहता है, वो होता है। पुस्तक में जो है, ग्रंथों में जो है, हम वैसे नहीं चलते और इसलिए हमारे यहां एक ग्रंथ नहीं है और ग्रंथों के अर्थ अलग-अलग किए हैं लोगों ने, अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार। तो पूरे इतिहास में मनुस्मृति के अनुसार देश चला, पूरा देश कभी नहीं चला। मेजोरिटी देश अपनी- अपनी सुविधा के अनुसार चला। ये जो मैंने कहा, श्रम-प्रतिष्ठा उसके क्षरण के कारण ऊंच-नीच की भावना, पहले स्वच्छता की भावना, अस्वच्छता की भावना, अस्वच्छता को अपवित्रता बना दिया, अपवित्रता के कारण ऊंच-नीच हो गया, ये ऐसा विकसित हुआ है। कब से हुआ पता नहीं। तो मूल वहां इलाज करना, सब लोग समाज के अंग है। समाज के सब अंग अपना-अपना काम करते हैं। ऊंच-नीच कोई नहीं है। सबकी प्रतिष्ठा समान है, सब अपने हैं। ये भाव जगाना, वो करना पड़ेगा, संघ वो कर रहा है। ग्रंथों का इसमें बहुत संबंध नहीं है। ग्रंथ हमेशा, स्मृतियां तो बदलती हैं समय के अनुसार। और नई स्मृति की आवश्यकता है। हमारे धर्माचार्य लोग सब विचार करें। और सभी भारतीय समाज के वर्ग, पंथ, उपपंथ, जाति, उपजाति सबको समाविष्ट कर सकने वाली, उनके लिए व्यावहारिक आचरण सिखाने वाली एक नई स्मृति उत्पन्न करें, ऐसा हमको लगता है।
अब ये जागृति का कार्यक्रम है। जातिगत समीकरण, राजनीतिक दृष्टि से प्रमुख होते जा रहे हैं। वो दृष्टि जाएगी। तो क्या करना, तो सद्भावना बैठक की बात मैंने कल बताई। जाति-बिरादरी के प्रमुख बैठते रहेंगे। और तीन बातों का विचार करेंगे, तो ये राजनीति चली अपने जगह, लेकिन समाज में दो फाड़ नहीं होंगे। समाज में विभाजन नहीं होगा, वो होना चाहिए।
प्रश्न 11: सामाजिक विषयों को लेकर कुछ प्रश्न आए हैं।
प्रश्नकर्ताओं के मैं नाम पढ़ता हूं। अविनाश शर्मा जी, लव तोमर जी, रजनीश कुमार जी, सुनील मांझी जी, प्रीतम शर्मा जी, डॉ. मनमोहन सिंह चौहान जी, विजय सिंघल जी, अमोक कुमार मिश्रा जी, अश्विनी पराशर जी, खेमचंद शर्मा जी, कैलाश गोतुका जी, दिनेश गुप्ता जी, डॉ. प्रेम कुमार शुक्ल जी, शैलेंद्र मिश्र जी, डीडी न्यूज। एस,राजा रमन जी, सोनम सिंह पत्रकार, नामधारी संघ सेवा समिति से। पंच परिवर्तन को लेकर कुछ प्रश्न है पहले मैं आपके समक्ष रखता हूं।
आपने कल पंच परिवर्तन की बात की थी, परिवारों को संस्कार कैसे दिए जा सकते हैं और नागरिक कर्तव्यों का बोध कैसे बढ़ाया जा सकता है?
भारतीय समाज का जागरण कैसे किया जा सकता है? सामाजिक परिवर्तन के इस दौर में बुजुर्गों का सम्मान बना रहे, नशे से दूर रहे युवा, वैवाहिक संबंधों के बाहर के मामलों से बचने जैसी चुनौतियों से कैसे निपटा जाए?
धार्मिक स्थलों, कुंभ मेले और पर्यटन स्थलों में पर्यावरण और सेवा के प्रति संकल्प का मन कैसे विकसित किया जा सकता है?
उत्तर : तो, अभी एक उदाहरण देता हूं। मेले, पर्यटन स्थलों के बारे में एक आह्वान हमारे पर्यावरण गतिविधि ने किया। खाली-थैला, तो उसको बहुत बड़ा प्रतिसाद सारे देश से मिला और वहां भी सब अखाड़ों ने उसको स्वीकार कर लिया। अभी ऐसा क्यों हुआ? तो जिन्होंने आह्वान किया, उनकी क्रेडिबिलिटी थी और उनका सुझाव बिल्कुल व्यावहारिक और जो सबके मन में है समस्या, उसका उपाय देने वाला था। उन्होंने तुरंत स्वीकार कर लिया। तो हमको ऐसे समाज में विश्वस्त जो हैं, उन लोगों ने ऐसे व्यावहारिक उपाय लेकर अपने-अपने स्थान पर जो मेले, पर्व, त्यौहार वगैरह सब होते हैं, उसमें हस्तक्षेप करना चाहिए।
जैसे अभी महाराष्ट्र में गणेश उत्सव बड़े पैमाने पर चल रहा है। तो वहां विश्व हिंदू परिषद वगैरह ये लोग, उनको एकत्रित करके कुछ राष्ट्र, देश, संस्कृति, संस्कार इसके बारे में कार्यक्रम करने को कहते हैं। वो नहीं करते, तो केवल डीजे बजते रहता है, दो बार आरती होती है और प्रसाद खाने को लोग आते हैं। लेकिन कुछ भाषण माला, कुछ स्पर्धाएं कुछ ऐसे लोगों की गुणवत्ता और समझदारी बढ़ाने वाले कार्यक्रम हो। ऐसा Intervention हम अपने-अपने जगह पर कर सकते हैं, वो करना चाहिए। बाकी परिवारों को संस्कार, इसके बारे में विस्तृत मैंने कल बोला है और इस कार्यक्रम की शायद पुस्तिका भी करेंगे, तो वो आपके पास पहुंच जाएगी, तो आपको उत्तर मिल जाएगा और इसके पहले के कुछ भाषण वगैरह भी आप देख लेंगे। बाहर किताबों का स्टाल होगा, तो वहां एक भाषणों की पुस्तक भी है, तो वो देखेंगे, तो आपको ये सब बातें मिल जाएंगी। उसमें अभी समय बचाने के लिए मैं नागरिक कर्तव्यों को बोध के बारे में बताता हूं। वो उदाहरण से बनता है। जानकारी होनी चाहिए, नागरिक कर्तव्य क्या है? मैं तो कहता हूं कि अपने संविधान का Preamble, नागरिक कर्तव्य, नागरिक अधिकार और मार्गदर्शक तत्त्व, ये चार Chapter संविधान के, मिडिल स्कूल में पांचवीं से पढ़ानी चाहिए। सब छात्रों को उसकी जानकारी होनी चाहिए और हमें भी उसकी जानकारी करते हुए उन कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, तो नई पीढ़ी सीखेगी और यह करना चाहिए। जागरण ऐसे ही होता हैं, उदाहरण और आत्मीयता। आत्मीयता मीडियम बनती है, यहां का विचार वहां जाने के लिए। यहां का नहीं, यहां का विचार वहां जाने के लिए, हृदय का हृदय से विचार। और जो बोलने वाला है, उसके करने में चाहिए और इतना ज्यादा नहीं चाहिए कि आदमी को डर लगे करते समय, इतना दिखना चाहिए। हो बहुत, लेकिन अलौकिक नहीं होना हैं। लोगों से पांच कदम आगे रखकर ये बात करनी हैं। तो धीरे-धीरे ये सारी बातें ठीक हो जाती हैं।
प्रश्न 12: भाषा को लेकर कुछ प्रश्न हैं। क्या नेशनल लैंग्वेज आवश्यक लगती है? बढ़ते भाषा-विवाद के समय संघ का क्या मत है? आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर संघ का क्या विचार है?
उत्तर : तो अब सब काम संघ ने ही करने चाहिए, ऐसा नहीं हैं, आप भी कर सकते हैं। करना चाहिए, तो वो होता हैं। संघ भी जानकारी देगा अपने स्वयंसेवकों को क्योंकि वो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आएगा? तो हमको भी उसको कुछ उपयोग में लाना पड़ेगा, तो ये जानकारी हमारे तरफ से भी जाएगी और उसके प्रोस्कॉन्स, उसके एथिक्स, ये सबके साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग हमको बताना पड़ेगा, तो वो हम करेंगे। अभी आ रहा है, हम धीरे-धीरे जा रहे उस तरफ। और हमारा सारा कार्यक्रम युवाओं को राष्ट्र और धर्म से जोड़ने के लिए ही करते हैं। वो दिखता नहीं है, ऐसा है करके। वो मैदान पर खेल रहे हैं। कुछ परेड वगैरह कर रहे हैं, ऐसा दिखता है। लेकिन हमारे लोगों का जुड़ाव राष्ट्र और धर्म से ही होता है, तो ये 100 साल से हम कर रहे हैं। कृपया प्रश्नकर्ता आए, देखे, कैसे क्या होता है तो उनको और समझ में आएगा।
नेशनल लैंग्वेज, यानी भारत की सब भाषाएं नेशनल लैंग्वेजेज हैं, जिनका उगम भारत में है। एक नेशनल और बाकी क्या है? सभी नेशनल लैंग्वेजेज़ हैं। इस राष्ट्र के घटक जो-जो भाषा बोलते हैं, वो राष्ट्रभाषा हैं। एक व्यवहार भाषा चाहिए, ये पक्का है। आपस में बात करने के लिए और वो विदेशी नहीं चाहिए क्योंकि हमारे भाव विदेशी भाषा में प्रकट नहीं होते। श्री गोपाल तो कॉहर, ऐसा नहीं होता है।
कविताओं का शब्द सार, धर्म के लिए शब्द नहीं हैं बाकी भाषाओं में। हमारे यहां सब भाषाओं में शब्द हैं। एक भारतीय भाषा, व्यवहार भाषा चाहिए, कौन सी हो? तय करे सब मिलकर। जो व्यवहारिक निर्णय हैं, करें, ऐसा मत हैं हमारा। भाषाओं में विवाद करने का कोई मतलब नहीं हैं। शब्द अलग हैं, भाव एक ही है सर्वत्र। आप तिरुकुरल लीजिए आप तुकाराम महाराज के अभंग लीजिए, आप रामचरितमानस की चौपाइयां लीजिए, कितने ही समान अर्थ के उसमें काव्यांश से हैं, जो छोटी-छोटी व्यावहारिक बातों, आचरण का उपदेश सब में समान हैं। जो आदर्श रखे गए हैं वो सब में समान हैं। सब भाषाओं में रामायण हैं, सब भाषाओं में महाभारत हैं। पठन होता हैं सर्वत्र।
संतो के नीति-वचन जो हैं, सब भाषाओं में समान हैं, सर्वग्न लीजिए, तिरूवल्लुवर लीजिए। उत्तर के सब ऐसे लीजिए तो इसलिए विवाद क्या करना है भाई? भाषा में, हम स्वाभाविक रूप से अपनी मातृभाषा अपने को अच्छी आनी चाहिए। हम जिस प्रदेश में रहते हैं, उस प्रदेश की भाषा है, वो हमको अच्छी बोलचाल करते बननी चाहिए। और एक व्यवहार, भाषा जो होगी, वो सीखनी चाहिए। फिर आपकी मर्जी हैं, तो और सारी भाषाएं सीखो। कोई भाषा अस्पर्श नहीं होती हैं। दुनिया की सब भाषा आना, एक एसेट हैं परंतु ये तीन कम से कम होने चाहिएं और इसलिए इसमें झगड़ा नहीं करना। सब भाषा हमारी है। ऐसा व्यवहार करना।
प्रश्न 13: अगला जो प्रश्न है, वो भारत में जन्मे पंथ और मत के संबंध में है। प्रश्नकर्ता हैं- विजय कुमार जी (पूर्व महानिदेशक) प्रदीप कुमार जी, अशोक कुमार सिंह जी, राजवीर सिंह जी, वर्गीज जॉर्ज, तरलोचन सिंह जी (एक्स एमपी)। निर्मल कौर जी (रिटायर्ड डीजी पुलिस)। जगेंद्रपाल सिंह जी, जसविंदर कौर जी।
प्रश्न है- भारत बुद्ध का देश है इसलिए शांति अपेक्षित है, तो फिर संघ, युद्ध हेतु शस्त्र की बात क्यों करता है?
संघ समानता में विश्वास क्यों नहीं करता?
हिंदू राष्ट्र क्यों कहते हैं? सनातन राष्ट्र क्यों नहीं कहते?
संघ अपने विचारों में समय के साथ बदलाव करता है क्या? यदि हां, तो संघ के स्थिर विचार कौन से हैं और किन मुद्दों पर यह लचीलापन दिख सकता है?
संघ से जुड़ने के लिए कहां और कैसे संपर्क किया जा सकता है?
उत्तर : भारत बुद्ध का देश है, उसमें शांति अपेक्षित है और हमारे देश में अपेक्षाकृत शांति है और होनी चाहिए। लेकिन बाकी देश बुद्ध के देश नहीं है, तो वो युद्ध की भाषा बोलते हैं। तो शस्त्र होना तो आवश्यक रहता है ना। जैसा मैंने कल कहा, ‘हम व्यायाम कर रहे, तो किसी को पीटने के लिए नहीं कर रहे, तो हम अपना शस्त्र बल को बढ़ाते, तो किसी को मारने के लिए नहीं बढ़ाते। अगर किसी को मारने के लिए हम शस्त्र सज्ज होते, तो अभी तक तो दिख जाता ना। लेकिन बार-बार हमने रोक दिया है। कैपेसिटी होते हुए भी क्योंकि हम खून-खराबा नहीं चाहते, शांति जानते है, हमारा बुद्ध का देश है, लेकिन सब देश बुद्ध के नहीं है, तो वो युद्ध करेंगे। तो कम से कम अपने को बचाने के लिए शस्त्र बल चाहिए ना। तो डिटोरेन्ट, वो तो चाहिए ही। संघ की प्रार्थना में हम कहते हैं ‘अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिम्’ यानी हमको इनविंसिबल स्ट्रेंथ दो। हमने ये नहीं बताया है कि दूसरों को जीतने वाली शक्ति दो। हमें कोई जीत न सके, ये वो शक्ति मांगी है। इतना तो आवश्यक रहता है और वो करना चाहिए।
संघ समानता में ही विश्वास करता है। विशिष्टता है, विविधता है, उन सबकी मान्यता स्वीकार है। परंतु उसके बावजूद हमारी एक समानता है। इसी के आधार पर हिंदुत्व है। इसी के आधार पर संघ है। इसलिए समानता में विश्वास हम करते हैं।
सनातन राष्ट्र कहने से कॅफ्यूज होते है लोग। हिंदू राष्ट्र कहने से समझ में आता है तुरंत सबको, ये हमारा अनुभव है। इसलिए इसका उत्तर दिया मैंने। हम उस शब्द का प्रयोग करते हैं।
हां, विचारों में समय के साथ बदलाव करते हैं। स्थिर विचार हमारे तीन हैं। व्यक्ति निर्माण से समाज के आचरण में परिवर्तन संभव है और हमने करके दिखाया। दूसरा, समाज को संगठित करो। बाकी सब परिवर्तन अपनेआप होते हैं, उलटा नहीं होता। घोड़े के पीछे गाड़ी होती हैं, गाड़ी के पीछे घोड़ा नहीं होता। पहले समाज बदलना पड़ता हैं, तो व्यवस्थाएं सारी ठीक हो जाती हैं। क्योंकि चलाने वाले लोग समाज से ही जाते हैं और समाज के वातावरण के दबाव में ही ये सब होता हैं, उसको करो। और तीसरा विचार, हिंदुस्तान हिंदू राष्ट्र है। इन तीन बातों को छोड़कर संघ में सब बदल सकता है, तो बाकी सब बातों में लचीलापन है हमारे यहां।
प्रश्न 14: Under Article-25 of the Indian Constitution, scheduled castes are granted access to temples, where then are Sikh, Buddhists and Jains included within this provision.
संघ राष्ट्र-निर्माण, चरित्र-निर्माण और धर्म-रक्षा का कार्य करता है। जैसे सिख गुरुओं ने किया। शाखा शारीरिक चरित्र बल और दल भावना सिखाती है। जैसे सिख गुरुओं ने गतका के माध्यम से किया। संघ और सिख परंपरा की इन समानताओं को, समाज में स्पष्ट रूप से क्यों नहीं चित्रित किया जा रहा है? हिंदू और सिखों के बीच बढ़ती दूरी को कम करने के लिए क्या संघ, सिख विद्वानों के साथ बैठक आयोजित करेगा?
सिख धर्म और अन्य पंथों के साथ मतभेद दूर करने हेतु, क्या संघ अपने वरिष्ठ सेवकों और सिख बुद्धिजीवियों व जनसाधारण के बीच निरंतर संवाद बढ़ाएगा? क्या सिख त्योहारों में संघ की उपस्थिति इस दिशा में सकारात्मक कदम साबित हो सकती है?
उत्तर : तो ये तो हम करेंगे ही और इसमें एक सुझाव भी है, वो सकारात्मक कदम, वो ठीक है। उस पर भी हम जा रहे हैं, ये सब हम कर रहे हैं और बढ़ाएंगे। लेकिन इसके चलते हम कुछ बोलेंगे, तो अभी स्थिति ऐसी नहीं है कि उसको ठीक ढंग से लिया जाएगा। यानी वातावरण निर्माण करने वाले ये न हो, ऐसा वातावरण बनाएंगे। इसलिए ये हम करेंगे लेकिन जैसे दूसरा भाग आपने पूछा है। जैसा सिख गुरुओं ने किया, वैसा संघ भी कार्य करता है। ये हम बोलने से ज्यादा आप लोग सब देखें और आप बोलें, तो वो ज्यादा परिणामकारक होगा और ज्यादा जल्दी होगा।
बाकी मंदिरों के प्रवेश के बारे में। हम तो उस मंदिर में सब के प्रवेश के मत के है, तो हम तो चाहते हैं, सब का, मंदिर ही हो हिंदुओं का। आपका मतलब सिख, बुद्धिस्त, जैन इन्क्लूडेड, उनके ऊपर ये क्यों लागू किया? ऐसा है क्या? अलग से लागू करने की आवश्यकता नहीं, उसमें कोई भी जा सकता है ऐसा है, ठीक है या कुछ नियम है, उसमें यही लोग जा सकेंगे, तो हमारा उसके बारे में कुछ कहना नहीं है। ये मामला और पंथ संप्रदाय के नियमों का है। वही लोग इसमें देखें, क्या है? लेकिन जो शेड्यूल कास्ट आर ग्रांटेड अक्सेस टू टेंपल्स, हम इसके हक में पहले से है।
प्रश्न 15 : शिक्षा को लेकर कुछ और प्रश्न हैं। प्रश्नकर्ता हैं- नीतिशा यादव जी, पंडित राजकुमार शर्मा जी, डॉ. राजगोपाल एस. जी, संजीव नंदा जी, कपिल प्यासी जी, अनूप कुमार त्रिवेदी जी, विकास गौड़ जी, हरपाल सिंह जी, विनोद किंकरजी, साहित्यकार हैं। संदीप ठाकुर जी, कमल धनशाला जी, संजय शर्मा जी इंडिया न्यूज से हैं। रजनी खेदवाल जी, संजीव नंदा जी, कुंवर शेखर विजेंद्र जी, राकेश कुमार जी, आशीष रंजन प्रसाद जी, डॉक्टर मार्कंडेय आहूजा जी एवं प्रेम कुमार शुक्ल जी।
शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, सर्वदूर मिले, सस्ती मिलें, आवश्यक, वैसे ही धर्म ज्ञान और मूल्यवान मिले। ऐसा कैसे हो सकता है?
क्या शिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता लगती है? बाकी दोनों प्रश्न जो हैं, पहले कवर हो गए हैं, टेक्नोलॉजी वाला है और युवाओं वाला है, तो ये दो प्रश्न हैं.
उत्तर : तो इन सभी प्रश्नों का उत्तर लगभग पहले प्रश्न के उत्तर में आ गया है। टेक्नोलॉजी में भाषा कैसे विचार करें? विकास करें, तो वो नई टेक्नोलॉजी में भाषा विकास करने वालों के पास आपको जाना पड़ेगा। उनके यहां अशोक चक्रधर जी कल थे, तो उन्होंने वो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में भाषा का काम करते हैं, तो उन्होंने कहा कि हम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बालक जैसा हैं, उसको सिखाना पड़ता हैं, तो मैंने उसको संस्कृत की कारिकाएं वगैरह ये सब सिखाईं। व्याकरण के नियम सिखाए। ये सब सिखाया। तो वो अब कविता भी करने लगा, तो अगर यही काम करना है, तो नई टेक्नोलॉजी में क्या-क्या फीड करना है? वो फीड करें, तो हमारे काम उससे बनते जाएंगे। एक केवल मेरे मन में आता है, वो भी अनुभव के आधार पर आप ठीक कर सकते हो, उसका उत्तर भी दे सकते हो। भाषा तो शब्द तो आ जाएंगे, भाव आएंगे कि नहीं? मैं कहता हूं आप बड़े विद्वान हो, मैं फिर कहता हूं, आप बड़े विद्वान हो। शब्द वही हैं, तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या टेक्नोलॉजी, ये भाव उसमें ला सकती है कि नहीं? मुझे पता नहीं है, इसलिए अभी तक मैं उपयोग नहीं करता हूं, बातें ही करता हूं सीधी।
प्रश्न- 16 : संघ को समझने की जिज्ञासा स्वाभाविक है प्रश्नकर्ता हैं- मुजीब मशाल, जर्नलिस्ट हैं आप। राकेश जिनसी जी, सोशल वर्कर हैं। डॉक्टर शिल्पा शंकर राव, अंजलि राय मेहता जी, फिल्ममेकर हैं। नरेश कौशल जी, बंटी चौरसिया जी, पुरुषोत्तम दास वरखिया जी, आप सोशल वर्कर हैं। उमाकांत चौधरी जी, शैलजा नैयर जी. अमन जिंदल जी, हरीशचंद्र बरनवाल जी।
5-6 ही प्रश्न है, मैं सभी आपके समक्ष रखता हूं। कुछ लोग संघ पर एक मिलिटेंट ऑर्गेनाइजेशन होने का आरोप लगाते हैं। केवल ऐसा आरोप लगता है कि संघ के संगठन हिंसा करते हैं। आपका क्या विचार है?
आजादी के आंदोलन में संघ की क्या भूमिका रही है?
संघ के द्वारा समाज के सामाजिक आंदोलन में क्या भागीदारी रही है? व अन्य क्या उपलब्धियां रही है?
How long will it take for your message of unity and inclusive nets to percolate to the grass root level workers.
आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक ढांचे को बदलने की संघ की क्या योजना है?
आपके हिसाब से अभी संघ देश के किन-किन क्षेत्रों में अपनी पैठ नहीं बना पाया है, उनके लिए क्या करने की आवश्यकता है?
उत्तर : तो आरोप लगाते हैं, लगते रहे हैं पहले से, लेकिन ऐसा तो कभी हुआ नहीं है और झूठे आरोपों के तथ्य भी उजागर हुए हैं, तो ये संघ कभी करता नहीं। कोई भी हिंसा करने वाला ऑर्गेनाइजेशन 75 लाख जगह पहुंच नहीं सकता, भारत में और उसको समर्थन नहीं मिल सकता। ये सीधे समझने की बात है।
अगर हम ऐसा होते, तो हम ये कार्यक्रम करते? हम कहीं अंडरग्राउंड छिपे होते, वहां से आपके घरों में पत्रक डाल देते, तो ये मूर्खता है। अब ये तो जो चिकना- चुपड़ा हो जाता है ना कोई कॉइन, बहुत चलने के बाद, वैसा हो गया है। तो आप भी इस झंझट में मत जाइए। जैसा मैं कहता हूं, मनुष्यों को जोड़ने का काम हिंसा के आधार पर नहीं होता। शुद्ध सात्विक प्रेम हमारे कार्य का आधार है। ये ध्यान में रखिएगा।
डॉक्टर हेडगेवार स्वयं एक क्रांतिकारी थे और आजादी के आंदोलन में दो बार साश्रम कारावास, कांग्रेस के आंदोलनों में भाग लेकर उन्होंने सजा भुगती थी। उन्होंने एक तरह से विदर्भ में लीड किया था। 1942 में महाराष्ट्र में जो दो प्रमुख, उस समय बहुत ज्यादा काम इधर-उधर हमारा था नहीं। उधर ही ज्यादा था, तो आष्टी और चिमूर, ये दो प्रकरण, 1942 के आंदोलन के बड़े प्रसिद्ध हैं। उसमें जो लोग बलिदान चढ़ गए, उनमें स्वयंसेवक हैं। जो लोग बाद में पकड़े गए, फांसी की सजा हो गई। फिर वो द्वितीय महायुद्ध के बाद एमनेस्टी मिली, तो उसमें वो छूट गए और 11 लोग थे। सात संघ के सचिव थे।
तुकड़ जी महाराज के साथ जनजागृति और ये सारा आंदोलन करने का काम स्वयंसेवकों ने किया था। वो हमारे संघ शिक्षा वर्ग में आते थे और रात को भजन सुनाते थे, तो वो ऐसे भजन थे, उनके पत्थर सारे बम बनेंगे, घास बनेगा भाला वगैरह। इस प्रकार के भजन वगैरह उसके आधार पर ये सारा गठजोड़ हुआ था और ये काम हुआ था। वसंत दादा पाटिल, सांगली की जेल से बाहर आए। पुलिस पहरा कड़ा खड़ा था सर्वत्र, तो जंगल के रास्ते उनको, वो रियासत थी पटवर्धन रियासत, उसके बाहर पहुंचाना, ट्रेन में बिठा देना। ये काम हमारे प्रांत संघचालक जी की योजना से एक परसलगीकर नाम के स्वयंसेवक थे, उनको मैं चार बार मिला हूं उन्होंने किया। कंधे पर उठाकर 15 किलोमीटर दौड़ते हुए उनको लेकर गए।
श्रीमती अरुणा असफ अली जी, लाला हंसराज गुप्ता जी के घर में ठहरी थीं अंडरग्राउंड। हमारा सहभाग है पहले से और हमेशा रहेगा क्योंकि पहले तो संघर्ष की प्रतिज्ञा ने भी जब तक स्वतंत्रता नहीं मिली थी, हिंदू राष्ट्र स्वतंत्र करने के लिए ऐसे शब्द थे। अब हम स्वतंत्र हो गए, तो सर्वांगीण उन्नत के लिए ऐसे शब्द है। ये तो स्वयंसेवकों की प्रतिज्ञा थी। जगह-जगह स्वयंसेवकों ने भाग लिया है। गए हैं, संगठन के नाते गए नहीं क्योंकि संगठन को बुलाया नहीं था। किसी को नहीं बुलाया था। कुछ योजना में रही होगी कमी, जो भी हुआ होगा, लेकिन आंदोलनकर्ताओं को पूरी मदद, अंडरग्राउंड काम में पूरी सहायता, ये संघ का काम जहां-जहां था, उस समय वहां-वहां हुआ है। बहुत लोगों के पास वो स्वतंत्रता संग्राम सैनिक वाले सर्टिफिकेट्स भी हैं। उस आंदोलन के नतीजे से निराश होकर ही रज्जू भैया की संघ में आवाजाही बढ़ गई, ऐसा उन्होंने स्वयं बताया था। वो भी उस आंदोलन में थे। तो ये सारा इतिहास आएगा। आप राकेश जी सिन्हा का ‘डॉक्टर हेडगेवार चरित्र ‘ पढ़िए, उन्होंने जो लिखा है और नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित हुआ है। उसमें आपको ब्यौरे मिल जाएंगे। हमारी संजीव सान्याल जी की भी एक पुस्तक नई है। सचिन्द्र सान्याल जी के वो पोते हैं, उनकी एक पुस्तक आई है। उसमें भी ये ब्यौरे आपको मिल जाएंगे। हमारी भी एक पुस्तक है ‘स्वतंत्रता संग्राम’ सुरुचि प्रकाशन में, आपको दिल्ली में मिल जाएगी, वो देख लीजिए। सामाजिक आंदोलन में हम संघ की एक इच्छा है कि ये समाज के खाते में सारी बातें जाएं, तो ‘We never raise our separate flags, we support and we participate in the efforts that are going on. Whatever banner, we don’t have any compensation to working with them.’
अच्छे कामों के लिए जहां-जहां कुछ हो रहा है, स्वयंसेवकों को ये खुली छूट है। स्वयंसेवकों से अपेक्षा है कि उन सब अच्छे कामों में लग जाएं। उनको पूछना नहीं पड़ता और वो लगते हैं। अनेक ऐसे अच्छे आंदोलनों में अनेक स्वयंसेवक मिलते हैं, तो समाज के इस प्रयास को बढ़ाना। उपलब्धि संघ की एक ऐसी है कि ये सब प्रामाणिकता से, निस्वार्थ बुद्धि से कर सकने वाले, ऐसा करके लोगों का विश्वास जीतने वाले कार्यकर्ता, संघ ने तैयार किए हैं। ये मुख्य बात है। बाकी सारी उपलब्धि उन-उन संगठनों की है, जहां उन्होंने काम किया है। तो संघ की उपलब्धि एक ही है कि करने वाला आदमी हमने तैयार किया है और करेंगे।
“How long It will? I don’t know how long it will take. you will have to go to an astrologer to ask that but as long as it will take, we are going to work. Unless we finish our work, we are not going to rest. That I can assure you”.
और संघ की योजना नहीं होती। संघ शाखा चलाता है, स्वयंसेवक तैयार करता है, स्वयंसेवकों की योजना होती है। आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक सब क्षेत्रों में संघ के एक या एक से अधिक संगठन काम कर रहे हैं। उनके द्वारा धीरे-धीरे व्यवस्था परिवर्तन हो रहा है, जैसा मैंने बताया। मजदूर संघ ने मजदूर क्षेत्र का एक नया दर्शन दिया है, जिसकी चर्चा आज इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन में भी हो रही है।
तो ये ढांचा बदलने की ही प्रक्रिया रहती है। तो ऐसे मॉडल्स उस-उस क्षेत्र में खड़ा करना, प्रतिमान खड़ा करना है, इसके लिए संगठन काम कर रहे हैं। धीरे-धीरे होगा और अब ऐसे बहुत थोड़े क्षेत्र हैं, जिनमें हम अपनी पैठ नहीं बना पाए। लेकिन हम वो बनाएंगे। सारा शताब्दी का जो 1 साल है, उस एक साल में यही हमारे प्रयत्न चलने वाले हैं और उस साल के बाद हम सब क्षेत्रों में अपना प्रतिनिधित्व लेकर उभरेंगे और अपना काम आगे जारी रखेंगे।
प्रश्न 17 : संघ जिज्ञासा की श्रृंखला में कुछ नाम मैंने आपके समक्ष पढ़े। कुछ और पढ़ देता हूं, विकास भदौरिया जी, अनमित्रा सेन गुप्ता जी, सीनियर जर्नलिस्ट। डॉ. एस. वाई. कुरैशी ,फॉर्मर चीफ इलेक्शन कमिश्नर ऑफ इंडिया। दीपक चौरसिया जी,सीनियर जर्नलिस्ट।, मयंक कुमार अग्रवाल जी, अमोद कुमार राय जी, विवेकानंद परांजपे जी, निर्मला गणपति जी, सीनियर जर्नलिस्ट। श्री अविनाश तिवारी जी,सीनियर जर्नलिस्ट पीटीआई), श्री अमन शर्मा जी, सीएनएन-न्यूज़18, और पारितोषिक जी।
अगला प्रश्न है—शताब्दी दीर्घ यात्रा में कभी किसी गृहस्थ स्वयंसेवक को महासचिव या सरसंघचालक नहीं बनाया गया। नए क्षितिज का संकेत देते हुए क्या हमें यह कल्पना करनी चाहिए कि भविष्य में कोई गृहस्थ स्वयंसेवक महासचिव की कुर्सी से व्याख्यान देगा?
इसी के साथ जुड़ता हुआ प्रश्न है “Should Indian leaders retire at 75 and why?” क्या संघ को लगता है कि 75 वर्ष के बाद राजनेताओं को भी पद छोड़ देना चाहिए? Bhagwat Ji recently said “Once you turn 75 and someone puts a shawl on your shoulder, one should retire.” Many think this was a reference to Prime Minister Narendra Modi to retire at 75 years. What are your comments?
इसी श्रृंखला में अंतिम है – कुछ समय पूर्व आपने मोरोपंत पिंगले जी के कथन का हवाला देते हुए कहा था कि 75वीं सालगिरह पर शाल पहनने का मतलब है कि अब आपकी उम्र आ गई है। क्या आपका संन्यास की तरफ इशारा किया गया है? क्या पांच वर्ष के लिए चुने गए व्यक्ति पर भी 75 वर्ष की परंपरा लागू होती है?
उत्तर : तो जानकारी आपको थोड़ी कम है। बड़े लंबे समय तक और संघ का सबसे कठिन समय था, उसमें श्रीमान भैया जी दाणी जो एक अच्छे किसान थे और भरी-पूरी गृहस्थी थी, वो संघ के सरकार्यवाह रहे, तो ऐसा नहीं है कि गृहस्थ स्वयं काम नहीं कर सकते या यहां आ नहीं सकते। लेकिन यहां आने के बाद पूरा समय देना पड़ता है और गृहस्थ को गृहस्थी भी संभालनी होती है। संघ की अपेक्षा है कि जो भी काम स्वयंसेवक करे, अच्छा करे, तो गृहस्थी भी अच्छी संभाले।
तो उनकी स्थिति ऐसी थी कि घर-गृहस्थी अच्छी चल रही थी और उसको किसी के हाथ में देकर वो घूम सकते थे, तो वो बने और आज भी लगभग मैं जितना भाषण दे रहा हूं, 1 दिन का, उतना देने वाले हमारे अनिल जी तो गृहस्थी हैं न। हमारे सहसंपर्क प्रमुख भारत जी गृहस्थ ही हैं।
संघ में हम प्रचारक लोग 3,500 हैं और कार्यकर्ता हमारे छोटे-बड़े दायित्वों को मिलाकर वो लगभग पांच–सात लाख होंगे। “We are a hopeless minority”. लेकिन हम उपलब्ध हैं, क्योंकि हम पूरा समय गृहस्थी में नहीं हैं, इसलिए ज्यादा कार्यभार हम पर डाला जाता है। आप ये समझिए कि गृहस्थ लोग हमारे सिर पर बोझा देकर हमको पीछे चला रहे हैं। मार्केट उनको जाना है, माल हमारे कंधे पर है, तो हम उनके मजदूर हैं। तो ये हमको यहां बिठाते हैं, प्रणाम देते हैं। इससे आप समझ सकते हैं कि संघ बड़ा विचित्र है। अंदर आकर ही आप समझ सकते हो उसको।
बाकी 75 साल की बात है, तो मोरोपंत जी को मैंने कोट किया। वो बड़े मज़ाकिया आदमी थे। “He was so witty that it made you bounce in your chair and it was very difficult to maintain the dressing.
So, once in a program, we all were there (All India Karyakartas). He completed his seventy years. So our Sir Karyawah Sheshadri Ji, He gave him a shawl and asked him to say something. He was ignored. “There is no need to buy this shawl also. It is not needed.” But then he screwed up and he said—”You see, you might be feeling that you have felicitated me, but I know that when this shawl is given, it means that now your age is over. You please sit in a chair calmly and see what happens.”
ऐसा वो Witticism है उनका। उनके चरित्र का “His Biography was inaugurated in Nagpur in English and I was speaking there, I sighted how witty he was. three or four incidents are I told them and Nagpur people have seen him very closely. so, they were take enjoying it. I never said that, I will retire or someone should retire”.
In Sangh we are Swayamsevaks, we are given a job, whether we want it or not.
So if I am 80 years old and Sangh will tell me—”Go run a Shakha,” I will have to go. I cannot say “I have completed 75 years, I want to enjoy the retirement benefits.” No there. There are no benefits.
And even if I am 35, Sangh may say “You sit in the office.” We do whatever Sangh tells us. We don’t say “I will do this, I want this, I want that.” No, that is not allowed. And we are not there for it, because we don’t want to accomplish anything.
So whatever they say, I am Sarsanghchalak. But do you think I am the only one who can be Sirsanghchalak? There are at least 10 people here. They are sitting in this hall. Anytime they can take this metal and carry on. But they are very busy and their contribution is valuable. They cannot be spared. I was the one who can be spared.
So this is not for the retirement of anybody or myself. We are ready to retire anytime in the life and we are ready to work as long as Sangh wants us to work. That is the thing.
प्रश्न 18: पूरा भारत कुंभ में उमड़ा, परंतु आप इससे दूर रहे, ऐसा क्यों?
उत्तर : दी सेम थिंग “हमको जहां बताते हैं, वहां जाते हैं।” मैं यहां इसलिए हूं और आपसे इसलिए बात कर रहा हूं कि हमारे लोगों ने तय किया कि यहां ये कार्यक्रम होना है और आपको बोलना है। मैंने ये भी कहा था कि पिछले बार मैं बोला, अब लोग बोर हो जाएंगे। फिर से सुनकर, आप चार जगह, चार अन्य लोगों के व्याख्यान रखो लेकिन उन्होंने नहीं माना, तो मुझे करना पड़ा।
ऐसे ही कुंभ में मैंने डेट्स निकाली थीं, आने की। लेकिन कुंभ में तो हमारे सभी अधिकारी गए थे। वहां संघ था। मैं नहीं था, क्योंकि हमको बताया गया कि उस समय बहुत भीड़ रहेगी। अन्य आपके आगे-पीछे के कार्यक्रम हैं, उसमें डिस्टर्बेंस हो सकता है। आप मत आइए।
मैंने कहा भाई, इतना बड़ा पुण्य सब लोग ले रहे हैं और मुझे आप वंचित कर रहे हो। संगत की याद न है, तो मैं कुछ कर नहीं सकता। कम से कम पानी भेज दो कलकत्ता में, तो कृष्ण गोपाल जी ने मेरे लिए कुंभ का जल भेजा और मौनी अमावस्या के दिन मैंने कलकत्ता में उस जल से स्नान करके अपने आप को…
लेकिन हमें संघ का काम है, जिसके कारण मैं उस पुण्य से वंचित हो गया। अब उसके लिए मैं कुछ नहीं कर सकता हूं। संघ हमको कहेगा—”नरक में जाओ,” तो मैं जाऊंगा।
प्रश्न 19 : अगले प्रश्नकर्ता हैं अरुण कुमार जी, साहिल सहगल जी, श्री जयंत जी, राजेश कुमार जी (सीनियर जर्नलिस्ट)।100 वर्षों के बाद संघ अपने लिए अंतर्राष्ट्रीय भूमिका के बारे में क्या विचार कर रहा है? विदेशों में संघ कार्य कैसे कर सकते हैं?
उत्तर : विदेशों में संघ कार्य कर रहे हैं। संघ नहीं, वहां के संगठन का कार्य कर रहे हैं, तो वो उनकी पद्धति है। उसी कार्य पद्धति से वो कर रहे हैं और वो वहां चलती है। हिंदू स्वयंसेवक संघ का काम चलता है। वो हर एक अपने देश का रजिस्टर्ड चैरिटी ऑर्गेनाइजेशन हैं। पद्धति उन्होंने हमसे ली है, भारत तो संघ का काम भारत के अंदर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत के अंदर ही करेगा। बाहर स्वयंसेवक करते हैं, तो वो हिंदू स्वयंसेवक संघ है। वहां के कानून के अनुसार वो चलता है, लेकिन उनकी कार्य पद्धति यही है, जो यहां है-शाखा है, शाखा चलाने वाला तंत्र है, व्यक्ति निर्माण होता है, व्यक्ति हिंदू समाज के अनेक कामों में लगते हैं, वहां के समाज से भी संपर्क करते हैं। ये सारा चलता है।
अंतर्राष्ट्रीय भूमिका के बारे में मैंने बोला है। सारे विश्व में ये एक बात हो कि लोग अपना-अपना स्वार्थ त्यागकर, सब लोग आगे बढ़ें। इस दृष्टि से अपने देश को चलाएं। प्रत्येक देश अपनी विशिष्टता, अपनी सीमा सब कायम रखकर “Contributory Role” में आ जाए। केवल स्वार्थ साधन के रोल में न रहे। ऐसा करना, इसके लिए सबसे संपर्क रखना, ये होना चाहिए और ये सरकार का काम नहीं, “People-to-People” मैं बात कर रहा हूं। उसके लिए आउटरीच बढ़ाना, ये हम करने वाले हैं और खासकर पड़ोसी देशों को पहले जोड़ेंगे। ये बात मैंने कल की।
प्रश्न 20 : कुछ समसामयिक विषय हैं। प्रश्नकर्ता हैं- राजेश कुमार ठाकुर जी, इंडियन एक्सप्रेस। संजीव त्रिपाठी जी, रिटायर्ड आईपीएस।, वसुधा वेणुगोपाल जी, सीनियर जर्नलिस्ट, एनडीटीवी। संजय झा जी, फॉरेन कॉरेसपोंडेंट। डॉ. सीतारमण रामा जी, अनमित्रा सेन गुप्ता जी, जर्नलिस्ट-आनंद बाजार पत्रिका।
क्या संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार मत, पंथ, संप्रदायों के प्रसार के लिए विदेशी धन आना उचित है?
क्या लव जिहाद जैसी समस्याओं के विरोध में संघ कोई योजना बना रहा है? हाऊ टू रिक्लेम हिंदू टेम्पल्स?
Mr. Bhagwat Said, “Food is not linked to Religion, but in some BJP Ruled states non veg sells are banned during festivals. Does RSS Support Such banes?
आपने सार्वजनिक रूप से कहा था कि राम मंदिर बनाने का आग्रह हमारा था, हमने इस आंदोलन को समर्थन किया। काशी, मथुरा के बारे में हमारी ऐसी कोई योजना नहीं है। क्या आप संघ प्रमुख के नाते अपने निर्णय पर अटल हैं या इसमें कोई बदलाव है?
अंधविश्वास को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से दूर करने के लिए संघ द्वारा कौन-से कार्य किए जा रहे हैं?
‘ऑपरेशन सिंदूर ‘ के बारे में विपक्ष ने कुछ सवाल उठाए थे। भारत के साथ खुलकर खड़े हुए दिखाई नहीं दिए। इस पर संघ की क्या सोच है?
अंतिम प्रश्न, पिछले कुछ वर्षों से अनेक स्तरों पर हिंसा बढ़ रही है। आंदोलन हिंसक होते जा रहे हैं। ऐसे लगता है जैसे किसी युद्ध की तैयारी हो रही है। लगता है, आने वाले दिनों में हिंसा बढ़ेगी। संघ इस दिशा में क्या सोचता है?
उत्तर : मत, पंथ, संप्रदायों के लिए विदेशी धन आना, सेवा के लिए आए, कोई दिक्कत नहीं, लेकिन जिस काम के लिए आए, उसी के लिए उसका उपयोग हो। तो प्रश्न तब खड़ा होता है कि ऐसा धन आता है और वह व्यय होता है, मतांतरण के लिए, इसलिए फिर उस पर अंकुश लगाना पड़ता है। मैं समझता हूं कि किसी भी हिसाब से, किसी भी काम के लिए बाहर से धन आता है, तो उसकी स्क्रूटिनी और यदि आवश्यक है तो उस पर प्रतिबंध, ये सरकार का काम है।
दूसरा हिंदू टेम्पल्स, तो पहला काम ये करना चाहिए कि सब मंदिर सरकार के पास नहीं हैं। बहुत से मंदिर निजी हैं, ट्रस्ट हैं। इन सब मंदिरों की स्थिति अच्छी रखी जाए, क्योंकि एक तरह से मन देश का तैयार है, व्यवस्था का भी तैयार है कि भक्तों को मंदिर दिए जाएं। वे अपने-अपने मंदिर मेंटेन करें लेकिन भक्तों को, हम मंदिर मेंटेन कर सकते हैं, ऐसा दृश्य रखना चाहिए।
कुछ निजी मंदिर या ट्रस्ट वाले मंदिर बहुत अच्छे चलते हैं। कुछ सरकार के लिए हुए मंदिर भी बहुत अच्छे चलते हैं और उलटा भी है। सरकार के हाथ में मंदिर है और चाहे जैसी मनमानी लूट हो रही है और ऐसा ही निजी मंदिर हैं या ट्रस्ट के मंदिर हैं, उसमें भी ऐसा हो रहा है। इसलिए इस चित्र को पहले ठीक करना चाहिए और एक रचना बननी चाहिए।
मंदिर जब मिलेंगे, तो उनको लेने वाली—उस मत, पंथ, संप्रदाय के अनुसार पूजा की व्यवस्था, भगवान के लिए आने वाले धन का उपयोग, भक्तों के लिए आने वाले धन का उपयोग, ऐसा करने वाली नागरिक और उस पंथ, संप्रदाय के धर्माचार्यों की एक व्यवस्था लोकल लेवल पर, जिला लेवल पर, प्रांत लेवल पर, अखिल भारतीय लेवल पर बननी चाहिए ताकि जब न्यायालय कहेगा कि हम देते हैं, तो लेने के लिए लोग तैयार रहें। तो ये तैयारियां चल रही हैं। धीरे-धीरे होगा।
ऐसा लगता है, फूड इज़ नॉट लिंक्ड टू रिलिजन, लेकिन व्रत के दिन नहीं खाना,ये तो लोग करते हैं। पर्व-त्योहारों में शाकाहारी रहना लोग करते हैं। उस समय अगर ऐसा दृश्य सामने आए कि हमारे घर के सामने ही कोई ऐसा कुछ कर रहा है, तो हो सकता है भावनाओं को ठेस पहुंचे। तो दो-तीन दिन की बात है। समझदारी से ऐसे समय में ऐसी बातों से परहेज रखना चाहिए। तो कानून भी नहीं करना पड़ेगा।
अब ये समझदारी नहीं है। कौन क्या खाता है? इससे मेरी भावना आहत होने का कोई कारण नहीं। विशेष प्रसंग है। वह समय चाहते हैं, हम सब आंखों के सामने भी और जैसा मैं चाहता हूं वैसा रहे। तो उस सेंसिटिविटी को समझकर मैं भी तय करूंगा कि भाई, इनका त्यौहार है, ये नहीं करना है, मैं नहीं करूंगा। ये समझदारी होती नहीं, तब ये कानून, बैन वगैरह आती है।
उसमें, उन कानूनों में, उस बैन में भी ‘ये नहीं खाना, वो नहीं खाना ‘ ये दृष्टि नहीं रहती। ये भावनाओं के भड़कने के कारण झगड़े न हों, ये दृष्टि रहती है। इस दृष्टि से वह ठीक ही है। लेकिन ये समझदारी दोनों तरफ आनी चाहिए। तो फिर इनकी जरूरत भी नहीं पड़ेगी। मांस खाने वाले रोज मांस खाते हैं, ऐसा नहीं है। और शाकाहारी खाने वाले रोज मांस खाने वालों को खाते हुए देखते नहीं, ऐसा भी नहीं है। लेकिन ये कुछ विशेष पीरियड की बात है। उसमें समझदारी दिखानी चाहिए, तो प्रॉब्लम नहीं रहेगी।
आंदोलन में संघ जाता नहीं। एकमात्र आंदोलन राम मंदिर था, जिसमें हम जुड़े। जुड़े इसलिए, उसको आखिर तक ले गए। अब बाकी आंदोलन में संघ जाएगा नहीं, लेकिन हिंदू मानस में काशी, मथुरा, अयोध्या,तीनों का महत्त्व है। दो जन्मभूमि हैं, एक निवास स्थान है। तो हिंदू समाज इसका आग्रह करेगा और संस्कृति और समाज के हिसाब से संघ इस आंदोलन में नहीं जाएगा, लेकिन संघ के स्वयंसेवक जा सकते हैं, वे हिंदू हैं लेकिन इन तीन को छोड़कर, मैंने कहा है, हर जगह मंदिर मत ढूंढ़ो, हर जगह शिवलिंग मत ढूंढ़ो। मैं अगर ये कह सकता हूं हिंदू संगठन का प्रमुख, जिसको स्वयंसेवक भी प्रश्न पूछते रहते हैं, तो थोड़ा इतना भी होना चाहिए। चलो भाई, तीन की ही बातें हैं न, ले लो—ये क्यों न हो? ये भाईचारा के लिए एक बहुत बड़ा कदम आगे होगा।
संघ में अंधविश्वास नहीं है, वैज्ञानिक दृष्टि है। स्वयंसेवकों को वही चीज जाती है। कोई कर्मकांड वगैरह संघ की शाखा का अंग नहीं होता है। जहां, जिसको जैसा विश्वास है, वैसा करता है। लेकिन वो कर्मकांड में हम जाने नहीं देते। आपने देखा होगा, यहां हमने पुष्पांजलि की, हो गई पूजा भारत माता की। नहीं तो मंत्र-वंत्र कहते—वो नहीं कहे। हम संघ में जितना संस्कृत पाठ्यंतर, मंत्र वगैरह किए जाते हैं, वो केवल भारत माता के किए जाते हैं।
संघ की प्रार्थना में भी पहले भारत माता हैं, बाद में प्रभु हैं और प्रभु हैं—राम, कृष्ण, बुद्ध ऐसा कुछ नहीं कहा है। ‘ प्रभु ‘ कहा है। सर्वत्र प्रभु की मान्यता है, जो सर्वश्रेष्ठ है, वही है प्रभु। इसलिए हम ऐसे किसी कर्मकांड में जाते नहीं। अंधविश्वासों का ये नहीं है, लेकिन मनुष्य की एक भावना भी होती है। उस भावना का सम्मान हम करते हैं।
हिंसा बढ़ रही है, आंदोलन हिंसक हो गए, युद्ध की तैयारी, इतना दूर नहीं जाना चाहिए। हां, दुनिया में और भारत में ऐसी शक्तियां हैं जो ऐसे झगड़े चाहती हैं लेकिन हम ज्यादा रिएक्ट करें, ओवर रिएक्ट करें, तो परिणाम अच्छा नहीं होगा। नाप-तोल के इसका बंदोबस्त कैसे करना है, इसकी तैयारी रखनी चाहिए।
लेकिन मन में डर के कारण द्वेष, त्वेष, दुश्मनी, ये बिलकुल नहीं आनी चाहिए। संघ पर प्रतिबंध आया। हर बार संघ के सरसंघचालक ने बाद में कहा, गुरुजी ने कहा, पहले प्रतिबंध के बाद कि “दांतों ने अपने ही जबान को काट लिया, इसलिए कोई अपने दांत गिराता नहीं है।” और बाला साहब ने कहा, “इमरजेंसी के बाद “Forget and Forgive” ये ध्यान में रखना चाहिए, तो सब ठीक रहेगा।”
प्रश्न 21: ग्लोबल सिनेरियो (Scenario) को लेकर कुछ प्रश्न हैं। तीन प्रश्न बचे हैं अभी। श्री देवेंद्र पराशर जी, पोलिटिकल एडिटर-इंडिया टीवी। श्री नवनीत मिश्र जी, राजस्थान पत्रिका,दिल्ली ब्यूरो। श्री अरुण कुमार जी, आईपीएस (रिटायर्ड)। तृप्ति लहर जी, सीनियर जर्नलिस्ट, दी वॉल स्ट्रीट जनरल चीफ। साउथ एशिया ब्यूरो, श्री सुरेंद्र सिंह जी, एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर। श्री नितिन बद्री जी, इंडिपेंडेंट डाइरेक्टर और श्री खेमचंद शर्मा जी, नेशनल मीडिया पैनलिस्ट।
अमेरिका जैसा देश हाल के दिनों में व्यापार का बहाना बनाकर भारत पर अपनी दबंगई दिखाने की कोशिश कर रहा है। क्या एक राष्ट्र के तौर पर हमें इस दबाव में आना चाहिए? इस मसले पर देश के राजनीतिक नेतृत्व को आरएसएस का क्या संदेश है?
There is huge turmoil in Geopolitics Many Experts are of the opinion that third war is Imminent. We are not prepared for war civil defence How kind we Strength in it?
अमेरिका भारत पर दबाव बना रहा है, तेल खरीदना बंद करने के लिए। ऐसे में हमें क्या करना चाहिए?
और एक अंतिम बात है इसके अंदर – How would you describe the RSS Influence on India’s current economy policies on trade negotiation with the US? How was the organization Shape the Government Trade Policy with respect to the United States.
उत्तर : तो इसके बारे में तो मैंने बोला है कल। अंतरराष्ट्रीय व्यापार अनिवार्य है, होना चाहिए। देशों के संबंध भी रहते हैं इसके कारण। लेकिन दबाव में नहीं होना चाहिए। दबाव में दोस्ती नहीं होती। तो मुक्त रूप से हो, परस्पर इच्छा से हो, दबाव में नहीं होना चाहिए। इस दबाव में हमको आना नहीं चाहिए, अलग से बताने की जरूरत नहीं है। और हम स्वनिर्भर बनें, आत्मनिर्भर बनें, परंतु परस्पर निर्भरता पर दुनिया चलती है। यह जानकर यह करना चाहिए। यह संघ का विचार है और संघ का विचार है, तो संघ के स्वयंसेवकों का विचार है। करते समय actually क्या करना, अब ये issue आ गया है। इसमें क्या करना? वो तो उस समय की देश की आवश्यकता, देश पर होने वाले परिणाम अगर निर्धारित करने की बात है, लेकिन Long Term उद्देश्य तो यही रहेगा कि बिना दबाव के हम ये सब कर सकें।
तो गवर्नमेंट को हम ये Influence नहीं करते कि अब ट्रंप साहब ने ये कह दिया, आप ऐसा करो। ये हम नहीं करते। उनको संभालना है, क्या करना, वो तय करेंगे, जैसा वो करेंगे। ऐसी अवस्था में प्रत्येक देशवासी का कर्तव्य है कि एक विश्वास रखकर सरकार के नाते जो तय होता है, उसके हम समर्थन में रहें। क्योंकि करना उनको है, वो कैसे किया जाता है, उनको देखना है। Hurdle (मुसीबत) क्या आते हैं, How to, ये सब उनको देखना है। Whatever it is decided, he is overview। लेकिन बेसिक समान है – सर्वत्र है, मुक्त व्यापार होना चाहिए। दबाव में व्यापार नहीं होना चाहिए अंतर्राष्ट्रीय। मुक्त व्यापार में फ्री ट्रेड की बात नहीं कर रहा हूं मैं, मानसिक फ्री होना चाहिए आदमी, करने के लिए या न करने के लिए।
हां, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और इसका कोई संबंध नहीं। We are a cultural nation, not a political nation, ये उसका मतलब है। कल मैंने राष्ट्र अपना कैसे बताया। तो वो संस्कृति के आधार, किसी राज्य के आधार पर बना नहीं। राज्य आते रहे, जाते रहे। वो सांस्कृतिक प्रवाह अखंड कायम चल रहा है। वो हमारा स्वरूप है।
प्रश्न 22 : समय की मर्यादा को देखते हुए चार प्रश्न हैं। उनका मैं समावेश कर रहा हूं और पूज्यनीय सरसंघचालक जी से समाधान की प्रार्थना है।
विकसित भारत 2047 के विकसित भारत के लिए हमारे देश को क्या राह अपनानी चाहिए? संघ की इसमें क्या भूमिका रह सकती है?
मीडिया और संघ के संदर्भ में कुछ प्रश्न हैं, वेब सीरीज में बेमेल संबंध और आपराधिक प्रवृत्ति के दुष्प्रचार को कैसे रोका जा सकता है? मीडिया में दलित और आदिवासी को पराया, हिंदू से अलग क्यों दिखाया जाता है?
कुछ प्रश्न संघ और महिला विषय पर हैं – संघ में महिलाओं की लक्ष्य शाखा क्यों है और उन्हें मुख्य संगठन में स्थान क्यों नहीं दिया जाता?
शाखा में अधिक से अधिक महिलाओं को जोड़ने के लिए क्या उपाय कर सकते हैं?
क्या संघ में महिलाओं की सुरक्षा के लिए कोई संस्था है?
महिलाओं की सहभागिता संघ में बहुत कम है। वो किस प्रकार संघ से जुड़ सकती हैं?
और एक जो अंतिम प्रश्न है आज का, संघ का आगामी लक्ष्य क्या है? ये चार प्रश्न, मैं पूज्यनीय सरसंघचालक जी से प्रार्थना करता हूं कि इसका समाधान करेंगे।
उत्तर : तो विकसित भारत के लिए क्या करना चाहिए? एक तो देश के लिए जीना-मरना सीखना चाहिए। बेसिक बता रहा हूं मैं। Policies बहुत हैं, उसका वर्णन करूंगा तो समय जाएगा। दूसरी बात है कि उद्यमिता बढ़नी चाहिए। देशभक्ति बढ़ने से देश की सुरक्षा निश्चित होती है। उद्यमिता बढ़ने से देश की इकॉनमी धीरे-धीरे ठीक होती है, तो हम करेंगे। दुनिया में कोई कुछ बनता है, हमारे देश में सब बनेगा, ये करना चाहिए। तो इन दो बातों पर हम जोर देंगे, तो आज तरुण पीढ़ी में ये उत्साह है कि हम अपने देश को बनाएंगे। ये माद्दा भी है कि हम अपने स्वार्थ की नहीं सोचेंगे, देश को भी बड़ा करेंगे। थोड़ी दिशा देनी आवश्यक है, तो ये हो जाएगा। उसी से भारत आत्मनिर्भर भी बनेगा, विकसित भी बनेगा।
हमको अपने विचारों के आधार पर अपना मॉडल खड़ा करके चलना चाहिए सब बातों में। यह आवश्यक है क्योंकि हम देख रहे हैं, इकॉनमी के परिणाम क्या-क्या होते हैं। तो आगे वाले को ठोकर लगी है, तो पीछे वालों को सावधान होकर, थोड़ा रास्ता बदलना चाहिए। ये कब होगा? जब हम सोचेंगे कि हम क्या हैं, हमको कहां जाना है, हमको क्या करना है, उसके आधार पर हमारा अपना विकास का मॉडल होना चाहिए। हमारा अपना विकास का मॉडल बहुत अलग है और आज के सब प्रश्नों का उत्तर देने वाला है। लेकिन उस पर अभी हम बढ़े नहीं हैं। विचार तो हो रहा है, लेकिन एक कांक्रीट सब जगह जैसा मैंने कहा, कुछ बातों में 180 डिग्रीज टर्न लेकर जाना पड़ेगा। और नीति के नाते, जिनको करना है, उनको और बहुत कॉस्टेंट रिस्टेंस है, उसमें से रास्ता निकालकर जाना पड़ेगा। धीरे-धीरे, लेकिन मन में रखकर करने की बात है।
और मीडिया ऐसा क्यों करता है, वैसा क्यों करता है? वो तो मीडिया को ही पूछना चाहिए। हम तो सबको एक मानते हैं। हम किसी को अलग मानते नहीं, क्योंकि कोई अलग है नहीं। सब लोग भारत में अनादि काल से रह रहे हैं। और अलग दिखते हैं, अलग हैं नहीं। जो पहले आदिवासी थे, वो ग्रामवासी, नगरवासी हो गए। आज इतने हजारों वर्षों के बाद कपड़े अलग हो गए। देवी-देवता अलग हो गए, वो तो होते ही हैं। भाषाएं अलग बन जाती हैं। किसी भी देश के बढ़ने का यह परिणाम होता है, उसमें विविधता उत्पन्न होती है। और हमारे यहां किसी विविधता को मिटाया नहीं जाता। इसलिए तब से जो विविधता है, वो आज भी चल रही है, तो उसको देखना चाहिए। मीडिया सोचे, उसके बारे में करे। देश को एक दिशा देनी है, संस्कार भी देना है, ये सोचकर करे।
महिलाओं के बारे में बताया, मैंने। एक राष्ट्र सेविका समिति 1936 में चली। तब से ये तय है कि वो वहां काम करेंगी, शाखाएं वहां चलाएंगी। हम शाखाएं पुरुषों में चलाएंगे। पैरेलल रहेंगे, मिलेंगे नहीं, एक-दूसरे की मदद करेंगे। और इसमें कुछ परिवर्तन करना है, तो राष्ट्र सेविका समिति को हमको बताना पड़ेगा कि “अब बदलो”, तब हम बदलेंगे। हम उस वचन का पालन कर रहे हैं। वो जब बताएंगे कि आप भी करो, तब हम करेंगे। नहीं तो, हम उनकी मदद करेंगे। उनकी भी अब 10,000 शाखाएं हो गई हैं। उनकी भी 50 के ऊपर थोड़ी प्रचारिका हैं। वो भी काम बढ़ रहा है, अच्छी तरह से।
बाकी सब कामों में पुरुष और महिला मिलकर काम करते हैं और महिला नेतृत्त्व भी करती हैं, विविध संगठनों में। संघ के स्वयंसेवकों के द्वारा चलाई हुई गतिविधियों में, संघ के स्वयंसेवकों के द्वारा चलाई हुई संस्थाओं में, सेवाभारती की अध्यक्ष महिला हैं। ऐसी कई बातें हैं। तो महिला इस रूप में संघ से जुड़ी है और प्रत्येक स्वयंसेवक का घर संघ का घर होता है, केवल स्वयंसेवक नहीं होता है। तो वहां भी महिला ही जुड़ी है। अनेक महिलाएं हमारी आचार पद्धति हमारे नए मुखिया से ज्यादा अच्छी जानती हैं। और उनको दो-चार गीत पाठ हैं, इनको 25 गीत पाठ हैं, कंठ पाठ है। ऐसी अवस्था है। तो जुड़ी हैं और उनके सपोर्ट से ही हम चल रहे हैं।
We cannot ignore them, and we do not want to ignore them. We want to organized whole of the society. तो उनका रोल है, अच्छा रोल है। बाकी व्यवस्था में भी ये हो, ऐसी हमारी इच्छा है। 50% महिलाएं हैं, रिप्रेजेंटेशन हो, सब जगह।
वो संघ में उनकी सहभागिता कम नहीं है। कभी-कभी हमारा कान पकड़कर भी वो हमको ठीक करती हैं। और महिला सब रोल कर सकती है। हमारा विश्वास है, status के बारे में Equal status है, परस्पर पूरक है। महिला और पुरुष दोनों मिलकर सृष्टि बनती है। तो इसलिए जो भी कुछ होना है, कुछ होना नहीं है, तो अकेले रह सकते हैं। कुछ होना है, तो दोनों साथ चाहिए। ये महिलाओं का रोल है, ये महिलाओं की status है, ऐसा हम मानते हैं।
हिंदू राष्ट्र घोषित नहीं करना है, वो है। ऋषि-मुनियों ने उसको राष्ट्र घोषित कर दिया है। हिंदू शब्द आजकल करने का, वो किसी अधिकृत घोषणा का मोहताज नहीं है। वो एक सत्य है। मानने से आपका लाभ है, न मानने से आपका नुकसान है, आजमाकर देख सकते हैं।
संघ की सदस्यता की कोई प्रक्रिया नहीं। संघ में आना, शाखा में आना। कहा जाना है, एक तो कार्यकर्ता पकड़िए। आप कोई आसपास वाला, आज भी आपने कुछ चेहरे देख लिए, उनको ढूंढ़ लीजिए, या वेबसाइट पर जाइए संघ के। वहां एक बटन है ‘Join Rss ‘ वाला। उसको दबाइए, तो आपको Contact मिल जाएगा। वो आपको बताएंगे। और इतने सारे काम चलते हैं स्वयंसेवकों के और संघ के भी, उसमें आप सहभागी हो सकते हैं।
एक तो मैं क्षमा चाहता हूं, एक घंटा ज्यादा मैंने लिया। लेकिन प्रश्न ही आपके ऐसे थे और कुछ प्रश्न तो डिटेल में बताने पर ही आपको उत्तर ध्यान में आएंगे। मैं आशा करता हूं, जो आपने पूछा था, वो जवाब मैंने दिया है। लेकिन मेरा एक आह्वान है कि पढ़ने-सुनने पर मत जाइए, अंदर आकर संघ को देखिए। आपको संघ का फील प्राप्त होने से You can know Rss? RSS is thing to be known by experience. ये ध्यान में रखिए।
बस, 2 दिन भाषण सुना और आज इतना लंबा प्रश्न-उत्तर का सेशन में भी आप बैठे रहे। आपको हृदय से धन्यवाद अर्पण करता हूं और हो गया। बाकी अब आभार प्रदर्शन वगैरह वो करेंगे। मैं आपको धन्यवाद मेरी तरफ से कह रहा हूं।
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