Explained – द केरल स्टोरी 2 के बीच केरल का बीफ फेस्ट: लेफ्ट की ‘फ्रीडम ऑफ चॉइस’ या हिंदू भावनाओं पर वार?

सत्य घटनाओं पर अधारित फिल्म केरल स्टोरी 2 की चर्चाओं के बीच गोमांस का मांस एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। लव जिहाद की घटनाओं को लेकर बनी इस फिल्म के एक सीन में एक हिंदू महिला को जबरन गोमांस खिलाते दिखाया गया है। इसे लेकर लेफ्ट संगठन स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) ने 20 फरवरी, 2026 को पूरे राज्य में बीफ फेस्टिवल का आयोजन किया था। जहां SFI के सदस्यों ने गोमांस और परोठा परोसा, साथ ही आरोप भी लगाया कि कामाख्या नारायण सिंह की फिल्म ने बीफ को गलत तरीके से प्रस्तुत किया और सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ावा दिया।
खुद को लिबरल बताने वाले वामपंथी खेमे की इस करतूत ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या धर्म विशेष की आड़ में किसी पर खाने को जबरन थोपा जाना सही है? एक संस्कृति की आड़ में किसी के धार्मिक मूल्यों को आहत करना कितना सही है? यहां सवाल मुद्दे को कानूनी या गैर कानूनी बताकर परोसने का न होकर फ्रीडम ऑफ चॉइस (चुनने की स्वतंत्रता) और जबरन थोपे जाने को लेकर ज्यादा है। ऐसे कई मामले हैं, जहां लॉ एण्ड ऑर्डर की धज्जियां उड़ाकर खुलेआम बीफ को प्रमोट किया गया।
नीचे ऐसे ही कुछ सवाल-जवाब के माध्यम से बीफ के केरल में आने के इतिहास, आस्था को ठेस पहुंचाने और लॉ एंड ऑर्डर को तोड़ने के मामलों के बारें में डिटेल में जानेंगे।
क्या है केरल की संस्कृति पर गोमांस को जबरन थोपे जाने का इतिहास?
वर्तमान में कम्यूनिस्ट सरकार ने केरल में गौमांस की बिक्री और उपभोग को लीगल किया हुआ है। अकादमिक जगत में राजनीतिक कहानी को प्रचारित किया जाता है, जहां बताया गया कि गोमांस केरल की संस्कृति का स्वभाविक रूप से हिस्सा रहा है। मगर पुरातात्विक साक्ष्य कुछ और ही कहानी बताते हैं। केरल में गोहत्या हमेशा से नहीं होती थीं, बल्कि इसकी शुरूआत 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से हुई। टीपू सुल्तान की विस्तावादी नीतियों और धार्मिक रूप में प्रेरित अभियानों ने इस पूरे क्षेत्र की संस्कृति को तहस-नहस कर दिया।
- टीपू सुल्तान ने जबरन गोमांस के सेवन, खतना को इस्लाम में धर्मांतरण के रूप में लागू किया था। इसका उल्लेख ब्रिटिश काल के ऐतिहासिक स्रोतों में मिलता है। (लेखक आभास मालदहियार के शोधपत्रों में परिभाषित)।
- मालाबार में हिंदुओं को इस्लाम में धर्मांतरण साबित करने के लिए गोमांस खाने और खतना करवाने के लिए मजबूर किया गया था। (एशिएटिक रिसर्च, खंड 5 (1799), पृष्ठ 33)
- टीपू सुल्तान के 13 फरवरी 1790 को बुदरुज जुमान खान को पत्र में लिखा गया। (संपादक किर्कपैट्रिक) में संरक्षित- इसमें टीपू सुल्तान ने 135 नायरों का जबरन खतना करने के लिए अधिकारी की प्रशंसा की गई है।
- डुआर्ते बार्बोसा (1516) ने लिखा कि मालाबार के लोग गाय का मांस नहीं खाते। टीपू सुल्तान के बाद ही केरल में गोमांस खाने की प्रथा का प्रसार हुआ।
- केरल में हिंदुओं के गोमांस खाने की संस्कृति 1788 के आसपास समाने आई, जब टीपू सुल्तान ने इस्लाम में कन्वर्जन के लिए गोमांस खाने को अनिवार्य कर दिया था।
- यानी की वर्तमान जो लोग बीफ के सेवन को फ्रीडम ऑफ चॉइस समझकर खा रहे हैं, इतिहास में उन्हीं के पूर्वजों पर उसे जबरन थोपा गया था।
क्या है हिंदू धर्म में गाय का महत्व?
हिंदू धर्म में गाय को अत्यंत पवित्र और सम्माननीय माना जाता है, उसे केवल एक पशु नहीं बल्कि (गौ माता) भी कहा जाता है। गाय का पालन-पोषण, करुणा समृद्धि के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इसका उल्लेख प्राचीन वेदों में भी मिलता है। ऋग्वेद में गाय को “अघन्या” कहा गया है। इसका अर्ध होता है “वध न करने योग्य” या “जिसे किसी भी परिस्थिति में मारा न जाए”। वहीं इसकी हत्या पर कई प्रकार के दंड के प्रावधान थे। हिंदू धर्म में गायों की उपस्थिति को सकारात्मकता के रूप में देखा जाता है।
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किन लीडर्स (स्वतंत्रता सेनानियों) ने गौ रक्षा को लेकर अपनी आवाज उठाई?
देशभर में कई ऐसे महान स्वतंत्रता सेनानी हुए हैं, जिन्होंने गौरक्षा के लिए प्रमुखता से अपनी आवाज उठाई और इसे हिंदू संस्कृति के प्रतीक चिन्ह के रूप में देखा।
महात्मा गांधी- महात्मा गांधी ने गौरक्षा को लेकर प्रमुखता से अपनी बात रखी थी। उनका कहना था कि मुझे भारत के लिए ऐसा स्वराज नहीं चाहिए, जहां गाय को मारा जाए। मेरा सपना (महत्वकांक्षा) है कि गौरक्षा के लिए लिए कानूनों को पूरी दुनिया में बनता देखूं। गौरक्षा हिंदुत्व का दुनिया के लिए सबसे बड़ा उपहार है और हमारे पास सत्ता आएगी तो मैं गोरक्षा के लिए काम करते हुए गोहत्या पर प्रतिबंध लगा दूंगा। उन्होंने यहां तक कहा था कि गाय का कल्याण उन्हें आजादी से भी ज्यादा प्रिय है। हिंदू लोग अपने तिलक, मंत्रोच्चार, तीर्थस्थलों के लिए नहीं बल्कि अपनी गौ पूजा और गौरक्षा के सिंद्धांतों के लिए जाने जाते हैं।
स्वामी दयानंद सरस्वती- आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने गौ रक्षा आंदोलन की शुरुआत की और 1882 में गौ रक्षिणी सभा की स्थापना की थी। उन्होंने कहा कि गौ हत्या से राजा और प्रजा दोनों की हानि होती है। दयानंद सरस्वती ने गो-करुणानिधि पुस्तक में गौ रक्षा के आर्थिक महत्व के पहलू पर विस्तार से लिखा।
बाल गंगाधर तिलक ने भी गौ रक्षा के लिए अपनी आवाज उठाई। उन्होने कहा था कि ‘चाहे मुझे मार डालो, पर गाय पर हाथ न उठाओ।’
पंडित मदन मोहन मालवीय का मानना था कि गौ संरक्षण केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्र और समाज की नैतिक जिम्मेदारी है। वे कहा करते थे कि यदि हम गायों की रक्षा करेंगे, तो गायें भी हमारी रक्षा करेंगी, क्योंकि उनका संरक्षण हमारी संस्कृति, अर्थव्यवस्था और जीवन-मूल्यों से गहराई से जुड़ा हुआ है।
साल 1958 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर गोहत्या पर प्रतिबंध लगाया जाए तो उससे इस्लामिक मजहब को ठेस बिल्कुल नहीं पहुंचनी चाहिए, क्योंकि इस्लाम में गोमांस को खाना अनिवार्य नहीं है। इसके बाद भी ऐसे कई मामले सामने आते रहे हैं, जहां जबरन गौ मांस खिलाया गया।
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भारत का संविधान क्या कहता है गोहत्या के बारे में?
भारत के संविधान का अनुच्छेद 48 यानी राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों को शामिल किया गया। ये अनुच्छेद नस्लों को संरक्षित करने और गायों व बछड़ों (वन्यजीव) के संरक्षण करने के आदेश को देता है। इसका उद्देश्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक रूप से व्यवस्थित करना है। साथ ही प्रतिबंध की सलाह भी देता है।
देशभर में कहां-कहां है गोहत्या पर प्रतिबंध?
देश के 11 राज्यों (हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, महराष्ट्र, छत्तीसगढ़, और दो केन्द्र प्रशासित राज्यों- दिल्ली, चंडीगढ़) में गौ हत्या (बैल, बछड़ा, भैस, बछिया) पर पूरी तरीके से रोक है। 8 राज्यों में गौ हत्या पर आंशिक रूप से प्रतिबंध है। (बिहार, झारखंड, ओडिशा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, गोवा और चार केंद्र शासित राज्यों- दमन और दीव, दादर और नागर हवेली, पांडिचेरी, अंडमान ओर निकोबार द्वीप समूह)। वहीं 10 राज्यों में कोई प्रतिबंध नहीं है, जिसमें केरल, पश्चिम बंगाल, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा आदि।
केरल से जुड़े ऐसे कई मामले हैं, जहां गौ मांस (बीफ) को राजनीतिक रणनीति देकर इसे पहचान, मुखरता और प्राइड के साथ जोड़ने की राजिश रची गई। मगर ये फ्रीडम ऑफ चॉइस से अधिक लॉ एण्ड ऑर्डर का अपमान था।
1. केरल में बैंक कर्मचारियों ने कार्यालय कैंटीन में गोमांस प्रतिबंध के विरोध में प्रदर्शन किया
केरल में अगस्त 2025, में केरल के कोच्चि में एक बैंक की शाखा में रीजनल मैनेजर ने ऑफिस कैंटीन में बीफ बैन कर दिया। इस पर कर्मचारियों ने विरोध के तौर पर ब्रांच के बाहर सड़क (सार्वजनिक रूप से) बीफ और परोठा , पकाया गया। साथ ही इस मामले को व्यक्तिगत स्वतंत्रता की तरफ दर्शाया गया मगर असल में सार्वजनिक रूप से ऐसा करना बाकी लोगों की गरिमा को भी ठेस पहुंचाता है। हमारा संविधान भी यही कहता है कि स्वतंत्रता का अधिकार तब तक ही वैध है, जब तक वो किसी और की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन न करे।
2. एक सामुदायिक समूह ने परोसा गौ मांस, विदेश में छिड़ा विवाद
31 अगस्त, 2021 को केरल समाजम नामक एक सामुदायिक समूह ने जर्मनी के फ्रैंकफर्ट में आयोजित एक भारतीय खाद्य उत्सव में भाग लिया। वे परोठा के साथ गोमांस करी परोस रहे थे। कुछ हिंदू समूहों ने इसका विरोध किया और कहा कि यह भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है। भारतीय वाणिज्य दूतावास ने समूह से इस व्यंजन को परोसना बंद करने का अनुरोध किया। इसके बाद केरल समाजम ने इसे हटा दिया। मगर कुछ लोगों ने इसकी आलोचना की।
यहां यह समझना जरूरी है कि बीफ खाना किसी का निजी चयन हो सकता है मगर सामुदायिक समारोह में ऐसी चीजों को परोसने से परहेज करना चाहिए। क्योंकि ये कुछ लोगों की गरिमा को ठेस भी पहुचा सकता है।
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3. केरल पुलिस प्रशिक्षुओं के मेनू से गोमांस हटाए जाने के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पुलिस स्टेशन के बाहर गोमांस परोसा
18 फरवरी, 2020 को केरल के कोझिकोड में, केपीसीसी के महासचिव एडवोकेट के प्रवीण कुमार के नेतृत्व में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने मुक्कम पुलिस स्टेशन के बाहर बीफ करी और रोटी वितरित की, ताकि उन खबरों का विरोध किया जा सके कि केरल पुलिस प्रशिक्षुओं के मेनू से बीफ हटा दिया गया है।
ये मामला न केवल सरे आम लॉ एण्ड ऑर्डर की धज्जियां उड़ाने वाला था, बल्कि देश की न्यायिक व्यवस्था को खुलेआम चुनौती देने वाला भी था।
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4. मकर संक्रांति पर गोमांस की रेसिपी शेयर करने पर केरल पर्यटन जगत विवादों में घिर गया
17 जनवरी 2020 को केरल के पर्यटन विभाग ने मकर संक्रांति, जो कि एक शुभ हिंदू दिन है, के अवसर पर बीफ उलार्थियाथु की रेसिपी ट्वीट करके विवाद खड़ा कर दिया। पर्यटन मंत्री कडकम्पल्ली सुरेंद्रन ने इस पोस्ट का बचाव करते हुए कहा कि भोजन का कोई धर्म नहीं होता। ये तर्क भी दिया कि लगभग 60% जनसंख्या गोमांस खाती है, जिसमें हिंदू, मुस्लिम और ईसाई शामिल हैं।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि केरल की 40 प्रतिशत जनता गोमांस नहीं खाती, वो भी उसी राज्य का हिस्सा हैं। ऐसे में मंत्री जी को अपनी राजनीति चमकाने के लिए सभी के खानपान और गरिमा का सम्मान करना चाहिए था। सरकार को सभी समूहों की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए।
5. केरल पुलिस अकादमी को आलोचना का सामना करना पड़ा, जब अधिकारियों ने प्रशिक्षुओं के मेनू से गोमांस हटा दिया
16 फरवरी, 2020 को केरल में त्रिशूर में केरल पुलिस अकादमी में उस समय विवाद खड़ा हो गया जब प्रशिक्षुओं के नए मेनू से लोकप्रिय गोमांस हटा दिया गया और उसकी जगह अन्य मांसाहारी व्यंजन शामिल कर दिए गए। अधिकारियों ने साफ कहा कि गोमांस पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है, बल्कि कठोर प्रशिक्षण के दौरान पोषण और कैलोरी जरूरतों को देखते हुए मेनू में बदलाव किया गया है।
हालांकि, प्रतिबंध से इनकार के बावजूद मेनू में गोमांस की गैरमौजूदगी को लेकर लोगों में चिंता और बहस शुरू हो गई।
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6. प्रधानमंत्री के दौरे से पहले युवा कांग्रेस ने कोच्चि में मवेशी व्यापार प्रतिबंध के विरोध में बीफ महोत्सव किया आयोजित
17 जून, 2017 में प्रधानमंत्री के कोच्चि मेट्रो के उद्घाटन के लिए आगमन से ठीक पहले , वाथुरुथी के पास गोमांस उत्सव आयोजित करने के आरोप में हार्बर पुलिस ने 10 युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया। यह उत्सव केंद्र सरकार द्वारा पशु व्यापार पर लगाए गए प्रतिबंध के विरोध में आयोजित किया गया था। ये पूरी तरह से राजनीतिक था, जिसमें हिंदुओं की आस्था को ठेस पहुंचाई और भरोसे का इस्तेमान किया।
7. केंद्र के मवेशी व्यापार-वध प्रतिबंध के विरोध में केरल विधायकों ने विधानसभा में गोमांस खाया
8 जून, 2017 में केरल विधानसभा के तिरुवनंतपुरम में, विधायकों ने केंद्र सरकार द्वारा मवेशियों के व्यापार और वध पर प्रतिबंध लगाने वाली अधिसूचना के खिलाफ प्रस्ताव पारित करने के लिए बुलाए गए विशेष सत्र में भाग लेते हुए कैंटीन को “बीफ फेस्टिवल” में बदल दिया। ये एक राजनीतिक विरोध था मगर इसमें जानबूझकर बीफ का इस्तेमाल किया गया ताकि मामले को सांप्रदायिक रंग देकर सबका ध्यान खींचा जा सके।
8. मवेशी व्यापार प्रतिबंध के विरोध में कोझिकोड में बीफ फेस्टिवल, महिला वकीलों के नेतृत्व में प्रदर्शन
3 जून, 2017 में केरल के कोझिकोड में महिला वकीलों के समूह पुनरजनी ने केंद्र द्वारा लगाये गए मवेशी व्यापार प्रतिबंध के विरोध के तहत गोमांस पर आधारित एक विशिष्ट इफ्तार पार्टी का आयोजना किया।
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9. मवेशियों की वध बिक्री पर केंद्र के प्रतिबंध के बाद केरल में दलों ने गोमांस बांटा
- 27 मई, 2017 को कोच्चि के कोल्लम में केंद्र सरकार द्वारा पर्यावरण मंत्रालय के 2017 के नियमों के तहत वध के लिए मवेशियों की बिक्री पर प्रतिबंध के विरोध में व्यापक स्तर पर गोमांस उत्सव और प्रदर्शन हुए।
- डीवाईएफआई, युवा कांग्रेस और सीपीआई (एम) समर्थित एलडीएफ-यूडीएफ कार्यकर्ताओं ने राज्यभर में गोमांस बांटकर प्रतिबंध का विरोध किया।
- कोच्चि, कोल्लम और थोडुपुझा में गोमांस पकाकर वितरण, प्रतिबंध के खिलाफ विरोध प्रदर्शन
- केरल में एलडीएफ-यूडीएफ कार्यकर्ताओं का विरोध, गोमांस पकाकर लोगों में बांटा गया।
- इसके लिए अन्य पशुओं की जगह केवल गाय को ही टारगेट किया और राजनीतिक तुष्टिकरण किया।
10. सीएमएस कॉलेज में एसएफआई छात्रों ने गोमांस प्रतिबंध के विरोध में ‘बीफ फेस्ट’ आयोजित किया
सीएमएस कॉलेज में तनाव तब बढ़ गया जब एसएफआई के छात्रों ने आदेश के बावजूद परिसर में गोमांस उत्सव आयोजित किया। विरोध के दौरान प्रधानाचार्य के साथ मारपीट हुई और उन पर गोमांस करी उडेल दी गई, जिसके बाद आठ छात्रों को निलंबित कर जांच शुरू कर दी गई। ये न केवल सांप्रदायिक प्रदर्शन था बल्कि किसी व्यक्ति की गरिमा को तोड़ने वाला मामला भी था। यहां ये समझने की जरूरत है कि उनकी भी कोई फ्रीडम ऑफ चॉइस हो सकती है, ऐसे में उन पर जबरन गौ मांस करी फेंकना नफरत की राजनीति है।
क्या है इस विवाद का अंत?
बीफ विवाद को केवल खानपान की स्वतंत्रता बनाम आस्था के द्वंद्व तक सीमित करना वास्तविक मुद्दे को सरल बना देना है। राजनीतिक दलों ने अपने तुष्टिकरण के लिए मुद्दे को चुना और सांप्रादायिक रंग दिया। यहां ध्यान देना जरूरी है कि संविधान प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्रता का अधिकार देता है, परंतु यह अधिकार तभी तक वैध है, जब तक वह सार्वजनिक व्यवस्था, गरिमा और दूसरों की धार्मिक भावनाओं का उल्लंघन न करे।
जब किसी राजनीतिक या वैचारिक प्रदर्शन के माध्यम से भोजन को प्रतीकात्मक टकराव का औजार बनाया जाता है, तो यह कानून-व्यवस्था और साम्प्रदायिक सद्भाव दोनों को प्रभावित करता है। बीफ खाना निजी चुनाव हो सकता है मगर उसकी रील बनाकर डालना या लॉ एण्ड ऑर्डर को ताक पर रखकर इसका भद्दा प्रदर्शन को किसी भी तरीके से न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता।
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