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क्या 1945 में विमान हादसे में हुई थी नेताजी की मौत? जानें उस दिन का अंतिम सच

Editor Ritam HindiEditor Ritam Hindi18 Aug 2025, 09:00 am IST
क्या 1945 में विमान हादसे में हुई थी नेताजी की मौत? जानें उस दिन का अंतिम सच

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सुभाष चंद्र बोस वह नाम हैं, जिनके बिना आजादी की गाथा अधूरी है। “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” का उनका नारा आज भी करोड़ों भारतीयों के दिल में गूंजता है। लेकिन जितना महान उनका जीवन था, उतना ही रहस्यमय उनकी मृत्यु बनी रही। 18 अगस्त 1945 को विमान दुर्घटना से लेकर गुमनामी बाबा की कहानियों तक, आजादी के 78 साल बाद भी देश यह सवाल पूछता है, क्या नेताजी सच में उस दिन चले गए थे या इसके पीछे कोई और रहस्य छिपा है?

18 अगस्त 1945 : वह दिन जिसने इतिहास बदल दिया

द्वितीय विश्व युद्ध अपने अंतिम चरण में था। जापान हार की कगार पर था और नेताजी जापानी सहयोग से भारत की आज़ादी की लड़ाई को नया मोड़ देने की कोशिश कर रहे थे। 18 अगस्त 1945 की सुबह, नेताजी जापान-नियंत्रित ताइवान (तब फोर्मोसा) के ताइहोकू हवाई अड्डे से मंचूरिया की ओर रवाना हुए।

जापानी सेना का विमान उड़ान भरते ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया। नेताजी गंभीर रूप से झुलस गए। डॉक्टरों ने भरसक प्रयास किया, लेकिन तीसरी डिग्री के जलन ने उनकी स्थिति नाजुक कर दी। बताया जाता है कि उसी रात 9 से 10 बजे के बीच नेताजी का निधन हो गया।

लेकिन रहस्य यहीं से शुरू होता है न तो उनकी कोई घायल या मृत तस्वीर सामने आई, न ही कोई आधिकारिक मृत्यु प्रमाण पत्र। यही संदेह बाद में अनेक सिद्धांतों और जांच आयोगों की नींव बना।

अंतिम संस्कार और रेंकोजी मंदिर

20 अगस्त 1945 को ताइहोकू के श्मशान गृह में उनका दाह संस्कार किया गया। अस्थियां 7 सितंबर को जापानी अधिकारी लेफ्टिनेंट तत्सुओ हायाशिदा ने टोक्यो की इंडियन इंडिपेंडेंस लीग को सौंपीं। 14 सितंबर 1945 को टोक्यो में एक स्मृति सभा हुई और उनकी अस्थियां रेंकोजी मंदिर में सुरक्षित रख दी गईं।आज भी यह अस्थियां वहीं रखी हैं। हर साल 18 अगस्त को विशेष प्रार्थना होती है, लेकिन सवाल अब भी जीवित है—क्या ये अस्थियां सच में नेताजी की हैं?

जांच आयोग और रिपोर्टें

नेताजी की मृत्यु को लेकर संदेह और सवाल उठने लगे। इन्हीं सवालों के जवाब के लिए समय-समय पर कई जांच आयोग गठित किए गए।

1. फिगेस रिपोर्ट (1946)

ब्रिटिश सरकार ने सबसे पहले इस मामले की जांच करवाई। कर्नल जॉन फिगेस ने अस्पताल रिकॉर्ड, हवाई अड्डे के दस्तावेज, जापानी अधिकारियों और डॉक्टरों के बयान एकत्र किए। उन्होंने अपनी रिपोर्ट 5 जुलाई 1946 को प्रस्तुत की और निष्कर्ष निकाला कि नेताजी की मृत्यु विमान हादसे में हुई थी।

2. शाहनवाज समिति (1956)

भारत सरकार ने शहनवाज खान की अध्यक्षता में समिति बनाई। इसने भी निष्कर्ष दिया कि 18 अगस्त 1945 को नेताजी विमान दुर्घटना में मारे गए। लेकिन समिति के सदस्य और नेताजी के भाई सुरेश चंद्र बोस ने असहमति जताई और कहा कि रिपोर्ट राजनीतिक दबाव में तैयार की गई।

3. खोसला आयोग (1970)

जस्टिस जीडी खोसला की अध्यक्षता में गठित आयोग ने भी यही निष्कर्ष दिया कि नेताजी की मृत्यु विमान हादसे में हुई थी। लेकिन जनता और परिवार के संदेह बने रहे।

4. मुखर्जी आयोग (1999–2005)

जस्टिस एमके मुखर्जी की अध्यक्षता वाला आयोग सबसे अलग निष्कर्ष पर पहुंचा। इसने माना कि विमान हादसा हुआ ही नहीं और रेंकोजी मंदिर में रखी अस्थियां नेताजी की नहीं हैं। ताइवान सरकार ने भी आयोग को बताया कि उस दिन कोई विमान दुर्घटना दर्ज ही नहीं हुई थी। हालांकि, 2006 में भारत सरकार (यूपीए सरकार) ने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट खारिज कर दी।

मुखर्जी आयोग के निष्कर्ष शाहनवाज समिति और खोसला आयोग अलग

मुखर्जी आयोग (1999-2005): एकमात्र मुखर्जी आयोग ने ही माना कि विमान हादसा नहीं हुआ, नेताजी की मृत्यु की पुष्टि नहीं हो सकती और रेंकोजी मंदिर में रखी अस्थियां नेताजी की नहीं हैं।

ताइवान सरकार ने आयोग को बताया कि उस दिन (18 अगस्त 1945) ताइवान में कोई विमान दुर्घटना दर्ज ही नहीं हुई थी। भारत सरकार (तत्कालीन यूपीए सरकार) ने 2005 में मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया।

सुभाष चंद्र बोस की रहस्मयी मौत पर लेखक संजय श्रीवास्तव का बयान

लेखक संजय श्रीवास्तव की किताब सुभाष बोस की अज्ञात यात्रा के अनुसार, मुखर्जी आयोग का मानना था कि जिस शख्स को सुभाष चंद्र बोस मानकर दाह संस्कार किया गया, वो सुभाष थे ही नहीं बल्कि एक जापानी सैन्य अफसर ओचिरा थे. उसी की अस्थियां जापान के रेंकोजी मंदिर में रखी हैं।

मुखर्जी कमीशन ने अपनी रिपोर्ट भारतीय संसद को 17 मई 2006 को सौंपी. तब तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने इसके निष्कर्षों का खारिज कर दिया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की बेटी अनीता बोस फाफ ने कहा कि मैं नेताजी की अस्थियों के डीएनए टेस्ट के लिए भारत सरकार से संपर्क करूंगी. मैं डीएनए टेस्टिंग के लिए तैयार हूं।

ब्रिटिश सरकार की फिगेस रिपोर्ट का उद्देश्य

ब्रिटिश सरकार ने सबसे पहले सुभाष चंद्र बोस के विमान हादसे की जांच करवाई थी, क्योंकि सुभाष चंद्र बोस स्वतंत्रता संग्राम के सबसे बड़े प्रतीक थे जिनकी वजह से ब्रिटिश प्रशासन यह सुनिश्चित करना चाहता था कि नेताजी वाकई मारे गए हैं या नहीं, ताकि भविष्य में कोई विद्रोह या सशस्त्र आंदोलन न उभरे।

लॉर्ड माउंटबेटन की अध्यक्षता में, दक्षिण-पूर्व एशिया के सुप्रीम एलाइड कमांड ने खुफिया अधिकारी कर्नल जॉन फिगेस (Colonel John Figgess) को नेताजी की मृत्यु की जांच का जिम्मा सौंपा।

यह जांच 1945 से 1946 के मध्य तक चली जिसमें कर्नल फिगेस ने ताइवान, जापान, भारत और अन्य संबंधित जगहों पर जाकर तथ्यों की पड़ताल की। और फिगेस ने अपनी गोपनीय रिपोर्ट 5 जुलाई 1946 को प्रस्तुत की।

उन्होंने अस्पताल रिकॉर्ड, हवाई अड्डे के दस्तावेज, अंतिम संस्कार के प्रमाण, जापानी सैन्य अधिकारियों और डॉक्टरों के बयान, और नेताजी के करीबी सहयोगियों (जैसे कर्नल हबीबुर्रहमान) के साक्षात्कार लिए। फिगेस रिपोर्ट को तत्कालीन ब्रिटिश प्रशासन ने गोपनीय रखा। यह रिपोर्ट 1980 के दशक तक सार्वजनिक नहीं की गई थी।

शाहनवाज समिति की रिपोर्ट पर नेताजी के भाई सुरेश चंद्र बोस की आपत्ति

अप्रैल 1956 में भारत सरकार ने शाहनवाज खान की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति बनाई, जिसने अप्रैल से जुलाई 1956 के बीच भारत, जापान, थाईलैंड और वियतनाम में जाकर 67 गवाहों के बयान दर्ज किए।

समिति के दो सदस्यों (शाहनवाज खान और एसएन मैत्रा) ने निष्कर्ष निकाला कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु 18 अगस्त 1945 को विमान दुर्घटना में हुई थी।

नेताजी के भाई सुरेश चंद्र बोस ने अंतिम रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया और एक असहमति नोट लिखा। उन्होंने आरोप लगाया कि समिति के अन्य सदस्यों और कर्मचारियों ने जानबूझकर कुछ महत्वपूर्ण सबूतों को छुपाया और उनका दावा था कि समिति को नेहरू सरकार द्वारा विमान दुर्घटना में मृत्यु का निष्कर्ष देने के लिए निर्देशित किया गया था।

खोसला आयोग का गठन और मोरारजी देसाई ने की रिपोर्ट खारिज

नेताजी की मृत्यु को लेकर शाहनवाज समिति की रिपोर्ट के बाद भी जनता और नेताजी के परिवार का बड़ा हिस्सा संतुष्ट नहीं था। भारत सरकार ने 1970 में पंजाब हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जीडी खोसला की अध्यक्षता में एक सदस्यीय आयोग गठित किया।

इस आयोग ने शाहनवाज समिति और ब्रिटिश फिगेस रिपोर्ट के निष्कर्षों की पुष्टि करते हुए कहा कि नेताजी की मृत्यु 18 अगस्त 1945 को ताइहोकू (ताइवान) में विमान दुर्घटना में हुई थी। लेकिन 1978 में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने शाहनवाज और खोसला दोनों आयोगों की रिपोर्ट को खारिज कर दिया, जिससे इस मामले की गुत्थी और उलझ गई।

गुमनामी बाबा थ्योरी और विष्णु सहाय आयोग रिपोर्ट का निष्कर्ष

उत्तर प्रदेश के अयोध्या (तत्कालीन फैजाबाद) में “गुमनामी बाबा” नामक एक रहस्यमय साधु ने 1950 के दशक से 1985 तक गुमनाम जीवन बिताया। उनके निधन (18 सितंबर 1985) के बाद उनके सामान में नेताजी सुभाष चंद्र बोस, आजाद हिंद फौज और बोस परिवार से जुड़ी कई वस्तुएं मिलीं, जिससे यह अफवाह फैली कि गुमनामी बाबा असल में नेताजी ही थे।

2016 में उत्तर प्रदेश सरकार ने जस्टिस विष्णु सहाय (सेवानिवृत्त न्यायाधीश) की अध्यक्षता में एक सदस्यीय आयोग गठित किया। आयोग ने 2019 में अपनी अंतिम रिपोर्ट उत्तर प्रदेश सरकार को सौंपी, जिसमें कहा गया कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह साबित करना मुश्किल है कि गुमनामी बाबा ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे या नहीं। सरकार ने गुमनामी बाबा थ्योरी पर भी जांच करवाई। मुखर्जी कमिशन और सहाय कमिशन ने इन दावों को भी निराधार बताया।

नेताजी से जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक करने की प्रक्रिया

23 जनवरी 2016 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 119वीं जयंती पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय अभिलेखागार (National Archives of India) द्वारा नेताजी से जुड़ी 100 गोपनीय फाइलों को डिजिटली सार्वजनिक किया। यह प्रक्रिया आगे भी चरणबद्ध तरीके से चली और कुल 304 फाइलें सार्वजनिक की गईं।

नेताजी के साथ क्या हुआ था वो आज भी एक पहेली है। लेकिन एक बात निश्चित है वह चाहे विमान हादसे में गए हों या गुमनामी में जिए हों, करोड़ों भारतीयों के दिल में उनकी गूंज आज भी जीवित है। नेताजी सिर्फ इतिहास नहीं, भारत की आत्मा हैं।”

 

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