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गुरु अमर दास जी : जब गुरु जी ने महिलाओं के उत्थान और जाति-भेद मिटाने वाली महान क्रांति ‘पीरी प्रणाली’  की शुरुआत की

Editor Ritam HindiEditor Ritam Hindi25 Mar 2026, 08:00 am IST
गुरु अमर दास जी : जब गुरु जी ने महिलाओं के उत्थान और जाति-भेद मिटाने वाली महान क्रांति ‘पीरी प्रणाली’  की शुरुआत की

16वीं सदी में महिलाओं का जीवन अत्यंत कष्टकारी था। वे ज्यादातर पर्दे के पीछे रहती थीं। खासकर मुस्लिम समाज में पर्दा प्रथा का पालन बहुत कठोरता से होता था और आज भी कुछ जगहों पर यह प्रचलन में है।

समाज में पुरुषों का राज था, औरत की हर सांस परिवार की मर्यादा से बंधी हुई थी। अगर वह बाहर निकलती, तो लोग उंगली उठाते। पुरुष संतों से बात करना तो दूर, उनकी आवाज सुनना भी गुनाह माना जाता था। सती प्रथा की आग जलती रहती,  जो सती न हो पातीं, वे विधवाएं सफेद कपड़ों में जीवन भर उदासी में डूबी रहतीं।

हालांकि गुरु नानक देव जी ने बराबरी का सुंदर संदेश दिया था, “सब एक हैं, कोई ऊंच-नीच नहीं।” लेकिन वह संदेश अभी घर-घर तक नहीं पहुंच पाया था। लेकिन तीसरे गुरु, गुरु अमर दास जी ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया और महिलाओं के लिए ‘पीरी प्रणाली’ शुरू की। यह क्या थी और इसने महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार कैसे दिए? आइए इस लेख में विस्तार से जानते हैं।

गुरु अमर दास जी का आगमन

भाई अमर दास तीसरे सिख गुरु बने

तभी गुरु अमर दास जी गोइंदवाल साहिब में गुरु गद्दी पर विराजमान हुए। वे पहले से ही भक्ति में डूबे हुए थे, लेकिन उनकी नजरें समाज की इस कड़वी हकीकत पर पड़ीं। उन्होंने देखा कि महिलाएं धर्म की रोशनी से सबसे ज्यादा दूर हैं। पुरुष प्रचारक उनके घर नहीं जा सकते थे—पर्दा प्रथा और समाज की सख्ती के कारण। महिलाओं को गुरबाणी सुनने, नाम जपने और लंगर की भावना में शामिल होने का मौका ही नहीं मिलता था।

गुरु जी का दिल दुखा। उन्होंने सोचा, ‘अगर पुरुष नहीं जा सकते, तो महिलाएं ही क्यों न अन्य महिलाओं तक पहुंचें?’ इसी सोच से जन्म हुआ पीरी प्रणाली का, सिख इतिहास की सबसे बड़ी क्रांति।

पीरी प्रणाली क्या थी और कैसे महिलाओं आगे लाने में सहायक सिद्ध हुई?

गुरु अमरदास महिलाओं के लिए समानता का उपदेश देते हुए

पीरी का अर्थ था छोटी चारपाई या सीट, लेकिन इसका असली अर्थ था महिलाओं को नेतृत्व। 1560 के दशक में गुरु जी ने 146 प्रचारक नियुक्त किए—94 पुरुष मंजी प्रणाली के तहत, और 52 महिलाएं पीरी प्रणाली के तहत। इन महिलाओं को पूरा अधिकार मिला कि वे घर-घर जाकर अन्य औरतों को गुरबाणी सिखाएं, नाम सिमरन करवाएं, लंगर में हिस्सा लेने की प्रेरणा दें और समानता का पाठ पढ़ाएं। पहली प्रमुख पीरी बनीं गुरु जी की पुत्री बीबी भानी जी। गोइंदवाल में जन्मीं, बचपन से पिता की सेवा में लगीं, गुरमत की गहराई समझने वालीं बीबी भानी ने गोइंदवाल और जालंधर के इलाकों में महिलाओं को बुलाया, “संगत में खुलकर आओ, पर्दा छोड़ो, नाम जपो, लंगर में बैठो।” उनकी आवाज ने सैकड़ों महिलाओं के दिलों में रोशनी जगा दी।

बीबी भानी को वरदान देना, फोटो क्रेडिट : आध्यात्मिक दुनिया

बीबी भानी जी – पहली प्रमुख पीरी

गुरु अमर दास जी की पुत्री बीबी भानी जी इस प्रणाली की पहली महिला नेता बनीं। उनका जन्म गोइंदवाल में हुआ था। वे बचपन से पिता की सेवा करती थीं और गुरमत को गहराई से समझती थीं। गुरु जी ने उन्हें पहली पीरी सौंपी। बीबी भानी गोइंदवाल और जालंधर क्षेत्र में महिलाओं को सिखाती थीं कि संगत में खुलकर आओ, पर्दा छोड़ो, नाम जपो और लंगर में हिस्सा लो। उनकी इस अथक प्रयास से सैकड़ों महिलाएं सिख बनीं।

अन्य प्रमुख पीरियां और उनका योगदान गुरु जी की दूसरी पुत्री बीबी दानी ने विधवाओं को सिखाया कि सती न हों या उपवास न करो, बल्कि नाम सिमरन करो। बीबी पल ने महिलाओं को संगत का सही रास्ता दिखाया। माई दास बैरागी ने लुधियाना में पिछड़े और मुस्लिम महिलाओं तक पहुंच बनाई। ये महिलाएं घर-घर जाकर गुरु नानक की शिक्षाएं फैलाती थीं। खासकर मुस्लिम महिलाओं के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण था, क्योंकि पुरुष प्रचारक उनके पास नहीं जा सकते थे।

महिलाओं की स्थिति में बदलाव पीरी प्रणाली से महिलाओं की जिंदगी पूरी तरह बदल गई। पर्दा प्रथा कमजोर हुई, महिलाएं संगत में स्वतंत्र रूप से आने लगीं, उन्हें शिक्षा और धार्मिक नेतृत्व मिला, और सिख समाज में उन्हें पुरुषों के बराबर माना गया। सती प्रथा, जाति-भेद और विधवा उत्पीड़न पर रोक लगी। गुरु ग्रंथ साहिब में महिलाओं के भजन इसका जीता-जागता प्रमाण हैं।

इसके अलावा और भी कई ऐसे उदाहरण हैं, जिससे गुरु साहिब ने ना सिर्फ महिलाओं को समानता का अधिकार दिलाया बल्कि जात धर्म में भी असमानता को समाप्त करने का संदेश दिया। इसी का एक जीता जागता उदाहरण है गोइंदवाल साहिब की बावली का निर्माण। जिस का विस्तार से आगे वर्णन किया गया है।

बीबी भानी को वरदान देना, फोटो क्रेडिट : आध्यात्मिक दुनिया

गोइंदवाल साहिब की बावली : समानता का प्रतीक गुरु जी ने गोइंदवाल में एक बड़ी बावली बनवाई। उस समय जातिवाद चरम पर था और निचली जाति के लोग सार्वजनिक कुओं से पानी नहीं ले सकते थे। गुरु जी ने साझा बावली बनवाई, जहां ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं था। सब एक ही जगह से पानी लेते थे। बावली में 84 सीढ़ियां बनवाई गईं। गुरु जी ने कहा कि हर सीढ़ी पर जपुजी साहिब का पाठ करो और स्नान करो, इससे 84 लाख योनियों के जन्म-मरण चक्र से मुक्ति मिलेगी।

निर्माण के दौरान एक चमत्कार हुआ—एक बड़ी चट्टान आ गई और पानी नहीं निकला। युवा सिख मनक चंद ने कील ठोकने का बीड़ा उठाया, पानी तेज बहा और वह बह गया। गुरु जी ने नाम लेकर पुकारा तो वह जीवित हो उठा और उसका नाम जीवर पड़ा। महिलाएं रोज 84 सीढ़ियों पर जप करतीं, जिससे उन्हें आध्यात्मिक शक्ति मिलती और सामाजिक बंधन टूटते थे। बावली गोइंदवाल को सिखों का पहला बड़ा तीर्थ बना।

सिख धर्म के प्रसार में पीरी प्रणाली और बावली की भूमिका पीरी प्रणाली ने महिलाओं को केंद्र में रखकर सिख धर्म का प्रचार न केवल पंजाब में बल्कि देश-विदेश में भी किया। घर-घर गुरबाणी और नाम जप पहुंचा, जाति-भेद मिटा और हजारों महिलाएं संगत से जुड़ीं। बाद के गुरुओं ने इस काम को और मजबूत किया।

गुरु अमर दास जी की विरासत और संदेश गुरु अमर दास जी की विरासत आज भी हमें सिखाती है कि सच्चा धर्म सेवा, समानता और महिलाओं के सम्मान से मजबूत होता है। पीरी प्रणाली ने महिलाओं को नेतृत्व दिया और बावली ने जाति-भेद मिटाकर सबको एक किया। आज के समय में जब लिंग भेदभाव और जातिवाद अभी भी मौजूद हैं, गुरु जी का संदेश बहुत प्रासंगिक है : सब बराबर हैं, कोई ऊंच-नीच नहीं। महिलाएं भी समाज की मुख्य धारा में आकर योगदान दे सकती हैं।

गुरु अमर दास जी की विरासत हमें याद दिलाती है – नाम जपो, सेवा करो और समानता अपनाओ। यही सिख धर्म की असली शक्ति है।

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