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ममता सरकार ने कैसे राष्ट्रीय सुरक्षा को बंधक बनाया? कलकत्ता HC ने सरकार को दिया BSF को भूमि सौंपने का निर्देश 

Editor Ritam HindiEditor Ritam Hindi31 Jan 2026, 04:06 pm IST
ममता सरकार ने कैसे राष्ट्रीय सुरक्षा को बंधक बनाया? कलकत्ता HC ने सरकार को दिया BSF को भूमि सौंपने का निर्देश 
ममता सरकार को कलकत्ता हाईकोर्ट ने लताड़ लगाई है

पश्चिम बंगाल के कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 27 जनवरी, 2026 को ममता सरकार को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने निर्देश दिया कि वे भारत-बांग्लादेश सीमा पर अधिग्रहण की भूमि 31 मार्च 2026 तक सड़क सुरक्षा बल (BSF) को सौंप दें, ताकि वहां कांटेदार तार की बाड़ लगाई जा सके। न्यायमूर्ति सुजॉय पॉल और पार्थ सारथी सेन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ सरकार को ये निर्देश दिए हैं। इसमें इस बात पर जोर दिया गया कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं व चुनाव से जुड़ी गतिविधियों के चलते राष्ट्रीय सुरक्षा के दायित्वों से समझौता नहीं किया जा सकता।

यहां सवाल उठता है कि ममता सरकार सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे को दरकिनार कैसे कर सकती है? जब इतने लंबे वक्त से यह मामला चल रहा है तो सरकार ने बीएसएफ को भूमि क्यों नहीं दी? आखिर कोर्ट की फटकार के बाद ही सोयी हुई सरकार की नींद खुलेगी या इसे भी टालमटोल कर दिया जाएगा।

सरकार और बीएसएफ के बीच विवाद कितना पुराना

दरअसल, भारत और बांग्लादेश 4,096 किलोमीटर जितनी लंबी सीमा रेखा साझा करते हैं। इसमें बंगाल सबसे ज्यादा 2,217 किलोमीटर का बॉर्डर लगता है, जोकि भारत की सबसे ज्यादा छिद्रपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय सीमा है। यहीं से सबसे ज्यादा घुसपैठ और तस्वीर को अंजाम दिया जाता है। पश्चिम बंगाल के 9 जिले बांग्लादेश से सीमा लगते हैं। यह उस देश से सटे सभी भारतीय राज्यों में सबसे अधिक है।

2016 से लेकर अब तक संवेदनशील क्षेत्रों में बाड़ लगाने के लिए कैबिनेट द्वारा बार-बार मंजूरी दिए जाने के बावजूद , इस सीमा का लगभग 26% हिस्सा बिना बाड़ के बना हुआ है, जिससे घुसपैठ, मादक पदार्थों की तस्करी, मवेशियों की तस्करी और नकली मुद्रा के प्रचलन जैसी अवैध सीमा पार गतिविधियों से संबंधित चिंताएं पैदा हो रही हैं।

सीमा को बाड़ लगाकर सुरक्षित करने के प्रयास कब से किए जा रहे?

भारत ने साल 1986 में बाड़ लगाने का कार्य शुरू किया था, जिसके तहत बंगाल समेत बांग्लादेश के साथ बॉर्डर शेयर करने वाले सभी राज्यों की सीमाओं पर बाड़ लगाना था। भारतीय गृह मंत्रालय के अनुसार सभी राज्यों की बांग्लादेशी सीमाओं पर भारत ने 3,141 किलोमीटर तक बाढ़ लगा दी है।

2000 के दशक की शुरुआत मे कई बार प्रयास किए गए लेकिन पश्चिम बंगाल में भूमि अधिग्रहण की बाधाओं के कारण प्रगति रुक ​​गई थी।

साल 2016 से राज्य के 9 जिलों – कूच बिहार, जलपाईगुड़ी, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर, मालदा, मुर्शिदाबाद, नादिया, उत्तर 24 परगना और दक्षिण 24 परगना आदि में लगभग 235 किलोमीटर संवेदनशील भूमि के अधिग्रहण के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय से कई बार कैबिनेट की मंजूरी और केंद्रीय निधि प्राप्त हुई थी।

इन आवंटनों के बावजूद, अब तक बीएसएफ को केवल लगभग 71 किलोमीटर भूमि ही सौंपी गई है, जिससे एक बड़ा भूभाग अभी तक असुरक्षित रह गया है। बता दें कि भारत के 5 राज्य बांग्लादेश के साथ बॉर्डर शेयर करते हैं।

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संविधान में कहां मिलता है उल्लेख?

भूमि अधिग्रहण का मुद्दा संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची II (राज्य सूची) के अनुच्छेद 23 के अंतर्गत आता है, जिससे राज्यों को प्राथमिक जिम्मेदारी मिलती है। हालांकि, जब राष्ट्रीय रक्षा का मुद्दा इसमें शामिल होता है, तो संविधान के अनुच्छेद 256, 257 और 355 के तहत संघ का अधिकार लागू होता है, जो राज्यों को संघ के निर्देशों का पालन करने और बाहरी आक्रमण से सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बाध्य करता है।

केंद्र सरकार की प्रतिक्रियाओं के बाद भी चले डिले

केंद्र सरकार ने अनुपालन का आग्रह करते हुए कई पत्र जारी किए थे, जिनमें 20 जून, 2025 को केंद्रीय गृह सचिव द्वारा पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव को लिखा गया पत्र भी शामिल था। इसके बावजूद, मतदाता सूचियों के चल रहे विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) और आगामी विधानसभा चुनावों के कारण राज्य स्तर पर देरी जारी रही।

गृह मंत्री अमित शाह ने सरकार को घेरा

30 दिसंबर 2025 को केंद्रीय गृह मंत्री ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ममता सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि वो आपकी ही सरकार है जो बाड़ लगाने के लिए बीएसएफ को भूमि नहीं देती है। क्या सीएम बता सकते हैं कि त्रिपुरा, असम, राजस्थान, पंजाब, कश्मीर और गुजरात की सीमाओं पर घुसपैठ क्यों रुक गई है? क्योकि बंगाल में आपकी निगरानी में घुसपैठ को मजबूत और जनसांख्यकीय परिवर्तन लाने में आपकी सरकार बिजी है।

गृह राज्य मंत्री ने प्रस्तुत किए आंकड़े

अगस्त 2025 में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री ने बताया कि पश्चिम बंगाल में भारत-बांग्लादेश सीमा की कुल 2,216.7 किलोमीटर लंबाई में से 1,647.697 किलोमीटर पर बाड़ लगाई जा चुकी है। शेष 569.004 किलोमीटर का हिस्सा अभी लंबित है। इसमें 112.780 किलोमीटर क्षेत्रफल को बाड़ लगाने के लिए अनुपयुक्त माना गया वहीं बाकी बचे एरिया में कार्य किए जा सकते है।

31.019 किमी राज्य मंत्रिमंडल की मंजूरी का इंतजार कर रहा है, 181.635 किमी के लिए भुगतान किया जा चुका है लेकिन उसे सौंपा नहीं गया है, 7.085 किमी राज्य द्वारा मूल्यांकन का इंतजार कर रहा है, और 9.579 किमी गृह मंत्रालय द्वारा भुगतान के लिए लंबित है।

सुब्रता साहा बनाम भारत संघ और अन्य, जिसने दिलाया इस मुद्दे पर ध्यान   

लेफ्टिनेंट जरनल डॉ. सुब्रता साहा बनाम भारत संघ और अन्य के नाम से दायर PIL पश्चिम बंगाल सरकार की सीमा सुरक्षा में लापरवाही को उजागर करने के लिए दायर की गई थी। याचिकाकर्ता साहा ने तर्क दिया कि बिना बाड़ वाली सीमा सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है।

उन्होंने इस बात पर ध्यान दिलाया कि संसदीय अभिलेखों द्वारा समर्थित अवैध गतिविधियां किस प्रकार बढ़ गई हैं, और तस्कर व घुसपैठिए इन खामियों का फायदा उठा रहे हैं। याचिकाकर्ता का तर्क था, ” सीमा पर बाड़ लगाना रक्षा, संप्रभुता और राष्ट्रीय अखंडता का मामला है,” और उन्होंने शीघ्र भूमि अधिग्रहण और बीएसएफ को सौंपने की मांग की।

साहा की याचिका अदालत के जनहित के दायित्व के अनुरूप थी, जिसमें इस बात पर जोर दिया गया था कि केंद्रीय निधि और स्वीकृतियों के बावजूद 2016 से हुई देरी को सुरक्षा के संदर्भ में उचित नहीं ठहराया जा सकता। इसमें आवश्यक 235 किलोमीटर के हिस्से और केवल 71 किलोमीटर के हस्तांतरित हिस्से का उल्लेख था, जो निष्क्रियता के उस पैटर्न को रेखांकित करता है जिसे कैबिनेट के प्रस्ताव हल करने में विफल रहे थे। इस मामले ने सभी का ध्यान खींचा था।

पश्चिम बंगाल बीएसएफ सीमावर्ती मामले में न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला

कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल और न्यायमूर्ति पार्थ सारथी सेन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि अधिग्रहित की गई और जिसके लिए मुआवजा दिया जा चुका है, वह सभी भूमि 31 मार्च, 2026 तक बीएसएफ को सौंप दी जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य सरकार मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) या आगामी राज्य विधानसभा चुनावों जैसी प्रशासनिक प्रक्रियाओं को हस्तांतरण में बाधा के रूप में लंबित नहीं कर सकती है।

मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल और न्यायमूर्ति पार्थ सारथी सेन की खंडपीठ ने इस बात पर जोर दिया कि केंद्र द्वारा पहले से ही अधिग्रहित और वित्त पोषित भूमि को तत्काल हस्तांतरित किया जाना चाहिए। कोर्ट ने सख्ती से कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण का हवाला देते हुए प्रक्रियात्मक बहाने स्वीकार नहीं किए जाएंगे।

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केंद्र वर्सेज राज्य: न्यायालय में प्रस्तुत मुख्य तर्क

केंद्र का तर्क 

केंद्र सरकार ने दलील दी कि भूमि अधिग्रहण पूरा होने के बाद उसे बीएसएफ को सौंपना राज्य का संवैधानिक कर्तव्य है। संविधान के अनुच्छेद 256, 257 और 355 के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा व सीमा रक्षा के मामलों में केंद्र राज्यों को निर्देश देने का अधिकार रखता है।

राज्य सरकार का तर्क 

राज्य सरकार ने अपनी प्रत्यक्ष खरीद नीति (DPP) का बचाव करते हुए कहा कि भूमि अधिग्रहण में RFCTLARR अधिनियम, 2013 की सामान्य प्रक्रिया—अधिसूचना, प्रकाशन, अधिग्रहण, मुआवजा और शिकायत निवारण अनिवार्य है, जबकि धारा 40 केवल वास्तविक आपात स्थितियों में ही अपवाद के रूप में लागू होती है।

अदालत ने राज्य सरकार को लगाई लताड़, दिए सख्त निर्देश

अदालत ने इस मामले में ममता सरकार को लताड़ लगाई और सवाल किया कि “जब राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल है, तो धारा 40 के तहत या अनिवार्य अधिग्रहण के माध्यम से भूमि का अधिग्रहण क्यों नहीं किया जा सकता?”

अदालत ने लक्षित निर्देशों के लिए भूमि को 3 श्रेणियों में विभाजित किया – 

पहले से अधिग्रहित/खरीदी गई और भुगतान की गई भूमि: जिन जमीनों पर कब्जा आंशिक है या रोक दिया गया है, उनके मामले में पीठ ने देरी का कोई औचित्य नहीं पाया और 31 मार्च, 2026 तक बीएसएफ को पूर्ण रूप से सौंपने का आदेश दिया। इसने स्पष्ट रूप से एसआईआर या चुनाव संबंधी कर्तव्यों को बाधा के रूप में खारिज कर दिया।

डीपीपी के तहत शुरू की गई कार्यवाही: राज्य को एक कार्रवाई रिपोर्ट दाखिल करनी होगी और इन प्रक्रियाओं को उसी समय सीमा के भीतर पूरा करना होगा, जिससे आगे कोई देरी न हो।

कोई अधिग्रहण शुरू नहीं किया गया: अदालत ने आपातकालीन उपायों के लिए धारा 40 की प्रयोज्यता की जांच लंबित होने के कारण इसे भविष्य की सुनवाई तक स्थगित कर दिया।

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सुरक्षा के लिहाज से क्यों जरूरी है ये मुद्दा ? 

बता दें कि न्यायालय के निर्देश में राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा प्रबंधन को प्राथमिकता दी गई है और बिना बाड़ वाले सीमावर्ती क्षेत्रों के दुरुपयोग को रोकने के लिए शीघ्र अनुपालन का आग्रह किया गया है।

बाड़ लगाने में देरी को सीमा पार अवैध गतिविधियों में वृद्धि से जोड़ा गया है, जो स्थानीय सीमावर्ती आबादी और सीमा सुरक्षा का दायित्व सौंपे गए राष्ट्रीय रक्षा बलों दोनों के लिए एक संवेदनशील मुद्दा है।

जब बाड़बंदी पूरी हो जाने के बाद, इससे निगरानी मजबूत होने, तस्करी को रोकने और अवैध रूप से सीमा पार करने में कमी आने की उम्मीद है, जिससे सुरक्षा एजेंसियों और स्थानीय समुदायों दोनों को लाभ होगा। इस मामले की अगली सुनवाई 2 अप्रैल, 2026 को होनी है। इसमें संभावना है कि न्यायालय प्रगति की समीक्षा करेगा साथ ही भूमि अधिग्रहण से जुड़े अनसुलझे मुद्दों का समाधान भी करेगा।

निष्कर्ष 

कलकत्ता उच्च न्यायालय का यह निर्देश केवल एक केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा अखंडता से जुड़े मुद्दे पर राज्य सरकार के लंबे असहयोग पर सख्त न्यायिक टिप्पणी है। साल 2016 से बाड़बंदी की मंजूरी, भूमि का वैधानिक अधिग्रहण और मुआवजे के भुगतान के बावजूद BSF को जमीन न सौंपना, देरी कर करना, तस्करी और अवैध घुसपैठ का बढ़ना गंभीर लापरवाही को दर्शाता है। ऐसे में 31 मार्च, 2026 की समयसीमा एक औपचारिक तिथि मात्र नहीं, बल्कि यह पश्चिम बंगाल सरकार की संवैधानिक प्रतिबद्धता और राष्ट्रीय रक्षा के प्रति जवाबदेही को दर्शाता है। ऐसे में सवाल उठना जायज है कि आखिर ममता सरकार ने जानबूझकर राष्ट्रीय सुरक्षा को क्यो खतरे में डाला है? यह तय करेगा कि राज्य सुरक्षा हितों को प्राथमिकता देगा या वर्षों से चली आ रही नीतिगत बाधाओं को आगे भी बनाए रखेगा। यह भी पढ़े : Wikipedia Exposed: लंदन की PR फर्म का ‘नैरेटिव जाल’, जानें भारत में कैसे और कब गढ़ा गया हिंदू विरोधी एजेंडा?

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