इस्लाम के लिए काफिरों से लड़ाई : राणा सांगा से हारे मुगल सैनिकों को मजहबी जहर पिला बाबर ने जीता था खानवा का युद्ध

History is written by the victors , मतलब विजेताओं द्वारा ही इतिहास लिखा/लिखवाया जाता है। मुगल राज को भारत में स्थापित करने वाले बाबर का इतिहास भी कुछ वर्ष पहले तक इसी सिद्धांत के तहत लिखा गया, महिमामंडित करते हुए। लेकिन सच्चाई अब सामने आ रही है। बाबर बर्बर था, हिंदू-घृणा से सना हुआ, वीरता से लड़ने के बजाय वह युद्ध को मजहबी रंग देता था, जीत के लिए इस्लाम को ढाल बनाता था। अब का इतिहास इन तथ्यों के साथ लिखा जा रहा है, पुराने गढ़े गए भ्रम इन तथ्यों से टूट रहे हैं।
खानवा के युद्ध में बाबर की महाराणा संग्राम सिंह (राणा सांगा) पर जीत के कारकों की जांच करने पर जो इतिहास सामने आया है, वो बाबर के लिए गढ़ी गई महिमामयी छवि के विपरीत है।
खानवा का युद्ध हुआ 16 मार्च 1527 को। इस युद्ध में बाबर की जीत हुई, यह लगभग सबने पढ़ी-सुनी होगी। लेकिन ठीक 24 दिन पहले एक और युद्ध हुआ था, बयाना का युद्ध। 21 फरवरी 1527 को हुए इस युद्ध में बाबर की सेना को राणा सांगा के जाबांज सैनिकों ने धूल चटा दी थी।
बयाना का युद्ध इतना भीषण था कि मुगलिया सेना के मन में राजपूत सैनिकों का खौफ घर कर गया था। पानीपत की लड़ाई जीतकर दिल्ली और आगरा में सत्ता स्थापित कर चुके अपने शासक बाबर से वो घृणा के लायक काफिरों की धरती पर लड़कर मरने के बजाय वापस काबुल जाने का आग्रह करने लगे थे।
बाबर की आत्मकथा बाबरनामा का अंग्रेजी अनुवाद किया था इतिहासकार विलियम एर्स्काइन ने। किताब का नाम है – A History Of India, Under The Two First Sovereigns Of The House Of Taimur, Baber And Humayun – अपनी आत्मकथा में बाबर ने बयाना के युद्ध को लेकर अपने सैनिकों का जो अनुभव लिखा, उनके मनोबल को बढ़ाने के लिए कैसे उसने कुरान और इस्लाम का सहारा लिया, वो पढ़ने लायक (पृष्ठ संख्या 444 से 474) है :
‘मुगल सेना ने अब तक जितने भारतीय सैनिकों या अफगान विरोधियों (पानीपत के युद्ध में हराए इब्राहिम लोदी की सेना)’ से लड़ाई लड़ी है, राणा सांगा के राजपूत सैनिक इन सबसे कहीं अधिक वीर, शक्तिशाली, युद्ध के लिए समर्पित और राष्ट्रीय चेतना से ओत-प्रोत हैं। इनके पास एक ऐसा नेता (राणा सांगा) है, जिसके लिए ये लोग विरोधी सेना के बड़े-से-बड़े योद्धा के सामने आने से नहीं डरते और सम्मान की खातिर हमेशा अपने बलिदान के लिए तैयार रहते हैं। बयाना के युद्ध में मुगल सेना ने जितनी बार आक्रमण किया, राजपूतों ने हर बार उनका सफाया कर दिया। राजपूतों की यह वीरता मुगलों की सोच से परे थी। जीत के बाद भी हालांकि राजपूत सैनिकों ने युद्ध नीति का हमेशा पालन किया। राजपूतों के पराक्रम की पराकाष्ठा को देखते हुए मुगल सैनिकों के बीच खौफ का मंजर था। बार-बार हार के कारण मुगल सेना हताश-परेशान थी। काफिरों की धरती हिन्दुस्तान को छोड़कर काबुल लौट चलने की बातें होने लगी, आम सैनिकों से लेकर सेनापतियों तक में। बाबर तक भी उसके सैनिकों की बातें पहुंचने लगीं।”
बाबर को तो समरकंद (वर्तमान का उज्बेकिस्तान) से हराकर भगा दिया गया था, आखिर वो कौन सा मुंह लेकर उधर लौटने की सोचता? ऐसे में उसने हिन्दुस्तान पर ही सत्ता स्थापित करने की सोची। इस सोच को उसने मजहब से गूंथ दिया, जो निर्णायक साबित हुआ।

सोच में डूबा आक्रांता बाबर, फोटो क्रेडिट : विकिमीडिया कॉमन्स
हतोत्साहित मुगलिया सैनिकों का उत्साह बढ़ाने के लिए उसने इस्लाम, मजहबी कट्टरता, कुरान, हर एक भावनात्मक चीज का सहारा लिया। युद्ध को उसने सत्ता और दौलत बढ़ाने के बजाय मूर्तिपूजकों-काफिरों के खिलाफ बताया। 21 फरवरी 1527 को बयाना का युद्ध हारने के बाद अगले कुछ दिनों तक बाबर ने अपने सेनापतियों से लेकर पैदल सैनिकों तक से संवाद किया।
16 मार्च 1527 को खानवा के युद्ध शुरू होने से पहले तक (कुल 24 दिनों में) बाबर की हर बातचीत में इस्लामी मकसद, अल्लाह के लिए सब कुछ, इस्लाम के लिए गैर-मुसलमानों (काफिरों) के विरुद्ध युद्ध आदि ही केंद्र-बिंदु रहे।
इतिहासकार विलियम एर्स्काइन ने अपनी पुस्तक में इन सबका विस्तार से जिक्र किया है। राजपूतों से हारते-हारते निराश हो चुकी मुगल सेना में जान फूंकने लिए बाबर ने जो कुछ कहा, उनमें से कुछ महत्व कथन निम्नलिखित हैं:
1. “हिन्दुओं के खिलाफ युद्ध सत्ता या धन के लिए नहीं है, बल्कि यह जिहाद है, इस्लाम के लिए है।”
2. “अल्लाह सबसे महान है। उसकी मेहरबानी हम सब पर है। बदनामी के साथ जीने से अच्छा है, अल्लाह के नाम पर मरकर शहीद कहलाना।”
3. “हम सब अल्लाह की कसम खाएं कि कोई भी, एक पल के लिए भी, काफिरों के विरुद्ध इस लड़ाई से मुंह मोड़ने के बारे में नहीं सोचेगा। मालिक हो या नौकर, पद में छोटा या बड़ा, सबके सब पवित्र कुरान को हाथ में लेकर कसम खाओ।”
4. “आज से किसी भी मुसलमान को तमगा मतलब टैक्स नहीं देना होगा, इसका फरमान जारी कर दो।”
5. “इस्लाम में शराब पीना हराम है। इसलिए मैं शराब का त्याग कर रहा हूं। जिन सोने-चांदी के बरतनों में मैंने शराब पिया, सबको तोड़ दो और गरीबों में बांट दो।”
6. “मुगल शिविर में जितनी भी शराब है, सबको जमीन पर बहा दो।”
7. “आज से मैं दाढ़ी पर कैंची-उस्तरा नहीं चलवाऊंगा, इनको बढ़ने दूंगा।”
8. “युद्ध से पहले जो भी राजपूत सैनिक मिले, उसे सिर्फ मारना नहीं है, बल्कि मारने के बाद उसकी गर्दन काटकर उसे अपने भाले में खोंसकर लाना है या चमड़े की रस्सी से घोड़े की गर्दन में लटकाकर।”
9. “जो भी राजपूतों का साथ देगा, उन सबके गांव-शहर तबाह कर दो। सबको बंदी बना लो।”
तात्कालिक युद्ध शैली की बात करें, तो बाबर एक कुशल सेनापति था। पानीपत की जंग में मुगल सेना से 8-गुनी बड़ी इब्राहिम लोदी की सेना को हराकर उसने अपनी क्षमता साबित भी कर दी थी। बारूद और तोपों का प्रयोग करके उसने पारंपरिक युद्ध की शैली ही बदल डाली थी। ऐसे में बयाना के युद्ध में हारने के बाद वो चुपचाप बैठा था या सिर्फ अपने सैनिकों को मजहबी पाठ पढ़ा रहा था, यह कहना भी गलत होगा।
बाबर अगले युद्ध की तैयारी में था। सैनिकों की गोलाबंदी के अलावा युद्धक्षेत्र की किलेबंदी, अपने सैनिकों के छिपने के लिए लंबे और गहरे गड्ढे, ये सब वो स्वयं की देखरेख में करवा रहा था। मारक क्षमता के तौर पर तोप और बारूद तो था ही उसके पास। इसके विपरीत राणा सांगा ने राजपूत सैनिकों की गोलाबंदी की, कुशल घुड़सवार, तलवारबाज और युद्ध में सक्षम हाथी जुटाए। खानवा के मैदान (वर्तमान में राजस्थान का भरतपुर जिला) में दोनों सेनाएं आमने-सामने हुईं।
राणा सांगा की सेना पारंपरिक युद्ध शैली (आमने-सामने) में आगे बढ़ी, जबकि बाबर ने अपनी मुगलिया फौज से तुलुगमा शैली (कौशल के आधार पर सेना को दाएं-बाएं-मध्य में बांटना, बैलगाड़ियों की आड़ में तोपखाने को छिपाना, बारूद वाले निशानेबाजों के साथ दुश्मन को चारों तरफ से घेरकर अचानक हमला करना) के आधार पर हमला करवाया। परिणाम यह हुआ कि युद्ध में असंख्य राजपूतों ने अपना बलिदान दिया। 16 मार्च 1527 को तकनीक और नवीनता के आगे वीरता और शौर्य को हार का सामना करना पड़ा।

फोटो क्रेडिट : rajras.in/battle-of-khanwa
खानवा के युद्ध के बाद बाबर ने सिर्फ जीत तक खुद को सीमित नहीं रखा। अपने ही लिखे बाबरनामा में उसने राजपूत सैनिकों के द्वारा जिस युद्ध नीति का हमेशा पालन करने का बखान किया था, वैसी ही नैतिकता वो खुद पर लागू नहीं कर पाया। मूर्तिपूजक हिन्दू राजपूतों, यानी काफिरों की लाशों से सिर कटवाए गए। कटे हुए सिरों की मीनार बनवाई गई। युद्ध में जीते गए क्षेत्र की महिलाओं और बच्चों को गुलाम बनाता था बाबर। संदेश स्पष्ट था, जो भी मुगलों के खिलाफ सिर उठाएगा, वो भी ऐसी ही किसी मीनार में चुनवा दिया जाएगा, उनके बच्चों के साथ ही घर की स्त्रियां गुलाम बना दी जाएंगी।
जरा सोचिए! बाबर ने पानीपत का युद्ध जीता, दिल्ली-आगरा की सत्ता पर कब्जा किया। लेकिन वो गाजी (ऐसा मुस्लिम योद्धा, जो इस्लाम के लिए जेहाद करता हो) कहलाया खानवा के युद्ध के बाद ही। बाबर के लिए इब्राहिम लोदी पर जीत से कहीं बड़ी जीत थी राणा सांगा के खिलाफ, राजपूतों के खिलाफ, हिन्दुओं के खिलाफ।
अगर बाबर ने अपने सैनिकों को मजहब की जहरीली घुट्टी न पिलाई होती, तो शायद भारत का इतिहास कुछ और होता।
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