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जनरल थिमैया की राष्ट्रनिष्ठा और नेहरू का अहंकार : जब एक अपमान बन गया ‘राष्ट्रीय शर्म’ का विषय

Editor Ritam HindiEditor Ritam Hindi30 Mar 2026, 08:00 am IST
जनरल थिमैया की राष्ट्रनिष्ठा और नेहरू का अहंकार : जब एक अपमान बन गया ‘राष्ट्रीय शर्म’ का विषय

भारत के इतिहास का एक ऐसा युद्ध नायक, जिसने दूसरे विश्व युद्ध में दुश्मनों को धूल चटाई और 1948 में पाकिस्तान को हराया, लेकिन उसे अपने ही देश के रक्षामंत्री और प्रधानमंत्री द्वारा अपमान और षड्यंत्र का सामना करना पड़ा। वह थे जनरल कोडांडेरा सुबैया थिमैया, जो 1957 से 1961 तक भारतीय सेना के चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ रहे। उन्होंने नेहरू को तब आगाह किया, जब देश में ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का खोखला नारा गूंज रहा था, जबकि सीमा पर चीन विस्तारवाद की चालाकियां चल रहा था।

जनरल थिमैया ने चीन की इस नीति को पहले ही भांप लिया था। लेकिन नेहरू और रक्षामंत्री वीके कृष्णा मेनन ने उनकी चेतावनियों को न केवल ठुकराया, बल्कि उन्हें अपमानित कर सेनाध्यक्ष पद के इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया। यह सच्ची कहानी है ‘एक वीर की राष्ट्रनिष्ठा और दो लोगों के अहंकार के बीच हुई टक्कर की’ जिसके चलते हमें चीन के हाथों बडा भू-भाग गंवाना पड़ा।

रक्षामंत्री कृष्ण मेनन, पूर्व पीएम नेहरू, रक्षा राज्यमंत्री मजीठिया और जनरल के एस थिमैया, (बाएं से दाएं)  इमेज सोर्स- swarajyamag

इस घटनाक्रम की शुरुआत हुई, 1957 से, जब जनरल कोडांडेरा सुबैया थिमैया भारतीय सेना प्रमुख बने। उस दौर में चीन की साम्राज्यवादी नीति अपने चरम पर थी। 1950 के दशक में चीन भारत के पड़ोसी देश तिब्बत पर अपना कब्जा जमा चुका था, अब उसकी नजर भारत पर थी। जिसे भांपते हुए जनरल थिमैया ने प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को खतरे से अवगत कराया और सेना को मजबूत करने की बात कही। लेकिन नेहरू ने कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया। उलटा, उन्होंने रक्षामंत्री मेनन की सलाह पर सेना का बजट घटाकर मात्र 305 करोड़ रुपए कर दिया, जो चीन के साम्राज्यवादी खतरे के आगे मजाक था।

1959-60 का वह मोड़ आया, जब चीन ने अक्साई चिन पर कब्जा जमा लिया और मैकमोहन लाइन को ठुकरा दिया। थिमैया ने उत्तर-पूर्वी सीमा पर संकट को महसूस किया। उन्होंने ‘लाल किला’ में सेना के अभ्यास का आयोजन किया, जो लेफ्टिनेंट जनरल एसपीपी थोराट के नेतृत्व में 17 मार्च 1960 तक चला। यह युद्ध का अभ्यास, सच्चाई का आईना बन गया। सेना ने हथियार, गोला-बारूद और साजो-सामान की भयानक कमी महसूस की। जिसके बाद सेना प्रमुख थिमैया ने इसकी रिपोर्ट रक्षामंत्री मेनन को सौंपी और अधिक सैनिक भर्ती, आधुनिक हथियार और सीमावर्ती विकास की मांग की। लेकिन मेनन ने इसे अस्वीकार कर दिया।

सीमा पर चीन के साथ बढ़ते तनाव को देखते हुए थिमैया ने सीधे प्रधानमंत्री नेहरू से भेंट की। उन्होंने सेना की कमजोर पूर्वी कमान, संसाधनों की कमी का कच्चा चिट्ठा खोला। लेकिन मेनन को इसकी भनक लग गई। सीमा पर बढ़ते तनाव से बेखबर रक्षामंत्री वीके कृष्णा मेनन ने सेना प्रमुख के सीधे प्रधानमंत्री से मिलने पर जनरल थिमैया को फटकार लगाई।

यह तीर थिमैया के सीने में उतर गया। गुस्से और अपमान में उन्होंने 31 अगस्त 1959 को सेना प्रमुख पद से त्यागपत्र दे दिया। अब नेहरू घबराए, उन्होंने शाम को जनरल थिमैया को बुलाया और त्यागपत्र वापस लेने को कहा। देशभक्ति ने थिमैया को झुकाया और सख्त स्वभाव के थिमैया ने अपना त्यागपत्र वापस ले लिया।

लेकिन थिमैया के इस्तीफे की खबर मीडिया तक पहुंच गई। किसी ने जान-बूझकर थिमैया के त्यागपत्र को मीडिया में लीक करा दिया। जिसके बाद संसद में तूफान आ गया। नेहरू ने संसद में सफाई दी, मगर झूठ बोला। उन्होंने इस्तीफे को ‘भावुकता का उफान’ कहा। नेहरू से उनकी ही पार्टी के सांसद प्रो. रंगा और टीएस चेट्टीयार ने रक्षामंत्री मेनन और सेना प्रमुख से जुड़े मतभेदों के बारे में पूछा था। लेकिन उन्होंने इन प्रश्नों को नजर अंदाज कर दिया। प्रधानमंत्री के अलावा, रक्षामंत्री मेनन ने थिमैया पर ‘षड्यंत्रकारी’ का ठप्पा जड़ दिया।

कांग्रेस सांसद टीएस चेट्टीयार ने सेना प्रमुख थिमैया के इस्तीफा देने पर नेहरू से मांगा था जवाब, इमेज सोर्स- Perform India

संसद में थिमैया की छवि धूमिल की गई, नेहरू ने भाषण में सफेद झूठ बोला। मेनन-नेहरू की मिलीभगत ने थिमैया को अलगाव की चपेट में ला दिया। एक वीर सैनिक को राजनीतिक जाल में फंसाया गया। जिससे सेना कमजोर हुई और उसका मनोबल टूटा। इस घटना के कुछ समय बाद,  20 अक्टूबर 1962 को भारत पर चीनी आक्रमण हुआ। चीनी सैनिकों ने पारंपरिक ‘मैकमोहन रेखा’ को पार कर पश्चिमी क्षेत्र में चुशूल में रेजांग-ला व पूर्व में त्वांग पर कब्जा कर लिया। हमारी सेना ने वीरता के साथ चीन का मुकाबला किया, लेकिन चीन की अपेक्षा भारतीय सैनिकों के पास आधुनिक हथियार नहीं थे, जिसका फायदा उठाते हुए चीन ने हमारे बड़े भू-भाग पर अवैध कब्जा कर लिया। जनरल थिमैया का अपमान ‘राष्ट्रीय शर्म’ में बदल गया।

लोकसभा में प्रधानमंत्री नेहरू द्वारा दिए गए बयान को लेकर टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर : इमेज सोर्स- perform india

इस घटनाक्रम को आज भी जनरल थिमैया की राष्ट्रनिष्ठा और नेहरू-मेनन के अहंकार के रूप में याद किया जाता है। अहंकार की दीवारों को तोड़कर अगर नेहरू-मेनन की जोड़ी ने जनरल थिमैया की बात मानकर सीमा पर सेना को मजबूत किया होता, तो 1962 के युद्ध का परिणाम कुछ और होता। चीन हमारी 38 हजार वर्ग किलोमीटर भू-भाग पर कब्जा न कर पाता। न ही हमारे वीर सैनिकों को बलिदान देना पड़ता। अक्साई चिन की ऊंची चोटियों से हमारी सेना को, देश की सीमाओं को और पैनी नजरों से देख पाने में मदद मिलती।

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