कैसे कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों ने बर्मा में 5 सप्ताह तक ब्रिटिश सेना को रोककर रखा?

बर्मा (आज का म्यांमार) के घने जंगलों, पहाड़ियों में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐसा अध्याय छिपा है, जिसे इतिहास में हाशिये पर रखा गया। यह कहानी किसी विशाल सेना की नहीं, बल्कि एक दृढ़ निश्चयी भारतीय सैन्य अधिकारी गुरबख्श सिंह ढिल्लों की है।
उस दौर में, जब ब्रिटिश साम्राज्य विश्व में सबसे शक्तिशाली सैन्य शक्ति था, तब आजाद हिंद फौज के इस अधिकारी कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों ने सीमित संसाधनों के बावजूद ब्रिटिश सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था। बर्मा के घने जंगलों में 5 सप्ताह तक ब्रिटिश सेना आगे नहीं बढ़ पाई थी। गुरबख्श सिंह ढिल्लों का अंग्रेजी सेना से यह कोई साधारण टकराव नहीं था, बल्कि वह ऐतिहासिक क्षण था, जब भारतीय सैनिकों ने पहली बार ब्रिटिश सरकार को सीधे युद्धभूमि में चुनौती दी थी।

कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों, इमेज सोर्स- asianstudies.org
द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम चरण में बर्मा, ब्रिटिश रणनीति का अहम केंद्र था। ब्रिटिश सेना टैंकों, भारी तोपखाने और वायुसेना के साथ इस क्षेत्र में आगे बढ़ रही थी। उनका उद्देश्य बर्मा पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर भारत की पूर्वी सीमाओं को सुरक्षित करना था क्योंकि बर्मा से नेता जी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज, भारत से ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकने के लिए भारत की ओर बढ़ रही थी। लेकिन इस क्षेत्र का भौगोलिक परिदृश्य इतना आसान नहीं था। घने जंगल, ऊंची पहाड़ियां, कच्ची सड़कें और इरावदी जैसी विशाल नदी का किनारा। इन्हीं विषम परिस्थितियों में कर्नल ढिल्लों ने ब्रिटिश सेना को चुनौती देने के लिए आजाद हिंद फौज की नेहरू ब्रिगेड की कमान संभाली थी। कर्नल ढिल्लों ने यह भांप लिया था कि अंग्रेजों से खुले मैदान में पारंपरिक युद्ध लड़ना आत्मघाती होगा। तब उन्होंने ब्रिटिश सेना की ताकत से नहीं, बल्कि उसकी कमजोरियों से लड़ने का निर्णय लिया।
कर्नल ढिल्लों ने आजाद हिंद फौज की टुकड़ियों को छोटे-छोटे गुरिल्ला दस्तों में संगठित किया। इन दस्तों का उद्देश्य सीधे युद्ध लड़ना नहीं, बल्कि ब्रिटिश सेना की आपूर्ति लाइनों, संचार नेटवर्क और अग्रिम चौकियों पर अचानक हमला करना था। कर्नल ढिल्लों ने रात के अंधेरे में हमला कर जंगलों में छिपने की नीति अपनाई। यह युद्ध नीति ब्रिटिश सेना के लिए पूरी तरह से नई थी। आजाद हिंद फौज का हर दिशा से दिखाई न देने वाला यह प्रतिरोध ब्रिटिश सेना को भ्रमित करने लगा। उनकी योजनाएं बार-बार बाधित होती रहीं और ब्रिटिश सैनिकों का आत्मविश्वास हिल गया।
फरवरी 1945 में ब्रिटिश सेना ने बर्मा में निर्णायक बढ़त बनाने के लिए इरावदी नदी पार करने की योजना बनाई। यह नदी पार करना उनके लिए सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था। 12 फरवरी 1945 को ब्रिटिश सेना ने न्यांगु और पगान क्षेत्र में भारी हवाई हमलों और तोपखाने की गोलाबारी के साथ नदी पार करने का प्रयास किया। लेकिन कर्नल ढिल्लों के नेतृत्व वाली आजाद हिंद फौज की सैन्य टुकड़ी ने, अंग्रेजों के इस प्रयास को विफल कर दिया। उनके गुरिल्ला हमलों ने ब्रिटिश अग्रिम पंक्तियों को बिखेर दिया। कई स्थानों पर संचार टूट गया, रसद की आपूर्ति बाधित हो गई और ब्रिटिश टुकड़ियां अव्यवस्थित हो गईं। आखिर में ब्रिटिश सेना को पीछे हटना पड़ा। यह वह क्षण था, जब आजाद हिंद फौज ने पहली बार ब्रिटिश सेना को किसी महत्वपूर्ण मोर्चे पर पीछे हटने को विवश किया था। इसने ब्रिटिश सैन्य नेतृत्व की मानसिकता पर गहरा प्रभाव डाला।
इरावदी के बाद संघर्ष माउंट पोपा और क्याउकपडांग की पहाड़ियों तक फैल गया। यहां परिस्थितियां और भी कठिन थीं। भारी टैंक, तोपखाना और निरंतर हवाई बमबारी के साथ, ब्रिटिश सेना ने तीन दिशाओं से हमला किया। किसी भी सेना के लिए ऐसी स्थिति में टिके रहना लगभग असंभव था।
लेकिन कर्नल ढिल्लों ने पीछे हटने के बजाय प्रतिरोध को और संगठित किया। उनकी टुकड़ी ने लगातार पांच सप्ताह तक ब्रिटिश सेना को आगे बढ़ने से रोके रखा। इन पांच सप्ताह में ब्रिटिश सेना के आपूर्ति मार्गों को ध्वस्त किया गया, जिससे ईंधन, गोला-बारूद और खाने-पीने के राशन की समस्या खड़ी हो गई। अंग्रेजों को लंबे और कठिन वैकल्पिक मार्ग अपनाने पड़े, जिससे समय और संसाधनों की भारी क्षति हुई। ब्रिटिश सैन्य अभियानों की गति लगभग ठहर सी गई। ब्रिटिश सेना के पास अत्याधुनिक हथियार और सैनिकों की विशाल संख्या होने के बाद भी, आजाद हिंद फौज ने उनपर बढ़त हासिल की।
ब्रिटिश सेना के लिए यह सैन्य हार ही नहीं, बल्कि एक गहरा मनोवैज्ञानिक झटका भी था। ब्रिटिश नेतृत्व को तब, पहली बार एहसास हुआ कि भारतीय सैनिक यदि संगठित होकर अपने उद्देश्य के लिए लड़ें, तो उनके विशाल साम्राज्य की सैन्य शक्ति भी सीमित हो सकती है। कर्नल ढिल्लों ने अपने पराक्रम और कुशल रणनीति से वर्षों से चली आ रही ब्रिटिश अजेयता के दंभ को तोड़ दिया था। हालांकि वैश्विक परिस्थितियां, विशेषकर युद्ध के अंतिम चरण में हुए घटनाक्रम के कारण, आजाद हिंद फौज को अंततः पीछे हटना पड़ा, लेकिन कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों का यह सैन्य पकाक्रम व्यर्थ नहीं गया।
कर्नल ढिल्लों ने यह सिद्ध कर दिया कि साहस, रणनीति और अटूट संकल्प के बल पर एक शक्तिशाली साम्राज्य को भी रोका जा सकता है। उनके पास न असीम संसाधन थे, न विशाल सेना, फिर भी कर्नल ढिल्लों ने अपने नेतृत्व से ब्रिटिश सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था। इतिहास भले ही इस अध्याय को कुछ पंक्तियों में समेट दे, लेकिन बर्मा की धरती पर हुआ यह सैन्य संघर्ष, भारत की स्वतंत्रता की नींव था। यह इस बात का प्रमाण है कि स्वतंत्रता राजनीतिक समझौतों से नहीं, बल्कि ऐसे सैन्य प्रतिरोधों से हासिल हुई।
जन्म और जीवन
कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों का जन्म 18 मार्च, 1914 को पंजाब के तरणतारण जिले में हुआ था। 1936 में उन्हें ब्रिटिश इंडियन आर्मी की 14वीं पंजाब रेजिमेंट में कमीशन मिला। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना की ओर से लड़ते हुए, जापानी सेना ने उन्हें युद्धबंदी बना लिया। बाद में वह, 1942 में नेताजी सुभाष चंद्र की नेतृत्व वाली आजाद हिंद फौज में शामिल हुए।
नेताजी ने कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों को आजाद हिंद फौज में ‘नेहरू बटालियन’ की जिम्मेदारी सौंपी। कर्नल ने अपने सैन्य पराक्रम और क्षमताओं से अंग्रेजी सेना को कई मोर्चों पर पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था। कर्नल ढिल्लों को 1998 में भारत सरकार ने ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया गया था। राष्ट्र सेवा करते हुए उनका निधन 6 फरवरी 2006 को हुआ।

भारत सरकार से ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित होते कर्नल, पिक्चर क्रेडिट : jatland.com
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