बालाकोट : 19वीं सदी के सैयद अहमद के ‘जिहाद’ से 21वीं सदी के ‘फिदायीन फैक्ट्री’ तक एक शहर की खतरनाक यात्रा

एक शहर, दो सदियां, एक पैटर्न, बालाकोट की कहानी कुछ ऐसी है, जहां 19वीं सदी के ‘जिहाद’ के नारे और 21वीं सदी की ‘फिदायीन फैक्ट्री’ एक ही पहाड़ियों और घाटियों के बीच पनपते दिखते हैं। कभी यह जगह सैयद अहमद बरेलवी के अनुयायियों के लिए मजहबी युद्ध का मंच थी, तो बाद में यही इलाका जैश-ए-मोहम्मद (जैश) जैसे मजहबी आतंकियों के लिए तहरीक और ट्रेनिंग की जमीन बना।पाकिस्तान में बालाकोट, खैबर-पख्तूनख्वा प्रांत के मानसेहरा जिले में कुन्हार नदी (काघन घाटी) के किनारे स्थित एक शहर है.
सैयद अहमद का बालाकोट वाला ‘जिहाद’ 19वीं सदी के आरम्भ में सिख साम्राज्य पंजाब और उत्तर-पश्चिम के इलाकों में मजबूती से खड़ा था, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली-लखनऊ की इस्लामी धार्मिक जमातों के बीच एक नया विचार उभर रहा था, शुद्ध इस्लामी शासन, शरिया आधारित व्यवस्था और ‘गैर-मुस्लिम हुकूमत’ के खिलाफ जिहाद। उत्तर प्रदेश के रायबरेली में जन्मा सैयद अहमद बरेलवी ने इसी विचारधारा के तहत अपने आंदोलन की बुनियाद रखी और 1826 में पेशावर पहुंचकर मौलाना इस्माइल देहलवी के साथ जिहादी अभियान शुरू किया। दोनों ने मिलकर ‘मुजाहिदीन’ सेना बनाई।
सैयद अहमद ब्रिटिश और मराठों से भिड़ने से बचता रहा और अपेक्षाकृत उस वक्त इनसे कमजोर समझे गए सिखों को निशाना बनाया, पर रणजीत सिंह का सिख साम्राज्य उनकी मुजाहिदीन सेना पर भारी पड़ा। बरेलवी ने सिखों के विरुद्ध कई युद्ध लड़े, लेकिन महाराजा रणजीत सिंह की सेना ने हर बार करारा जवाब दिया। इसके बाद बरेलवी को कश्मीर के निकट जाना पड़ा और 1830 में उसने बालाकोट में अपना अड्डा स्थापित किया। उसकी रणनीति बालाकोट के पहाड़ों में सिखों से युद्ध करना, उन्हें परास्त करना और कश्मीर पर विजय प्राप्त करना था।
6 मई 1831 को बालाकोट की लड़ाई में सिख सेना ने सैयद अहमद के मुजाहिदीन को निर्णायक रूप से परास्त कर दिया। सैयद अहमद और शाह इस्माइल वहीं मारे गए। इसी लड़ाई ने बालाकोट को प्रतीकात्मक महत्त्व दिया। यह जगह मुजाहिदीन के लिए ‘जिहाद की धरती’ बन गई। इस प्रकार, बालाकोट सिर्फ भूगोल नहीं रहा, बल्कि एक मानसिक नक्शे पर दर्ज प्रतीक बन गया, एक ऐसी घाटी, जहां से जिहाद की कहानियां शुरू होती हैं और भावी पीढ़ियों को ‘प्रेरणा’ दी जाती है।
जैश का कैंप, फिदायीनों के लिए ‘जन्नत की तैयारी’ 21वीं सदी की शुरुआत में जब पाकिस्तान में विभिन्न जिहादी संगठनों का नेटवर्क फैल रहा था, तब जैश-ए-मोहम्मद जैसे समूहों ने बालाकोट को एक अहम ठिकाने के रूप में चुना। दूरदराज पहाड़ियां, नदी, जंगल, धार्मिक माहौल और ऐतिहासिक जिहादी प्रतीकवाद, यह सब मिलकर इसे कैंप लोकेशन बनाते थे।
बालाकोट के पास जाबा टॉप नाम की पहाड़ी पर सन् 2000 के आसपास अपना बड़ा ट्रेनिंग कैंप खड़ा किया, जिसे ऊपर से ‘तालीम-उल-कुरान’ नाम के मदरसे और धार्मिक परिसर के रूप में दिखाया गया। लेकिन भीतर का काम था, फिदायीन हमलों की ट्रेनिंग, हथियारों का उपयोग, नक्शों पर टारगेट सीखना और ‘शहादत’ का वैचारिक पाठ।

बालाकोट, फोटो क्रेडिट : scroll.in/article
26 फरवरी 2019 आसमान से आया जवाब
14 फरवरी 2019 को जैश-ए-मोहम्मद ने पुलवामा में आतंकी हमला किया। इस हमले में 40 भारतीय जवानों के बलिदान के बाद भारत ने तय किया कि जवाब इस बार जोरदार तरीके से दिया जाएगा। सिर्फ नियंत्रण रेखा के पास किसी पोस्ट पर गोलीबारी नहीं, बल्कि वहीं वार किया जाएगा, जहां पाकिस्तान और जैश को सबसे अधिक सुरक्षा का भ्रम है- बालाकोट के जाबा टॉप कैंप पर।
26 फरवरी की सुबह लगभग 3:30 बजे भारतीय वायुसेना के मिराज-2000 विमानों ने सीमा पार कर खैबर पख्तूनख्वा की हदों में प्रवेश किया और GPS/इमेज–गाइडेड स्पाइस-2000 स्मार्ट बमों से इस कैंप की इमारतों को निशाना बनाया। यह 1971 के बाद पहली बार था जब भारतीय विमानों ने नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर पाकिस्तान की जमीन पर किसी टारगेट पर एयर स्ट्राइक की।
दुनिया के लिए यह एक काउंटर-टेरर ऑपरेशन था, लेकिन अगर बालाकोट के लंबे इतिहास को देखें, तो यह उसी पहाड़ी शहर पर दूसरा निर्णायक प्रहार था। पहली बार 1831 में सिख सेना ने यहां सैयद अहमद के जिहादी आंदोलन की कमर तोड़ी थी, तो दूसरी बार करीब 190 वर्ष बाद 2019 में भारतीय वायुसेना ने आधुनिक जिहादी नेटवर्क की रीढ़ मानी जाने वाली ट्रेनिंग फैसिलिटी पर हवाई हमला कर तहस-नहस कर दिया।
एयर स्ट्राइक ने इस पैटर्न में पहली बार एक नया मोड़ जोड़ा, संदेश यह कि अगर किसी शहर की पहाड़ियां बार-बार आतंकी हिंसा की प्रयोगशाला बनेंगी, तो अब जवाब भी वहीं तक पहुंचेगा।
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