2 सितंबर 2016: तृणमूल कांग्रेस (TMC) का राष्ट्रीय दल बनने का ऐतिहासिक सफर

2 सितंबर 2016 का दिन तृणमूल कांग्रेस (TMC) के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इस दिन चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी को राष्ट्रीय दल का दर्जा दिया। जो उनके लंबे संघर्ष और पश्चिम बंगाल से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक प्रभाव बनाने की राजनीतिक यात्रा का प्रतीक था। आइए जानते हैं टीएमसी का राजनीतिक सफर.
तृणमूल कांग्रेस का जन्म तृणमूल कांग्रेस (TMC) की स्थापना 1 जनवरी, 1998 को हुई थी, जब इसकी संस्थापक ममता बनर्जी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अलग होकर एक नई राह चुनी। उस समय, ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की एक लोकप्रिय और जुझारू नेता के रूप में जानी जाती थीं, लेकिन कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व और राज्य की राजनीतिक नीतियों से उनके मतभेद गहरे होते जा रहे थे। उन्होंने महसूस किया कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस वामपंथी दलों (CPM) के खिलाफ प्रभावी ढंग से संघर्ष नहीं कर पाई। लेकिन कांग्रेस की नीतियों और राज्य नेतृत्व के साथ मतभेद होने के कारण वह अलग हो गईं और अपनी पार्टी का गठन किया – जिसका नाम “तृणमूल कांग्रेस” रखा। “तृणमूल” (यानी, ज़मीन से जुड़ी हुई) रखा गया, जो उनके जमीनी स्तर के संघर्ष और आम लोगों से जुड़ाव को दर्शाता था।
तृणमूल कांग्रेस का राष्ट्रीय दल बनने का सफर वास्तव में एक दिलचस्प राजनीतिक यात्रा है, जो वाम मोर्चा के गढ़ को ढहाने और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने के संघर्ष को दर्शाती है।
पहला संघर्ष: वाम मोर्चा के खिलाफ लड़ाई
पार्टी की शुरुआत एक बड़े संघर्ष से हुई थी। 1998 में, जब ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस का गठन किया, तब पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा (Left Front) का शासन 20 साल से अधिक समय से था। यह एक बेहद मजबूत और संगठित राजनीतिक शक्ति थी। तृणमूल कांग्रेस के लिए, शुरुआत में सब कुछ ज़ीरो से शुरू करना पड़ा। पार्टी के पास न तो कोई बड़ा संगठन था और न ही कोई मजबूत ढांचा। कार्यकर्ता और प्रतीक चिन्ह से लेकर ज़मीनी स्तर पर अपनी पहचान बनाने तक, हर कदम पर संघर्ष था। पार्टी ने लगातार वाम मोर्चा की नीतियों और कथित भ्रष्टाचार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किए, जिससे ममता बनर्जी की छवि एक जुझारू और निडर नेता के रूप में स्थापित हुई।
वाम मोर्चा का पतन और सत्ता पर कब्जा
तृणमूल कांग्रेस की सबसे बड़ी सफलता 2011 में मिली, जब उसने पश्चिम बंगाल में 34 साल पुराने वाम मोर्चा शासन को समाप्त कर दिया। यह भारतीय राजनीतिक इतिहास की एक अभूतपूर्व घटना थी। यह जीत सिर्फ एक चुनाव जीतना नहीं थी, बल्कि एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था को उखाड़ फेंकना था जिसने कई दशकों तक राज्य पर राज किया था। इस ऐतिहासिक जीत के बाद, पार्टी का प्रभाव और कद दोनों बढ़ा।
तृणमूल को राष्ट्रीय दल का दर्जा कैसे मिला? उल्लेखनीय है कि नियमानुसार राष्ट्रीय दल बनने के लिए तीन शर्तों में से कम से कम एक को पूरा करना होता है। लोकसभा में कम से कम 4 राज्यों से 6 प्रतिशत वोट प्राप्त करने होते हैं। या लोकसभा में 3 राज्यों से कम से कम 11 सीटें जीतनी होंगी। या कम से कम 4 राज्यों में ‘राज्य दल’ का दर्जा प्राप्त करना होगा। 2014 के लोकसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल के अलावा मणिपुर, त्रिपुरा, झारखंड और असम में भी तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव लड़ा था। पश्चिम बंगाल में 42 सीटों में से तृणमूल को 34 सीटें मिली थीं। लोकसभा चुनाव में यह तृणमूल कांग्रेस का सबसे अच्छा प्रदर्शन था। इसके बाद 2 सितंबर, 2016 को चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस को राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता दी थी।
उस समय पश्चिम बंगाल के अलावा मणिपुर, त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश में भी तृणमूल को मान्यता प्राप्त दल का दर्जा मिला था। इसलिए, राष्ट्रीय दल का दर्जा प्राप्त करना केवल समय की बात थी। तृणमूल कांग्रेस को मिलाकर वर्तमान में देश में राष्ट्रीय दलों की संख्या सात हो गई। इस सूची के बाकी दल हैं कांग्रेस, भाजपा, बसपा, सीपीआई, सीपीएम और एनसीपी। राजनीतिक गलियारों का मानना है कि राष्ट्रीय दल का दर्जा प्राप्त करने वाले दल को कई फायदे मिलते हैं। पहला, कोई भी राष्ट्रीय दल का चिन्ह देश के किसी अन्य हिस्से में कोई अन्य दल उपयोग नहीं कर पाएगा। दूसरा, दलीय कार्यालय बनाने के लिए सरकार से जमीन या घर मिलता है राष्ट्रीय दलों को। तीसरा, चुनाव के समय राष्ट्रीय दल अधिकतम 40 स्टार प्रचारकों को प्रचार कार्य में ला सकता है, जबकि अन्य दलों के मामले में यह सीमा 20 होती है।
तृणमूल को राष्ट्रीय दल का दर्जा क्यों गंवाना पड़ा? संक्षेप में, 2014 के लोकसभा चुनावों में बंगाल के अलावा त्रिपुरा, अरुणाचल और मणिपुर में तृणमूल को 6 प्रतिशत से अधिक वोट मिले थे। उल्लेखनीय है कि राज्य दल का दर्जा पाने के लिए संबंधित राज्य से 6 प्रतिशत सीटें और कम से कम दो विधानसभा सीटों पर जीतना होता है। चार राज्यों में ‘राज्य दल’ का दर्जा मिलने पर ही राष्ट्रीय दल बना जा सकता है।
लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों में वे यह शर्त पूरी नहीं कर पाए। उस साल अरुणाचल के विधानसभा चुनावों में भी वे किसी भी सीट पर जीतने में विफल रहे। इसके बाद 2022 में मणिपुर और इस साल त्रिपुरा में भी क्षेत्रीय दल बनने की शर्त पूरी करने का अवसर उन्होंने खो दिया। त्रिपुरा में कुल वोटों के हिसाब से तृणमूल नोटा से भी पीछे थी। परिणामस्वरूप, 2023 में ‘चुनावी परिणामों के आधार पर प्रतीक आवंटन संबंधी नियमावली’ के आधार पर तृणमूल का राष्ट्रीय दल का दर्जा छीन लिया गया था।
तृणमूल के राष्ट्रीय दल का दर्जा रद्द करने की मांग शुभेंदु ने की उल्लेखनीय है कि त्रिपुरा चुनाव के बाद ही बंगाल के विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने चुनाव आयोग से तृणमूल के राष्ट्रीय दल के दर्जे को रद्द करने की मांग की थी। उस समय उन्होंने ट्वीट कर बताया था, “त्रिपुरा चुनाव में तृणमूल ने राष्ट्रीय दल का दर्जा पाने के मानदंड पूरे नहीं किए, इसलिए मैंने यह मुद्दा उठाया था।” गौरतलब है कि 2023 में मेघालय के विधानसभा चुनावों में लगभग 13.8 प्रतिशत वोट हासिल कर 5 विधानसभा सीटों पर तृणमूल ने जीत हासिल की थी। परिणामस्वरूप, बंगाल के साथ-साथ पूर्वोत्तर के उस राज्य में भी वे ‘राज्य दल’ के रूप में जोड़ाफूल प्रतीक का उपयोग करने के हकदार थे।
तृणमूल का आरोप राष्ट्रीय दल का दर्जा रद्द होने के बाद तृणमूल के एक सूत्र का आरोप था कि नियमों के अनुसार 2024 तक, यानी लगातार दो लोकसभा चुनावों तक, उनका दर्जा बरकरार रहना चाहिए था। इसके बाद भी अगर शर्तें पूरी नहीं होतीं, तो आयोग चाहें तो अगले विधानसभा चुनावों तक इंतजार कर सकता था। 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद के विधानसभा चुनावों में भी यदि वांछित शर्तें पूरी नहीं होतीं, तभी मान्यता छीनी जा सकती थी। लेकिन इस मामले में आयोग ने ‘अति सक्रियता’ दिखाई है। हालांकि, अक्टूबर 2023 में इसे फिर से बहाल कर दिया गया।
निष्कर्ष
2 सितंबर 2016 तृणमूल कांग्रेस के लिए सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि बंगाल की क्षेत्रीय राजनीति से राष्ट्रीय मंच तक के सफर की पहचान है। ममता बनर्जी के नेतृत्व और पार्टी के दृढ़ संगठन ने यह साबित किया कि मजबूत जनसमर्थन और स्पष्ट राजनीतिक दृष्टि से एक क्षेत्रीय दल भी देश की राजनीति में अपनी जगह बना सकता है। राष्ट्रीय दल का दर्जा मिलने का अनुभव पार्टी को नई जिम्मेदारियों और अवसरों से जोड़ता है, जो भविष्य में भारतीय राजनीति में इसकी भूमिका को और मजबूत करेगा।











