Menu

तिब्बती संस्कृति पर ‘चीनीकरण’ का शिकंजा: समझें कैसे नए जातीय एकता कानून से चीन में खत्म हो जाएगी अल्पसंख्यक पहचान?

Editor Ritam HindiEditor Ritam Hindi26 Mar 2026, 05:44 pm IST
तिब्बती संस्कृति पर ‘चीनीकरण’ का शिकंजा: समझें कैसे नए जातीय एकता कानून से चीन में खत्म हो जाएगी अल्पसंख्यक पहचान?

12 मार्च 2026 में चीन की शी जिंनपिंग की सरकार ने तिब्बती संस्कृति को तहस-नहस करने के लिए जातीय एकता नाम से एक नया कानून पारित किया है। सीधे तौर पर यह कानून तिब्बतियों पर चीनी भाषा, संस्कृति और राज्य द्वारा परिभाषित मानदंडों को अपनाने का दबाव डालते हैं। आसान शब्दों में कहें तो इसके बाद तिब्बत के लोगों के पास दो ही विकल्प बचेंगे- अपनी संस्कृति को भुला कर चीनी बन जाओ या फिर क्रिमिनल।

क्या है चीन का नया जातीय एकता कानून?

चीनी सरकार ने “Promotion of Ethnic Unity and Progress in the People’s Republic of China” नाम से कानून पारित किया है। कागजों पर इसका मुख्य उद्देश्य शिक्षा और आवास के माध्यम से आधिकारिक तौर पर मान्यता प्राप्त 56 जातीय समूहों के बीच एकीकरण को बढ़ावा देना है। वहीं आलोचकों ने इसे तिब्बती लोगों को उनकी संस्कृति, भाषा, कल्चरों से अलग करने वाला बताया। यह कानून 1 जुलाई, 2026 से प्रभावी होगा।

इसके मुख्य प्रावधान के तहत शिक्षा के प्री-किंडरगार्डन से लेकर हाई स्कूलों तक मंदारिन भाषा को सीखना अनिवार्य है। इससे पहले छात्र अपनी मातृभाषा तिब्बती, उइघुर और मंगोलियाई जैसी मातृभाषा पढ़ाई कर सकते थे।

इसके अलावा सार्वजनिक स्थलों पर अल्पसंख्यक भाषाओं का इस्तेमाल होता है, तो इसकी जगह वहां भी मंदारिन को प्रमुखता देनी होगी। स्थानीय लोगों को डर है कि यह कानून तिब्बती भाषा और संस्कति को कमजोर करने के लिए लाया गया है। चीनी अधिकारियों के अनुसार मंदारिन को बढ़ावा देने आर्थिक और सामाजिक भागीदारी के लिए जरूरी है।

कानून का प्रमुख हिस्सा पुरानी प्रथाओं को बदलने और अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देने पर केंद्रित है। जिससे तिब्बतियों और अन्य जातीय लोगों को हान चीनी लोगों से विवाह कर उनकी पत्नियों और बच्चों को चीनी बनाना है।

इस कानून के विवादित अनुच्छेद कौन से हैं?

इस कानून का अनुच्छेद 2 शी जिनपिंग, माओंत्से डेंग, शायओपिंग जैसे नेताओं के विचारों को आम जनता और मुख्य रूप से तिब्बती लोगों पर थोपता है। साथ ही चीनी झंडे फहराने, चीनी प्रतीकों को हर जगह प्रदर्शित करने के लिए बाध्य करता है।

नए कानून के अनुच्छेद 5 के अनुसार पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की सभी नागरिकों को कानून के समक्ष सामान बताया है। साथ ही किसी भी जातीय समूह के खिलाफ उत्पीड़न निषिद्ध है। हालांकि असली तस्वीर पूरी अलग है, जहां पीड़ित लोगों को कार्यस्थलों, स्कूल, होटल में कमरा बुक करते हुए भेदभाव का सामना करना पड़ता है।

इस कानून के अनुच्छेद 15 के तहत तिब्बत के लोगों को राष्ट्र की आम भाषा (मंदारिन) व लिपि के उपयोग को पूरी तरह अनिवार्य बना दिया है। साथ ही राष्ट्र की भाषा के उपयोग में किसी संगठन या व्यक्ति द्वारा बाधा नहीं डाली जाएगी। ये लोगों को अपनी मातृभाषा त्याग कर एक लिपि को पढ़ने के लिए बाध्य करता है।

अनुच्छेद 20 तिब्बती  माता-पिता में अपने बच्चों में चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी, मातृभूमि, जनता और चीनी लोगों के प्रति प्रेम उत्पन्न करने वाले विचारों पर जोर देता है। यह तिब्बती बच्चों को उनकी भाषा, धर्म, संस्कृति सीखने पर भी रोक लगाता है। जोकि उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

कानून के अनुच्छेद 46 के तहत तिब्बती मठों को बौद्ध धर्म को चीनी रूप में ढालने के लिए काम करना है साथ ही भिक्षुओं को देशभक्ति के नाम पर चीनी नेताओं के साम्यवादी विचार सिखाए जाएंगे। इन लोगों को अपने जातीय, धार्मिक और सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देना होगा।

कानून के अनुच्छेद 60 में सामाजिक समूहों, व्यवसायों, संस्थानों, संगठनों को चेतावनी दी गई है कि वो नए कानून को कमजोर करने वाला कोई भी कार्य न करें। साथ ही इस तरह की गतिविधियां करने वालों को दंडित करने की बात भी की गई है।

क्यो हो रही है आलोचना ?  

तिब्बत की सांस्कृतिक रीति रिवाज (Source -TV9)

साल 2012 में पावर में आने के बाद राष्ट्रपति शी जिमपिंग ने सीसीपी के अंतर्गत चीनीकरण (Cinisiation) की पॉलिसी को बूस्ट करने के लिए कई दमनकारी नीतियों को लागू किया है। चीनी की जनसंख्या 140 करोड़ (1.4 अरब) के बीच है, इसमें से 90 प्रतिशत से ज्यादा हान चीनी लोग हैं। वहीं अन्य लोग तिब्बती , उईघुर, मंगोलियाई लोगों की आबादी है। ऐसे में इस नये कानून से सरकार बची हुई आबादी का भी चीनीकरण (Sinicisation) करना चाहती है। चीन के इस नए कानून की अंतरराष्ट्रीय समुदाय, शिक्षाविदों और मानवाधकार संगठनों द्वारा आलोचना की गई है।

आलोचकों का कहना है कि इन स्थानों पर लोगों पर जानबूझकर चीनीकरण की नीति को थोपा जा रहा है। यह राज्य प्रेरित नीति है, जिसके अनुसार नेता शी जिंनपिंग के शासनकाल को गति मिली है। उन्होंने बड़े पैमाने पर अल्पसंख्यक जातीय समूहों वाले क्षेत्रों में कड़ा रुख अपनाया है।

मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यह कानून अदालतों में अधिक मामलों को सुलझाने नहीं बल्कि सरकार की एक सोच को तय करने के लिए लाया जा रहा है।

तिब्बत एक्शन इंस्टीट्यूट (TAI) ने इस कानून के पारित होने पर कड़ी निंदा व्यक्त की है। उनके अनुसार तिब्बत में यह सब पहले से लागू है और कानून उसे औरचारिक रूप देता है। ये तिब्बती भाषा, समाज, संस्कृति और परंपराओं के लिए अस्तित्व का संकठ उत्पन्न कर दिया है।

तिब्बत का धर्म और संस्कृति (Source – Himalayan Wander Walkers

हालांकि ये पहली बार नहीं है, जब चीन ने तिब्बत के लोगों की अस्मिता को मिटाने के लिए समय–समय पर कई ऐसे विवादित कदम उठाए हैं। चीन ने शिक्षा, भाषा, धर्म और सामाजिक संरचना को लक्षित करते हुए कानूनों और नीतियों की एक विस्तृत श्रृंखला लागू की है, जिससे तिब्बती समाज पर नियंत्रण की एक व्यापक प्रणाली का निर्माण हुआ है।

नीचे चीनीकरण के लिए चीनी सरकार द्वारा लाई गई दमनकारी नीतियों के बारे में बता रहे हैं-

1. चीन ने अल्पसंख्यक समूहों की पहचान मिटाने के लिए जातीय एकता कानून लागू किया

चीन ने एक ऐसी नीति की रूपरेखा प्रस्तुत की है, जिसके तहत एकीकृत राष्ट्रीय पहचान को बढ़ावा देना अनिवार्य है। (Assimilation Policy Framework) के तहत चीनी संस्कृति, भाषा और सामाजिक प्रथाओं को अपनाने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

इस कानूनों के तहत तिब्बती पहचान की गुंजाइश कम हो जाती है। यह चीनीकरण की संस्कृति को मानने के लिए बाध्य करता है।

2. चीन ने मंदारिन भाषा के प्रभुत्व को कानूनी बना रही हैं, ताकि अल्पसंख्यक भाषाएं कमजोर हो जाए

4 मार्च, 2026 को चीन ने तिब्बती समेत कई क्षेत्रों में मंदारिन को प्राथमिक भाषा के रूप में स्थापित करने लिए कानूनी ढांचे का प्रस्ताव लाया गया। ये कानून तिब्बती जैसे अल्पसंख्यक भाषाओं को वैकल्पिक दर्जा देता है। साथ ही जीवन से धीरे-धीरे हटा देता है। इसका उद्देश्य राष्ट्रीयकरण की आड़ में अल्पसंख्यकों की संस्कृति को हटाना है।

3. मानवाधिकार संवाददाता की रिपोर्ट में चीनी सरकार तिब्बत में अत्यधिक दमनकारी नीतियां जारी

4 फरवरी, 2026 में ह्यूमन राइट्स वॉच की एक रिपोर्ट में हाईलाइट किया गया कि चीनी अधिकारी तिब्बत में सख्त और दमनकारी नीतियां लगा रहा है। इससे वहां की अभिव्यक्ति, धर्म और संगठन की स्वतंत्रता सिकुड़ रही है।

रिपोर्ट में तिब्बती शिक्षकों को गिरफ्तार करने, तिब्बती भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देने वाले स्कूलों को बंद करने और चीनीकरण की नीतियों को लाने का उल्लेख किया गया है।

4. चीन ने कॉलेज प्रवेश परीक्षा के मुख्य विषयों से तिब्बती भाषा को हटाया

8 अगस्त, 2025 में चीनी अधिकारियों ने घोषणा की है कि तिब्बत में अधिकांश छात्रों के लिए राष्ट्रीय महाविद्यालय प्रवेश परीक्षा (गाओकाओ) में तिब्बती भाषा अब एक मुख्य विषय नहीं रहेगी। इसमें मंदारिन, गणित और विदेशी भाषाओं को लागू किया गया है। वहीं तिब्बती भाषा के विषय को हटा दिया गया है।

यह भी पढ़ें – दलाई लामा को ग्रैमी, CCP को बेचैनी! 5 सवालों से समझें क्या चीनीकरण को चुनौती दे पाएगी दलाई लामा की बढ़ती वैश्विक पहचान?

5. चीन के बोर्डिंग स्कूलों पर तिब्बती बच्चों पर धार्मिक मत थोपने का आरोप

29 जून, 2025 तिब्बती बच्चों (4 साल से ऊपर) को सरकारी बोर्डिंग स्कूलों में रखा जाता है, जहां वे अपने परिवारों से दूर रहते हैं और ज्यादातर पढ़ाई मंदारिन भाषा में होती है। यह सरकारी सोच को थोपने वाली शिक्षा व्यवस्था है, जो तिब्बती भाषा के इस्तेमाल को कम करती है।

साथ ही प्रार्थना करना, बौद्ध प्रतीक पहनने पर भी रोक है। बच्चों को (CCP) कम्यूनिस्ट पार्टी के प्रति वफादार रहना सिखाया जाता है।

6. चीनी अधिकारियों ने तिब्बती  संस्कृति को बढ़ावा देने वाले स्कूलों को बंद कर दिया

5 फरवरी, 2025 को चीनी अधिकारियों ने पूर्वी तिब्बत में तिब्बती भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देने वाले निजी और मान्यता प्राप्त स्कूलों पर ताला लगा दिया। ये एक्शन उन शैक्षिक संस्थानों पर किया गया, जो आधुनिक शिक्षा को तिब्बती संस्कृति से जोड़ते थे। इसके साथ ही कई धार्मिक और शैक्षिक टीचर्स को भी गिरफ्तार किया गया। ये कार्रवाइयां स्वतंत्र तिब्बती शैक्षिक पहलों को सीमित करती हैं, साथ ही भाषाई संरक्षण को कम करती हैं।

7. चीन ने राज्य नीतियों के तहत तिब्बती ग्रामीणों के जबरन विस्थापन में तेजी लाई

21 मई, 2024 से चीनी अधिकार राज्य निर्देशित कार्यक्रमों के तहत तिब्बती ग्रामीणों और चरवाहों को ग्रामीण क्षेत्रों से निकालकर शहरी बस्तियों में बसाया जा रहा है। हालांकि इसका उद्देश्य स्वेच्छिक और विकास को बताया जा रहा है। मगर सबूत जबरदस्ती के दबाव और वास्तविक सहमति का अभाव बता रहे हैं।

कई जगहों पर पूरे-पूरे गांवों को विस्थापित कर दिया गया है। इससे पशुपालन और खेती जैसी आजीविकाएं प्रभावित हुई हैं। यह नीति भूमि उपयोग और बस्तियों के स्वरूप राज्य का नियंत्रण लागू करती हैं।

8. चीन ने तिब्बत में नियंत्रण कड़ा करते हुए नए साइबर सुरक्षा नियम लागू किए

चीनी अधिकारियों ने 1 फरवरी, 2023 को तिब्बत में नए साइबर सुरक्षा नियम लागू किए हैं। इसमें अलगाववाद या सार्वजनिक व्यवस्था जे जुड़ी ऑनलाइन गतिविधियों में शामिल होने पर कठोर दंड का प्रावधान हैं। इन नियमों से डिजिटल संचार पर निगरानी बढ़ी हैं। इसने तिब्बती यों के ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है। ये नियम सरकारी प्रतिबंधों को मजबूत करते हैं।

9. तिब्बत लौटने के बाद तिब्बती यों को भेदभाव और अधिकारों से वंचित होना पड़ रहा

साल 2023 में चीनी अधिकारी विदेश से लौट रहे तिब्बतियों को पारिवारिक पंजीकरण (हुकोऊ) देने में मना कर रहे है। इस वजह से लोगों को वर्षों तक अपनी ही भूमि के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। दस्तावेजों के बिना लोगों को हुकोऊ , रोजगार और यात्रा जैसी मूलभूत दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

इस प्रणाली से पता चलता है कि कई लौटने वालों को ब्लैकलिस्ट कर दिया है। साथ ही उनका पंजीकरण रद्द कर दिया है। वो लोग जिन्हें धार्मिक उद्देश्यों से यात्रा की थी, उनके साथ भी ऐसा ही व्यवहार हुआ।

10. चीनी अधिकारियों ने तिब्बती बौद्ध पुनर्जन्मों पर अपना नियंत्रण और मजबूत किया

15 दिसंबर, 2021 से चीनी अधिकारियों ने बौद्ध भिक्षुओं/नेताओं के पुनर्जन्म को मान्यता देने वाले नियमों को बदलना शुरू कर दिया। कानून के अनुसार पुनर्जन्म को सरकारी अधिकारयों द्वारा अनुमोदित किया जाना चाहिए। इसके लिए सरकार द्वारा निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन होना चाहिए।

अधिकारी भिक्षुओं और स्थानीय अधिकारियों पर इन नियमों का समर्थन करने और राजनीतिक निष्ठा प्रदर्शित करने के लिए दबाव डाल रहे हैं। ये उपाय धार्मिक नेतृत्व के चयन पर राज्य का नियंत्रण बढ़ाते हैं।

11. चीन ने तिब्बती भिक्षुओं और भिक्षुणियों पर राजनीतिक निष्ठा की शर्तें लगाईं

चीन की “चीनीकरण” नीति के तहत तिब्बती भिक्षुओं और भिक्षुणियों को कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति निष्ठा दिखानी, वैचारिक प्रशिक्षण लेना और सरकारी नीतियों का प्रचार करना अनिवार्य किया गया है। “चार मानक” नीति के जरिए धार्मिक संस्थानों पर नियंत्रण बढ़ाकर बौद्ध परंपराओं को सरकारी विचारधारा के अनुरूप ढाला जा रहा है।

यह भी पढ़ें – दलाई लामा को ग्रैमी, CCP को बेचैनी! 5 सवालों से समझें क्या चीनीकरण को चुनौती दे पाएगी दलाई लामा की बढ़ती वैश्विक पहचान?

Related News