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वर्ष 1813 : क्लैफम सेक्ट का षड्यंत्र, मिशनरी घुसपैठ और सदा के लिए बदल गई भारत की डेमोग्राफी

Editor Ritam HindiEditor Ritam Hindi21 Feb 2026, 08:00 am IST
वर्ष 1813 : क्लैफम सेक्ट का षड्यंत्र, मिशनरी घुसपैठ और सदा के लिए बदल गई भारत की डेमोग्राफी

●   हिन्दुओं के सभी देवी-देवता अशुद्ध और पतित

●   इनके लकड़ी और पत्थर के बने देवता, देव नहीं बल्कि राक्षस

●   हिन्दुओं के सभी सिद्धांत और प्रथाएं सिर्फ ढोंग, सब के सब भ्रष्ट

●   इनकी सभी परंपराएं और विश्वास हास्यास्पद और अपमानजनक

●   हिन्दुओं की लोककथाएं और किंवदंतियां सभी कपट से भरे हुए

●   इसीलिए मूर्ति पूजा की समाप्ति हो और यह समाप्ति होगी ईसाई मजहब को फैलाकर, वो भी अंग्रेजी माध्यम से। हिन्दुओं की मुक्ति का एकमात्र उपाय यही है।

ऊपर कोई कहानी नहीं लिखी गई है। हर एक वाक्य इतिहास में दर्ज है। ऐसा इतिहास, जिसके दम पर भारत में ईसाई मिशनरियों के लिए जमीन तैयार की गई। ऐसा इतिहास, जिसका बीज बोया जैचरी मैकाले और उनके क्लैफम सेक्ट (Clapham Sect) के साथी ईसाइयों ने और फल पाने के लिए दस्तावेज पर मुहर लगाई गई साल 1813 में।

भारत में ईसाई मिशनरी क्यों भेजे जाएं, या किस रूप में भेजना चाहिए, वर्ष 1813 में लंदन की संसद में पास किए गए चार्टर एक्ट में सब दर्ज किया गया। आज जिस मैकाले की शिक्षा नीति पर इतनी चर्चा होती है, वो इसे तभी क्रियान्वित कर पाया, क्योंकि कभी उसके पिता जैचरी मैकाले ने हिन्दू घृणा के कारण अंग्रेजियत और ईसाइयत के प्रचार-प्रसार की नींव रखी थी।

लॉर्ड मैकाले

1813 से पहले का भारत और ईस्ट इंडिया कंपनी

भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी अपनी जड़ें जमा चुकी थीं, वित्तीय और राजनीतिक दोनों स्तरों पर। अगर यह कहा जाए कि भारतीय इस कंपनी के गुलाम बन चुके थे, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। इसके बावजूद सामाजिक और धार्मिक स्तर पर कंपनी ने दखलंदाजी नहीं के बराबर की थी। और इसके पीछे उनका तर्क था, व्यापार।

लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी पर दबाव था, वो भी लंदन से। व्यापार तो मस्त चल रहा था, तो दबाव किस बात का? दबाव था, हिन्दू धर्म और उसके समाज में घुसपैठ का। लेकिन कंपनी यह नहीं चाहती थी। कंपनी के अधिकारियों को यह डर था कि भारत के सामाजिक ताने-बाने को छेड़ने से अगर कोई विद्रोह हुआ, तो व्यापार को नुकसान निश्चित है।

वर्ष 1813 के पहले मिशनरियों को भारत आकर ईसाई मजहब के प्रचार-प्रसार की आधिकारिक अनुमति नहीं थी। स्थिति हमेशा ऐसी ही बनी रहे, इसके लिए ईस्ट इंडिया कंपनी समय-समय पर अपने तर्क देती रहती थी। हालांकि लंदन स्थित क्लैफम सेक्ट के कट्टर ईसाई सदस्यों को इससे दिक्कत थी। लेकिन कंपनी और वित्तीय फायदे का तर्क हमेशा भारी पड़ जाता था।

लेकिन क्लैफम सेक्ट इतनी जल्दी हार मानने वाला नहीं था। उनका लक्ष्य तात्कालिक धंधे या फायदे से कहीं बड़ा था। इसलिए क्लैफम सेक्ट ने ‘महारानी के झंडे’ और ‘ईसाई क्रॉस’ के तालमेल से लंबे समय तक राज करने की थ्योरी गढ़ी। इसके आगे ईस्ट इंडिया कंपनी मात खा गई और 1813 में ब्रिटिश संसद ने चार्टर एक्ट 1813 पास कर दिया। इसके बाद भारत में मिशनरियों के आने, प्रचार-प्रसार का रास्ता आधिकारिक तौर पर खुल गया।

क्या था क्लैफम सेक्ट, भारत से क्यों जुड़ा है कनेक्शन

क्लैफम सेक्ट यह एक समूह था। इसमें कोई व्यापारी था, कोई गणितज्ञ, तो कोई पादरी। साथ ही कुछ सरकारी अधिकारी, सांसद, लेखक और बैंकर भी थे। लेकिन 2 चीजें सबमें कॉमन थीं, 1. सब के सब बहुत ज्यादा अमीर थे और 2. सब कट्टर ईसाई थे।

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वैसे तो ये लोग तथाकथित प्रगतिशील दिखने के लिए तरह-तरह के काम करते थे लेकिन असली मकसद था, ईसाई मजहब का प्रचार-प्रसार करना। इनका फोकस था, भारत और अफ्रीका में मिशनरी कार्य करवाना, पूरी दुनिया में बाइबल भेजना

क्लैफम सेक्ट से जुड़े कुछ प्रमुख नाम थे : विलियम विल्बरफोर्स, चार्ल्स ग्रांट, जैचरी मैकाले (लॉर्ड मैकाले के पिता) और जॉन वेन।

भारत में हिन्दू धर्म और उसकी परंपराएं खत्म हों, ईसाई मिशनरी भेजे जाएं, हिन्दू लोगों को बाइबिल पढ़ाई जाए, इन सबकी शुरुआत विलियम विल्बरफोर्स ने ही की थी वर्ष 1793 में। उस साल वे अपने ध्येय में असफल रहे थे, ब्रिटिश संसद ने उनके बिल को खारिज कर दिया था।

फिर उनके इस मिशन को आगे बढ़ाया था चार्ल्स ग्रांट ने। 1813 में ये लोग सफल हो गए। मतलब आधिकारिक तौर पर अब भारत में ईसाई मजहब का प्रचार-प्रसार करने का लाइसेंस मिल चुका था। इसके बाद जॉन वेन, जो चर्च से जुड़े प्रभावशाली पादरी थे, उन्होंने ही लंदन से 2 पादरियों को भारत भेजा। ये दोनों 4 जुलाई 1814 को मद्रास (अब के चेन्नई) पहुंचे, अपने मकसद को पूरा करने।

अब बात जैचरी मैकाले की। कुछ शख्स के कारनामों को इतिहास में छिपा दिया जाता है, साजिश और षड्यंत्र के तहत। जैचरी मैकाले इनमें से एक है। इसको एक वाक्य में ऐसे समझ सकते हैं, ‘लॉर्ड मैकाले अगर भारतीय शिक्षा प्रणाली का अंग्रेजीकरण करने वाला राजमिस्त्री है, तो उनके पिता जैचरी मैकाले भारतीय शिक्षा प्रणाली के साथ-साथ भारतीय समाज तक में अंग्रेजी-ईसाई की घुसपैठ का नक्शा बनाने वाला इंजीनियर है।’

इन जैसे कट्टर ईसाई लेकिन प्रभावशाली लोगों के प्रयासों के कारण धोखा-लालच-भय आदि के दम पर दुनिया भर (भारत और अफ्रीका थे प्रमुख लक्ष्य) में सामूहिक धर्म-परिवर्तन का दौर चला। इसी कारण ये लोग 19वीं शताब्दी को “मिशनरी कार्यों की महान सदी” तक कहते हैं।

हिन्दू क्या थे, उनकी मान्यताएं कैसी थीं, ईसाई मिशनरियों की सोच क्या थी – दोहराव के बावजूद इसे फिर से पढ़ा जाए।

●   हिन्दुओं के सभी देवी-देवता अशुद्ध और पतित

●   इनके लकड़ी और पत्थर के बने देवता, देव नहीं बल्कि राक्षस

●   हिन्दुओं के सभी सिद्धांत और प्रथाएं सिर्फ ढोंग, सब के सब भ्रष्ट

●   इनकी सभी परंपराएं और विश्वास हास्यास्पद और अपमानजनक

●   हिन्दुओं की लोककथाएं और किंवदंतियां सभी कपट से भरे हुए

●   इसीलिए मूर्ति पूजा की समाप्ति हो और यह समाप्ति होगी ईसाई मजहब को फैलाकर, वो भी अंग्रेजी माध्यम से। हिन्दुओं की मुक्ति का एकमात्र उपाय यही है।

दोहराव के बावजूद उपरोक्त पंक्तियां इसलिए पढ़नी आवश्यक हैं, ताकि समझा जा सके कि अपने इन लक्ष्यों को पाने के लिए क्लैफम सेक्ट ने किन-किन उपकरणों/तंत्रों का सहारा लिया। हिन्दुओं के मन में उनकी ही परंपराओं के प्रति घृणा का भाव कैसे फैलाया, साथ-ही-साथ ईसाई मिशन को कैसे फैलाया, यह भी स्पष्ट होगा।

भारत 1813 के बाद : क्लैफम सेक्ट की चरणबद्ध योजना, शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन

1801-1810 का जो दशक था, उसमें कितने भारतीय नागरिक ईसाई थे? इस प्रश्न का उत्तर है, 1 लाख से भी कम। यह भारत सरकार का डेटा है। जवाहरलाल नेहरू जब प्रधानमंत्री थे, 1961 की जनगणना के साथ इसे भारतीय सांख्यिकी संस्थान द्वारा पब्लिश किया गया था। 1871 तक ये बढ़कर लगभग 9 लाख हो गए, मतलब 70 साल में 800% से ज्यादा की वृद्धि। 10 साल बाद 1881 में इनकी जनसंख्या हो गई, 19 लाख के करीब

वर्तमान का कोई सरकारी डेटा उपलब्ध नहीं है, इसलिए 2011 की जनगणना पर ही बात कर लेते हैं। तब के डेटा के अनुसार देश की कुल आबादी का 2.3% ईसाई लोग हैं – भारत में ही पैदा हुए, फले-फूले सिख, बौद्ध, जैन धर्म की जनसंख्या से कहीं ज्यादा। ‘मिशनरी कार्यों की महान सदी’ में यह संभव हो पाया क्योंकि क्लैफम सेक्ट अपना षड्यंत्र रच भी चुका था, बिछा भी चुका था, शिक्षा, स्वास्थ्य से लेकर प्रशासन तक में ईसाइयत को घुसाकर। स्कूल, कॉलेज, अस्पताल के अलावा ICS अधिकारी (जो अब IAS कहे जाते हैं) तक चर्च के लिए काम करते थे।

ईसाई धर्मांतरण का खेल शुरू किया गया भारतीय शिक्षा व्यवस्था में घुसपैठ करके, हमारी गुरुकुल परंपरा को नीचा दिखाकर। इसको आप एक तुलनात्मक डेटा से समझ सकते हैं:

गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था पर प्रहार

वर्तमान में लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति के तहत ही लगभग पूरे भारत की शिक्षा प्रणाली चल रही है। इसी के तहत पढ़कर IAS-सचिव बने लोग जब RTE (राइट टू एजुकेशन) या ‘समग्र शिक्षा अभियान’ जैसे राष्ट्र स्तरीय प्लान बनाए, तो शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात रखा, 1:20 मतलब 20 छात्र-छात्राओं की पढ़ाई के लिए 1 शिक्षक/शिक्षिका की व्यवस्था। अगर आपको यह बताया जाए कि साल 1830 में भी भारतीय शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात 1:20 ही था, तो आप चौंक जाएंगे… शायद विश्वास भी न करें। तारीफ की बात यह है कि NCERT की कक्षा 8 में यह इतिहास है, जिसे खुद एक ईसाई मिशनरी ने दर्ज किया था।

लॉर्ड मैकाले की रट्टा-मार शिक्षा नीति के विपरीत गुरुकुल में वैदिक गणित, खगोल शास्त्र, धातु विज्ञान, औषधि विज्ञान, शल्य क्रिया, कारीगरी, रसायन शास्त्र, चिकित्सा शास्त्र जैसे कुल 18 विषयों की पढ़ाई होती थी। इतना ही नहीं, उस भारतीय शिक्षा व्यवस्था में अमीर और गरीब दोनों तबकों के बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था थी, न कि आज की तरह, जहां गरीब के बच्चे तथाकथित अच्छे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ने का सपना तक नहीं देख सकते।

CBSE बोर्ड हो या ICSE या राज्य-स्तरीय बोर्ड, हर में लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति के तहत ही पढ़ाई होती है। गुरुकुल परंपरा वाले बड़े विद्यालय, हर गांव में आचार्य आधारित शिक्षा-व्यवस्था का समूल नाश किया गया। मकसद था, हिन्दुओं की सांस्कृतिक और धार्मिक रीढ़ को अंग्रेजी भाषा तथा पश्चिमी शिक्षा प्रणाली से तोड़ना। ब्रिटिश साम्राज्य ने देशी जनता को ईसाई धर्म से जोड़ने के लिए शिक्षक और पादरी को उपकरण के तौर पर इस्तेमाल किया।

मिशनरी अस्पताल से ईसाई प्रचार-प्रसार

शिक्षा के बाद अस्पताल इस षड्यंत्र का दूसरा औजार था। जब जगह-जगह मिशनरी स्कूल खुल गए, बच्चों के कोरे दिमाग पर जब अंग्रेजियत हावी हो गई, तब खोले जाने लगे मिशनरी अस्पताल। यहां ध्यान देने लायक बात यह है कि ईस्ट इंडिया कंपनी के अफसर-सैनिक अपने लिए जो अस्पताल खोलते थे, वो शहरों में होते थे, इसके उलट मिशनरी अस्पताल खोले जाते थे एकदम सुदूर इलाकों में।

दिल्ली जब देश की राजधानी भी नहीं बनी थी, उससे कई दशक पहले बना मेरठ से 20 किलोमीटर दूर स्थित सरधना माता अस्पताल हो या बिहार के बाढ़ग्रस्त इलाके मोकामा में पादरी अस्पताल, ये सब ईसाई मिशनरियों के द्वारा बनाए अस्पताल हैं। ऐसे अस्पतालों के मकसद को समझने के लिए नीचे की तस्वीर को ध्यान से देखें।

असली नाम फॉरेस्टर हॉस्पिटल…, लेकिन बड़े-बड़े अक्षरों में ‘कृपाओं की माता अस्पताल’, फोटो साभार: johnitefromthemissions

इन मिशनरी अस्पतालों ने पिछले 150 वर्षों में क्या खेल किया, इसको भी डेटा से समझते हैं : भारतीय स्वास्थ्य सेवाओं में अब इनकी लॉबी चलती है, अब ये इक्के-दूक्के नहीं… हजारों में हैं। तीन सबसे बड़े ईसाई स्वास्थ्य नेटवर्क को ही देखते हैं –

  • क्रिश्चियन मेडिकल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CMAI)
  • कैथोलिक हेल्थ एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CHAI)
  • इमैनुअल हॉस्पिटल एसोसिएशन (EHA)

CMAI के साथ 12000 से ज्यादा डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ जुड़े हैं। 3500 से ज्यादा अस्पतालों से जुड़ा हुआ CHAI मेडिकल क्षेत्र में भारत का सबसे बड़ा NGO है, हर साल 2 करोड़ से ज्यादा लोगों तक इसकी पहुंच है। EHA दूरदराज स्थित कम्युनिटी अस्पतालों का नेटवर्क है, जो अलग-अलग स्वास्थ्य संबंधी प्रोजेक्ट पर काम करता है।

ये अस्पताल ईसाई मिशनरियों के प्रचार-प्रसार के बड़े अड्डे बने, यह आरोप नहीं है, बल्कि इन्होंने खुद ही इसे इतिहास में दर्ज किया है।

फोटो साभार: Christian Journal for Global Health

ICS : ईसाई मिशनरी के कामों को आगे बढ़ाना

भारतीय समाज को तोड़ने के लिए, बड़े पैमाने पर हिन्दुओं के धर्मांतरण के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य उपकरण भले हो सकते हैं, लेकिन बिना प्रशासनिक सहायता के यह मुमकिन हो ही नहीं सकता था। इसलिए इंडियन सिविल सर्विस (ICS, जो अब IAS जाने जाते हैं) के अधिकारियों को चर्च के साथ-साथ काम करने लायक बनाने की बुनियाद रखी गई।

और यह सब 1813 से पहले शुरू किया जा चुका था चार्ल्स ग्रांट के द्वारा। ईस्ट इंडिया कंपनी का डायरेक्टर रहते हुए वो भले ही मिशनरियों को आधिकारिक तौर पर भारत भेजने में 1813 में सफल हुआ लेकिन उसके पहले 1805-06 में ही उसने एक ऐसे कॉलेज की स्थापना कर दी थी, जहां ICS अफसरों को ट्रेनिंग दी जाए। इस कॉलेज में पढ़ाई-ट्रेनिंग के दौरान लैटिन-ग्रीक (ताकि बाइबिल को समझने में आसानी हो) भाषा, बाइबिल के आधार पर नैतिक शिक्षा आदि पाठ्यक्रम का हिस्सा थे। ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ से सत्ता जब ब्रिटिश शासन के अधीन चली गई, तब भी बाइबिल आधारित ICS ट्रेनिंग बनी रही।

‘एंग्लो इंडियन एटिट्यूड्स : द माइंड ऑफ द इंडियन सिविल सर्विस’ : इस नाम की एक किताब है। ICS अधिकारी चर्च के साथ मिलकर अपने-अपने जिलों में मिशनरियों के कामों (जिसमें धर्मांतरण भी शामिल था) को कैसे आगे बढ़ाते थे, इसका विस्तार से वर्णन है इसमें। उनके मुख्य कामों में से एक काम था, मिशनरियों की मदद करना, प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार करना। ब्रिटिश झंडा और ईसाई क्रॉस एक-दूसरे के पर्याय थे।

फोटो साभार: IJFMR

भारतीय इतिहास (खासकर सनातन को मानने वालों का इतिहास) में साल 1813 एक लकीर है। इससे पहले और इसके बाद के तुलनात्मक अध्ययन से ही यह स्पष्ट होता है कि 1 लाख से कम की आबादी वाला कैसे कोई मजहब मात्र 200 साल के भीतर पूरे भारत का तीसरा सबसे बड़ा जनसंख्या समूह बन जाता है। देश के 4 राज्यों – नागालैंड, मिजोरम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, में ईसाई बहुल आबादी है, मतलब बाकी सभी धर्म/मजहब से ज्यादा। मणिपुर, गोवा, अंडमान-निकोबार, केरल, सिक्किम, इन 5 राज्यों की बात करें तो यहां 10% से लेकर 42% तक ईसाई आबादी हो चुकी है। जिस क्लैफम सेक्ट ने इस षड्यंत्र का ताना-बाना बुना था, उन्हें पता था लक्ष्य, तभी ‘मिशनरी कार्यों की महान सदी’ जैसे शब्द-वाक्य गढ़े गए थे। भारत के संदर्भ में जो डेटा आज हमारे सामने है, वो भी इसकी पुष्टि करते हैं।

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