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गोविंद बल्लभ पंत जयंती: जमींदारी प्रथा का उन्मूलन व गोवध निवारण अधिनियम…जानिए पंत जी के ऐतिहासिक कार्य!

Editor Ritam HindiEditor Ritam Hindi10 Sept 2025, 10:45 am IST
गोविंद बल्लभ पंत जयंती: जमींदारी प्रथा का उन्मूलन व गोवध निवारण अधिनियम…जानिए पंत जी के ऐतिहासिक कार्य!

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व देश के पूर्व गृह मंत्री पंडित गोविंद बल्लभ पंत का जन्म 30 अगस्त 1887 (अनंत चतुर्दशी के दिन) को अल्मोड़ा उत्तराखंड, के खूंट गांव में हुआ. 1946 में जब वह दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तब अनंत चतुर्दशी 10 सितंबर को पड़ी, तभी से उनका जन्मदिन 10 सितंबर को मनाया जाने लगा. यही कारण है कि उनके बारे में लिखे गए अधिकांश लेखों में उनकी जन्म तिथि 10 सितंबर 1887 लिखी है.

शिक्षा

गोविंद बल्लभ पंत के पिता का नाम मनोरथ पंत था. वह ब्रिटिश सरकार में राजस्व अधिकारी थे. जबकि उनक माता का नाम गोविंदी पंत था जो गृहिणी थीं. जीवन के प्रारंभिक 10 वर्ष में उन्होंने अपने नाना जी के घर पर ही पढ़ाई की. फिर उन्होंने 1885 को रैमजे कॉलेज अल्मोड़ा में प्रवेश लिया, यहां उन्होंने प्राइमरी से 8वीं तक तक पढ़ाई की. इस दौरान उन्हें 8 आने छात्रवृत्ति के तौर पर मिलता था.

1905 में उन्होंने 12वीं की परीक्षा पास की और बीए की पढ़ाई के लिए प्रयागराज ( तब इलाहाबाद) पहुंचे. यहां उन्होंने म्योर सेंट्रल कॉलेज में प्रवेश लिया. 1907 में गणित, राजनीति और अंग्रेजी साहित्य से बीए की परीक्षा पास की. फिर कानून की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद लॉ कॉलेज में प्रवेश लिया. लॉ की परीक्षा में उन्होंने यूनिवर्सिटी टॉप किया. जिस पर उन्हें लम्सडेन स्वर्ण पदक मिला.

व्यक्तिगत जीवन

पंत जी का वैवाहिक जीवन बहुत अच्छा नहीं रहा. उनकी कुल 3 शादियां हुईं. पहली शादी 1899 में गंगा देवी के साथ हुई, उस दौरान वह सिर्फ 12 वर्ष के थे और सातवीं में पढ़ाई कर रहे थे. लेकिन दुर्भाग्य बस 23 वर्ष की आयु में उनकी पहली पत्नी गंगा देवी का निधन हो गया. परिवारिक दबाव के चलते 1912 में पंत जी ने दूसरा विवाह किया. दूसरी पत्नी से उन्हें एक पुत्र भी हुआ, लेकिन कुछ ही दिनों बाद उसकी मौत हो गई. बच्चे की मौत के बाद 1914 में पंत जी की दूसरी पत्नी का भी निधन हो गया.

1916 में गोविंद बल्लभ पंत ने अपने मित्र राजकुमार चौबे के दबाव के चलते काशीपुर निवासी समाजसेवी तारादत्त पांडेय की पुत्री कलादेवी से विवाह किया. तब उनकी उम्र 30 साल थी. इस शादी के बाद उन्हें 1 पुत्र और 2 पुत्रियों की प्राप्ति हुई.

पारिवारिक पृष्ठभूमि

पंत जी की पारिवारिक पृष्ठभूमि काफी समृद्धशील मानी जाती है. वह मूल रूप से महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पंत ब्राह्मण परिवार से आते हैं. पंत जी जयदेव पंत की वंशावली के 17वीं पीढ़ी के सदस्य थे. पंत समाज के लोगों की गिनती प्रतिष्ठित ब्राह्मण समाज के लोगों में होती है. पंत जी के नाना बद्रीदत्त जोशी अल्मोड़ा के प्रसिद्ध व्यक्ति थे. उस जमाने में स्थानीय लोग उन्हें ‘राजा जी’ कहकर संबोधित करते थे.

राजनीतिक पृष्ठभूमि

गोविन्द बल्लभ पंत ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया. वह गांधी जी से काफी प्रभावित थे. वह पहली बार नवंबर 1934 में ‘रुहेलखण्ड-कुमाऊं’ क्षेत्र से केंद्रीय विधान सभा के लिए निर्विरोध चुने गए. 17 जुलाई 1937 को पंत जी संयुक्त प्रान्त (उत्तर प्रदेश) के पहले मुख्यमंत्री बने. यह काल भारतीय इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण था, तक भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत प्रांतीय स्वशासन की शुरुआत हुई थी. फिर वह 1946 से लेकर 27 मई 1954 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने रहे. मुख्यमंत्री के बाद उन्हें 1955 से लेकर 1961 तक देश के गृह मंत्री के रूप में सेवा करने का अवसर मिला.

जमींदारी उन्मूलन अधिनियम बनाया

मुख्यमंत्री रहते हुए पंत जी ने सामाजिक न्याय को सर्वोपरि रखा. उन्होंने जमींदारी प्रथा के उन्मूलन के लिए 21 मई 1952 को जमींदारी उन्मूलन अधिनियम बनाया. जो भूमि सुधार आंदोलन में ऐतिहासिक कदम था. इससे किसानों को भूमि पर अधिकार मिला और सामंती ढांचे का अंत प्रारंभ हुआ. साथ ही उन्होंने नैनीताल जो तराई क्षेत्र था, उसे आबाद करने की योजना बनाई, जिससे लाखों विस्थापितों और बेरोजगारों को रोजगार मिला.

अन्य भूमिका

1916 में गठित कुमाऊं परिषद के वह सदस्य रहे. इस दौरान उन्होंने कुमाऊं वन समस्या को लेकर रिपोर्ट तैयार की. 1916 में ही कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में पहली बार गांधी जी से मिले और कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ग्रहण की. कांग्रेस में रहते हुए उन्होंने 1921, 1930, 1932 और 1934 के आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई. उन्होंने असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई इस दौरान वह करीब 7 वर्ष तक जेल में रहे.

सामाजिक कार्य

गोविंद बल्लभ पंत केवल कुशल अधिवक्ता व राजनेता ही नहीं थे, वह जन-जागरण, सामाजिक सुधार और सांस्कृतिक स्वाभिमान के भी प्रतीक थे. उन्होंने इन क्षेत्रों में भी काफी काम किया. वे समाज के हर वर्ग को जागरूक और आत्मनिर्भर बनाने के लिए निरंतर काम करते रहे.

1910 में अपने मूल स्थान अल्मोड़ा लौटकर पंत जी ने वकालत के माध्यम से समाज की सेवा करने का मार्ग चुना. उन्होंने काशीपुर में प्रेम सभा नाम की एक संस्था का गठन किया. जिसका मुख्य उद्देश्य साहित्य के माध्यम से जनता को सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से शिक्षित और सजग बनाना था. उनके द्वारा निर्मित इस संस्था की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ब्रिटिश संचालित स्कूलों को काशीपुर से अपना बोरी-बिस्तर बांधना पड़ा.

उदयराज हिंदू हाईस्कूल की स्थापना की. यह मात्र एक विद्यालय ही नहीं था, बल्कि ब्रिटिश शिक्षा नीति के विरुद्ध एक वैकल्पिक स्वदेशी मंच भी था. जब फिरंगियों ने स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने पर विद्यालय के विरुद्ध नीलामी की डिक्री पारित की, तो पंत जी ने लोगों से चंदा जुटाकर नीलाम होने से बचाया.

वकालत में पंत जी की एक विशेषता यह थी कि वह केवल उन्हीं लोगों का मुकदमा लेते थे जो उन्हें सत्यता से अवगत कराते थे. पंत जी मात्र विचारों से नहीं, बल्कि वेषभूषा से भी राष्ट्रवादी और धार्मिक थे. वह धोती खादी का कुर्ता पहनते थे. साथ ही वह इतना धार्मिक थे कि रोज भोजन करने से पहले गायत्री मंत्र का पाठ करते थे.

गोवध निवारण अधिनियम बनाने में भूमिका

गोविंद बल्लभ पंत को यूपी में गोवध निवारण अधिनियम बनाने के लिए भी याद किया जाता है. बात 1954 की है. उस समय पंडित गोविंद बल्लभ पंत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. तक गोरक्षा आंदोलन अपने चरम पर था. इसी बात को लेकर पंत जी ने ब्रह्मचारी जी को बुलाया. उनके साथ वीरेन्द्र कुमार चौधरी व रज्जू भैया भी गए.

गोरक्षा की बात शुरू हुई, तो ब्रह्मचारी जी ने मजबूती के साथ पंत जी के सामने अपने विचार रखे. पंत जी ने बातों को गंभीरता से सुना और यूपी में गाय की रक्षा के लिए कानून बनाने की तैयारी शुरू की. किंतु उन्हें दिसंबर 1954 में यूपी के मुख्यमंत्री पद से हटाकर केंद्रीय गृहमंत्री बना दिया गया, लेकिन उनके द्वारा शुरू की गई पहल 1955 सफल हुई. तब यूपी विधानसभा में ‘उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम’ पास हुआ. आज लाखों गोमाताओं की रक्षा उसी कानून के जरिए हो रही है. देश और प्रदेश की सेवा करते हुए पंत जी का देहावसान 7 मार्च 1961 को हुआ था.

पुरस्कार और सम्मान

राष्ट्र और समाज के प्रति पंत जी के समर्पण को देखते हुए 1957 में उन्हें गृह मंत्री रहते हुए भारत के सबसे बड़े सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया था. यह सम्मान उनके व्यक्तित्व को दर्शाता है. इसके अलावा उन्हें लॉ की परीक्षा में यूनिवर्सिटी टॉप करने पर लम्सडेन स्वर्ण पदक मिला था.

रचनाएं एवं कृतियां

पंत जी की रचनाओं में स्वतंत्र नाटक (एकल रचनाएं) में कंजूस की खोपड़ी, राजमुकुट, वरमाला, अंतःपुर का छिद्र, अंगूर की बेटी, सुहाग बिंदी, ययाति. नाटक कंपनियों के लिए लिखे गए नाटकों में जिसमें उन्होंने अभिनय भी किया. वह है अहंकार, प्रेमयोगी, मातृभूमि, द्रौपदी स्वयंवर.

उपन्यास में प्रतिमा, मदारी, तारिका, अमिताभ, नूरजहां, मुक्ति के बंधन, फॉरगेट मी नॉट, मैत्रेय, यामिनी प्रमुख हैं. इसके अलावा एकांकी संग्रह में विषकन्या का नाम शामिल हैं. कहानी संग्रह में एकादशी और प्रदीप उनकी प्रमुख रचनाएं हैं.

परिवार में राजनीति

गोविंद बल्लभ पंत के पुत्र कृष्ण चंद्र पंत (केसी पंत) भी राजनीति में सक्रिय रहे. वह भी अपने पिता की तरह ही राजनीति में करीब 50 वर्षों तक सक्रिय रहे. उन्होंने अपने 26 साल के संसदीय कार्यकाल में देश के रक्षा, वित्त, गृह, शिक्षा व ऊर्जा मंत्री के तौर पर अपनी सेवाएं दीं. वह अटल जी की सरकार में योजना आयोग के उपाध्यक्ष भी रहे. 1931 में जन्मे केसी पंत का निधन 15 नवंबर 2012 को हुआ था. उनकी पत्नी और गोविंद बल्लभ पंत की पुत्रवधू इला पंत भी लोकसभा की सदस्य रह चुकी हैं.