बचपन की हुंकार से कांपे थे फिरंगी: क्रांतिकारी महावीर सिंह के शरीर पर पत्थर बांध अंग्रेजों ने समुद्र में जिंदा दफनाया!

‘महावीर सिंह राठौर’ उत्तर प्रदेश में जन्मा एक ऐसा क्रांतिकारी जिसने बचपन में ही अंग्रेजी सरकार की नींव हिला दी थी. महावीर सिंह से अंग्रेज सरकार इतना डर गई थी, कि उनके शरीर पर पत्थर बांधकर जिंदा ही समुद्र में फेंक दिया था. महावीर सिंह जब मात्र कक्षा 6 में पढ़ते थे, तभी अंग्रेज अफसरों के सामने महात्मा गांधी के समर्थन में नारे लगाए थे. उनके वंदे मातरम् और भारत माता की जय के नारों की गूंज सुनकर ब्रिटिश सरकार ने उन्हें विद्रोही घोषित कर गिरफ्तार कर लिया. यह घटना महावीर सिंह की देशभक्ति का संकेत थी. इस दंड से उनका उत्साह और दृढ़ हो गया.
क्रांतिकारी महावीर सिंह राठौर का जन्म 16 सितंबर 1904 को राठौर गांव, जिला एटा (पूर्व कासगंज) में हुआ था.उनके पिता का नाम कुंवर देवी सिंह राठौर (जमींदार परिवार से) और माता का नाम शारदा देवी था. महावीर सिंह राठौर बचपन से ही तेजस्वी, साहसी और नेतृत्व गुणों से युक्त थे. बाल्यकालीन प्रेरणा स्रोतों में आचार्य रामचंद्र नेहरू (DAV कॉलेज निदेशक) और आर्य समाज के प्रचारक शामिल थे. आर्य समाज से जुड़ाव ने उन्हें जाति से ऊपर उठकर देश प्रेम की सीख दी.उनके परिवार की सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति गहरी आस्था थी और वे दासता से मुक्ति के आंदोलन में भी सक्रिय रूप से लगे रहे.
महावीर सिंह की चाची खेतल कुंवर का बचपन से ही उन पर गहरा प्रभाव था. खेतल कुंवर ने ही महावीर सिंह को प्रारंभिक वर्षों में देशभक्ति के विचार दिए. महावीर सिंह चाहते थे कि उनकी बहन भी आंदोलन से जुड़ें.
क्रांतिकारी विचारों से प्रेरित होकर महावीर सिंह ने कानपुर में नौजवानों की टोली बनाई और जनजागरण अभियान चलाया. वे प्रभातफेरी निकालते, अंग्रेजों के विरुद्ध नारे लगाते और राजनीतिक साहित्य का वितरण करते थे. इस सक्रियता के चलते वे कानपुर और आसपास के इलाकों में प्रसिद्ध हो गए. वे नवजवान भारत सभा के सक्रिय सदस्य रहे, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव आदि के करीबी रहे.
अंग्रेजों के सामने लगाए राष्ट्र भक्ति के नारे
वर्ष 1922 का एक वाकया है, एक दिन अंग्रेज अधिकारियों ने अपनी राजभक्ति प्रदर्शित करने के उद्देश्य से कासगंज में अमन सभा का आयोजन किया. जिसमें ज़िलाधीश, पुलिस कप्तान, आस-पास प्रतिष्ठित लोग जमा हुए. छोटे-छोटे बच्चों को भी जबरदस्ती सभा में बैठाया गया. जिनमें से एक महावीर सिंह भी थे. लोग बारी-बारी उठकर अंग्रेजी हुक़ूमत की तारीफ़ में लंबे-लंबे भाषण दे ही रहे थे कि तभी बच्चों के बीच से किसी ने जोर से से नारा लगाया–महात्मा गांधी की जय, वंदे मातरम्. बाकी लड़कों ने भी समवेत स्वर में ऊंचे कंठ से इसका समर्थन किया और पूरा वातावरण इस नारे से गूंज उठा.
- महावीर सिंह ने ब्रिटिश प्रशासकों की सभा में ‘वन्दे मातरम्’ और ‘महात्मा गांधी की जय’ के नारे लगाए, जिससे उनके साहस की पहचान हुई. इस पर उन्हें गिरफ्तार कर 10 कोड़े मारे गए. परंतु इससे उनका राष्ट्रीय संकल्प नहीं टूटा. शिक्षा पूरी करके जब वे कानपुर आए, देशभर में महात्मा गांधी का असहयोग आंदोलन चल रहा था,महावीर सिंह भी इसके साथ जुड़ गए.
- महावीर सिंह ने नवजवान भारत सभा की सदस्यता ली, जो उस समय क्रांतिकारी युवाओं का प्रमुख संगठन था. उन्होंने कानपुर के नवजवान समूह का नेतृत्व किया, जिसने आसपास के गांवों तक आजादी का संदेश पहुंचाया. नौजवान सभा में शामिल होकर महावीर सिंह की नेतृत्व क्षमता और संगठन शक्ति विदित हुई, वे बाकि क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणास्रोत बन गए.
- कानपुर में महावीर सिंह का संपर्क चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों से हुआ. उन्होंने सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की सदस्यता ली और काकोरी कांड, विधानसभा बमकांड सहित अनेक अभियानों में भाग लिया. इसी काल में उनका भगत सिंह से परिचय हुआ और उन्होंने भगत सिंह के साथ क्रांतिकारी योजनाओं में सहयोग दिया.
- महावीर सिंह ने भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त और दुर्गावती देवी को लाहौर की मौज़ांग जेल से सुरक्षित निकलवाया. पुलिस को चकमा देकर उन्होंने अपने क्रांतिकारी साथियों को बिना रोकटोक लाहौर से बाहर भेज दिया. इस मामले की सुनवाई लाहौर में हुई, जिसमें महावीर सिंह को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई.
- 1929 के लाहौर षड्यंत्र मामले में महावीर सिंह को भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव और बटुकेश्वर दत्त के साथ अभियुक्त बनाया गया. उन्हें पंजाब और तमिलनाडु की जेलों में रखा गया, जहां ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा कड़ी यातनाएं दी जाती थीं. अंततः 1933 में महावीर सिंह को अंडमान स्थित सेल्युलर जेल (काला पानी) भेज दिया गया. यह जेल राजनीतिक कैदियों के लिए अत्यंत क्रूर माना जाता था. जहां कैदियों को निर्भय मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना दी जाती थी.
- महावीर सिंह राठौड़ ने जेल के अंदर भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव और अन्य क्रांतिकारियों के साथ 40 दिनों तक जेल में भूख हड़ताल की. बाद में उन्हें उनके कुछ साथियों के साथ काला पानी की सजा काटने के लिए अंडमान और निकोबार के पोर्ट ब्लेयर स्थित सेलुलर जेल भेज दिया गया.
- जेल प्रशासन ने भूख हड़ताल तोड़ने के लिए महावीर सिंह को भयानक यातनाएं दीं. जेल में कैदियों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार के विरोध में उन्होंने 1933 में फिर से भूख हड़ताल की. 12 मई 1935 को सभी राजनीतिक कैदियों ने अपनी मांगों को लेकर जेल में अनशन किया. इस आंदोलन में उनके साथ मोहित मोइत्रा, मोहन किशोर नामदास सहित 30 अन्य क्रांतिकारियों ने भी भाग लिया.
- अनशन के छठे दिन से जेल अधिकारियों ने जबरदस्ती खाना खिलाना शुरू कर दिया. आधे घंटे की जद्दोजहद के बाद 10-12 लोग मिलकर महावीर सिंह को ज़मीन पर लिटाने में कामयाब हो गए, जिसके बाद डॉक्टर ने अपना एक घुटना उनकी छाती पर रखा और नाक के अंदर नली डाल दी. उन्होंने यह नहीं देखा कि नली महावीर सिंह के पेट की बजाय उनके फेफड़ों में चली गई थी. 1 लीटर दूध उनके फेफड़ों में चला गया, 17 मई 1933 को इन अत्याचारों के कारण महावीर सिंह की मृत्यु हो गई. उनकी जिंदा देह को ब्रिटिश अधिकारियों ने पत्थरों से बांधकर समुद्र में फेंक दिया.
- महावीर सिंह राठौर के पिता देवी सिंह ने एक बार कहा था, “देश के लिए आपकी लड़ाई साबित करती है कि आपने दिल से गुलामी स्वीकार नहीं की है. अब जब आप आज़ादी की राह पर हैं, तो पीछे मुड़कर न देखें और अपने साथियों के साथ कभी विश्वासघात न करें.
- आज़ादी के बाद, अंडमान और निकोबार के पोर्ट ब्लेयर स्थित सेलुलर जेल परिसर में महावीर सिंह राठौर की एक प्रतिमा स्थापित की गई. सेलुलर जेल में महावीर सिंह पर हुए अत्याचारों को चित्र में देखा जा सकता है.
- कानपुर के ‘प्रताप’ समाचार पत्र के माध्यम से महावीर सिंह ने क्रांतिकारी संदेश फैलाए. प्रताप उस समय क्रांतिकारी विचारों का प्रमुख प्रकाशक था और चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह जैसे नायकों से जुड़ा था. इसके सहयोग से महावीर सिंह क्रांतिकारियों के संदेशों को गांव-गांव तक पहुंचाते थे.
- महावीर सिंह की शिक्षा-पुस्तक और स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित दस्तावेजों में भी चर्चा होती है. इतिहास की बहु-खंडात्मक कृतियों में उनके योगदान का उल्लेख मिलता है, जैसे भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों की सूची और सरकारी प्रकाशन. नए अकादमिक लेखों में भी उनके बलिदान को उजागर किया गया है.
- उनके नाम पर संचालित कुछ शोध और पुस्तकें में उन्हें वीरतापूर्ण नायक बताया गया है. उन पर प्रकाशित “अमर बलिदानियों” एवं “क्रांतिकारियों का इतिहास” जैसे ग्रंथों में महावीर सिंह का उल्लेख मिलता है. उदाहरण स्वरूप, नई पीढ़ी को प्रेरित करने के लिए तैयार विषयों में उनका जीवन संक्षेप से शामिल कि या गया है.
- महावीर सिंह के कपड़ों में उनके पिता का एक पत्र भी मिला था,जो उन्होंने महावीर सिंह के अंडमान से लिखे एक पत्र के उत्तर में लिखा था. इसमें लिखा था कि– उस टापू पर सरकार ने देशभर के जगमगाते हीरे चुन-चुनकर जमा किए हैं. मुझे खुशी है कि तुम्हें उन हीरों के बीच रहने का मौका मिल रहा है. उनके बीच रहकर तुम और चमको, मेरा तथा देश का नाम अधिक रोशन करो, यही मेरा आशीर्वाद है.
- महावीर सिंह ने अधिकारों के लिए जीवन-पर्यंत लड़ने का संकल्प लिया था; उन्होंने अपने विचारों पर कभी समझौता नहीं किया. पिता देवी सिंह ने उनके बलिदान के समय कहा था,तुम्हारा देश के लिए संघर्ष यह प्रमाण है कि तुमने दिल से गुलामी स्वीकार नहीं की है. अब जो शहीद होने वाले हो, पीछे मत देखना और साथियों को कभी धोखा मत देना.
- महावीर सिंह भतीजे यतीन्द्र सिंह राठौर के अनुसार, महावीर सिंह के परिवार ने देश को उनका तिजोरी (चाबियाँ) भेंट की और मान्यता की मांग कभी नहीं की. यतीन्द्र बताते हैं कि महावीर सिंह के दबे हुऐ साहस को परिवार ने बड़े गर्व से संभाला, जिसका एक प्रमाण वह भगत सिंह का तिजोरी है, जिसे बाद में राष्ट्र को समर्पित किया गया.















