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राम मंदिर भूमि पूजन: लाखों का बलिदान, जानिए गुमनाम नायकों की कहानी

Editor Ritam HindiEditor Ritam Hindi05 Aug 2025, 11:13 am IST
राम मंदिर भूमि पूजन: लाखों का बलिदान, जानिए गुमनाम नायकों की कहानी

अयोध्या राम मंदिर की भूमि पूजन के 5 वर्ष पूरे हो गए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 अगस्त 2020 को बहुप्रतीक्षित राम मंदिर निर्माण की आधारशिला रखी थी. इस आयोजन में देश के तमाम साधु-संतों को आमंत्रित किया गया था. 500 वर्षों तक चले लंबे संघर्ष के बाद,जब भगवान राम की जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण की आधारशिला रखी जा रही थी, तब पूरा देश भावुक था और उन लोगों को धन्यवाद दे रहा था, जिन्होंने मंदिर निर्माण के संघर्ष में अपना पूरा जीवन खपा दिया. राम जन्मभूमि की रक्षा व वहां से मुगलों का कब्जा हटाने के लिए 500 वर्ष संघर्ष हुआ, जिसमें 1,74,000 हिंदुओं ने अपने प्राणों की आहुति दी.

देवीदीन पांडेय

परम रामभक्त देवीदीन पांडेय ने राम जन्मभूमि पर पुन: मंदिर निर्माण के लिए अपना बलिदान देकर संघर्ष शुरू किया था. 1528 में मुगल आक्रांता बाबर के सेनापति मीर बाकी ने अयोध्या में जन्मभूमि पर बने मंदिर में लूटपाट की और उस तोड़ डाला.अयोध्या के समीप सनेथू गांव के रहने पुरोहित देवीदीन पांडेय को राम मंदिर तोड़े जाने की जानकारी मिली थी. उन्होंने ग्रामीणों की सेना बनाकर मुगलों पर आक्रमण कर दिया. मात्र तीन घंटे के युद्ध में देवीदीन पांडेय ने 700 से अधिक मुगल सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया.

छल पूर्वक मुगल सैनिकों ने देवीदीन पांडेय को चारों ओर से घेर कर पर उन पर लखौरी ईंट बरसानी शुरू कर दीं. जिससे उनके सिर में गंभीर चोटें आईं. लेकिन वह मुगल सेना से युद्ध लड़ते रहे. युद्ध में देवीदीन पांडेय जी गंभीर रूप से घायल हो गए. घायल होने के चलते 9 जून 1528 को उनकी मृत्यु हो गई.

महाराज महताब सिंह

श्री राममंदिर मुक्ति के आंदोलन में भीटी के महाराज महताब सिंह ने भी बड़ी लड़ाई लड़ी. उन्होंने 80 हजार सैनिकों के साथ मुगल सेनापति मीर बाकी की पौने दो लाख सैनिकों की सेना से मुकाबला किया. भीटी नरेश बद्रीनाथ की यात्रा पर जा रहे थे. यात्रा के बीच उन्हें खबर मिली की मुगल शासक बाबर के सेना पति मीर बाकी ने अय़ोध्या पर हमला बोल दिया है. उन्होंने बद्री विशाल की यात्रा स्थगित कर मीर बाकी से युद्ध किया.

मुगलों की पौने दो लाख सेना के सामने,सिर्फ 80 हजार सैनिकों के साथ महाराज महताब सिंह ने युद्ध किया.भीटी स्टेट और मुगल सेना के बीच 17 दिनों तक भीषण युद्ध हुआ. इस युद्ध में बाबर का सेनापति मीर बाकी बुरी तरह से घायल हुआ. महाराज महताब सिंह ने मुगलों की तीन चौथाई सेना काट डाली. लेकिन वह स्वयं राम मंदिर की रक्षा के लिए बलिदान हो गए.

महाराजा रणविजय सिंह

देवीदीन और महाराजा महताब के बलिदान के बाद अंबेडकरनगर की हंसवर स्टेट के महाराजा रणविजय सिंह ने मीर बांकी से युद्ध कर उसे हराया और जन्मभूमि पर कब्जा कर लिया.28 हजार सैनिकों के साथ युद्ध कर रहे महाराजा रणविजय ने 8वें दिन ही मुगल सेना को राम जन्मभूमि छोड़कर भागने के लिए मजबूर कर दिया.रणविजय सिंह को राम जन्मभूमि पर मुगलों द्वारा फिर से हमला किए जाने की आशंका थी. इसलिए उन्होंने मंदिर परिसर के चारों और गहरी खाई खुदवाई और बाड़ लगवा दी, ताकि मुगल अपने मंसूबों में सफल न हो सकें.

कब्जे 10 दिनों बाद एक बार फिर से मुगलों ने दोगुनी ताकत के साथ मंदिर पर हमला कर दिया. रणविजय सिंह और उनके सैनिकों ने वीरता के साथ मुगलों का सामना किया. लेकिन युद्ध करते हुए महाराजा रणविजय सिह बलिदान हो गए.महाराजा के साथ हजारों सैनिक, साले वीरभानु प्रताप व भाई संग्राम सिंह भी वीरगति को प्राप्त हुए. जिसके बाद मुगलों ने एक बार फिर से राम जन्मभूमि पर कब्जा कर लिया.

महारानी जयराज कुमारी

हंसवर के महाराजा रणविजय सिंह के बलिदान के बाद उनकी पत्नी महारानी जयराज कुमारी ने भी मुगलों को खदेड़कर राम मंदिर पर हिंदुओं का अधिकार स्थापित कर दिया था.महारानी जयराज कुमारी ने मुगलों से हल्लाबोल युद्ध किया. महारानी युद्ध कला में प्रवीण थीं. महारानी 3,000 महिलाओं की सेना लेकर मुगलों पर चढ़ाई की थी.

महारानी ने सन् 1528-1530 तक अयोध्या की सीमा पर मौजूद कई मुगल सैनिकों को छापामार युद्ध कर मार डाला. महारानी की महिला सेना अलग-अलग टुकड़ियों में गांव की कामकाजी महिलाओं के साथ रहती थी. ताकि मुगलों को शक न हो.26 दिसंबर 1530 को आगरा में मुगल आक्रांता बाबर की मौत हो गई. जिसके बाद हुमायूं दिल्ली सल्तनत का नया बादशाह बना.

हुमायूं के बादशाह बनते ही महारानी ने राम जन्मभूमि पर चढ़ाई कर दी. मुगल सैनिक मैदान छोड़कर भागे और इस प्रकार से रानी जयराज कुमारी ने अपने पति की तरह एक बार फिर राम जन्मभूमि पर कब्जा कर लिया.महारानी ने राम मंदिर के गर्भ गृह में अस्थाई तौर पर एक छोटा सा मंदिर बनवाया और रामलला की मूर्ति रखकर पूजा प्रारंभ कर दी. मंदिर में तीन महीनों तक पूजा होती रही.

1531 में हुमायूं ने विशाल सेना भेजकर एक बार फिर से रामजन्म भूमि पर हमला करवा दिया. भीषण युद्द में महारानी जयराज कुमारी उनके गुरु स्वामी महेश्वरानंद सहित बड़ी संख्या में लोग बलिदान हो गए.मुगलों ने एक बार फिर से राम मंदिर पर कब्जा कर लिया. साथ ही गर्भ गृह में बनाए गए अस्थाई मंदिर को भी ध्वस्त कर दिया और पूजा-पाठ करने पर रोक लगा दी.

स्वामी महेश्वरानंद

स्वामी महेश्वरानंद ने ही हंसवर के महाराजा रणविजय सिंह व महारानी जयराज कुमारी से राम जन्मभूमि को मुगलों से मुक्त कराने को कहा था. महाराजा को वीरगति प्राप्त होने के बाद स्वामी महेश्वरानंद ने महारानी को युद्ध करने के लिए प्रेरित किया.स्वामी महेश्वरानंद ने महारानी की सेना निर्माण में बहुत मदद की. वह अयोध्या व आसपास के गांवों में रहने वाले युवाओं को योद्धा के तौर पर तैयार करते थे, फिर इन्हें महारानी की सेना में शामिल करते थे.

स्वामी महेश्वरानंद के प्रयासों से राम जन्मभूमि दो बार हिंदूओं के अधिकार क्षेत्र में आई. 1531 में हुमायूं ने फिर से राम जन्मभूमि अयोध्या पर हमला कर दिया. हमले में महारानी जयराज कुमारी के साथ स्वामी महेश्वरानंद भी वीरगति को प्राप्त हुए थे.

25 निहंग सिखों ने मस्जिद के ढांचे पर किया था कब्जा

राम जन्मभूमि को मुक्त कराने क लिए निहंग सिखों ने भी लड़ाई लड़ी. बाबा फकीर सिंह के नेतृत्व में 25 निहंग सिखों ने विवादित बाबरी ढांचे पर कब्जा कर गर्भगृह में रामलला की मूर्ति की स्थापना कर दी थी.निहंग सिखों ने रामलला की मूर्ति स्थापित करने के बाद वहां पूजा-पाठ भी प्रारंभ कर दिया था. जिसके बाद निहंग बाबा फकीर और उनके साथियों के खिलाफ 30 नवंबर 1858 को अवध थाने में रिपोर्ट दर्ज की गई.सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर 2019 को दिए गए अपने फैसले में इस एफआई आर का जिक्र किया था.

महंत रघुबर दास

प्रथम स्वाधीनता संग्राम के बाद विद्रोह की आग में देश जल रहा था. दूसरी ओर अयोध्या में राम जन्मभूमि के लिए हिंदू-मुस्लिमों के बीच विवाद चल रहा था. परेशान होकर अंग्रेजों ने विवादित स्थल की चारों ओर बाड़ लगा दी. हिंदू और मुस्लिम दोनों को पूजा व नमाज पढ़ने की इजाजत दे दी. 19 जनवरी 1885 तक का समय ऐसे ही बीता. तभी विवादित ढांचे के पास एक ऊंचा मंच बनाया गया. इसके बाद मुस्लिम पक्ष ने फैजाबाद जिला मजिस्ट्रेट के यहां विरोध दर्ज किया.

इसी मंच पर निर्मोही अखाड़े के महंत रघुवर दास ने मंदिर निर्माण शुरू किया, मुस्लिम पक्ष की आपत्ति पर जिला मजिस्ट्रेट ने निर्माण रोक दिया. इसके बाद महंत रघुवर दास ने चबूतरे के निर्माण और उसके मालिकाना हक का दावा करते हुए फैजाबाद के उपन्यायधीश की अदालत में 25 मई 1885 को मुकदमा दायर कर दिया.

1. 22 दिसंबर 1949 को अयोध्या में अचानक रामलला की मूर्ति प्रकट हुई, जो इस मामले में बहुत निर्णायक साबित हुआ. इस पूरे घटनाक्रम में परमहंस रामचंद्र दास जी की बड़ी भूमिका रही.

2. 16 जनवरी 1950 को सिविल कोर्ट में हिंदू पक्ष ने मुकदमा दायर कर जन्मभूमि पर स्थापित भगवान राम और अन्य मूर्तियों की पूजा करने की इजाजत मांगी.

3. 1985 को कर्नाटक के उडुपी में दूसरी धर्मसंसद हुई. रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत परमहंस रामचंद्र दास ने ऐलान किया कि 8 मार्च 1986 को महाशिवरात्रि तक जन्मभूमि पर लगा ताला खोजा जाए, अगर ताला नहीं खोला गया तो ‘ताला खोलो आंदोलन, ताला तोड़ो आंदोलन’ किया जाएगा. जिसके बाद 1 फरवरी 1986 को ताला खोला गया.

महंत अवैद्यनाथ

गोरक्षपीठ के तत्कालीन महंत दिग्विजयनाथ जी ने साल 1934 से 1949 तक राम मंदिर निर्माण के लिए संघर्ष किया. साल 1949 में जब विवादित ढांचे में रामलला की मूर्तियां प्रगट हुईं, तब यह स्पष्ट हुआ कि बाबा अभिराम दास के साथ मिलकर महंत दिग्विजयनाथ ने मूर्तियों की स्थापना की थी.दिग्विजयनाथ के ब्रह्मलीन होने के बाद उनके शिष्य महंत अवैद्यनाथ ने राम मंदिर आंदोलन को गति दी. उन्होंने राम जन्मभूमि मुक्त यज्ञ समिति की स्थापना की और सीतामढ़ी से अयोध्या तक की यात्रा की. महंत अवैद्यनाथ के नेतृत्व में साल 1984 में श्रीराम जन्मभूमि न्यास का गठन हुआ. वह इस न्यास के पहले अध्यक्ष बनें.

ठाकुर गुरुदत्त सिंह (प्रयागराज)

22-23 दिसंबर 1949 की रात विवादित स्थल पर रामलला की मूर्तियों का प्राकट्य हुआ, उस दौरान ठाकुर गुरुदत्त सिंह फैजाबाद के सिटी मजिस्ट्रेट थे. प्रधानमंत्री नेहरू व मुख्यमंत्री गोविंदवल्लभ पंत ने उनसे मूर्तियों को हटाने को कहा. पर उन्होंने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए मूर्तियां नहीं हटाईं. उस दौरान उनका सिविल लाइंस स्थित आवास ‘रामभवन’ रामजन्मभूमि आंदोलन का आरंभिक केंद्र बना. जहां आंदोलन से जुड़े प्रमुख नेता रूका करते थे.

गोपाल सिंह विशारद

16 जनवरी 1950 को हिंदू महासभा के नेता गोपाल सिंह विशारद और दिगंबर अखाड़ा के महंत परमहंस रामचंद्रदास ने फैजाबाद अदालत में याचिका दाखिल की. विशारद ने मांग की कि उन्हें रामलला के दर्शन-पूजन का अधिकार दिया जाए.1949 में मूर्तियों के प्राकट्य के बाद यह पहली कानूनी कार्रवाई थी. 2019 में जब सुप्रीम कोर्ट ने रामलला के पक्ष में फैसला सुनाया, तब विशारद को उनकी मृत्यु के 33 साल बाद पूजा करने का अधिकार मिला.

न्यायमूर्ति देवकीनंदन अग्रवाल (प्रयागराज)

राम मंदिर आंदोलन में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त जज जस्टिस देवकीनंदन अग्रवाल का योगदान विशेष रहा.साल 1989 में उन्होंने रामलला विराजमान को एक पक्षकार के रूप में मान्यता दिलाने के लिए स्वयं को रामसखा के रूप में प्रस्तुत किया. साथ ही सिविल सूट नंबर-5 दाखिल किया. रामलला को पक्षकार बनाए जाने से यह संभव हुआ कि सरकार बाद में विवादित भूमि का अधिग्रहण कर मंदिर निर्माण कर सके. वह 8 अप्रैल 2002 को निधन तक रामसखा के रूप में प्रतिबद्ध रहे.

बलराज यादव

बलराज यादव 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचे पर चढ़ने वाले पहले कारसेवक थे. वह कारसेवकों के एक छोटे दल का नेतृत्व कर रहे थे. बलराज यादव सुरक्षा घेरे को तोड़कर विवादित स्थल पर पहुंचे और विवादित ढांचे को ध्वस्त करना शुरू कर दिया. इस घटना के 10 दिन बाद, 16 दिसंबर को हैदराबाद में कट्टरपंथियों की भीड़ ने उन पर हमला किया और चाकू गोदकर उनकी निर्मम हत्या कर दी. बलराज यादव राम मंदिर आंदोलन के पहले बलिदानियों में से एक माने जाते हैं.

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