सुप्रीम कोर्ट में ग्राम सभाओं की ऐतिहासिक जीत, कैसे जनजातीय संस्कृति को बचाने के लिए ईसाई प्रचारकों की एंट्री हुई बैन

देश के सर्वोच्च न्यायालय ने छत्तीसगढ़ के कांकेर में ग्राम सभाओं के पक्ष में ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है, जिसमें “धर्म प्रचारकों के प्रवेश पर प्रतिबंध” वाले होर्डिंग को बरकरार रखा है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने 17 फरवरी, 2026 को हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार और ईसाई पक्ष की याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए पेसा कानून (पंचायत विस्तार अनुसूचित क्षेत्र अधिनियम 1996) को हाइलाईट किया, कि ग्राम सभाएं अपने सांस्कृतिक फैसले लेने के लिए स्वतंत्र हैं।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
दरअसल, ये मामला कांकेर जिले के आठ गांवों (कुडाल, परवी, जुनवानी, घोटा, घोटिया, हवेचुर, मुसुरपुट्टा और सुलांगी) से जुड़ा हुआ है। इन जनजातीय गांवों की सीमा पर ग्राम सभाओं ने साइन बोर्ड लगाए थे, जिसमें लिखा था कि ईसाई धर्मगुरुओं (पास्टर्स) और धर्म बदलने वाले लोगों को प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाएगी। ये गाँव पांचवी अनुसूची के अंतर्गत आते हैं, जहां पेसा कानून लागू है। ये साइन बोर्ड गांवों में धर्मांतरित ईसाइयों और पास्टर्स की एंट्री रोकने लिए थे, ताकि वो किसी भी प्रकार से लालच प्रलोभन में बचकर अपनी संस्कृति की रक्षा कर सके।
ग्रामसभाएं किसी भी क्षेत्र की आधारभूत इकाइयां होती हैं जोकि हर तरह के कार्यों से सबसे पहले प्रभावित होती हैं। ऐसे में कोर्ट का ये फैसला ग्राम सभाओं के सामूहिक प्रयासों को हाईलाइट करता है। साथ ही ये भी साफ होता है कि काकेंर की ग्राम सभाएं केवल एक प्रशासनिक इकाई नहीं हैं, बल्कि जनजातीय स्वशासन, सांस्कृतिक संरक्षण और सामुदायिक संरक्षण के लिए मजबूत आधारशिला के रूप में जानी जाती हैं। नीचे कुछ सवालों और जबावों की मदद से इस पूरे मामले और इसके कानूनी पक्ष के बारे में डिटेल से बताया गया है।
क्या है पूरा मामला?
इस पूरे मामले को केवल अनुसूचित क्षेत्रों के गांवों में बोर्ड/होर्डिंग लगाने की घटना या कार्रवाई के रूप में देखना शायद बड़ी भूल होगी। ये ईसाई धर्मांतरण की उस काली तस्वीर पर कार्रवाई के विरोध में सामने आया, जिसे भोले-भाले वनवासी लोगों ने वर्षों तक जिया और झेला है।
दरअसल, साल 2025 के अगस्त महीने में कांकेर जिले की 8 ग्राम सभाओं ने प्रस्ताव पारित कर गांव में स्थानीय जनजातीय ग्रामीणों द्वारा सूचना बोर्ड/होर्डिंग लगाया गया। इसमें लिखा गया था कि ग्राम-सीमा के अंदर जबरन प्रलोभन या भ्रम के माध्यम से धर्मांतरण की गतिविधियां स्वीकार नहीं होंगी। साथ ही इसमें संविधान की पांचवी अनुसूची और पेसा कानून का भी उल्लेख किया गया था। इसके बाद कई दूसरे गांवों में भी होर्डिंग लगाए गए थे।
कांकेर के निम्न गांवों में होर्डिंग/बोर्ड लगाए गए थे –
· कुडाल (Kudal) – तहसील भानुप्रतापपुर, जिला कांकेर
· परवी (Parvi) – तहसील भानुप्रतापपुर, जिला कांकेर
· बांसला (Bansla) – तहसील भानुप्रतापपुर, जिला कांकेर
· घोटा (Ghota) – तहसील भानुप्रतापपुर, जिला कांकेर
· घोटिया (Ghotiya) – तहसील भानुप्रतापपुर, जिला कांकेर
· बोंडानार (Bondanar)- तहसील अंतागढ़, जिला कांकेर
· मुसुरपुट्टा (Musurputta)- तहसील नरहरपुर, जिला कांकेर
· सुलंगी (Sulangi) – तहसील पखांजूर, जिला कांकेर

कांकेर में गावों के बाहर लगाए गए साइन बोर्ड / होर्डिंग (Sources: Indian Express)
क्या है चर्चाओं में आने वाला पेसा कानून (PESA: Panchayats Extension to Scheduled Areas Act), 1968?
गांवों के बाहर होर्डिंग लगाने के प्रस्तावों को ग्राम सभा ने पारित किया था, जिनमें “जबरन” और “प्रलोभन” जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया था। ये शब्द छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम, 1968 की भाषा से मेल खाते हैं। अब सवाल उठता है कि क्या ग्राम सभा ऐसे प्रस्ताव पारित कर सकती है? तो इसका जबाव है हां, कांकेर जिला छत्तीसगढ़ के उन क्षेत्रों में आता है, जिन्हें संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्र घोषित किया गया है। Ministry of Panchayati Raj
अनुसूचित क्षेत्र होने का अर्थ है कि उस क्षेत्र में न केवल पंचायत व्यवस्था लागू है, बल्कि यहां ग्रामसभा को सामान्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक संवैधानिक संरक्षण एवं विशेष अधिकार भी प्राप्त हैं। पेसा अधिनियम 1996, (Panchayats Extension to Scheduled Areas Act), इस अधिकार का विधायी विस्तार है।
इस अधिनियम से ग्रामसभा केवल विकास योजनाओं पर सहमति देने वाली संस्था भर नहीं, बल्कि परंपरा और सांस्कृतिक संरक्षक के रूप मे मान्यता देने वाली इकाई भी है। इस अधिनियम की धारा 4(d) खासतौर पर ग्रामसभा को अधिकार देती है कि वो अपनी परंपराओं, सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक संसाधनों का संरक्षण करें। इस मामले ने संवैधानिक नियमों का उल्लेख कर उन्हें और मजबूत किया।
ये कानून जनजातीय समुदाय की सांस्कृतिक पहचान कर सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक विवाद प्रणालियों की रक्षा करता है। पेसा कानून से लघु वन उपज के स्वामित्व और प्रबंधन का अधिकार सबसे आधारभूत संरचना यानी स्थानीय समुदायों को देता है। पेसा कानून के तहत भूमि अधिग्रहण, जल निकाय, लघु खनिज जैसे प्रबंधनों के लिए स्थानीय समुदायों का परामर्श अनिवार्य है। जो समुदाय समाज की मुख्यधारा से बाहर अलग-थलग हैं, उनके परंपरागत ज्ञान, सामुदायिक समझ और जीवन पद्धतियों को बनाए रखने के लिए भी पेसा कानून काम करता है। ये कानून जंगल, जमीन और जल के साथ सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा करने में मदद करता है।
यह भी पढ़ें – जगन्नाथ पुरी रत्न भंडार: 8 साल बाद खुलेगी 324 पेज की रिपोर्ट, HC के आदेश के बाद समझें 1978 के बाद की पूरी टाइमलाइन ग्राम सभा के साइन बोर्ड्स पर कैसे हाईकोर्ट का फैसला बना मील का पत्थर?
वनवासी ग्रामसभाओं द्वारा अपनी संस्कृति बचाने के लिए होर्डिंग और साइन बोर्ड लगाने को कुछ मीडिया प्लेटफॉर्म और ईसाई संगठनों ने धार्मिक “स्वतंत्रता पर रोक” और “आवागमन अधिकार का उल्लंघन” बताकर प्रचारित किया। मामला छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में रिट याचिका के रूप में पहुंचा। इसमें अनुच्छेद 25 और 19(1)(d) का हवाला दिया गया।ईसाई याचिकाकर्ता की तरफ से कहा गया कि ग्राम सभा के होर्डिंग कुछ संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाले हैं।
उच्च न्यायालय ने सुनवाई करते हुए होर्डिंग की भाषा का विश्लेषण शब्दों के आधार पर किया, न कि व्याख्या के आधार पर। साथ ही पेसा के प्रावधान और संवैधानिक भाषाओं में उपलब्ध वैकल्पिक उपायों को गहराई से ध्यान दिया। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए ऐतिहासिक आदेश दिया और माना कि प्रस्तुत सामग्री पर होर्डिंग स्वत: असंवैधानिक साबित नहीं होते। हाईकोर्ट ने होर्डिंग पर लिखे वाक्यों का विश्लेषण शब्दों के अधार पर किया। उन्होंने इस लाइन को देखा कि क्या ये शब्द समुदाय के सभी लोगों को निषिद्ध करते हैं? और क्या ये गतिविधि आधारित चेतावनी है।
“(ग्राम में जबरन प्रलोभन या भ्रम के माध्यम से धर्मांतरण गतिविधियां स्वीकार्य नहीं हैं।) “
कोर्ट ने अपने फैसले में ग्राम सभा को बताया “सर्वोच्च”
कोर्ट को यहां कोई ऐसा स्पष्ट आधार नहीं मिला जिस पर याचिकाकर्ता के प्वाइंट्स सिद्ध हो सकें। कोर्ट ने पेसा अधिनियम को दोहराते हुए उल्लेख किया कि ग्रामसभा सर्वोच्च है। अगर किसी को आपत्ति है तो इस नियम में ग्रामसभा के निर्णय को चुनौती देने की प्रक्रिया उपलब्ध है मगर इसके लिए संरचना का पालन करना जरूरी है। ऐसे में संवैधानिक न्यायालय अंतिम उपाय होते हैं।
न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए माना कि सामाजिक संदर्भों की स्वीकृति महत्वपूर्ण तत्व है। उन्होंने संकेत दिया कि यदि धर्मांतरण की गतिविधियां सामुदायिक तनाव उत्पन्न कर रही हैं तो ग्रामसभा की चिंता निराधार नहीं मानी जा सकती। ये टिप्पणी किसी समुदाय के विरुद्ध नहीं बल्कि सामाजिक स्वीकृति के साथ थी।
याचिकाकर्ताओं की संदिग्धता से उठा पर्दा
हाई कोर्ट में याचिका दायर करने वाले दो याचिकाकर्ता थे। 1. दिग्बल तांडी 2. नरेंद्र भवानी (दोनों एक दूसरे से संपर्क में थे, मगर यह बात कोर्ट से छिपाई थी। इसमें नरेंद्र भवानी नामक व्यक्ति आम आदमी पार्टी की तरफ से चुनाव लड़ चुका है, साथ ही 6 अपराधिक केस भी चल रहे हैं। दिग्बल तांडी खुद एक ईसाई पास्टर है, जिसने सुनवाई के दौरान इस सच्चाई को छिपाया।
अदालत के इस फैसले का स्वागत करते हुए राज्य के गृह मंत्री ने इसे ग्राम सभा की जीत बताया था। साथ ही कहा था कि यहां पेसा लागू है और अपनी संस्कृति के संरक्षण हेतु ग्राम सभाएं ऐसे कदम उठा सकती हैं।
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क्या छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण एक चुनौती की तरह उभरा है?
कांकेर जिले में पास्टर/पादरी निषेध बोर्ड लगाने का मामला उस क्षेत्र की गंभीर चुनौतियों को उजागर करता है, जिसे वहां का समाज लंबे समय से झेल रहा है। ये वैचारिक प्रक्रिया की छोटी सी प्रतिक्रिया है, जो सालों से बस्तर संभाग में दिखती है।
छत्तीसगढ़ का बस्तर केवल एक भौगोलिक इकाई भर नहीं है, बल्कि ये पूरा क्षेत्र अपनी विशिष्ट जनजातीय संस्कृति, पारंपरिक रीति-रिवाज, धार्मिक आस्था, जंगल से रिश्ता, और विशेष संस्कृति आधारित जीवन शैली के लिए जाना जाता है। पिछले कई सालों से बस्तर में जनजातीय बहुल क्षेत्रों में चर्च नेटवर्क, ईसाई प्रार्थना केंद्र और स्थानीय एजेंट प्रणाली (Intermediary Network) की मदद से मिशनरियों की गतिविधियाँ संचालित हो रही हैं।
कैसे कांकेर में बढ़ रही हैं अघोषित ईसाई जनसंख्या?
इस अनुसूचित क्षेत्र के समाज ने बड़े पैमाने पर प्रलोभन, दबाव, भ्रम, सामाजिक विघटनकारी रणनीति का अनुभव किया है। ये एक सेट पैटर्न के रूप में कार्य करता है। हालांकि जनगणना के आंकड़ें ईसाईयों की संख्या में कोई खास बढ़त को नहीं दिखाते हैं मगर ईसाई रिलीजन को मानने वालों की संख्या अघोषित रूप से बस्तर के कई गांवों में आधे से अधिक हो चुकी है। संभाग के कई गांव भूमियाबेड़ा, घूमियाबेड़ा, औरछा, चिपरेल आदि की स्थिति ऐसी ही है कि वहां ईसाईयों की संख्या 90 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। (2011 की जनगणना के अनुसार) बस्तर में 27 हजार 951 लोग ईसाई हैं। मगर ये आंकड़ा पिछले वर्षो में कई गुना तेजी से बढ़ा है।
जनजातीय समाज की यह विशेषता है कि वहां किसी की पहचान व्यक्तिगत नहीं होती बल्कि यह सामूहिक होती है। उनके त्योहार, परंपराएं, देवस्थान, मृत्यु संस्कार, विवाह संस्कार, सामुदायिक नियम सभी में सामाजिक अनुशासन की छाप दिखती है। इसलिए जब कोई गांव या परिवार धार्मिक समूह से कटकर अपनी पहचान बनाते हैं तो वह व्यक्तिगत फैसला न होकर सामाजिक परिवेश को प्रभावित करता है। इसलिए कन्वर्जन के लिए ईसाई चर्च जनजातीय लोगों को प्रमुखता से निशाना बनाते हैं।
कैसे होता है धर्मांतरण की गतिविधियों का संचालन?
वैसे तो कन्वर्जन कई तरीकों से होता है मगर इसका मुख्य टारगेट वो लोग होते हैं जो किसी न किसी तरीके से मजबूर होते हैं। ऐसे में उनको प्रलोभन, चिकित्सा, शिक्षा, घर, भ्रम, के माध्यम से होता है। इस प्रक्रिया में कई मध्यस्थों का प्रयोग होता है, जो स्थानीय होते हैं। इसे कई चरणों में भी किया जाता है।
1- पहले चरण में बाहरी संपर्क और परिचय बनाया जाता है। यह परिचय सीधे “धर्म बदलो” जैसी भाषा में नहीं होता। प्रारंभिक स्तर पर यह संपर्क सहायता, सहानुभूति, इलाज या शिक्षा के माध्यम से होता है। गाँव में बीमारी, आर्थिक कठिनाई या किसी पारिवारिक संकट के समय ऐसे नेटवर्क, लोगों को आकर्षित करते हैं। इसे स्थानीय भाषा में “संकट के समय सहारा” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इस स्तर पर कोई भी व्यक्ति इसे समस्या नहीं मानता।
2- दूसरे चरण में नियमितता आती है। नियमित प्रार्थना सभा, घर-घर बैठक, या सामूहिक “चंगाई” कार्यक्रमों के माध्यम से एक नया समूह बनता है। धीरे-धीरे इस समूह की पहचान अलग होने लगती है।
3- तीसरे चरण में परंपरा पर हमला शुरू होता है। पारंपरिक देवस्थानों, पूजा-पद्धति, ग्राम-देवी, देवता, मड़ई, मेला, विवाह-संस्कार आदि को “गलत”, “अंधविश्वास”, या “पाप” बताकर, परंपरा से कटाव पैदा किया जाता है। इस कटाव का परिणाम केवल धार्मिक नहीं, सांस्कृतिक भी होता है। क्योंकि जनजातीय समाज में धर्म और संस्कृति अलग-अलग नहीं हैं, वे एक ही जीवन-व्यवस्था हैं।
4- चौथे चरण में गांव के भीतर सामाजिक संघर्ष के संकेत उभरते हैं। परंपरा से जुड़े लोग मानते हैं कि उनकी संस्कृति पर हमला हो रहा है। वहीं नव कन्वर्टेड समूह मानता है कि उन्हें रोकने की कोशिश हो रही है। यहां से स्थिति तनावपूर्ण हो जाती है।
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कितने चरणों मे पैदा होता है लोगों में उनके धर्म के प्रति वैमनस्य?
लोगों को उनके धर्म के प्रति घृणा पैदा करने के लिए भी एक सेट पैटर्न का प्रयोग होता है, इसे मुख्य रूप से 3 चरणों में किया जाता है।
- पहला चरण शांत ध्रुवीकरण’ (Quiet Polarisation)
- दूसरा चरण ‘खुला सामाजिक टकराव’ (Open Social Conflict)
- तीसरा चरण ‘लोकशांति संवेदनशीलता’ (Public Order Sensitivity) इस तरह की प्रक्रिया के वैमनस्य से बचने के लिए ग्राम सभा की तरफ से गाँवों के बाहर होर्डिंग लगाए गए थे।
मीडिया ने कैसे तथ्य और सच्चाई छिपाकर इस मामले को प्रस्तुत किया?
कांकेर ग्रामसभा होर्डिंग मामला केवल एक क्षेत्र का मुद्दा न होकर राष्ट्रीय चर्चा का केंद्र बन गया। मगर विडंबना यह है कि ज्यादातर मीडिया समूहों और ईसाईयों द्वारा इस मामले को अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक बताकर प्रस्तुत किया गया। जब केस हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तब कांकेर होर्डिंग मामले के साथ इसमें कई अन्य मामलों को जोड़ा गया, जोकि मूल याचिका का हिस्सा नहीं थे। इसमें शव दफन विवाद, राज्यव्यापी उत्पीड़न नैरेटिव बनाकर हाईकोर्ट में प्रस्तुत किया गया।
यहां ये ध्यान देना भी जरूरी है कि न्यायालय जिन प्रश्नों के उत्तर दे रहा था, मीडिया उन प्रश्नों को सामने नहीं रख रहा था। दोनों में भिन्नता होती है तो भ्रम की स्थिति बनती है। यहां भी यही हुआ, हाईकोर्ट के सामने सवाल था कि “क्या होर्डिंग असंवैधनिक हैं?” मगर सार्वजनिक विमर्श में सवाल खड़ा किया गया कि “क्या राज्य में अल्पसंख्यकों पर उत्पीड़न हो रहा है?” दोनों सवालों में जमीन-आसमान का अंतर है। न्यायालय व्यापक निष्कर्ष तब तक नहीं निकलता जब तक पर्याप्त साक्ष्य न हों। सुप्रीम कोर्ट में भी इसे दोहराया गया, इसने नए मुद्दों के प्रश्नों को मूल प्रश्नों से अलग माना। साथ ही अदालत ने माना कि मूल रिट के बाहर के विवादों को जोड़कर मूल रिट को बदला नहीं जा सकता।
होर्डिंग मामले में कैसे ग्राम सभाओं की भूमिका बनी मील का पत्थर?
कांकेर ग्राम सभाओं की ये लड़ाई न केवल जनजातीय लोगों को धर्मांतरण जैसी गंभीर चुनौतियों के खिलाफ है, बल्कि अपनी संस्कृति, आस्था, विश्वासों और परंपराओं को बचाने के लिए भी है। ग्राम सभाओं ने इस कानूनी लड़ाई को लड़ते हुए एक नायक की भूमिका निभाई है। पेसा कानून की पुनर्व्याख्या ने जनजातीय इलाकों में ग्राम सभाओं के अधिकारों को हाईलाईट किया। साथ ही ये भी दर्शाया कि ये कानून केवल संविधान तक ही सीमित नहीं हैं, जमीनी स्तर पर भी लागू हैं। अदालत का यह फैसला ग्राम सभाओं की संप्रभुता और स्व-शासन की ऐतिहासिक विजय का प्रतीक बन गया, जो भविष्य में जनजातीय समुदाय के लिए मिसाल कायम करेगा।
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