Menu

जब अमेरिका को भारतीयों की नागरिकता के लिए बनाना पड़ा कानून : दलीप सिंह सौंध के संघर्ष की कहानी

Editor Ritam HindiEditor Ritam Hindi07 Feb 2026, 07:00 am IST
जब अमेरिका को भारतीयों की नागरिकता के लिए बनाना पड़ा कानून : दलीप सिंह सौंध के संघर्ष की कहानी

1 फरवरी 2005 को अमेरिकी संसद में एक असाधारण प्रस्ताव पारित हुआ। सार्वजनिक कानून 109-22। यह कानून किसी राष्ट्रपति या सेनानायक के लिए नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के सम्मान में था, जिसने अमेरिका के नस्लवादी नागरिकता कानून को बदलने में निर्णायक भूमिका निभाई।

उस व्यक्ति का नाम था दलीप सिंह सौंध। जिस अमेरिका ने कभी उन्हें अपना नागरिक मानने से इनकार कर दिया था, उसी देश की संसद ने दशकों बाद स्वीकार किया कि उसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था को अधिक न्यायपूर्ण बनाने में सौंध का योगदान ऐतिहासिक रहा।

दलीप सिंह सौंध, इमेज सोर्स- Britannica

दलीप सिंह सौंध 1919 के बाद उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका पहुंचे। पढ़ाई पूरी कर उन्होंने कैलिफोर्निया में खेती शुरू की और वहीं बस गए। लेकिन जल्द ही उन्हें यह एहसास हुआ कि मेहनत और योगदान के बावजूद वे अमेरिकी समाज में पूरे इंसान नहीं माने जाते। उन्होंने जब अमेरिकी नागरिकता के लिए आवेदन किया, तो सरकार ने साफ जवाब दिया, ‘मौजूदा कानून के तहत भारतीय और अन्य एशियाई लोग नागरिक बनने के पात्र नहीं हैं।’

अदालतों ने भी यही कहा कि एशियाई लोग ‘फ्री व्हाइट पर्सन’ की श्रेणी में नहीं आते, इसलिए उन्हें नागरिकता नहीं दी जा सकती। यह केवल कानूनी अस्वीकृति नहीं थी, बल्कि उनकी पहचान को नकारने जैसा था।

इस नस्लीय भेदभाव का असर सौंध के जीवन पर गहराई से पड़ा। नागरिकता न होने के कारण वे अपने नाम से जमीन नहीं खरीद सकते थे, खेती करने के लिए उन्हें अमेरिकी लोगों के नाम पर जमीन लेनी पड़ती थी। कई बार तो जिसके नाम पर जमीन खरीदी जाती थी वह फसल तैयार होने के बाद देने से ही मना कर देता था। नागरिकता न होने के चलते खेती में हुए नुकसान पर भी सरकार से कोई सहायता नहीं मिलती थी। व्यापार पर भी कानूनी खतरा बना रहता था।

सौंध और अन्य भारतीय किसानों को गोरे अमेरिकियों की हिंसा, अपमान और गालियों का सामना करना पड़ा। खेतों में काम करते समय मारपीट की घटनाएं हुईं, सामाजिक स्तर पर उन्हें ‘आउटसाइडर’ कहकर नीचा दिखाया गया। परिवार को भी यह सब सहना पड़ा। आर्थिक असुरक्षा, सामाजिक बहिष्कार और लगातार यह डर कि कभी भी उनकी मेहनत छिन सकती है।

इन अपमानजनक अनुभवों ने सौंध को तोड़ा नहीं, बल्कि उन्हें संघर्ष के लिए तैयार किया। उन्होंने समझ लिया कि व्यक्तिगत मुकदमे लड़ने से कुछ नहीं बदलेगा। नागरिकता का सवाल पूरे समुदाय का सवाल है। इसी सोच के साथ उन्होंने भारतीय प्रवासियों को संगठित करने के लिए इंडिया एसोसिएशन ऑफ अमेरिका की स्थापना की और अमेरिकी सांसदों तक अपनी बात पहुंचाई। उन्होंने कांग्रेस को बताया कि जो लोग टैक्स देते हैं, खेती करते हैं, अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हैं, उन्हें केवल नस्ल के आधार पर नागरिकता से वंचित नहीं किया जा सकता।

यह लड़ाई लंबी और थकाने वाली थी। कई बार उम्मीद जगी, कई बार निराशा हाथ लगी क्योंकि 1923 में United States v. Bhagat Singh Thind के फैसले ने साफ कर दिया कि भारतीय मूल के लोग ‘free white persons’ नहीं माने जाएंगे और इसलिए वे अमेरिकी नागरिकता के पात्र नहीं होंगे। इससे सौंध सहित सभी भारतीय मूल के आवेदकों के नागरिकता आवेदन नकार दिए जाते थे और यह विचार कानूनी रूप से स्थापित हो गया था कि भारतीय ‘अयोग्य’ हैं।

आखिरकार सौंध की वर्षों की मेहनत और सतत् अभियान के बाद अमेरिकी संसद में ल्यूस-सेलर अधिनियम पारित हुआ, जिस पर 2 जुलाई 1946 को राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने हस्ताक्षर किए। इस कानून के तहत हर साल 100 भारतीयों को अमेरिका में नागरिकता का अधिकार मिला। यह वह क्षण था, जब सौंध की वर्षों की पीड़ा, अपमान और संघर्ष ने ठोस रूप लिया। जिस व्यवस्था ने कभी उन्हें और उनके जैसे हजारों लोगों को ‘अयोग्य’ कहा था, उसी व्यवस्था ने कानून बदलकर यह स्वीकार किया कि यह भेदभाव गलत था।

ल्यूस-सेलर अधिनियम पर राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने हस्ताक्षर करते हुए। फोटो क्रेडिट : wikipedia.org

नागरिकता मिलने के साथ दलीप सिंह सौंध की लड़ाई समाप्त नहीं हुई, बल्कि उसका केवल एक उद्देश्य मात्र पूरा हुआ था। इसके बाद वह उसी अमेरिका में कई बड़े शासकीय पदों पर रहे, जिस देश का कानून उन्हें अपना नागरिक तक मानने को तैयार नहीं था। 16 दिसंबर, 1949 को वह अमेरिका की राजनीति में सक्रिय हुए। जिसके बाद 1952 में वह स्थानीय न्यायाधीश और फिर 1956 में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के लिए चुने गए। वह ऐसा करने वाले न केवल पहले भारतीय अमेरिकी, बल्कि पहले एशियाई अमेरिकी और पहले सिख सांसद बने।

कांग्रेसमैन दलीप सिंह सौंध (बीच में) तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी (बाएं) और उपराष्ट्रपति लिंडन बी जॉनसन के साथ। फोटो क्रेडिट : hindustantimes.com

इस कानून के तहत दलीप सिंह सौंध ‘अमेरिकी लोकतंत्र में योगदान देने वाले अग्रदूत’ के रूप में मान्यता दी गई। साथ ही कैलिफोर्निया स्थित संयुक्त राज्य डाक सेवा भवन का नाम ‘दलीप सिंह सौंध डाकघर भवन’ कर दिया गया।

सौंध को अमेरिका में मिला सम्मान केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं था, बल्कि वह उस संघर्ष के सफल होने की औपचारिक स्वीकृति थी, जिसने अमेरिका में भारतीयों और एशियाई समुदाय के लिए नागरिकता का दरवाजा खोला। दलीप सिंह सौंध की कहानी इस बात का प्रमाण है कि नागरिकता केवल कागज नहीं, बल्कि सम्मान और बराबरी की लड़ाई का परिणाम होती है।

ये भी पढ़ें-प्रिंटिंग प्रेस अंग्रेजों का तोहफा नहीं था, यह भारत में धर्म परिवर्तन का एक जरिया था : सेरामपुर प्रेस का एक केस स्टडी

ये भी पढ़ें-कैसे कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों ने बर्मा में 5 सप्ताह तक ब्रिटिश सेना को रोककर रखा?

Related News