ईसा मसीह की जगह भगवान लुंगकित्सुंगबा के नाम पर नागालैंड में फैलाया ईसाइयत : 88% ईसाई आबादी के पीछे का सच

‘भगवान लुंगकित्सुंगबा (Lungkitsungba) ने हम सभी को बनाया है।’
नागालैंड में जब पहली बार ईसाई मिशनरी ने धर्मांतरण करवाया, तो उन्होंने ईसा मसीह का जिक्र तक नहीं किया। धर्म परिवर्तन करवाया गया, नागाओं के सबसे बड़े भगवान लुंगकित्सुंगबा (Lungkitsungba) के नाम पर। ‘चर्च, मतलब यीशु दा मंदिर, पास्टर को कहो पापा जी, जिंगल बेल्स कुछ और नहीं, ‘येशु दी बल्ले-बल्ले है’, पंजाब में जो आज चल रहा है, नागालैंड में भी बिल्कुल वही सब किया गया था वर्ष 1872 में, 153 साल पहले। पंजाबियत का चोला ओढ़कर आज पंजाबी समाज में मिशनरी वाले घुसपैठ कर रहे हैं। इसी पैटर्न पर नागालैंड में नागाओं की आस्था और परंपराओं को साथ रखकर शुरुआती धर्मांतरण किया गया।
इन आंकड़ों पर गौर कीजिए : सबसे पहले नागा शख्स के धर्म-परिवर्तन के डेढ़ शताब्दी बाद 2011 की जनगणना के अनुसार वहां की जनसंख्या में 88% ईसाई हैं। 140 वर्ष से कम समय में 1 मात्र ईसाई नागरिक से बढ़कर अब 1739651 नागरिक चर्च की शरण में हैं।
‘मेरा यशु-यशु’ के वायरल मीम की बाढ़ में बहकर पंजाब की डेमोग्राफी भी 88% ईसाई आबादी वाली न हो जाए, इसके लिए जरूरी है, जानना-समझना नागालैंड की कहानी।
10 नवंबर 1872 को नागालैंड में पहली बार 9 लोगों का धर्म परिवर्तन करवाया गया। अमेरिकी पादरी एडवर्ड विंटर क्लार्क ने इन लोगों को एक स्थानीय तालाब में डुबकी लगवाई थी। पादरी के पास न तो कोई बाइबिल थी, न ही वहां जीसस का नाम लिया गया था। भजन भी गाया गया था नागाओं के भगवान लुंगकित्सुंगबा (Lungkitsungba) के नाम पर। योजना ही ऐसी थी, नए बने ईसाई को न तो समाज से कटाव महसूस हो, न ही स्थानीय रीति-रिवाज से।

लेखिका तालिलुला की पुस्तक ‘1872 – ग्राफिक नॉन-फिक्शन’ का एक पृष्ठ, फोटो साभार: frontline
योजना काम कर गई। 42 दिनों के बाद 22 दिसंबर 1872 को 15 और नागाओं का धर्मांतरण कर दिया गया। और इसी दिन बना नागालैंड का पहला चर्च। चर्च मतलब, यूरोपियन स्टाइल वाला नहीं, फूस की झोंपड़ी – ताकि यह भी नागा समाज और उनके रहन-सहन से अलग न दिखे।

नागालैंड का पहला मिशन सेंटर। यही, यहां का प्रथम चर्च भी बना, फोटो साभार: मोलुंगयिम्सेन
दोहराव होने के बावजूद फिर से बता रहा हूं कि नागालैंड में ईसाई धर्मांतरण हो तो रहा था, लेकिन अभी तक वहां बाइबिल नहीं लाया गया था। यह भी सुनियोजित चाल थी। मिशनरी ऐसा कुछ भी नहीं थोपना चाहते थे, जिससे ‘विदेशी’ का भाव स्थानीय लोगों के मन में आए। पहली बार वर्ष 1892 में बाइबिल लाया गया। पहले धर्मांतरण के 20 साल के बाद, वो भी स्थानीय नागा भाषा में अनुवाद वाली।
असम की प्रिंटिंग प्रेस में करना था काम, करने लगा धर्मांतरण
नागालैंड में ईसाई धर्मांतरण की असली कहानी शुरू होती है पादरी ई. डब्ल्यू क्लार्क के साथ। यह अमेरिकी पादरी आया तो था असम स्थित शिबसागर प्रिंटिंग प्रेस का कामकाज देखने, लेकिन धर्मांतरण इसका मुख्य लक्ष्य बन गया। निशान पर थे, नागा लोग।
नागा समाज के लोग व्यवसाय के लिए पहाड़ी से उतरकर असम के मैदानी इलाके में आते थे। वहां मंदिर के किनारे हाट-बाजार में अपनी चीजों को बेचते थे। लेकिन इनसे बातचीत कैसे हो, झांसे में कैसे लिया जाए? भाषा की समस्या पादरी के सामने थी। ऐसे में असम के एक शख्स ने उसकी मदद की।

असम के शिवसागर स्थित माता दुर्गा का देवी डोल मंदिर, पास खड़े नागा समाज के व्यवसायी, फोटो साभार : मोलुंगयिम्सेन
पादरी ई. डब्ल्यू क्लार्क असम मूल के एक व्यक्ति को अपना चेला बना चुका था, या यूं कहिए कि दलाल। गोधुला बरुआ नाम का यह शख्स, धर्म-परिवर्तन करके ईसाई बन गया था। दिलचस्प बात यह है कि इसे ईसाई बनाया गया था शिव डोल मंदिर के शिवसागर तालाब में डुबकी लगवाकर। इसने फिर एक नागा व्यक्ति को झांसे में लिया, नाम था सुपोंगमेरेन। पादरी ई. डब्ल्यू क्लार्क ने उसको भी शिवसागर तालाब में डुबकी लगवाई और ईसाई बना दिया।
सुपोंगमेरेन ही वो माध्यम बना, जिसको लेकर पादरी ई. डब्ल्यू क्लार्क ने नागालैंड में ईसाई धर्मांतरण का पूरा खेल खेला। इसके पहले मिशनरियों ने जब-जब प्रयास किया था, तब-तब नागा समाज के विरोध के कारण उन्हें मुंह की खानी पड़ी थी। पहले आए पादरियों की गलतियों से सीखते हुए पादरी ई. डब्ल्यू क्लार्क ने धीरे-धीरे और बिना किसी बड़े बदलाव को थोपते हुए धर्म-परिवर्तन का काम जारी रखा। स्थानीय भाषा के धर्मांतरित लोग और प्रिंटिंग प्रेस के अपने अनुभव का मिश्रण करके उसने इसे हथियार में तब्दील कर दिया।
मोलुंग प्रिंटिंग प्रेस : नागालैंड में ईसाइयत का हथियार
भगवान लुंगकित्सुंगबा (Lungkitsungba) ने हम सभी को बनाया है।’ लेख की शुरुआत इस वाक्य से की गई थी। इसे एक बार फिर से पढ़िए। यह भी याद कीजिए कि नए बने नागा ईसाइयों के साथ भजन भी गाया गया था नागाओं के भगवान लुंगकित्सुंगबा के नाम पर।
यही वो षड्यंत्रकारी योजना थी, जिसके दम पर पादरी ई. डब्ल्यू क्लार्क ने मोलुंग प्रिंटिंग प्रेस को नागालैंड में न सिर्फ स्थापित किया, बल्कि उससे छपकर जो पन्ने निकले, उसने नागालैंड की सामाजिक संरचना और संस्कृति को लगभग-लगभग मिटा दिया। 88% ईसाई आबादी इसका प्रमाण है।
मोलुंग प्रिंटिंग प्रेस वर्ष, 1884 में नागालैंड के मोलुंगिमसेन गांव में स्थापित किया गया। 1872 में किए गए प्रथम धर्मांतरण के 12 साल बाद। तब तक सब कुछ भगवान लुंगकित्सुंगबा के नाम पर ही चलने दिया गया, भजन या प्रार्थना से लेकर ईसाई बनाने की प्रक्रिया तक। पढ़कर आश्चर्यजनक लगेगा, लेकिन इस प्रिंटिंग प्रेस से शुरुआती काम जो किया गया, वो बाइबिल छापना नहीं था।
1984 में ही ईसा मसीह की धर्म-शिक्षाओं का स्थानीय नागा भाषा आओ (Ao) में अनुवाद किया गया, मोलुंग प्रिंटिंग प्रेस में। 4 साल के बाद स्थानीय लोथा (Lotha) भाषा और अंगामी (Angami) भाषा में फिर प्रकाशन हुआ। बाइबिल आया 20 साल बाद 1892 में, वो भी स्थानीय भाषा में। 1911 में प्रकाशित की गई आओ भाषा वाली डिक्शनरी। मोलुंग प्रिंटिंग प्रेस से निकले पन्नों की क्रोनोलॉजी देखने पर स्पष्ट हो जाएगा कि इन सबके पीछे की मंशा नागाओं की प्रगति कभी नहीं थी। मकसद था : नए-नए धर्मांतरित हुए नागाओं को धीरे-धीरे उनकी परंपराओं से काटना, धीरे-धीरे ईसाइयत की ओर ले जाना। प्रगति अगर मकसद होता, तो 88% ईसाई आबादी वाला राज्य नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार बेरोजगारी, GDP, प्रति व्यक्ति आय आदि के पैमानों पर फिसड्डी नहीं रहता।
एक और आश्चर्यजनक तथ्य जानिए : भगवान लुंगकित्सुंगबा के नाम पर 20 साल तक लोगों को मूर्ख बनाने, उन्हें धर्मांतरित करने के बाद भी ‘ईसा मसीह’ शब्द नहीं बताया गया। चूंकि नागा लोग भगवान कृष्ण और भगवान विष्णु से ज्यादा करीबी रखते थे, इसलिए जब नए भगवान के लिए शब्द रचने का समय आया तो, ‘ईसा मसीह’ की जगह शब्द दिया गया – ईशू ख्रिस्टा।
एशिया का सबसे बड़ा चर्च
क्या आपको पता है एशिया का सबसे बड़ा चर्च कहां है? मुंबई या मनीला में, हॉन्ग कॉन्ग, केरल या बैंकॉक में? सारे विकल्प गलत हैं क्योंकि नागालैंड है सही उत्तर। जी हां। वह राज्य जो नीति आयोग के विकास वाले आंकड़ों पर फिसड्डी है, वहां के जुन्हेबोटो (Zunheboto) शहर में बना है एशिया का सबसे बड़ा चर्च।

नागालैंड स्थित जुन्हेबोटो सुमी बैपटिस्ट चर्च, फोटो साभार: यूट्यूब चैनल DreamtoRide
1. फूस की झोंपड़ी वाले चर्च की तस्वीर याद कीजिए।
2. ऊपर एशिया के सबसे बड़े चर्च को देखिए।
3. ईसाई मिशनरी हमारे यहां सभ्यता और शिक्षा का पाठ पढ़ाने आए थे, इस ढोंग को याद कीजिए।
4. विकास के पैमानों पर नीति आयोग ने नागालैंड को फिसड्डी बताया है, इस तथ्य को भी जानिए।
ऊपर के चारों बिंदुओं को मिलाकर समग्र रूप में देखिए। नागालैंड में ईसाई मिशनरी क्यों आए थे, कहानी स्पष्ट हो जाएगी। पंजाब में आज जो चल रहा है, वहां भविष्य में क्या होगा, यह तस्वीर भी स्पष्ट हो जाएगी।
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