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सरहिंद की घेराबंदी : अफगानों ने जब महिलाओं और तीर्थयात्रियों का किया अपहरण, जानिए मराठों ने कैसे दिया था उत्तर?

Editor Ritam HindiEditor Ritam Hindi10 Mar 2026, 08:00 am IST
सरहिंद की घेराबंदी : अफगानों ने जब महिलाओं और तीर्थयात्रियों का किया अपहरण, जानिए मराठों ने कैसे दिया था उत्तर?

सन् 1758 में जब मराठा सेना सरहिंद की घेराबंदी के लिए पंजाब की ओर बढ़ रही थी, तब अफगान कमांडर अब्दुस समद खान ने मल्हारराव होल्कर के परिवार की महिलाओं और तीर्थयात्रियों को बंदी बनवा लिया था, लेकिन मराठा गार्ड्स ने उन्हें वीरता के साथ छुड़ा लिया। यह वीरगाथा सरहिंद की घेराबंदी से ठीक पहले की है, जो मराठा इतिहास की एक छिपी हुई कथा है। आइए जानते हैं कि यह सब कैसे हुआ और किस तरह से इस घटना का मराठा सैनिकों ने त्वरित उत्तर दिया?

सब कुछ जनवरी 1758 के ठंडे महीने में आरंभ हुआ। उत्तर भारत में मुगल साम्राज्य के क्षीण होने से शक्ति की शून्यता आ गई थी और अहमद शाह अब्दाली के अफगान आक्रमणों ने पंजाब को अस्थिर कर रखा था। मराठा साम्राज्य अब तक अपने चरम पर पहुंच चुका था और रघुनाथराव तथा मल्हारराव होल्कर के नेतृत्व में उनकी सेना दिल्ली जीतकर अब पंजाब की ओर बढ़ रही थी।

होल्कर की सेना में परिवारजन, महिलाएं और तीर्थयात्री भी शामिल थे। 9 जनवरी को सोमवती अमावस्या के पवित्र दिन कुरुक्षेत्र में मेला लगा था, जहां ये लोग स्नान करने आए थे। महिलाओं में होल्कर परिवार की बहू-बेटियां थीं, जो धार्मिक अनुष्ठान में व्यस्त थीं।

इस बीच सरहिंद का अफगान गवर्नर अब्दुस समद खान पूरी तरह सतर्क था। वह जानता था कि मराठों का आगमन उसके लिए जोखिम से भरा है। उसने सरहिंद किले में मजबूत रक्षा पंक्ति तैयार की और मौका देखकर एक दुस्साहसिक योजना बनाई। उसके सैनिकों की एक टुकड़ी ने शाहाबाद के पास होल्कर के काफिले पर अचानक धावा बोल दिया। मुख्य सेना से अलग महिलाओं और तीर्थयात्रियों के दल को घेर लिया गया। अफगान घुड़सवार कई महिलाओं को कैद कर शाहाबाद ले गए। यह हमला न केवल सैन्य था, बल्कि महिलाओं की अस्मिता पर सीधा आघात था, जो 18वीं सदी के युद्ध नियमों में भी घृणित माना जाता था।

समाचार जैसे ही मल्हारराव होल्कर तक पहुंचा, सेना में सन्नाटा फैल गया। होल्कर एक अनुशासित सेनापति थे, लेकिन यह अपमान व्यक्तिगत था। उनके परिवार की महिलाएं अफगानों के चंगुल में फंस गई थीं। हालांकि, मराठा सेना की तत्परता यहां  नजर आई। होल्कर के सशस्त्र गार्ड्स, जो काफिले की सुरक्षा के लिए नियुक्त थे, तुरंत सतर्क हो गए। ये गार्ड्स मराठा घुड़सवार सेना के चुने हुए योद्धा थे, तेज, कुशल और पूरी तरह निष्ठावान। मुख्य सेना से अलग होने के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और जवाबी कार्रवाई की तैयारी की।

मराठा गार्ड्स ने रात के अंधेरे का फायदा उठाते हुए अफगान टुकड़ी को चारों तरफ से घेर लिया। उनकी प्रसिद्ध घुड़सवार सेना की गति और चतुराई यहां पूरी तरह काम आई। सबसे पहले उन्होंने दूर से तीरों की बौछार की, जिससे अफगान घोड़े बिदक गए और उनकी पंक्तियां बिखरने लगीं। फिर मराठा योद्धा ‘छापामार युद्ध शैली’ में हमला करने लगे। तेजी से आगे बढ़कर करीबी मुकाबला करना, तलवारों से प्रहार करना और फिर पीछे हटकर दोबारा हमला बोलना। अफगान सैनिक, जो भारी कवच और लंबी तलवारों पर निर्भर थे, इस तेज और लगातार बदलती रणनीति के सामने बेबस हो गए। मराठों ने अफगानों के घोड़ों की टांगों पर निशाना साधा, जिससे बिदककर अनेक घोड़ों ने अपने घुड़सवारों को जमीन पर पटक दिया और फिर मराठा सैनिकों ने भालों व तलवारों से करीबी युद्ध में उन्हें मार गिराया। धूल का गुबार उठा, तलवारों की झनकार के साथ चीखें मैदान में गूंजीं। कुछ ही पलों में अफगान टुकड़ी टूट गई और भागने लगी।

फिर आया वह सबसे रोमांचक क्षण, जब बंदी महिलाओं और तीर्थयात्रियों को सुरक्षित मुक्त कराया गया और उन्हें होल्कर के मुख्य शिविर में लाया गया। अफगानों को भारी नुकसान हुआ। कई मारे गए और उनके घोड़े छीन लिए गए। यह रेस्क्यू ऑपरेशन इतना त्वरित और निर्णायक था कि अब्दुस समद खान की चाल पूरी तरह उलटी पड़ गई।

फोटो क्रेडिट : AI GENERATED

यह घटना भले ही मुख्य युद्ध कथाओं में छिपी रह गई हो, लेकिन इसका महत्त्व कम नहीं है। इसने मराठा सेना का मनोबल बढ़ाया और सरहिंद की घेराबंदी का पूर्वानुमान बन गया। यह कहानी हमें सिखाती है कि इतिहास की बड़ी लड़ाइयों के पीछे छोटी-छोटी वीरतापूर्ण घटनाएं भी होती हैं, जो सम्मान, बहादुरी और मानवीयता को सामने लाती हैं।

आज के संदर्भ में यह घटना हमें याद दिलाती है कि चुनौतियों में तत्परता और एकजुटता से कोई भी संकट पार किया जा सकता है, चाहे वह युद्ध का मैदान हो या जीवन की युद्ध।

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