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सरायघाट का युद्ध : कैसे अहोम साम्राज्य के नाविकों ने गुप्त रास्तों से मुगल सेना को हराया?

Editor Ritam HindiEditor Ritam Hindi17 Feb 2026, 08:00 am IST
सरायघाट का युद्ध : कैसे अहोम साम्राज्य के नाविकों ने गुप्त रास्तों से मुगल सेना को हराया?

सरायघाट के युद्ध को अहोम साम्राज्य (1228 CE–1826 CE) के दौरान सबसे ऐतिहासिक घटनाओं में से एक माना जाता है। इस युद्ध ने ब्रह्मपुत्र घाटी और उत्तर-पूर्व भारत के इतिहास को बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। यह युद्ध 18 फरवरी, 1671 को गुवाहाटी के पास सरायघाट में हुआ था। इसे असम और आसपास के इलाकों में फैलने की मुगल साम्राज्य की आखिरी बड़ी कोशिशों में से एक माना जाता है।

सरायघाट की युद्ध (उत्तर गुवाहाटी में सरायघाट युद्ध स्मारक पार्क में एक पत्थर की प्लेट पर चित्रण), फोटो क्रेडिट : https://indianculture.gov.in/stories/battle-saraighat

अहोम राजवंश खुफिया जानकारी के सहारे मुगलों को हराने में सफल रहा, जिसमें नाविकों के गुप्त रास्तों का प्रयोग करके मुगल जासूसों को भ्रमित किया गया। आज, हम बताते हैं कि कैसे इस रणनीति ने सरायघाट के युद्ध के दौरान ब्रह्मपुत्र नदी पर नाविकों द्वारा प्रयोग किए गए गुप्त रास्तों से मुगलों को हराने में अहोम साम्राज्य की मदद की। सरायघाट के इस युद्ध ने साबित कर दिया कि अगर आपके पास भूगोल और स्थानीय जानकारी है, तो एक ताकतवर साम्राज्य को भी हराया जा सकता है।

सरायघाट के युद्ध की तैयारी

1671 में, अहोम साम्राज्य पर मुगल साम्राज्य द्वारा एक बड़ा हमला हुआ था। एक तरफ मुगल सेना थी, जिसका मिर्जा राजा जय सिंह के बेटे राजा राम सिंह नेतृत्व कर रहा था और दूसरी तरफ अहोम साम्राज्य था, जिसका लचित बरफुकन नेतृत्त्व कर रहे थे। अहोम राजा चक्रध्वज सिंह और सेनापति लचित बरफुकन मुगलों की बड़ी सेना देखकर समझ गए थे कि मुगलों को ताकत से नहीं, बल्कि समझदारी से हराया जा सकता है। इसलिए, अहोम साम्रज्य ने सरायघाट का युद्ध सिर्फ एक सैन्य युद्ध नहीं, बल्कि रणनीतिक, समझदारी और स्थानीय जानकारी का बहुत अच्छा प्रयोग करके लड़ा। नाविकों के गुप्त रास्तों से नदी के बहाव को समझने में मदद मिली, और मुगल जासूसों को गुमराह करने की इसी रणनीति ने अहोम सेना को जीत दिलाई।

फोटो क्रडिट : ndtv.com

ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे और पहाड़ियों से घिरी गुवाहाटी का क्षेत्र इसे बाहरी आक्रमणों से अत्यंत सुरक्षित बनाती थी। लचित बरफुकन जानते थे कि मुगलों के पास नौसेना की युद्ध का ज्यादा अनुभव नहीं है और वह इसका फायदा उठाना चाहते थे। उन्होंने ‘अंधरुबली’ नाम के एक खास क्षेत्र की पहचान की, जो ब्रह्मपुत्र के दक्षिणी किनारे पर नीलांचल पहाड़ियों और ताकुही इलाके और उत्तरी किनारे पर अश्वक्रांता को जोड़ता था। उनके अनुसार, यह क्षेत्र मुगलों से युद्ध के लिए सबसे सटीक रणनीतिक स्थान था। ब्रह्मपुत्र नदी का दक्षिणी किनारा सीधे लचित बरफुकन के नियंत्रण में था, जबकि उत्तरी किनारा एलन बुरहागोहेन के नियंत्रण में था, जो बुरहागोहेन के प्रधानमंत्री और अहोम साम्राज्य के सैन्य प्रमुख थे। बुरहागोहेन को नदी के दोनों किनारों पर जरूरी किले और रक्षात्मक ढांचा बनाने का काम सौंपा गया था।

फरवरी 1669 में, राम सिंह, रंगमती के सीमा पर स्थित किले पर पहुंचा। अहोम सेना के सभी सैन्य अधिकारी गुवाहाटी में इकट्ठा हुए और कामाख्या मंदिर में प्रार्थना की। हर अधिकारी को कुछ सैनिक और जरूरी हथियार और गोला-बारूद दिए गए थे।

सरायघाट युद्ध का साइट मैप, फोटो क्रेडिट : wikipedia.org

मुगल जासूसों को गुमराह करने के लिए नाविकों का इस्तेमाल करने की अहोम की रणनीति

ब्रह्मपुत्र केवल एक बड़ी नदी नहीं है। यह कई छोटी नहरों, रेत के टीलों से घिरे पानी के पतले रास्तों और मानसून के मौसम में कुछ समय के लिए बनने वाली नदियों की अनेक शाखाओं से जुड़ी हुई है। अहोम साम्राज्य के लिए नदी के महत्त्व को समझते हुए, मुगल सेना ने युद्ध से पहले ब्रह्मपुत्र नदी में नाव चलाने की क्षमता का अंदाजा लगाने, अहोम बेड़े की लोकेशन का पता लगाने और स्थानीय नाविकों और मछुआरों से जानकारी इकट्ठा करने के लिए कई जासूस भेजे।

हालांकि, केवल स्थानीय नाविक ही इन गुप्त रास्तों को जानते थे। अहोम इन रास्तों का प्रयोग चुपके से सैनिकों और सप्लाई को ले जाने, रात के अंधेरे में नाव बदलने और अचानक हमले के लिए पोजीशन लेने के लिए करते थे। मुगल जासूसों को इन रास्तों का कोई निशान नहीं मिला। सिर्फ नाविक ही नदी के हर मोड़, रेत के टीले और छिपे हुए चैनल को जानते थे। वे जानते थे कि बड़ी नावें कहां फंस जाएंगी, और वे ये भी समझते थे कि कौन से रास्ते दुश्मन को जाल में फंसाएंगे। लचित बरफुकन ने इन नाविकों का इस्तेमाल करके एक गुप्त रणनीति बनाई।

अहोम सेना न सिर्फ ब्रह्मपुत्र नदी की धाराओं में छिपी रही, बल्कि जान-बूझकर गलत जानकारियां भी फैलाईं। कुछ नाविकों को मुगल कैंप में भेजा गया, जहां उन्होंने कहा, “इस रास्ते पर काफी पानी नहीं है, नावें नहीं जा सकतीं” और “उस दिशा में अहोम की कोई नाव नहीं है”। जबकि असल में, अहोम सेना का बेड़ा उन्हीं रास्तों का प्रयोग कर रहा था। उन्होंने दूसरी तरकीबें भी अपनाईं, दिन में छोटी नावें दिखाकर मुख्य बेड़े को छिपाना, खाली नावें को इस तरह ले जाना कि लगे कि सैनिकों को एक जगह से दूसरी जगह भेजा जा रहा है, और रात में चुपचाप अपनी असली जगह बदल लेना। इससे मुगल जासूसों को ऐसा लगा कि अहोम सेना डर के मारे पीछे हट रही है।

फिर भी, इन सभी तैयारियों का मुख्य मकसद मुगलों को सरायघाट के तंग पानी के रास्तों में फंसाना था। इससे बड़े मुगल जंगी जहाज ठीक से चल नहीं पाते, जबकि अहोम सेना की हलकी नावें तेजी से चल सकती थीं। इस रणनीति से यहीं पर मुगलों की ताकत कम हो गई थी।

नतीजा

इस रणनीति की वजह से, मुगल समझ नहीं पाए कि अहोम नावें कहां से आ रही हैं, मुख्य सेना कहां छिपी है0000 या मुगल सेना पर कितना बड़ा हमला होने वाला है। और इन्हीं गलत धारणाओं की वजह से सरायघाट के युद्ध में मुगल सेना को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। हार के बाद, मुगल सेना को गुवाहाटी से पीछे हटने के लिए बाध्य होना पड़ा।

सरायघाट का युद्ध अहोम साम्राज्य के राज में एक ऐतिहासिक पड़ाव था। यह युद्ध अहोम साम्राज्य के इतिहास में खास स्थान रखती है, जिन्होंने इस इलाके पर लगभग 600 वर्षों तक लगातार राज किया।

अहोम सेनापति लचित बरफुकन ने अपने शानदार नेतृत्त्व और सैन्य ताकत से मुगलों को हराया। उन्होंने पहले से खोए क्षेत्रों पर फिर से आधिपत्य जमा लिया, जिसके कारण वह आज भी सम्मान के साथ याद किए जाते हैं।

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