हरीश राणा को इच्छामृत्यु की अनुमति, जानें 14 वैश्विक मामले जहां यूथेनेसिया पर कोर्ट ने दिया रोगी के पक्ष में फैसला

13 सालों से गाजियाबाद के हरीश राणा कोमा के चलते एक ऐसी गहरी नींद में रहे, जो शायद कभी खुलने नहीं वाली। 11 मार्च, 2024 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए उनकी इच्छा मृत्यु को अनुमति दे दी। माता-पिता द्वारा दायर याचिका पर कोर्ट ने डॉक्टर से परामर्श लिया, जहां डॉक्टरों ने हरीश के ठीक न होने की संभावना होने की पुष्ठि की। इसके बाद जस्टिस जेबी पारदीवाला और केबी विश्वनाथन की पीठ ने भावुक होकर नम आंखों से पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी। इसके बाद अरुणा शानबाग का मामला भी सुर्खियों में आ गया है।
क्या है यूथेनेशिया और कितने हैं इसके प्रकार?
यूथेनेसिया (Euthanasia) या इच्छामृत्यु एक ऐसी प्रक्रिया है, जहां असहनीय पीड़ा से गुजर रहे पीड़ित (मरीज) को जानबूझकर असहनीय पीड़ा से मुक्ति दी जाती है। मगर इसमें व्यक्ति की गरिमा को बनाए रखना जरूरी है, इसे आसान शब्दों में “दया मृत्यु” भी कहा जाता है। ये दो प्रकार से होती है-
पैसिव यूथेनेसिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) :- इसमें मरीज के इलाज के लाइफ सपोर्ट, दवाई, फीडिंग ट्यूब और वैंटिलेटर को रोक दिया जाता है ताकि मृत्यु प्राकृतिक हो सके। इसमें एक प्रकार से डॉक्टर इलाज करना बंद कर देते हैं, जिसमें मौत का कारण बीमारी ही रहती है।
एक्टिव यूथेनेशिया (सक्रिय इच्छामृत्यु) :- इसमें मरीज का जीवन खत्म करने के लिए डॉक्टर दवाई, इंजेक्शन आदि का इस्तेमाल करते हैं। ये इसमें मृत्यु प्राकृतिक नहीं होती और अगर कोई जान बूझकर किसी मरीज को दवाई से मारता है तो यह अपराध है। भारत में यह गैर कानूनी है और BNS की धारा के तहत आत्महत्या में मदद माना जाता है।
यहां हम भारत के हरीश राणा, अरुणा शानबाग से लेकर फ्रांस की विंसेट लैम्बर्ट और USA की टेरी शियावो तक, नीचे भारत समेत दुनियाभर में आए ऐसे ही 10 मामलों के बारे में डिटेल में बताने जा रहे हैं। जहां न्यायिक निर्णयो, कानूनी ढांचों के माध्यम से पेसिव यूथेनेसिया यानी गरिमापूर्ण मृत्यु की अनुमति दी गई।
1.अरुणा शानबाग, वो मामला जिसके बाद बढ़े यूथेनेसिया की चर्चाएं
भारत में इच्छामृत्यु हमेशा से ही एक विवादित विषय रहा है। मगर इसे लेकर बड़ी चर्चाएं 2011 में अरुणा शानबाग मामले के बाद ज्यादा शुरू हुईं। दरअसल, गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार अरुणा शानबाग मुंबई के किंग एडवर्ड अस्पताल में नर्स थीं। मगर 1973 में एक सफाईकर्मी द्वारा रेप और गला घोटने की कोशिश के बाद वो गंभीर स्थिति में कोमा में चली गईं। इसके 42 सालों तक वो कोमा में रहीं और 2015 में उनका निधन हो गया। कोमा के दौरान नर्स की दोस्त पिंकी विरानी ने याचिका दायर कर उसे ट्यूब से खाना खिलाने को बंद करने की मांग की ताकि अरुणा को पीड़ा से मुक्ति मिल जाए।
न्यायालय ने अपने फैसले में याचिका खारिज कर कहा कि इतने सालों तक अस्पताल के स्टाफ ने उनकी देखभाल की है और वास्तव में वहीं उनके सच्चे मित्र हैं। ऐसे में फैसला भी उन्हीं का होना चाहिए। इसने इच्छा मृत्यु पर नई बहस शुरू की थी।
यह भी पढ़ें – तरुण खटीक हत्याकांड: इस्लामी कट्टरपंथियों का खौफनाक चेहरा, अब तक क्या-क्या हुआ? शॉकिंग डिटेल्स
2. स्पेन की सर्वोच्च अदालत ने बेटी की इच्छामृत्यु रोकने के लिए पिता की याचिका खारिज कर दी
इसी साल 26 फरवरी, 2026 को स्पेन की संवैधानिक अदालत ने उसके पिता की इच्छा मृत्यु को रोकने की अर्जी को खारिज कर दिया। बता दें कि साल 2022 में लंबे वक्त से दर्द से तड़प रही नोएलिया ने आत्महत्या की कोशिश की, इसके बाद उसके दर्द को देखते हुए साल 2024 में कैटालोनिया की मेडिकल कमेटी ने इच्छामृत्यु को मंजूरी दी थी। अदालत ने आदेश दिया कि इच्छामृत्यु की अनुमति देना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं है। उन्होंने पहले के अधिकार को बरकरार रखा।
3. उरुग्वे ने इच्छमृत्यु को दी कानूनी मान्यता, बना पहला लैटिन अमेरिकी देश
उरुग्वे ने 16 अक्टूबर, 2025 को अपनी सीनेट द्वारा गरिमापूर्ण मृत्यु विधेयक पारित कर करने के बाद इसे कानूनी मान्यता दे दी। इसके तहत गंभीर और लाइलाज बीमारियों से पीड़ित वयस्क व्यक्ति अपनी जिंदगी खत्म करने के लिए चिकित्सकों से सहयता के लिए बात कर सकता है।
31 सीनेटरों में से 20 ने इस कानून के समर्थन में वोट किया था, जिसके बाद यह कानून पारित हो पाया। इसके साथ ही उरुग्वे पहला लेटिन अमेरिकी देश बन गया, जिसने इस तरह के कानून को पास किया है।
4. इजरायली अदालत ने ALS रोगी के लिए इच्छामृत्यु को मंजूरी दी
इजरायल की एक जिला अदालत ने 28 सितंबर, 2025 को माइकल पोडोस्की एएसएल (एमयोट्रोफिक लैटरल स्क्लेरोसिस) रोगी के शिबा मेडिकल सेंटर में वेंटिलेटर सपोर्ट को धीरे-धीरे खत्म कर जीवन समाप्त करने की मंजूरी दी। ये काफी बड़ा फैसला था जिसने दुनियाभर का ध्यान खींचा।
बता दें कि पोडोस्की एक गंभीर बीमारी (एमयोट्रोफिक लैटरल स्क्लेरोसिस) से जूझ रहे थे और काफी लंबे वक्त से लकवाग्रस्त स्थिति में वेंटिलेटर पर थे। अदालत ने हाईलाइट करते हुए कहा कि यह सक्रिय इच्छामृत्यु नहीं बल्कि रोगी के अधिकारों के कानूनों के हिसाब से जीवन रक्षक उपचार में कमी करना है।
यह भी पढ़ें – तरुण खटीक हत्याकांड: इस्लामी कट्टरपंथियों का खौफनाक चेहरा, अब तक क्या-क्या हुआ? शॉकिंग डिटेल्स
5. क्षेत्रीय कानून लागू होने के बाद टस्कनी में चिकित्सकीय सहायता से आत्महत्या का पहला मामला दर्ज किया
11 जून, 2025 को इटली के टस्कनी में पार्किंसंस रोग से पीड़ित 60 वर्षीय लेखक डेनियल पियेरोनी चिकित्सकीय सहायता से आत्महत्या करने वाले पहले व्यक्ति बन गए। फरवरी, 2025 में इससे जुड़े कानून को क्षेत्रीय परिषद द्वारा पारित किया गया था।
बता दें कि पिएरोनी 2008 से इस बीमारी से पीड़ित थे और खाने-पीने में गंभीर समस्याओं का सामना कर रहे थे। वो ज्यादातर समय फीडिंग ट्यूब पर निर्भर थे। यह मामला इटली के क्षेत्रीय कानून के अनुसार चलाया गया, वहीं वहां राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा कानून नही है।
यह भी पढ़ें – तरुण खटीक हत्याकांड: इस्लामी कट्टरपंथियों का खौफनाक चेहरा, अब तक क्या-क्या हुआ? शॉकिंग डिटेल्स
6. फ्रांस की संसद ने इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता देने के पक्ष में मतदान किया
मई, 2025 में फ्रांस में सरकार ने इच्छामृत्यु को लेकर बड़ा कदम उठाया गया है। फ्रांस की नेशनल असेंबली ने गंभीर और लाइलाज बीमारियों से जूझ रहे वयस्कों को इच्छामृत्यु (Euthanasia) की अनुमति देने वाले विधेयक के पक्ष में 305 बनाम 199 वोटों से मंजूरी दी। फ्रांस में वर्तमान में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति है।
प्रस्ताव के अनुसार, असहनीय पीड़ा से गुजर रहे पात्र मरीजों को कड़ी चिकित्सा निगरानी में घातक दवा लेने की अनुमति दी जा सकेगी। हालांकि यह अभी अंतिम कानून नहीं बना है। इसे लागू होने से पहले सीनेट की मंजूरी भी हासिल करनी होगी। सरकार के अनुसार, ये न तो कोई नया अधिकार है और न ही स्वतंत्रता…बल्कि ये सम्मान और गरिमापूर्ण जीवन और निजी चयन के बीच संतुलन है।
7. मानसिक पीड़ा से पीड़ित डच महिला को इच्छामृत्यु की मंजूरी मिली

Zoraya ter Beek, who applied for euthanasia ( Source – theguardian)
16 मई, 2024 को 29 वर्षीय जोराया टेर बीक नामक महिला को नीदरलैंड में इच्छामृत्यु की अनुमति मिली। इसका कारण का उसका लंबे समय से मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित होना। इसमें दीर्घकालिक अवसाद चिंता, आघात और अन्य व्यक्तिगत बीमारियां शामिल हैं।
जोराया को यह मंजूरी वहां के इच्छामृत्यु कानून के तहत 3 साल से अधिक की प्रक्रिया के बाद मिली। बता दें कि नीदरलैंड का यह कानून असहनीय पीड़ा का सामना कर रहे जहां सुधार की संभावना न हो, को मृत्यु की अनुमति दी गई है।
8. लंबी कानूनी लड़ाई के बाद पेरू की महिला ने इच्छामृत्यु का सहारा लिया

एना एस्ट्रादा, पेरु में इच्छामृत्यु पाने वाली पहली महिला (Source – Reuters)
22 अप्रैल, 2024 को पॉलीमायोसिटिस से पीड़ित 47 वर्षीय मनोवैज्ञानिक एना एस्ट्राडा ने इच्छामृत्यु के माध्यम से आखिरी सांस ली। उन्होंने यूथेनेसिया के अधिकार के लिए लंबी लड़ाई लड़ी और संघर्ष किया। वो काफी वक्त से बिस्तर पर जीवन के लिए संघर्ष कर रही थीं।
2022 में पेरू की न्यायपालिका ने उन्हें आपराधिक दायित्व से छूट प्रदान की, इसके बाद डॉक्टरों के उनके जीवन को खत्म करने में सहायता करने की अनुमति मिली। एना अदालत द्वारा अनुमोदित निर्णय के तहत इच्छामृत्यु पाने वाली पहली महिला बन गईं।
9. इक्वाडोर अदालत ने एक गंभीर बीमारी से पीड़ित मरीज के लिए इच्छामृत्यु को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया
7 फरवरी, 2024 में इक्वाडोर में एक ऐतिहासिक फैसले ने इच्छामृत्यु (Euthanasia) को लेकर कानून की दिशा बदल दी है। 42 वर्षीय एमायोट्रोफिक लैटरल स्क्लेरोसिस (ALS) से पीड़ित महिला पाओला रोल्डन की कानूनी चुनौती के बाद देश के संवैधानिक न्यायालय ने इच्छामृत्यु को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यदि कोई मरीज गंभीर और असाध्य बीमारी से जूझ रहा हो और असहनीय पीड़ा के कारण स्वेच्छा से इच्छामृत्यु की मांग करता है, तो उस स्थिति में डॉक्टरों को आपराधिक सजा नहीं दी जाएगी। साथ ही अदालत ने सरकार को निर्देश दिया है कि इस प्रक्रिया को लागू करने के लिए स्पष्ट नियम और दिशानिर्देश भी तैयार किए जाएं।
10. बेल्जियम: आतंकी हमले से बचे व्यक्ति को PTSD से पीड़ित होने के बाद इच्छामृत्यु की मंजूरी दी गई
10 अक्टूबर 2022 को बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स में बम धमाकों शांति डे कोर्टे नामक 17 वर्षीय महिला की जान बच गई थी। उसे पोस्ट ट्रोमेटिक स्ट्रेस डिसोर्डर (PTSD) हो गया। लंबे वक्त बाद डॉक्टरों और मनोचिकित्सक के पैनल ने ये तय किया कि बेल्जियम के इच्छामृत्यु कानून के तहत उनकी बिमारी लाइलाज थी, इससे इस प्रक्रिया को अंजाम देने की अनुमति मिल गई।
यह भी पढ़ें – तरुण खटीक हत्याकांड: इस्लामी कट्टरपंथियों का खौफनाक चेहरा, अब तक क्या-क्या हुआ? शॉकिंग डिटेल्स
11. कोलंबिया की अदालत ने चिकित्सकीय सहायता से मृत्यु को मंजूरी दी
12 मई, 2022 में श्रीलंका के कोलंबिया के संवैधानिक न्यायालय ने गंभीहर या असाध्य बिमारियों से पीड़ित रोगियों के लिये चिकित्सकीय सहायता से मृत्यु को मंजूरी दी। ये उन बिमारियों के लिए था जो तीव्र शारीरिक और मानसिक पीड़ा का कारण बनती हैं।
इस दौरान अदालत ने उल्लेख किया कि अगर रोगी स्वेच्छा से अनुरोध करता है और उसकी स्थिति चिकित्सा मानदंडों के पूरा करती है। ऐसे में रोगियों का जीवन समाप्त करने वाले डॉक्टरों को अपराधी नहीं माना जाएगा।
12. फ्रांसीसी अदालत द्वारा जीवन रक्षक प्रणाली हटाने की अनुमति दिए जाने के बाद विन्सेंट लैम्बर्ट का निधन

विन्सेंट लिम्बर्ट का इच्छा मृत्यु से निधन (Source: https://www.theguardian.com/)
11 जुलाई, 2019 में विन्सेंट लैम्बर्ट ने लंबी कानूनी लड़ाई के बाद डॉक्टरों ने पेसिव यूथेनेशिया के बाद आखिरी सांस ली। 42 वर्षीय विन्सेट 2008 में एक सुड़क एक्सीडेंट के बाद कोमा जैसी स्थिति में थे। उनकी इच्छामृत्यु का मामला लंबे समय तक फ्रांसीसी और यूरोपीय अदालतों में चल इसके बाद डॉक्टरों को कृत्रिम पोषण और जल बंद करने से उनकी मृत्यु हो गई।
13. बेल्जियम में पहली बार किसी नाबालिग को इच्छामृत्यु की अनुमति दी गई

Belgian Government Grants Permission for Euthanasia to a Minor
11 जुलाई, 2019 में 2014 में बेल्जियम सरकार ने अपने इच्छामृत्यु कानून में संशोधन कर एक ऐतिहासिक कदम उठाया, जिसके बाद सख्त शर्तों के तहत किसी भी उम्र के बच्चों को भी डॉक्टर की सहायता से मृत्यु (Euthanasia) की अनुमति दी गई।इसी कानून के तहत एक 17 वर्षीय गंभीर रूप से बीमार किशोर इच्छामृत्यु पाने वाला दुनिया का पहला नाबालिग बना।
कानून के तहत –
1. नाबालिग को एक ऐसी गंभीर चिकित्सा स्थिति में होना चाहिए जिसमें उसे लगातार और असहनीय शारीरिक पीड़ा हो रही हो।
2. उसमें तर्कसंगत निर्णय लेने की क्षमता हो।
3. माता-पिता की सहमति और कई डॉक्टरों से अनुमोदन प्राप्त करना आवश्यक हो।
हरीश राणा से लेकर अरुणा शानबाग और विन्सेंट लिम्बर्ट जैसे मामलों से पता चलता है कि इच्छामृत्यु (Euthanasia) केवल एक चिकित्सा या कानूनी मुद्दा भर नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा, अधिकार और संवेदना से जुड़ा जटिल प्रश्न है। लोगों को जिस प्रकार गरिमा के साथ जीने का अधिकार है उसी प्रकार गंभीर बीमारियों में इच्छामृत्यु जैसे विकल्प होने चाहिए। हरीश राणा को लेकर सुप्रीम कोर्ट का हाल का फैसला आगे भविष्य मे आने वाले मामलों के लिए मील का पत्थर साबित होगा।
यह भी पढ़ें – तरुण खटीक हत्याकांड: इस्लामी कट्टरपंथियों का खौफनाक चेहरा, अब तक क्या-क्या हुआ? शॉकिंग डिटेल्स
यह भी पढ़ें – वर्ल्ड कप जीत के जश्न में हिंसा: हिंदू समर्थकों पर चाकू और लाठी चलीं; जानें 9 घटनाएं जब क्रिकेट जीत के बाद भड़की हिंसा











