पाकिस्तान में तोड़ी मूर्तियां, ढाहे मंदिर और बिखरी आस्था, जानें विभाजन के जख्मों से जुड़ी पूरी कहानी

भारत का 1947 का विभाजन इतिहास की सबसे दर्दनाक त्रासदियों में से एक था. इस दौरान पाकिस्तान में कई हिंदू मारे गए, कई लोगों को घर छोड़कर पलायन करना पड़ा, औरतों के साथ बालात्कार, जबरन धर्म परिवर्तन, अपहरण और आत्महत्या जैसे कई घटनाएं हुई. केवल इतना ही नहीं, बल्कि सैकड़ों हिंदू मंदिरों को तोड़ दिया गया, उन्हें गोदाम, स्कूल और सरकारी दफ्तरों में बदल दिया गया और कुछ मंदिरों को ताला लगा दिया गया. ज्यादातर रावलपिंडी, हजारा, अटॉक जैसे इलाकों में दंगे फैले थे. वर्तमान में अभी भी पाकिस्तान में कई ऐसे मंदिर हैं जो बंद पड़े हैं.
कहां-कहां तोड़े गए मंदिर?
- मुल्तान के ऐतिहासिक मंदिर: पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में सूरज कुंड रोड पर रेलवे स्टेशन के पास स्थित विशाल भैरों नाथ मंदिर को ऐसा तोड़ा गया, जिससे एक भी ईंट शेष नहीं बची. मंदिर के संगमरमर और अन्य निर्माण सामग्रियां निकाल ली गईं और धराशायी कर दिया गया.
- मॉन्टगोमरी जिले के ओकारा, चिचावतनी, अरिफवाला और पाकपत्तन में 23-29 अगस्त 1947 तक कट्टरपंथी मुस्लिमों ने गुरुद्वारों और मंदिरों जैसे पूजा स्थलों को तोड़ा गया. बाद में इसे अपने उपयोग के लिए कब्जा कर लिया. नूर शाह में बाबा ज्वाला सिंह का मंदिर को भी नष्ट किया गया और सभी मूर्तियों को तोड़ दिया गया.
- विभाजन से पहले सरगोधा जिले के हर गांव में एक मंदिर या गुरुद्वारा की जरूरत थी. खुशाब तहसील में उग्र भीड़ ने हिंदुओं और सिखों के सभी धार्मिक स्थलों को आग लगा दिया. कुछ मंदिरों के पुजारियों की हत्या भी कर दी गई.
- खुशाब से 11 मील दूर कुंड गांव में मंदिर को जलाकर गैर-मुस्लिमों की निर्मम हत्या कर दी गई. निहंग गांव का मंदिर पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया, और कोट भाई खान गांव के मंदिर और गुरुद्वारे को तोड़ दिया गया.
- मुजफ़्फरगढ़ जिले के किंजर गांव का लोकप्रिय गोपाल जी मंदिर भी दंगों के दौरान जला दिया गया.
- पंजाब जिले के हर छोटे-बड़े मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया.
1947 के विभाजन के बाद पाकिस्तान में मंदिरों की स्थिति क्या थी?
- पश्चिमी पंजाब में विभाजन के बाद कई मकान खाली थे, फिर भी मुसलमानों ने मंदिरों और धर्मशालाओं पर निजी उपयोग के लिए कब्जा किया.
- लाहौर में आर्य समाज, सनातन धर्म सभा, दयाल सिंह ट्रस्ट, गंगा राम ट्रस्ट को सामान्य उपयोग में बदल दिया गया.
- साहीवाल में मंदिरों को शौचालय में बदल दिया, मुजफ्फरगढ़ में धार्मिक स्थलों को आवासीय क्वार्टर बना दिया गया.
- सरगोधा में पवित्र मंदिर को शौचालय में बदल दिया, भेरा, भलवाल, खुशाब में मंदिर को रसोईघर बदला गया.
- मुजफ्फरगढ़ के प्रसिद्ध हनुमान मंदिर को गिराकर वहां चूल्हा जलाया गया.
- आर्य समाज मंदिर में स्थित ‘युग शाला’ को बीफ (गौमांस) पकाने के स्थान में बदल दिया गया.
- लच्छू लाल की शिवाला को शौचालय बनाया गया. श्मशान घाट की धर्मशाला को गधों के लिए छाया स्थल बना दिया गया.
- गांव किंजर (मुज़फ्फरगढ़) में स्थित गोपाल जी मंदिर, जिसे दंगों में जला दिया गया था, अब वहाँ रहने वाले शरणार्थियों द्वारा शौचालय के रूप में उपयोग किया जा रहा है.
- विभाजन के समय पाकिस्तान में लगभग 428 हिंदू मंदिर थे. विभाजन के बाद लगभग 400 मंदिरों को स्कूल, सरकारी दफ्तर, रेस्टोरेंट, स्नैक शॉप में बदल दिया गया.
क्या मंदिरों पर हमले को लेकर सरकार ने कोई कदम उठाया?
विभाजन के दौरान जब हिंदु, सिख और जैन समुदाय के लोग जब भारत चले पलायन करने के बाद कई मंदिर, गुरुद्वारे, धर्मशालाएं और व्यक्तिगत संपत्तियां पाकिस्तान में ही रह गई. इन्हीं संपत्तियों की देखरेख के लिए पाकिस्तान सरकार ने इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ईटीपीबी) की स्थापना की. इसका मकसद इन स्थलों की सुरक्षा, देखरेख और मूल धार्मिक उपयोग को बनाए रखना था.
विभाजन के समय में पाकिस्तान सरकार ने विभिन्न क्षेत्रों में मंदिरों में ताले लगा दिए, कब्जा किया गया और ध्वस्त कर दिया गया. ईटीपीबी ने इन मामलों में कोई कार्रवाई नहीं की. यह संस्था धीरे-धीरे कट्टरपंथी ताकतों के हाथ की कठपुतली बन गई, जिसने कई मंदिरों की जमीनों को निजी हाथों में सौंप दिया.
लाहौर, कराची, रावलपिंडी, और हैदराबाद (सिंध) जैसे क्षेत्रों में 1947 में जिन मंदिरों की संपत्तियां ‘ट्रस्ट प्रॉपर्टी’ घोषित की गईं थीं, उन्हें बाद में दुकानों, गोदामों, स्कूलों और सरकारी दफ्तरों में बदल दिया गया. निष्क्रांत ट्रस्ट संपत्ति बोर्ड (ETPB) की फाइलों में आज भी लगभग 400 से अधिक मंदिर ‘गैर-कार्यात्मक’ घोषित हैं. इस संस्था पर आरोप लगे कि यह केवल सिख गुरुद्वारों की देखरेख पर ज्यादा ध्यान दिया. जबकि हिंदू मंदिरों की मरम्मत और पूजा-पाठ की व्यवस्था को जानबूझकर रोका गया.
मंदिरों को लेकर पाकिस्तानी सरकार का क्या था झूठा आश्वासन?
पाकिस्तान बनने के बाद मोहम्मद अली जिन्ना ने संविधान सभा के उद्घाटन के दौरान घोषणा की थी कि “नए बने पाकिस्तान में हर नागरिक को मंदिर, मस्जिद या किसी भी अन्य पूजा स्थल पर जाने की पूर्ण स्वतंत्रता होगी.’’ उन्होंने यह भी कहा, “पाकिस्तान में किसी के साथ धर्म, जाति या संप्रदाय के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा. सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार किया जाएगा.”
लेकिन कुछ ही समय बाद, पाकिस्तान में ‘बंधक सिद्धांत’ अपनाया गया. इसके सिद्धांत के तहत, पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू अल्पसंख्यकों के साथ इसलिए बेहतर व्यवहार किया जाना था ताकि भारत में मुसलमानों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके.
पाकिस्तान के जब ख्वाजा नाजिमुद्दीन की दूसरी सरकार आई तब जिन्ना की बातों का खुला विरोध किया. उन्होंने कहा, “मैं इस विचार से सहमत नहीं हूँ कि धर्म व्यक्ति का निजी मामला है, और न ही इस बात से कि एक इस्लामी राज्य में सभी नागरिकों को जाति, संप्रदाय या आस्था की परवाह किए बिना समान अधिकार मिलने चाहिए.”
विभाजन के बाद मंदिरों को तोड़ना अब भी जारी है?
पाकिस्तान में मंदिरों पर हमले सिर्फ 1947 तक ही सिमित नहीं थे, बल्कि आज भी मंदिरों को तोड़ना जारी है. भारत में बाबरी मस्जिद विध्वंस (1992) के बाद, पाकिस्तान में मंदिरों पर मुसलमानों ने हमला किया था. कराची में 5 मंदिरों पर हमला किया, सिंध प्रांत (जहाँ रहती है पाकिस्तान की 85% हिंदू आबादी) में 25 मंदिरों को जलाया गया. सुक्कुर (सिंध) और क्वेटा में भी मंदिरों पर हमले हुए. हिंदुओं के घरों और दुकानों पर भी हमला किया गया.
लाहौर के जैन मंदिर को 1992 में इस्लामिक भीड़ ने नष्ट कर दिया. इसके बाद सरकार ने “जैन मंदिर चौक” का नाम बदलकर “बाबरी मस्जिद चौक” रख दिया.
26 जनवरी 2014 को पेशावर के झंडा बाजार में मंदिर पर हमला किया, जिसमें मंदिर संरक्षक की हत्या कर दी गई. 15 मार्च 2014 को लरकाना, सिंध में एक हिंदू मंदिर और धर्मशाला पर कट्टरपंथी मुस्लिम भीड़ ने हमला किया. दिसंबर 2020 में करक जिले के खैबर पख्तूनख्वा में एक मंदिर को आग लगा दी.
पाकिस्तान में फिलहाल सिर्फ 22 हिंदू मंदिर बचे हैं, और उनमें से सबसे ज्यादा 11 सिंध क्षेत्र में हैं. सिंघ में 11 मंदिर, पंजाब में 4, खैबर पख्तूनख्वा में 4 और बलोचिस्तान में 3 मंदिर बचे हैं.











