क्या UGC के नए नियम इंदिरा जय सिंह की दिमागी उपज है? SC के बड़े फैसले के बीच समझें कैसे 2025 के मसौदे को बदला गया?

यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (UGC) की तरफ से लाए गए नए नियम (‘Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026) पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। अदालत के अनुसार अगला आदेश आने तक यूजीसी के 2012 के नियम ही प्रभावी होंगे। इस फैसले के बाद पूरे मामले में नया मोड़ आ गया है। इस बीच वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह लगातार चर्चाओं में बनी हुई हैं। दरअसल, उन्होंने यूजीसी के नए नियमों का विरोध करने वाले और वापस लेने की मांग करने वाले सामान्य छात्र समूहों का विरोध किया। इसे लेकर सोशल मीडिया पर दो वीडियो काफी वायरल हो रहे हैं। एक वीडियो 28 जनवरी का है जिसमें जयसिंह कहती नजर आ रही हैं, “अपर कास्ट को प्रोटेक्शन की क्या जरूरत है? वो ही तो हमारे-आपके सिर के ऊपर बैठे हैं…उनके साथ कोई भेदभाव नहीं होता है।”
27 जनवरी को एक्स पर सामने आए एक वीडियो में जयसिंह ने विरोध करने वालों को “उच्च जाति की प्रतिक्रिया” कहकर आपत्ति जताई। यहां यह जानना भी जरूरी है कि इंदिरा जयसिंह वामपंथी विचारधारा की प्रबल समर्थक होने के साथ-साथ इस पूरे मामले से गहराई से जुड़ी हुई अधिवक्ता भी रही हैं। इससे पहले भी वो UAPA और नए अपराधिक कानूनों की आलोचना करने वालों में सबसे आगे रही हैं।
क्या था पूरा मामला?
बता दें कि 13 जनवरी से यूजीसी के नए नियमों के प्रभावी होने की बाद ही इनके खिलाफ देशभर में लोग प्रदर्शन के लिए सड़कों पर उतर आए। इसी बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने (27 जनवरी 2026) को यूजसी के समता मुद्दों को लेकर सरकार का पक्ष सामने रखा और आश्वासन दिया कि कि इनका कोई दुरुपयोग नहीं किया जाएगा। हालांकि इसके बाद भी लोगों की आशंकाएं दूर नहीं हुईं और सवाल बना रहा कि क्या सामान्य वर्ग जाति आधारित भेदभाव का शिकार नहीं हो सकते? उन्हें अघोषित अपराधी मान लिया गया है? हालांकि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से काफी स्पष्टता आई है।
क्यों उठ खड़ा हुआ देशव्यापी विरोध?

Nation Wide Protest on UGC
यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन 2026 को उच्च शिक्षा बढ़ावा देने वाले नियम बताया गया, साथ ही 2025 के मसौदे को ‘सुधार’ बताकर पेश किया गया था, मगर सच्चाई इसके ठीक उलट थी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार 2026 के नियमों के ठीक उलट 2025 के ड्राफ्ट में सुझाए गए नियम शैक्षणिक संस्थानों में भेदभाव को दूर करने के लिए संतुलित नजरिए और व्यवहारिक प्रयासों को बताने वाले थे।
दरअसल, पूरा मामला 2019 में तब शुरू हुआ, जब रोहित बेमुला और पायल ताडवी की माताओं ने अदालत में याचिका दायर की। रोहित बेमुला ने 2016 और पायल ताडवी ने 2019 में जातिगत उत्पीड़न के चलते आत्महत्या की थी। उनके परिवारों ने सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह, एडवोकेट प्रसन्ना एस और दिशा वाडेगर की मदद से याचिकाए दायर कीं, जिसमें शैक्षणिक संस्थानों में भेदभाव विरोधी उपायों को लागू करने की मांग की।
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इन याचिकाओं में साल 2012 के यूजीसी नियमों को पूरी तरह बदलने की मांग नहीं थी। इसके विररीत पहले से चले आ रहे विश्वविद्यालय के नियमों में सख्त परिवर्तन और समानता को बढ़ावा देने वाले नियम लाने का उल्लेख था। इनमें अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों के प्रति होने वाले अत्याचारों से निपटने के लिए “Equal Opportunity Cell” बनाने की मांग थी।
पब्लिक पीआईएल में याचिकाकर्ता ने शैक्षणिक संस्थानों के मूल्यांकन, छात्रावास आवंटन व परिसर में जातिगत भेदभाव और 2012 के ढांचे के क्रियान्वयन में विफलता का आरोप लगाया गया। जनवरी 2025 तक ये मामला निष्क्रिय ही रहा, मगर 2025 के जनवरी में इस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने UGC को फटकार लगाई, आंकड़े मांगे और UGC से नए नियमों का मसौदा बनाने की बात कही।
2025 के मसौदे में कैसे दिखता है समानता का दृष्टिकोण?
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने फरवरी 2025 में उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के लिए सार्वजनिक परामर्श (सलाह) मांगी थी। 2025 के नियम इन्ही पर आधारित थे। इसमें संबंधित पक्षों के लिए संस्थागत स्वायत्तता, निष्पक्षता और उचित प्रक्रिया को बनाए रखने और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने पर केंद्रित थे। उस मसौदे नियम में भेदभाव को अनुसूचित जाति या जनजाति के खिलाफ जाति की पहचान के आधार पर (अनुचित, भिन्न और पक्षपातपूर्ण) रूप में परिभाषित किया था। इन्हें संस्थानों की भौगोलिक स्थिति और माहौल के आधार पर संदर्भ के अनुसार नियम की व्याख्या और प्रयोग करने की छूट दी थी।
UGC के नए 2026 नियमों में इंदिरा जयसिंह की इन 10 सिफारिशें भी शामिल
हालांकि इंदिरा जयसिंह और याचिकाकर्ता समानता वाले 2025 के मसौदा नियमों से संतुष्ट नहीं थे, जिसके बाद जयसिंह ने इसमें अपने 10 प्रमुख बदलाव प्रस्तावित किए। जोकि अब काफी अलोचनात्मक साबित हुए। बता दें कि इनमें से ज्यादातर बदलावों पर ही विवाद गर्माया। अंतिम विनियमों में 2025 के विनियमों में परिलक्षित संतुलित दृष्टिकोण का अभाव था, भाषा अस्पष्ट थी और इसमें जयसिंह की कई सिफारिशें शामिल थीं। जैसे- भेदभाव पर प्रतिबंध लगाने की शक्तियों के साथ (धारा 11), स्पष्ट अलगाव-विरोधी खंड (धारा 7(घ)), ओबीसी/पीडब्ल्यूडी/महिलाओं सहित विविध इक्विटी समिति प्रतिनिधित्व (धारा 5(7)), गोपनीयता और प्रतिशोध-विरोधी सुरक्षा उपाय, संस्थागत प्रमुख के कर्तव्य (धारा 4(3)), अनिवार्य परामर्श (धारा 7(एफ)), और सक्रिय इक्विटी स्क्वाड और एंबेसडर आदि। इनमें से ज्यादातर पॉइन्ट काफी विवादित थे, जिन पर विवाद भड़का। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में सुनवाई करते हुए इन सभी नियमों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है।
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कौन हैं इंदिरा जयसिंह?
इंदिरा जयसिंह वामपंथी विचारधारा पर चलने एक विवादित वरिष्ठ अधिवक्ता हैं। उनका जन्म 3 जून, 1940 को मुंबई में एक हिंदू (सिंधी) परिवार में हुआ था।
उन्होंने बैंगलोर विश्वविद्यालय से कला स्नातक और 1962 में बॉम्बे विश्वविद्यालय से कानून में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। बाद में जयसिंह ने उच्च अध्ययन किया, जिसमें लंदन में इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड लीगल स्टडीज में फैलोशिप और कोलंबिया विश्वविद्यालय में विजिटिंग स्कॉलर की भूमिका शामिल हैं।
हालांकि इन उपलब्धियों के साथ ही इंदिरा जय सिंह का नाम काफी विवादों से जोड़कर देखा जाता है। यूएपीए, नए अपराधिक कानूनों की आलोचना से लेकर रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए वकालत तक, ऐसे अनगिनत मामले हैं जिन्होंने जिन्हें लेकर इंदिरा जयसिंह विवादों में घिरी हैं। अब हाल ही में यूसीसी के नए नियमों को लेकर एक बार फिर सुर्खियों में आ गई है। नीचे इंदिरा जयसिंह से जुड़े ऐसे ही प्रमुख विवादित बयान और मामलों के बारे में बताने जा रहे हैं।
1- इंदिरा जयसिंह ने उमर खालिद समेत दिल्ली दंगों के मामलों में UAPA के इस्तेमाल पर सवाल उठाए
7 जनवरी, 2026 को इंदिरा जयसिंह ने एक लेख में कहा कि शरजील इमाम और उमर खालिद की जमानत नामंजूर करने का मूल कारण यह है कि क्या उनके कृत्य UAPA के तहत अपराध की श्रेणी में आते हैं?
बता दें कि विवाद धारा 15 की अदालत द्वारा की गई व्यापक व्याख्या पर केंद्रित है, जो “आतंकवादी कृत्य” को परिभाषित करती है। इससे यह चिंता पैदा होती है कि आतंकवाद की श्रेणी में न आने वाले कृत्य भी UAPA के दायरे में आ सकते हैं।
इंदिरा जयसिंह ने 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों में UAPA के इस्तेमाल की आलोचना करते हुए इसे भारत की संप्रभुता के लिए खतरे के सबूतों के अभाव में की गई कार्रवाई बताया।
2- इंदिरा जयसिंह ने भारतीय न्याय संहिता की आलोचना करते हुए कहा कि इसमें UAPA शैली के आतंकवाद संबंधी प्रावधान शामिल किए
इंदिरा जयसिंह ने 1 जुलाई, 2024 से प्रभावी भारत के नए आपराधिक कानूनों – विशेष रूप से भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की कड़ी आलोचना की। इसके पीछे उनका तर्क था कि नए कानूनों में पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बिना यूएपीए शैली के आतंकवाद संबंधी प्रावधान शामिल किए गए हैं।
3- गृह मंत्रालय ने CAA विरोधी प्रदर्शनों और इंदिरा जयसिंह जैसे वकीलों को PFI द्वारा फंडिंग के दिए जाने से पर्दा उठाया
(28 जनवरी, 2020) में गृह मंत्रालय ने आरोप लगाया है कि केरल स्थित संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) ने देशभर में नागरिकता संशोधन अधिनियम और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के खिलाफ प्रदर्शनों को वित्त पोषित किया है।
इससे पहले यह खबर आई थी कि 2019 में सीएए विरोधी दंगों की जांच के दौरान ईडी ने पाया था कि जयसिंह को केरल के कोझिकोड स्थित पीएफआई के एक खाते से 4 लाख रुपये मिले थे।
जयसिंह के अलावा, कई अन्य कांग्रेस नेताओं और सुप्रीम कोर्ट के वकील कपिल सिबल को भी कथित तौर पर पीएफआई से 77 लाख रुपये मिले थे। पीएफआई ने इन दावों को भी खारिज करते हुए कहा कि जिन पैसों के हस्तांतरण की बात हो रही है, वे 2017 के हादिया मामले में वकीलों की फीस थी।
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3 इंदिरा जयसिंह ने भारत और संयुक्त राष्ट्र में रोहिंग्या शरणार्थियों के संरक्षण की वकालत की
- 8 मार्च 2018 में इंदिरा जयसिंह ने भारत में UNHRC के संरक्षण में रोहिंग्या शरणार्थियों के अधिकारों की वकालत की, उनके निर्वासन का विरोध किया और उन्हें उत्पीड़न से भागे शरणार्थी बताया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की याचिकाओं का समर्थन किया, हालांकि भारत ने 2017 के बाद सुरक्षा कारणों से कुछ रोहिंग्याओं को निर्वासित किया।
- मई 2017 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने उन्हें रोहिंग्या संकट की जांच के लिए तीन सदस्यीय तथ्य-जांच पैनल में नियुक्त किया, जिसने म्यांमार में कथित हत्याओं, यौन हिंसा और विस्थापन की जांच की।
- जयसिंह ने स्थिति को “नरसंहार का खतरा” बताया। 2018 की रिपोर्ट में जवाबदेही की मांग की गई, लेकिन म्यांमार ने जांच टीम को प्रवेश से रोक दिया।
4 इंदिरा जयसिंह ने ब्राह्मणों को संरक्षण देने के लिए SC/ST अधिनियम को कमजोर करने का आरोप सुप्रीम कोर्ट के जजों पर लगाया

Advocate Indira Jaisingh Tweet Link
23 मार्च 2018 के ट्वीट में इंदिरा जयसिंह ने सुप्रीम कोर्ट के दो “उच्च जाति” के न्यायाधीशों पर आरोप लगाया कि उन्होंने SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम को दलितों की बजाय ब्राह्मणों के संरक्षण के लिए कमजोर किया।
पृष्ठभूमि: इंदिरा जयसिंह का एक ट्वीट 20 मार्च 2018 के सुभाष काशीनाथ महाजन फैसले के बाद आया, जिसमें अधिनियम के दुरुपयोग को रोकने हेतु गिरफ्तारी से पहले प्रारंभिक जांच का प्रावधान किया गया था।
3 अप्रैल 2018 को बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने ट्वीट की निंदा की और न्यायाधीशों के खिलाफ टिप्पणी हटाने की मांग की।
5 इंदिरा जयसिंह के गैर सरकारी संगठन लॉयर्स कलेक्टिव को जॉर्ज सोरोस समर्थित ओपन सोसाइटी फाउंडेशन से फंडिंग मिली
9 जून, 2016 को एक सरकारी खुफिया रिपोर्ट में दावा किया गया कि इंदिरा जयसिंह के गैर सरकारी संगठन लॉयर्स कलेक्टिव को अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस द्वारा संचालित ओपन सोसाइटी फाउंडेशन से 4.1 करोड़ रुपये की धनराशि मिली थी। बाद में इस गैर सरकारी संगठन को सस्पेंड कर दिया गया ।
रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि कुछ विदेशी वित्त पोषित गैर सरकारी संगठन धार्मिक धर्मांतरण, जलवायु सक्रियता और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ी गतिविधियों में शामिल थे, और उन्हें विवादास्पद और “शासन परिवर्तन” की कहानियों से जुड़ा हुआ माना जाता था।
निष्कर्ष
यूजीसी के नए नियमों पर अगली सुनवाई तक सुप्रीम कोर्ट के स्टे ने तस्वीर को काफी हद तक साफ कर दिया है। वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह संबंध विवादों से काफी गहरा रहा है, मगर इस बार विरोध और भी स्पष्ट हुआ। इस बीच यहां सवाल उठता है अगर यूजीसी के 2012 के नियमों में सुधार की मांग की थी तो उन्हें पूरी तरह से क्यों बदल दिया गया? आखिर 2025 के मसौदे के सुझावों को ठुकरा कर इंदिरा जयसिंह ने अपने 10 पॉइंट्स क्यों दिए, जिसे किसी चर्चा के ड्राफ्ट में शामिल कर दिया गया? यहां सवाल यह भी है कि जब यूजीसी के नए नियमों पर चिंताएं सामने आने लगीं और विरोध होने लगा। तब इंदिरा जय सिंह ने इन विरोधों को समान्य वर्ग की जगह “उच्च जाति की प्रतिक्रिया” क्यों बताया? ऐसे कई सवाल हैं, जिनके जबाव मिलने अभी बाकी हैं।
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