Menu

क्रांति की माता : कैसी थी भीकाजी कामा की कहानी, जिसे अंग्रेज ‘खतरनाक महिला’ कहते थे

Editor Ritam HindiEditor Ritam Hindi24 Sept 2025, 11:00 am IST
क्रांति की माता : कैसी थी भीकाजी कामा की कहानी, जिसे अंग्रेज ‘खतरनाक महिला’ कहते थे

भारत की स्वतंत्रता का इतिहास केवल तलवार और तोप के दम पर नहीं लिखा गया। यह उन स्त्रियों और पुरुषों की हिम्मत और दूरदृष्टि का परिणाम भी है, जिन्होंने सीमाओं से परे जाकर दुनिया को भारत की गुलामी की हकीकत दिखाई। इनमें सबसे प्रमुख नाम है भीकाजी रुस्तम कामा का, जिन्हें दुनिया मैडम कामा, क्रांति की माता और भारत की जोन ऑफ आर्क के नाम से जानती है। उन्होंने विदेशी धरती पर भारत का झंडा फहराकर दुनिया को यह संदेश दिया कि भारत केवल उपनिवेश नहीं, बल्कि वह एक स्वतंत्र राष्ट्र बनने की तैयारी कर रहा है।

भीकाजी कामा का जन्म 24 सितम्बर 1861 को मुंबई में हुआ। वह एक सम्पन्न और प्रभावशाली पारसी परिवार से थीं। उनके पिता सोराबजी पटेल व्यापारी थे और ब्रिटिश हुकूमत के वफादार माने जाते थे। घर में नौ भाई-बहनों के बीच पली-बढ़ीं भीकाजी को शिक्षा और संस्कार दोनों मिले। वे मुंबई के अलेक्जेंड्रा नेटिव गर्ल्स इंस्टीट्यूट की छात्रा रहीं और बचपन से ही सामाजिक सेवा में रुचि रखती थीं।

उनकी खासियत थी बहुभाषी होना। अंग्रेजी, फ्रेंच और संस्कृत के साथ वह फारसी और गुजराती भी जानती थीं। यूरोप में रहते हुए यही क्षमता उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी। विदेशी मंचों पर भाषण देते समय वह जिस आत्मविश्वास से धाराप्रवाह भाषण देती थीं, उसने श्रोताओं पर गहरी छाप छोड़ी।

विवाह और मतभेद

1885 में उनका विवाह वकील और समाज सुधारक रुस्तमजी कामा से हुआ। लेकिन विवाह के कुछ वर्षों बाद ही मतभेद सामने आ गए। रुस्तमजी ब्रिटिश शासन के समर्थक थे, जबकि भीकाजी धीरे-धीरे राष्ट्रवादी विचारों की ओर बढ़ रही थीं। यह मतभेद इतने गहरे हुए कि भीकाजी ने वैवाहिक जीवन से दूरी बनाकर अपना जीवन भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई को समर्पित कर दिया।

प्लेग महामारी और सेवा

1896 में जब मुंबई में प्लेग फैला, तो भीकाजी कामा ने निःस्वार्थ भाव से मरीजों की सेवा की। वह अस्पतालों में जाकर लोगों की देखभाल करती थीं। इस सेवा भाव ने उन्हें जनता का स्नेह तो दिलाया, लेकिन इसी दौरान वह स्वयं भी प्लेग से संक्रमित हो गईं। गंभीर रूप से बीमार पड़ने के बाद उनका स्वास्थ्य कभी पहले जैसा नहीं रहा। 1902 में उन्हें इलाज के लिए यूरोप भेजा गया, लेकिन वहां भी उन्होंने चैन से जीवन नहीं बिताया। यूरोप में रहते हुए उन्होंने भारत की आजादी के लिए नया मोर्चा खोल दिया।

यूरोप में स्वतंत्रता संग्राम की गूंज

लंदन में उनकी मुलाकात श्यामजी कृष्ण वर्मा और दादाभाई नौरोजी से हुई। यह संपर्क उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। उन्होंने भारतीय क्रांतिकारियों के बीच नेटवर्क बनाया और ब्रिटिश हुकूमत की नीतियों को उजागर करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों का प्रयोग किया।

बाद में वह पेरिस चली गईं और वहां पेरिस इंडियन सोसाइटी की स्थापना की। यह संगठन प्रवासी भारतीयों और क्रांतिकारियों का केंद्र बना। पेरिस से प्रकाशित पत्रिकाएं ‘वंदे मातरम्’ और ‘मदन की तलवार’ गुप्त मार्ग से भारत भेजी जाती थीं। इनमें ब्रिटिश शासन के खिलाफ लेख, कविताएं और क्रांतिकारी विचार प्रकाशित होते थे।

स्टुटगार्ट का झंडा और ऐतिहासिक भाषण

22 अगस्त 1907 का दिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। जर्मनी के स्टुटगार्ट शहर में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस में भीकाजी कामा ने भारत का झंडा विदेशी धरती पर फहराया।

उस झंडे में तीन रंग थे– हरा, पीला और लाल। सबसे ऊपर हरी पट्टी में आठ कमल बने थे, जो भारत के आठ प्रांतों का प्रतीक थे। बीच की पीली पट्टी पर ‘वंदे मातरम्’ लिखा था और नीचे की लाल पट्टी पर सूरज और चांद की आकृति थी। जब उन्होंने यह झंडा फहराया, तो सभा में मौजूद प्रतिनिधि स्तब्ध रह गए।

भीकाजी ने जोरदार आवाज़ में कहा, “यह भारत का झंडा है, यही भारत के लोगों का प्रतिनिधित्व करता है। इसे सलाम करो।”  इस भाषण में उन्होंने भारत में हो रहे अकालों, करों की मार और ब्रिटिश शासन की क्रूरता का उल्लेख किया। उस समय भारत में लोग आवाज़ नहीं उठा सकते थे, लेकिन यूरोप की धरती पर भीकाजी कामा ने स्वतंत्रता का बिगुल बजा दिया।

क्रांतिकारियों से जुड़ाव और ब्रिटिश सरकार की नजर

भीकाजी कामा का संपर्क उस दौर के कई प्रसिद्ध क्रांतिकारियों से था, जैसे विनायक दामोदर सावरकर, लाला हरदयाल, मदनलाल धींगरा और श्यामजी कृष्ण वर्मा। वह उन्हें आर्थिक सहायता देतीं, क्रांतिकारी साहित्य छपवातीं और जरूरत पड़ने पर सुरक्षित जगह उपलब्ध करातीं।

ब्रिटिश सरकार ने उन्हें खतरनाक महिला और कुख्यात आंदोलनकारी कहा। लंदन में उनकी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया गया और उन्हें नजरबंद करने की कोशिशें की गईं। लेकिन फ्रांस ने उन्हें सुरक्षा दी और वह वहीं से काम करती रहीं।

पत्रकारिता को बनाया हथियार

1909 में पेरिस से उन्होंने ‘वंदे मातरम्’ नामक पत्रिका शुरू की। इस पत्रिका का पहला अंक मदनलाल धींगरा की शहादत को समर्पित था। पत्रिका पर अंग्रेजों ने प्रतिबंध लगा दिया, लेकिन इसे गुप्त मार्ग से भारत भेजा जाता रहा। यह पत्रिका भारत में क्रांतिकारियों और युवाओं के बीच अत्यंत लोकप्रिय हुई।

भीकाजी कामा को भारत की पहली महिला पत्रकारों में गिना जाता है, जिन्होंने पत्रकारिता को स्वतंत्रता संग्राम का हथियार बनाया।

महिला अधिकारों की पैरोकार

भीकाजी कामा का मानना था कि स्वतंत्रता अधूरी है, यदि महिलाएं बराबरी के अधिकारों से वंचित रहें। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा और सामाजिक भागीदारी पर जोर दिया। उनके भाषणों में महिला सशक्तिकरण की झलक स्पष्ट दिखाई देती थी। यही कारण है कि यूरोपियन अखबारों ने उन्हें भारत की ‘जोन ऑफ आर्क’ कहा।

अंतिम दिन और विरासत

1935 में, उम्र और बीमारी से जूझने के बाद उन्हें भारत लौटने की अनुमति मिली। एक साल बाद, 13 अगस्त 1936 को मुंबई में उनका निधन हो गया। उनकी अंतिम इच्छा थी कि उनकी कब्र पर भारत की मिट्टी डाली जाए, जो पूरी हो गई।

स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार ने उनके योगदान को सम्मान दिया। 1962 में उनके नाम पर डाक टिकट जारी किया गया। नई दिल्ली का व्यावसायिक क्षेत्र भीकाजी कामा प्लेस उनके नाम पर है और भारतीय तटरक्षक बल ने अपने एक जहाज का नाम ICGS Bhikaji Cama रखा। पुणे की केसरी मराठा लाइब्रेरी में आज भी उनका फहराया गया झंडा सुरक्षित है। उन्होंने साबित किया कि आजादी केवल तलवारों से नहीं, बल्कि विचारों, भाषणों और कलम से भी जीती जा सकती है।