निरस्त्रीकरण का खतरनाक ब्लाइंड स्पॉट : गलवान और पहलगाम जैसी घटनाएं कैसे साबित करती हैं कि भारत को ताकत की आवश्यकता है?

गलवान और ऑपरेशन सिंदूर यह साबित करती हैं कि परमाणु हथियारों से लैस शत्रुओं के सामने मजबूती से खड़े रहने के लिए सशस्त्र प्रतिरोध (डिटरेंस) आवश्यक है। भारत और उसकी सीमाओं की कहानी बताती है कि निरस्त्रीकरण एक व्यक्तिपरक अवधारणा (सब्जेक्टिव) है।
ग्लोबल निरस्त्रीकरण के दोहरे मापदंड
संयुक्त राष्ट्र के वार्षिक दिवसों—5 मार्च (निरस्त्रीकरण दिवस) और 30 मार्च (परमाणु अप्रसार दिवस) पर दुनिया को संयम रखने का उपदेश दिया जाता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि अमेरिका (~5,000 परमाणु वारहेड), रूस (~4,300) और चीन (~500 से अधिक) अपने हथियार भंडार और सैन्य गठबंधनों जैसे AUKUS का विस्तार भी करते जा रहे हैं।
परमाणु अप्रसार संधि (NPT) इस पांच शक्तियों के एकाधिकार को संस्थागत रूप देती है, उन्हें छूट देती है, जबकि अन्य देशों पर दबाव बनाती है। वहीं इजराइल के लगभग 90 अघोषित परमाणु वारहेड होने के बावजूद उस पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जाता।

फोटो क्रेडिट : britannica.com/topic/AUKUS
ऐसी स्थिति में भारत (लगभग 160–180 परमाणु वारहेड) “विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध (Credible Minimum Deterrence)” की नीति अपनाता है। भारत अपने क्षेत्र में मौजूद लगभग 670 शत्रुतापूर्ण परमाणु वारहेड के बीच असुरक्षित रहने के विकल्प को स्वीकार नहीं करता।
गलवान घाटी : ‘शांति’ के बीच हाथापाई
जून 2020 में, चीनी PLA ने लद्दाख के गलवान समझौतों को तोड़ा, जिससे 14,000 फीट पर एक भयानक आमने-सामने की झड़प हुई, प्रोटोकॉल के हिसाब से कोई गोलीबारी नहीं हुई, लेकिन डंडों, पत्थरों और कांटेदार रॉड से हुई लड़ाई में 20 भारतीय (कर्नल संतोष बाबू समेत) और 40+ चीनी मारे गए।

गलवान घाटी हाथापाई : AI GENERATED
इससे निरस्त्रीकरण की नासमझी सामने आई। बातचीत नाकाम रही, बिना मजबूत जवाब के आक्रामकता बढ़ती रही। इसने भारत के ट्रायड बिल्डअप को बढ़ावा दिया, जो सीधे निरस्त्रीकरण विरोधी इरादे से जुड़ा।
ऑपरेशन सिंदूर : सटीक जवाब
पहलगाम आतंकी हमले (26 मारे गए) के बाद मई 2025 में आरम्भ किया गया ऑपरेशन सिंदूर ने पाकिस्तान/PoK में 9 आतंकी स्थानों पर मिसाइलों से हमला किया, जिसमें LeT/JeM के कैंप, गोला-बारूद के डिपो और पाक एयर फोर्स का 20% हिस्सा (जैसे, भोलारी बेस) 23 मिनट में तबाह हो गया। इससे इस्लामाबाद को बीजिंग की रियल-टाइम इंटेलिजेंस के बीच चीन की सप्लाई की गई सुरक्षा व्यवस्था जाम हो गई। 100 से ज्यादा आतंकवादी मारे गए, तीनों सेनाओं के इंटीग्रेशन में ब्रह्मोस, पिनाका, S-400, ड्रोन की शक्ति दिखाई दी। भारत ने LoC पार नहीं किया, फिर भी बहुत बड़ा झटका। पाकिस्तान को चीन/तुर्किए की सहायता ने कई मोर्चों पर खतरों को दिखाया, जिसने भारत के हथियारों के जखीरे को सही साबित किया गया।
गलवान ने शक्ति-संतुलन में मौजूद वास्तविक कमियों को उजागर किया, जबकि ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया कि तकनीकी-आधारित प्रतिरोध (टेक-डिटरेंस) बिना बड़े युद्ध में उलझे भी प्रभावी हो सकता है, जिससे विरोधियों की क्षमता कमजोर होती है और नागरिकों की सुरक्षा भी बनी रहती है।
निर्बल या निहत्था ‘संयम’ अक्सर दबाव और धमकी को आमंत्रित करता है, खासकर तब, जब पड़ोस में पाकिस्तान (लगभग 170 परमाणु वारहेड के साथ) और चीन (500 से ज्यादा परमाणु वारहेड के साथ) जैसे देश मौजूद हों। भारत की रणनीतिक नीति NPT की असमानताओं को चुनौती देती है और भाषणों से अधिक अपनी सीमाओं की सुरक्षा को प्राथमिकता देती है।
जब सीमाएं लगातार खतरे में हों, तब निरस्त्रीकरण का प्रश्न भी अलग अर्थ ले लेता है। ऐसे में पश्चिम के दोहरे मानदंड काम नहीं करेंगे।
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