केंद्रीय योजनाओं से क्यों बंगाल की ममता सरकार कर रही है जनता को वंचित, चौंकाने वाला है डेटा, समझें

शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार…ये तीनों वो मूलभूत चीजें हैं, जिनकी मांग जनता अपनी सरकार से करती है। मगर बंगाल में ये आम बुनियादी सुविधाएं भी तुष्टिकरण की राजनीति की भेंट चढ़ रही हैं। 7 मार्च, 2026 को रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने जानकारी देते हुए कहा कि बंगाल में कई रेलवे परियोजनाएं (अवसंरचना) भूमि अधिग्रहण की धीमी गति और राज्य के सीमित समर्थन के चलते लगातार डिले हो रही हैं।
केंद्रीय मंत्री ने बीजेपी की परिवर्तन यात्रा के दौरान बताया कि बंगाल में टीएमसी सरकार केंद्र को कोई समर्थन नहीं दे रही हैं। इस वजह से अभी तक केवल 27 प्रतिशत भूमि का ही अधिग्रहण हो पाया है। ये बात तो हम जानते हैं कि राज्य और केंद्र में अलग सरकार हो तो आपसी मतभेद होते रहते हैं, मगर इसका नुकसान जनता को भगतना पड़े तो वो बिल्कुल ठीक नहीं होगा। दरअसल बंगाल की तस्वीर कुछ ऐसी ही है, जहां आम जनता बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के पर्सनल ईगो की भेंट चढ़ रही है। बच्चे हो बड़े या बूढ़ें, या फिर महिलाएं, हर कोई इस राजनीतिक टुष्टिकरण की चपेट में आता जा रहा है।
केंद्र सरकार क्यों बनाती है योजनाएं?
बता दें कि केंद्र सरकार पूरे देश के लिए विभिन्न प्रकार की योजनाएं बनाती है। इन्हें मुख्य तौर पर आर्थिक रूप से वंचित वर्ग के कल्याण को केंद्र में रखकर बनाया जाता है। इन योजानाओं का मुख्य उद्देश्य आर्थिक कल्याण, समानता को बढ़ाना देना, शिक्षा और रोजगार जैसी सुविधाओं को पूरा करना होता है। इन योजनाओं में सभी वर्गों के राज्यों की जनता के हितों को ख्याल भी रखा जाता है। इन योजनाओं को स्टेट जनता ले लिए अपने राज्यों में लागू करते हैं। मगर जब राजनीति बीच में आती है तो जनता के हितों को ताक पर रखकर फैसले लिए जाते हैं। बंगाल की जनता भी ऐसे ही राजनीतिक तुष्टिकरण की मार झेल रही है।
नीति आयोग की मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी 2023 की रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम बंगाल में गरीबी की स्थिती गंभीर है। रिपोर्ट के अनुसार वहां रहने वाले लगभग 9 करोड़ लोगों में से 11 प्रतिशत लोग अभी भी मल्टीडायमेंशनल गरीबी का शिकार हैं। इसका सीधा मतलब है कि उन्हें समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए जन कल्याणकारी योजनाओं की जरूरत है।

NITI Ayog Multidimentional Poverty Report 2023 (Source – Niti Ayog)
केंद्र सरकार की वो योजनाएं जो बंगाल में आंशिक या पूर्ण रूप से लागू नहीं हैं
- आयुष्मान भारत योजना बंगाल में लागू नहीं है जबकि इसके अलावा पूरे देश में लागू है।
- वन नेशन वन राशन कार्ड – पश्चिम बंगाल में नहीं (सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद लागू)
- पीएम श्री योजना (शिक्षा की दिशा में अभूतपूर्व कदम – पश्चिम बंगाल में लागू नहीं
- प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना (डीबीटी) – कुछ स्तर तक ही सीमित
- पश्चिम बंगाल में प्राकृतिक खेती मिशन भी लागू नहीं
- जल जीवन मिशन (केवल 55 प्रतिशत जनता तक ही जल की उपलब्धता है) ये राज्य सबसे निचले पायदान पर है।
- पीएम सूर्यघर योजना (सोलर रूफ टॉप इन्सटॉल्ड 1100 घरों में ही है।)
- प्रधानमंत्री मत्स्य योजना (PMMSY) – सीमित स्तर पर लागू नहीं
- VB-G Ram G (MANREGA) – पूरी तरह से बंद नहीं – 2022 में फंड रोका गया, भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण
- NEP (New Education Policy) – पश्चिम बंगाल ने अपने लिए नई शिक्षा नीति बनाई है।
प्रस्तावों को देर से प्रस्तुत करना और समन्वय की कमी के चलते केंद्र की योजनाओं से बंगाल की जनता वंचित है। इसने राज्य में अवसंरचना, कल्याण और आर्थिक विकास परियोजनाओं के लिए आवंटित केंद्रीय निधि के उपयोग को धीमा कर दिया।
नीचे 2025 और 2026 के बीच पश्चिम बंगाल में केंद्रीय पहलों में देरी या उनके कार्यान्वयन न होने से संबंधित मुख्य घटनाओं के बारे में पूरी जानकारी दी जारी है-
1- पश्चिम बंगाल ने आयुष्मान भारत स्वास्थ्य योजना लागू नहीं की
2 दिसंबर, 2025 को केंद्र सरकार द्वारा भारत भर के अस्पतालों में लागू आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM JAY) पश्चिम बंगाल में लागू नहीं की गई। इसके माध्यम से गरीब परिवारों को मुफ्त स्वास्थ्य बीमा और कैशलेस पेमेंट भुगतान से हेल्थ बेनीफिट मिलते हैं। साथ ही सरकारी और प्राइवेट अस्पताल में 10 लाख तक का हेल्थ ट्रीटमेंट मुफ्त हैं। वहीं बंगाल में लागू न हो पाने का अर्थ है कि वहां के श्रमिक, गरीब समेत सभी पात्र निवासी इस योजना की सेवाओं से अभी भी वंचित हैं।
बता दें कि आयुष्मान भारत 32,000 से ज्यादा नेटवर्क वाले अस्पतालों में प्रवासी श्रमिकों को मुफ्त इलाज की सुविधा देता है।
2- बंगाल में 2 वर्षों तक प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना को लागू नहीं किया गया
2 दिसंबर, 2025 – प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) को पश्चिम बंगाल सरकार ने दो वर्षों तक लागू नहीं किया। यह योजना सतत मत्स्य पालन विकास को बढ़ावा और मछली पालकों की आय में सुधार लाने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। इस योजना में देरी का प्रमुख कारण समय पर प्रस्तावों को अनुमोदित न करना था, जिससे परियोजना के क्रियान्यवयन में देरी हुई।
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3- पश्चिम बंगाल ने भारत-बांग्लादेश सीमा बाड़बंदी परियोजनाओं के लिए पर्याप्त समर्थन प्रदान नहीं किया
सीमा सुरक्षा को मजबूत करने के उद्देश्य से शुरू की गई भारत-बांग्लादेश सीमा बाड़बंदी परियोजना में पश्चिम बंगाल की भूमि अधिग्रहण की रफ्तार कछुए जैसी है। राज्य सरकार से समय पर सपोर्ट न मिलने के चलते लगातार इस परियोजना में देरी हुई है। ये मामला अदालत में भी चल रहा है और कोर्ट ने राज्य सरकार को फटकार लगाई है।
कारण बताया गया कि आवश्यक भूमि का हस्तांतरण न होने के चलते सीमा के कई हिस्सों में समय पर बाड़बंदी नहीं हो सकी।
4- पश्चिम बंगाल में MGNREGA (VB G Ram G) और PMAY-G के कार्यान्वयन में अनियमितताओं के कारण निधि का निलंबन
4 अगस्त, 2025 को केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण एवं ग्रामीण विकास मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने जानकारी दी “केंद्र सरकार ने पश्चिम बंगाल के विकास के लिए 1.10 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि दी है।” ये आवंटन MGNREGA (VB G Ram G), PMAY-G और कौशल विकास कार्यक्रमों सहित विभिन्न ग्रामीण विकास कार्यक्रमों के लिए हुआ।
2019 से 2022 के बीच जांच में बंगाल में इन योजनाओं के क्रियान्वयन में कई प्रकार की अनियमितताएं पाई गईं। इसमें धन का दुरुपयोग, परियोजनाओं का विभाजन और अपात्र लाभार्थियों का चयन शामिल है। इसके चलते धारा 27 के तहत निधि को निलंबित कर दिया गया।
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5. पश्चिम बंगाल ने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना को लागू नहीं
साल 2015 में केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित योजना बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ (BBBP) योजना लेकर आई थी, जिसका उद्देश्य जन्म आधारित लिंग चयन को रोकना, लिंग अनुपात में सुधार लाना और लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देना था। ये योजना पश्चिम बंगाल में कभी ठीक से लागू नहीं हो पाई। 2017 में बंगाल ही ऐसा राज्य था जहां यो योजना लागू नहीं थी। इसकी जगह राज्य सरकार ने कन्यश्री जैसी योजना लाई।
‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ योजना से देशभर की बच्चियों के जीवन में सुधार आए मगर बंगाल में ये योजना ममता सरकार के ईगो की भेंट चढ़ गई।
6- पश्चिम बंगाल ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से बाहर निकलने का विकल्प चुना
14 मार्च, 2023 – किसानों को फसल हानि से सुरक्षा प्रदान करने लिए साल 2016 में शुरू की गई प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को कई राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू किया गया।
हालांकि पश्चिम बंगाल ने जोखिमों की आशंका को देखते हुए वित्तीय कारणों का हवाला देते हुए इसे शुरूआत में कुछ मौसमों तक ही लागू किया। बाद में सरकार ने बाहर होने का विकल्प चुना, हालांकि इसमें फसलों के लिए स्वेच्छिक रूप से शामिल होने का भी विकल्प था।
7- गरीब कल्याण रोजगार अभियान पश्चिम बंगाल में लागू नहीं किया गया
बता दें कि कोविड-19 महामारी के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में लौटे प्रवासी श्रमिकों को रोजगार के अवसर प्रदान करने के लिए भारत सरकार ने गरीब कल्याण रोजगार अभियान को लागू किया। हालांकि ऐसी आपदा के समय में भी कुछ सरकारों ने तुष्टिकरण को आगे रखा, पश्चिम बंगाल भी उन्हीं में से एक था।
पश्चिम बंगाल में इस योजना को लागू नहीं किया गया वहीं इस लेकर आवश्यक जानकारी भी लोगों तक नहीं पहुंच पाई, जिस वजह से बड़े पैमाने पर लोगो को सहायता से वंचित रहना पड़ा और इस कार्यक्रम का विस्तार राज्य में नहीं हो सका।
निष्कर्ष
आसान शब्दों में कहें तो पश्चिम बंगाल में केंद्र और राज्य के टकराव का सबसे बड़ा नुकसान आम जनता को उठाना पड़ रहा है। स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी कई योजनाएं या तो पूरी तरह लागू नहीं हैं या विवादों में उलझकर धीमी पड़ गई हैं। नतीजा यह है कि जिन योजनाओं का उद्देश्य गरीब और जरूरतमंदों को मुख्यधारा में लाना था, वही लोग लाभ से वंचित रह जाते हैं। तुष्टिकरण की राजनीति की भेंट आम जनता चढ़ रही है। यदि राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर समन्वय किया जाए, तो यही योजनाएं राज्य के विकास की दिशा बदल सकती हैं और करोड़ों लोगों के जीवन में वास्तविक सुधार ला सकती हैं।
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