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जन्मदिन विशेष: जब अभिनेता देव आनंद ने इंदिरा गांधी का विरोध किया

Editor Ritam HindiEditor Ritam Hindi26 Sept 2025, 08:00 am IST
जन्मदिन विशेष: जब अभिनेता देव आनंद ने इंदिरा गांधी का विरोध किया
Dev Anand Birthday

एक बार देव आनंद एमरजेंसी में इंदिरा सरकार द्वारा किए गए अत्याचार के खिलाफ खड़े हो गए थे और राजनीतिक दल बनाकर 1979 के चुनाव में कैंडीडेट उतारने जा रहे थे. ऐसे में घबराकर कांग्रेस नेताओं ने फिल्मी सितारों की पार्टी में फूट डलवाकर इस आंदोलन का सफाया कर दिया था. आइए जानते हैं, जीवट के धनी देव साहब के बारे में खास बातें

  • भारत के सदाबहार अभिनेताओं में देव आनंद का नाम सबसे ऊपर रखा जा सकता है. 60 वर्षों से ज्यादा समय तक चले करियर में देव आनंद कभी फीके नहीं पड़े. अभिनेता, लेखक, निर्माता, निर्देशक किसी न किसी रूप में वह दर्शकों से जुड़े रहे.
  • देव आनंद का आरंभिक नाम था, धर्मदेव पिशोरिमल आनंद. फिल्मी दुनिया में आकर वहां की परिपाटी के अनुसार उन्होंने अपना नाम बदलकर देव आनंद रख लिया था.
  • देव आनंद का जन्म 26 सितंबर 1923 को अविभाजित पंजाब के गुरदास पुर (जो अब नारोवाल जिला, पाकिस्तान में है) में हुआ.
  • उनके पिता किशोरीमल आनंद एक प्रसिद्ध वकील थे. उनका परिवार एक मिडिल क्लास परिवार था. एक इंटरव्यू में देव ने बताया था कि उनकी मां बहुत सौम्य महिला थीं. वह देव आनंद से बहुत स्नेह करती थीं. उन्होंने देव के पिता से कहा था, “देखना, देव एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनेगा.” मां के कहे को देव आनंद ने साकार करके दिखा दिया.

कहां तक शिक्षा प्राप्त की है?

  • देव आनंद ने मैट्रिक तक की पढ़ाई सेक्रेड हार्ट स्कूल, डलहौजी (जो उस समय पंजाब में था) से की.
  • इसके बाद उन्होंने गवर्नमेंट कॉलेज, धर्मशाला में पढ़ाई की.
  • फिर वह लाहौर गए, जहां उन्होंने ब्रिटिश भारत के गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर से अंग्रेजी साहित्य में बी.ए. की डिग्री प्राप्त की.
  • विशेष बात यह थी कि जब भारत में उच्च शिक्षा का चलन कम था, तब देव आनंद ने बी.ए. किया और उनके बड़े भाई वकील बने.

उनकी  पारिवारिक पृष्ठभूमि क्या थी?

  • देव आनंद का परिवार एक मध्यम वर्गीय परिवार था. पिता की तरह देव आनंद के सबसे बड़े भाई भी एक सफल वकील बने.
  • पर दूसरे नंबर के भाई चेतन आनंद फिल्मों में हाथ आजमाने मुंबई चले गए.
  • देव आनंद भी पढ़ाई पूरी करके अपने बड़े भाई चेतन के पास मुंबई अभिनेता बनने गए.
  • फिर चौथा और सबसे छोटा भाई विजय आनंद भी दोनों भाइयों की तरह फिल्मों में आ गए.
  • उनकी एक बहन थीं, जिनके बेटे प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक शेखर कपूर हैं.
  • देव आनंद ने जहां विशेष रूप से अभिनेता के रूप में नाम कमाया, वहीं बड़े भाई चेतन आनंद जबरदस्त निर्देशक बने, जिन्होंने ‘नीचा नगर’, ‘हकीकत’, ‘हीर रांझा’,  ‘हंसते ज़ख्म’ और ‘हिंदुस्तान की कसम’ जैसी फिल्में बनाईं. छोटे भाई विजय आनंद ने भी निर्देशक बनकर ‘गाइड’ जैसी कालजयी फिल्म का निर्देशन किया.

मुंबई कैसे आना हुआ?

  • देव आनंद 1942 के आसपास पढ़ाई पूरी करके मुंबई (तब बंबई) किस्मत आजमाने आ गए. हालांकि उनका फिल्मी सफर इतना आसान नहीं रहा.
  • वह साल 1943 में 30 रुपए और कुछ कपड़े लेकर मुंबई अपने सपने के साथ पहुंचे थे. उनके बड़े भाई चेतन आनंद पहले से ही मुंबई में रहते थे, देव आनंद भी उनके साथ रहने लगे.
  • जब देव आनंद  हीरो बनने के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब उन्होंने अपना खर्च चलाने के लिए 85 रुपए मासिक वेतन पर एक कंपनी में अकाउंटेंट की नौकरी शुरू की.
  • इसके बाद उन्हें ब्रिटिश सरकार के सेंसरशिप ऑफिस में नौकरी मिल गई, जहां देव आनंद को 120 रुपए महीने का वेतन मिलता था. उस समय 120 रुपये महीना मिलना भी बड़ी बात थी.
  • देव आनंद मुंबई अभिनेता बनने ही आए थे. इसके लिए वह रोज बड़े-बड़े फिल्म स्टूडियोज का चक्कर लगाते. उस समय उनके मनपसंद अभिनेता अशोक कुमार थे. और किस्मत की बात देखिए, देव आनंद को पहला बड़ा ब्रेक अशोक कुमार ने ही दिया.

पहली फिल्म कब मिली?

  • संघर्ष करते-करते 1946 में,  देव आनंद को प्रभात फिल्म्स की हिंदू-मुस्लिम एकता पर आधारित एक फिल्म ‘हम एक हैं’ में मुख्य भूमिका निभाने का मौका मिला.
  • यह फिल्म 8 जून 1946 को रिलीज हुई और इसकी काफी प्रशंसा हुई.
  • कुछ समय बाद अशोक कुमार ने देव आनंद को एक फिल्म में बड़ा ब्रेक दिया!
  • उन्होंने देव आनंद को बॉम्बे टाकीज़ प्रोडक्शन की फिल्म ‘जिद्दी’ में हीरो की भूमिका में लिया.
  • भारत की आजादी के बाद 1948 में रिलीज़ यह फिल्म अत्यंत सफल रही.
  • इसके बाद देव आनंद फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने में सफल हो गए.
  • एक अभिनेता के रूप में सफल होने के बाद 1949 में देव आनंद ने अपनी एक फिल्म कम्पनी ‘नवकेतन फिल्म्स’ की स्थापना की.
  • इस तरह अब वह फिल्म निर्माता भी बन गए! देव आनंद ने अपने मित्र गुरुदत्त को निर्देशक के रूप में लेकर 1951 में ‘बाज़ी’ फिल्म का निर्माण किया, जिसके हीरो स्वयं देव आनंद ही थे. यह फिल्म काफी सफल हुई.
  • नवकेतन फिल्म्स के मालिक देव आनंद ही थे और उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र सुनील आनंद इसके स्वामी हैं.
  • वर्ष 1970 में ‘प्रेम पुजारी’ फिल्म का निर्माण करते हुए वह पहली बार निर्देशन के क्षेत्र में उतरे. परंतु एक निर्देशक के रूप में उन्हें सीमित सफलता ही मिली. ‘हरे रामा हरे कृष्णा’, ‘देस-परदेस’ उनके द्वारा निर्देशित सफलतम फिल्में हैं.

देव आनंद ने किससे विवाह किया था?

  • देव आनंद बहुत बड़े सिने कलाकार थे, उन्होंने अपनी ही कई फिल्मों में हिरोइन रहीं कल्पना कार्तिक से 1954 में विवाह किया था.
  • कल्पना कार्तिक उनकी कई फिल्मों जैसे ‘आंधियां’, ‘टैक्सी ड्राइवर’, ‘हाऊस नं. 44’ में हिरोइन बन चुकी थीं. विवाह के बाद कल्पना ने फिल्मों को काम करना छोड़कर घर को प्राथमिकता दी.
  • उनका एक ही बेटा हुआ सुनील आनंद, जो फिल्मों में किसी भी रूप में सफल नहीं हो पाए.
  • देव आनंद एक सफल अभिनेता, निर्माता और निर्देशक थे. अपने फिल्मी करियर के अंतिम दो दशकों में उनकी बनाई अधिकांश फिल्में असफल रहीं, जिनसे उन्हें जबरदस्त घाटा होता था.
  • पर वह अपनी खुशी और समाज की बेहतरी के लिए सामाजिक फिल्मों का निर्माण करते रहते थे.

देव साहब का परिवार  

देव आनंद का अपना परिवार बहुत बड़ा है. चेतन आनंद, विजय आनंद कल्पना कार्तिक, शेखर कपूर, बलराज साहनी, परीक्षित साहनी, शेखर कपूर, सुनील आनंद आदि फिल्म इंडस्ट्री के स्थापित नाम हैं.

क्या अजीब अफवाह फैली थी देव साहब को लेकर?   

  • उनके बारे में एक बात बहुत प्रचारित है कि देव आनंद पर काला सूट पहनने पर प्रतिबंध लगाया गया था.
  • देव आनंद का काला कोट और सफेद शर्ट का लुक बहुत लोकप्रिय था.
  • उनकी एक झलक पाने के लिए लड़कियां बेकाबू हो जाती थीं और कुछ लड़कियों ने उनके लिए अपनी जान देने की कोशिश की.
  • यह दीवानगी इतनी बढ़ गई थी कि देव आनंद को सार्वजनिक स्थानों पर काला कोट पहनने से बचने की सलाह दी थी, ताकि भगदड़ और दुर्घटनाओं से बचा जा सके.
  • यह अफवाह फैली कि देव आनंद को अदालत से काला कोट न पहनने का आदेश मिला था.
  • पर देव आनंद ने एक साक्षात्कार में बताया कि किसी भी अदालत ने औपचारिक रूप से उन पर काला कोट पहनने पर प्रतिबंध नहीं लगाया था, जैसा कि कुछ रिपोर्टों में बताया गया है.
  • देव आनंद ने अपनी आत्मकथा ‘रोमांसिंग विद लाइफ’ में इस वाकये की सच्चाई के बारे में लिखा था कि ऐसा कुछ नहीं था. मतलब ये सारी बातें सिर्फ अफवाह है और कोर्ट ने ऐसा कुछ नहीं कहा था.

देव साहब की अच्छी बातें

  • देव आनंद धुन के बहुत पक्के थे. वह सामाजिक मुद्दों पर लगातार फिल्में बनाते रहते थे. फिल्म सफल हो या असफल, उनपर कोई फर्क नहीं पड़ता था. एक फिल्मकार के रूप में वह अपनी जिम्मेदारी समझते थे और लोग इस बात के लिए उनकी बहुत प्रशंसा करते थे.
  • देव आनंद ने फिल्मों में सफल होने के लिए बहुत संघर्ष किया. इसलिए जब वह निर्माता-निर्दशक बने, तो उन्होंने नए चेहरों को प्राथमिकता दी. जैकी श्रॉफ और तब्बू को उन्होंने ही प्रथम ब्रेक दिया था.

उनकी आलोचना करने वाले भी कम नहीं थे

लोग उनकी फ्लॉप फिल्मों के बारे में बहुत मजाक उड़ाते थे, उनकी एक निर्देशक के रूप में फ्लॉप फिल्में बनाने के लिए बहुत आलोचना करते थे, पर यह उनके प्रति पूर्वाग्रह ही था क्योंकि उनकी फिल्में उद्देश्यपरक होती थीं.

कितनी फिल्मों में काम किया था देव आनंद ने?

देवआनंद ने करीब 100 फिल्मों में काम किया था. अभिनेता के रूप में उनकी कुछ प्रसिद्ध फिल्में हैं-

जिद्दी, अफसर, बाजी, जाल, मुनीमजी, काला बाजार, बम्बई का बाबू, हम दोनों महल, प्रेम पुजारी, जॉनी मेरा नाम और देस परदेस.

निर्देशक के रूप में

निर्देशन के क्षेत्र में देव आनंद ज्यादा सफल नहीं हो पाए। 1970 में उन्होंने पहली बार प्रेम पुजारी फिल्म से निर्देशन की शुरुआत की उन्होंने कुल 19 फिल्मों का निर्देशन किया-

प्रेम पुजारी, हरे रामा हरे कृष्णा, हीरा-पन्ना, इश्क-इश्क-इश्क, देस परदेस, लूटमार, स्वामीदादा, आनंद और आनंद, हम नौजवान, सच्चे का बोलबाला, अव्वल नम्बर, सौ करोड़, प्यार का तराना, गैंगेस्टर, मैं सोलह बरस की, सेंसर, लव एट टाइम स्क्वैर, मि. प्राइम मिनिस्टर, चार्जशीट,

उनके निर्देशन कला की तारीफ तो हुई, पर कुछ फिल्मों को छोड़कर उनके निर्देशन की अधिकतर फिल्में असफल ही रहीं.

कौन-कौन से प्रमुख पुरस्कार मिले?

  • देव आनंद को 2 बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर अवार्ड मिला.
  • 1965 में गाइड के लिए सर्वश्रेष्ठ फिल्म का अवार्ड मिला.
  • 2001 में भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण अवार्ड मिला.
  • 2002 में दादा साहब फाल्के अवार्ड से सम्मानित हुए.

देव आनंद का समाज या फिल्म उद्योग पर प्रभाव  

  • देव आनंद सफलता-असफलता के पीछे न पड़कर काम करने को प्राथमिकता देते थे.
  • उनका यह जीवन दर्शन समाज के लिए भी महत्वपूर्ण है.
  • इससे प्रेरणा लेकर कई लोग फिल्म उद्योग में सफल हुए

कभी देव आनंद ने किया था इंदिरा गांधी का विरोध

  • बात 1975 में इमरजेंसी के दौर की है. उस समय कांग्रेस की इंदिरा सरकार की क्रूरता से पूरा देश हिल गया था.
  • भारतीय फिल्मी जगत भी इससे अछूता नहीं था.
  • कई अभिनेताओं ने खुलकर सरकार का विरोध किया था.
  • देव आनंद इंदिरा गांधी के बहुत मुखर विरोधी हो गए थे.
  • उन्होंने कांग्रेस के विरुद्ध चुनाव लड़ने का ऐलान किया था.
  • 1977 में जब आपातकाल के बाद चुनाव आए, तो फिल्मी सितारों ने एकजुट होकर कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने के लिए नेशनल पार्टी का गठन किया.
  • पार्टी के अध्यक्ष सदाबहार अभिनेता देवानंद थे. पर इंदिरा गांधी के विरुद्ध इतनी जबरदस्त लहर थी कि देव आनंद को चुनाव में उतरने की जरूरत नहीं पड़ी.
  • कांग्रेस 1977 में हारी और जनता पार्टी सत्ता में आई. पर दो साल में ही जनता सरकार का पतन हो गया.
  • 1979 में जब जनता सरकार का पतन हुआ और नए चुनाव का ऐलान हुआ, तो इस बार बॉलीवुड ने पूरी गंभीरता से राजनीतिक दल का गठन करने का फैसला किया.
  • चार सितंबर 1979 को मुंबई के ताजमहल होटल में हुई एक प्रेस कांफ्रेंस में ‘नेशनल पार्टी’ के गठन की घोषणा की गई.
  • इसी के साथ पार्टी का घोषणापत्र भी जारी किया गया.
  • इस पार्टी का मुख्यालय वी. शांताराम के मुंबई के परेल स्थित राजकमल स्टूडियो में बनाया गया. हालांकि इसका सक्रिय संचालन देवा आनंद के दफ्तर से ही होता था.
  • देव आनंद और उनके भाई विजय आनंद के अलावा निर्माता-निर्देशक वी. शांताराम, जीपी सिप्पी, श्रीराम बोहरा, आइ.एस. जौहर, रामानंद सागर, आत्माराम, शत्रुघ्न सिन्हा, धर्मेंद्र, हेमामालिनी, संजीव कुमार जैसे अनेक सितारे भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से पार्टी से जुड़ गए.
  • इन तमाम लोगों ने एकमत होकर देव आनंद को पार्टी का अध्यक्ष चुन लिया.
  • फिल्मी जगत से जुड़े लोगों की पार्टी होने के कारण बड़ी संख्या में लोग इससे जुड़ने लगे थे. इससे कांग्रेस काफी चिंतित थी.
  • चुनाव में हार के डर से कांग्रेस के बड़े नेताओं ने जीपी सिप्पी और रामानंद सागर जैसे असरदार फिल्मी हस्तियों को डराया और नसीहत दी कि अगर हमारी जीत हुई, तो सोच लो. चुनाव के बाद होने वाली मुश्किल से फिल्म उद्योग को बचाना है तो इस ‘तमाशे’ को बंद कर दो.
  • इस धमकी के बाद कई अभिनेता सरकार से लड़ने के पक्ष में नहीं थे.
  • धीरे-धीरे नेशनल पार्टी में सक्रिय फिल्मी कलाकार किनारा करने लगे और देव आनंद लगभग अकेले ही रह गए.
  • ऐसे में उन्होंने मजबूरी में नेशनल पार्टी के विचार को खामोशी से दफन कर दिया.
  • परंतु देव आनंद ने दिखा दिया था कि अभिनेता भी जरूरत पड़ने पर सरकार का विरोध करने से पीछे नहीं हटेंगे.

देव आनंद का निधन

  • 2011 के अंत में देव आनंद, लंदन में अपने स्वास्थ्य की जांच के लिए गए थे.
  • वहीं 88 वर्ष की उम्र में 3 दिसंबर 2011 को लंदन के एक होटल  में उनका निधन हो गया.
  • उनकी मृत्यु का कारण कार्डियक अरेस्ट (हृदय गति रुकना) बताया जाता है.
  • उनका अंतिम संस्कार 10 दिसंबर को लंदन में ही किया गया.
  • उनकी अस्थियां भारत लाई गईं और गोदावरी नदी में विसर्जित कर दी गईं.

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