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1923 मदुरै कोर्ट लेकर मद्रास हाई कोर्ट के दीपम फैसले तक, क्या रही है तिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर कानूनी लड़ाई

Editor Ritam HindiEditor Ritam Hindi20 Dec 2025, 05:37 pm IST
1923 मदुरै कोर्ट लेकर मद्रास हाई कोर्ट के दीपम फैसले तक, क्या रही है तिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर कानूनी लड़ाई
तिरुपरनकुंद्रम मंदिर के अदालती फैसलों का इतिहास

Thiruparankundram Hill: तमिलानाडु के मदुरै जिले में स्थित तिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर स्थित तिरुपरनकुंद्रम मंदिर पिछलें कई समय से सुर्खियों में बना हुआ है। 1 दिसंबर 2025 को इस विषय को लेकर मद्रास उच्च न्यायालय के जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथ ने बड़ा फैसला सुनाते हुए कार्तिगई दीपम के अवसर पर मंदिर में ‘दीपथून’ की अनुमति दी थी। मगर इस्लामिक कट्टरपंथी लोगों ने विवाद और हिंसा करके इस प्राचीन परंपरा कौ मनाने से रोका। ये न केवल देश की शांति बल्कि हाई कोर्ट के आदेश के लिए भी बड़ी चुनौती थी। तिरुपरनकुंद्रम मंदिर का इतिहास हजारों साल (संगम साहित्य) पुराना है, इसके बाद भी मंदिर के हर कण ने अपनी उपस्थिति को लेकर सबूत दिये हैं। इस विषय पर अदालत ने कई बार फैसला सुना चुकी है जिनकी जानकारी कुछ इस प्रकार है –

ब्रिटिश सरकार के समय सांस्कृतिक परंपराओं को बचाने की चुनौती

औपनिवेशिक काल के दौरान ब्रिटिश सरकार की नीतियां डिवाइड और रूल यानी बांटकर शासन करने की थीं। तिरुपरनकुंद्रम की पवित्र पहाड़ी भी इसका शिकार रही। 19वीं शताब्दी के अंत में, पहाड़ी के स्वामित्व पर विवाद सामने आए। इसके अंतर्गत कुछ मुस्लिम समूह पहाड़ी पर दरगाह और इस्लामिक इबादत को बढ़ावा देने की कोशिश करने लगे थे, वहीं मंदिर प्रशासन ने तिरुपरनकुंद्रम मंदिर को लेकर ऐतिहासिक दावे सामने रखे। इस दौरान सबसे विवादित बात थी कि सभी ब्रिटिश औपनिवेशिक राजस्व रिकॉर्डों में इस पवित्र पहाड़ी को “स्कंदर मलाई” या “सिक्कंदर मलई” दर्ज कर दिया था। इससे संघर्ष और भी तीव्र हो गया था।

1923 में मदुरै कोर्ट का वो ऐतिहासिक निर्णय, जिसे आज भी किया जाता है याद

25 अगस्त 1923 में मदुरै अधिनस्थ अदालत ने 21 गवाहों और 300 से ज्यादा दस्तावेजों की जांच करने के बाद एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। ये मंदिर के इतिहास में एक बड़ा फैसला था, जिसके अंतर्गत कोर्ट ने फैसला दिया कि पूरी पहाड़ी पर मालिकाना हक मंदिर का है, सिवाय इन हिस्सों के: नेल्लीथोप (Nellithope) का लगभग 33 सेंट हिस्सा, मस्जिद/दरगाह की इमारत, उसका झंडा‑स्तंभ और वहां तक जाने वाली सीढ़ियां – जिन्हें मुस्लिम प्रतिवादियों की संपत्ति माना गया। ​बाद में प्रिवी काउंसिल (AIR 1931 PC 212) ने भी यही स्थिति बरकरार रखी कि दर्गाह, flagstaff और steps मुसलमानों के, बाक़ी पहाड़ मंदिर का। बिना विध्वंस का आदेश दिए सुलह की भावना को स्थापित करने के लिए अदालत ने मंदिर और दरगाह के बीच सीमाएं निर्धारित की थीं। ये स्पष्ट था कि फैसला मंदिर के पक्ष में था।

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तिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर प्रिवी काउंसिल का अंतिम फैसला (1931)

लंदन की प्रिवि पर्स काउंसिल साल 1931 में मदुरै अदालत के फैसले के खिलाफ समीक्षा की। उन्होंने इस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें कहा गया था कि तिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी केवल मुरुगन मंदिर की है। इस दौरान लिखित रूप से कहा गया है कि स्वामित्व के अधिकार न तो सरकार और न ही दरगाह के पास हैं। मंदिर, जो पांड्य काल (8वीं शताब्दी ईस्वी) में बनाया गया, एक पहाड़ी पर खड़ा है जो शिवलिंग जैसे रूप के लिए पूजनीय है।

द्वितीय विश्वयुद्ध के समय कैसे दीपम रोकने के फैसले ने नए विवादों को जन्म दिया

सदियों से तिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी के शिखर पर कार्तिगई दीपम यानी दीपक जलाने की परंपरा चलती आई है। इसे ‘दीपथून’ कहा जाता है मगर साल 1940 की शुरुआत में द्वितीय विश्व युद्ध के बीच ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया। इस दौरान अवैध अतिक्रमण तेजी से बढ़ा और मुस्लिम समुदायों ने दरगाह का विस्तार कर हरे झंडे लगाना और सिकंदर हिल कहना शुरू कर दिया था।

1994 में पहाड़ी शिखर पर दीपम के लिए अदालत का ऐतिहासिक फैसला

साल 1994 में कुछ छिटपुट विरोधों और मंदिर की साहसिक परंपरा को बचाने के बीच हिंदू मुन्नानी ने पारंपरिक अभ्यास के लिए पहाड़ी पर दीपम जलाने की मांग करते हुए मामला दायर किया। इस पर मदुरै जिला अदालत ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए निर्देश दिए थे कि HR&CE मंदिर प्रशासन पहाड़ी शिखर के साथ आगे बढ़ सकता है। हालांकि, इस्लामी समूहों ने विरोध किया और हमेशा दीपम जलाने को लेकर विवाद खड़ा करते रहे।

4 दिसंबर 2024 को, दर्गाह प्रबंधन ने तिरुप्परंकुंड्रम पहाड़ी क्षेत्र में एक नया साइनबोर्ड लगाया, जिसमें लिखा था कि “पहाड़ी पर दर्गाह में कंदूरी (जानवर की बलि वाली रस्म) करने वालों के लिए सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं।” इससे हिंदू समुदाय की ओर से सोशल मीडिया पर तीव्र विरोध हुआ और इस कदम की व्यापक रूप से निंदा की गई। ​अक्टूबर 2025 में मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने एक महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए तिरुप्परंकुंड्रम पहाड़ी पर बकरों और मुर्गियों सहित किसी भी पशु‑बलि पर प्रतिबंध लगाया और वहाँ मांसाहारी भोजन पकाने, ले जाने या परोसने पर भी रोक लगा दी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अब इस पहाड़ी को “सिकंदर हिल” या “सिकंदर मलै” के नाम से नहीं पुकारा जाएगा।

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मद्रास उच्च न्यायलय की मदुरै पीठ ने 1 दिसंबर 2025 को तिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर स्थित दीपथून (प्राचीन पत्थर स्तंभ) पर कार्तिगई दीपम जलाने वाली याचिका को स्वीकार किया था। साथ ही कोर्ट ने दीप जलाने की अनुमति भी दी थी। कोर्ट ने इस आदेश में इस बात का ध्यान रखा था कि कार्तिगई के दौरान पहाड़ियों की चोटी पर दीपक जलाना तमिल की परंपरा का हमेशा से हिस्सा रहा है। न्यायमूर्ति जी. आर. स्वामीनाथन की एकल पीठ ने सुनवाई करते हुए ये बड़ा फैसला दिया था।

कोर्ट के आदेश के बावजूद भी इस्लामिक कट्टरपंथियों ने कार्तिगाई दीप जलाने के खिलाफ जमकर हंगामा किया, साथ ही पुलिस, सुरक्षाबलों और आम लोगों के साथ हिंसक वारदात की गईं। इस मामले में (कांग्रेस- DMK) भी अपनी राजनेतिक रोटियां सेकने के इरादे से कूद गई। इस दौरान न केवल अदालत के आदेश की अवहेलना हुई बल्कि मद्रास हाई कोर्ट के न्यायधीश जस्टिस जी. आर. स्वामीनाथन के खिलाफ महावियोग प्रस्ताव तक लाया गया।

महावियोग की आड़ में एंटी हिंदू ताकतों को प्रोत्साहन देना DMK, कांग्रेस, वामपंथी दलों, इसमें इस्लामिक कट्टरपंथी दलों व संगठनों की पुरानी साजिश रही है। ये महावियोग दर्शाता है कि कैसे हिंदू परंपराओं को कुचलने के लिए संवैधानिक संस्थाओं को भी ताक पर रख दिया गया। हालांकि इतिहास ऐसे अनेक फैसलों से भरा पड़ा है, जहां हिंदुओं के पक्ष फैसले दिए गए। मगर इसके बाद भी हिंदू समुदाय न्याय के इंतजार में हैं।

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