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ऑपरेशन अलोंद्रा रेनबो : जब पहली बार समुद्री लुटेरों का सामना भारतीय तटरक्षक बल से हुआ!

Editor Ritam HindiEditor Ritam Hindi31 Jan 2026, 08:00 am IST
ऑपरेशन अलोंद्रा रेनबो : जब पहली बार समुद्री लुटेरों का सामना भारतीय तटरक्षक बल से हुआ!

भारत के समुद्री इतिहास में एक दिन ऐसा भी आया, जब भारतीय तटरक्षक बल (Indian Coast Guard-ICG) ने अरब सागर में खूंख्वार समुद्री डाकुओं से लड़ाई लड़ी। इस लड़ाई को नाम दिया गया था, ऑपरेशन अलोंद्रा रेनबो (Operation Alondra Rainbow), जिसने न केवल भारत की समुद्री ताकत, बल्कि उसकी बुद्धिमत्ता को भी पूरी दुनिया के सामने साबित किया।

1 फरवरी को पूरे देश में भारतीय तटरक्षक दिवस (Indian Coast Guard Day) मनाया जाता है। इसी दिन 1977 में इस बल की नींव रखी गई थी। तो आइए, इस अवसर पर ऑपरेशन अलोंद्रा रेनबो के बारे में विस्तार से जानते हैं कि कैसे भारत के समुद्री सुरक्षा इतिहास में इसने एक स्वर्ण अध्याय जोड़ा।

(Photo Courtesy: Indian Navy Archive)

जब जापानी जहाज को समुद्री डाकुओं ने हाईजैक किया

कहानी की शुरुआत 22 सितंबर 1999 से होती है, जब ‘एमवी अलोंद्रा रेनबो’ (MV Alondra Rainbow) नामक एक जापानी मालवाहक जहाज, दक्षिण चीन सागर में 10-12 सशस्त्र इंडोनेशियाई समुद्री डाकुओं के कब्जे में आ गया। अलोंद्रा रेनबो में इलेक्ट्रॉनिक सामान से लदा हुआ था। इसका मूल्य लगभग 2 मिलियन डॉलर था। डाकुओं ने जहाज के मूल जापानी चालक दल के 10 सदस्यों को जहाज से बाहर फेंक दिया, लेकिन वे थाईलैंड के फुकेट तट के पास बच निकले।

इसके बाद समुद्री डाकुओं ने जहाज का नाम बदलकर ‘एमवी मेगा रामा’ (Mega Rama) रख दिया, इसे फिर से रंगा और पाकिस्तान की ओर ले गए, इनका इरादा लूट के इस माल को बेचना था। जहाज के अपहरण की इस खबर की सूचना अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठनों, जैसे UKMTO (UK Maritime Trade Operations) और PRC (Piracy Reporting Centre) ने जारी की।

नाम बदला, रंग बदला, लेकिन भारतीयों की नजर से नहीं बचा

कुछ हफ्तों बाद 13 नवंबर 1999 को भारतीय व्यापारी जहाज ‘एमवी अल शुअदा’ के कप्तान ने कन्याकुमारी के दक्षिण-पश्चिम में 66 नॉटिकल मील दूर एक संदिग्ध जहाज देखा, जो ‘अलोंद्रा रेनबो’ जैसा लग रहा था लेकिन नाम ‘मेगा रामा’ था। यह जहाज उत्तर-पश्चिम दिशा में 8 नॉटिकल मील की गति से जा रहा था।

पीआरसी ने तुरंत भारतीय तटरक्षक मुख्यालय (नई दिल्ली) और डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ शिपिंग (मुंबई) को अलर्ट किया। तटरक्षक मुख्यालय ने कोच्चि से ICGS तारा बाई (Tarabai) जहाज को तैनात किया और दमन से डोर्नियर-228 विमान से हवाई निगरानी शुरू की। फोटो और विवरण अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों को भेजे गए, जहां से पुष्टि हुई कि यह वही अपहृत जहाज है।

ऐसे हुई डाकुओं की घेराबंदी

अब शुरू हुआ जहाज का पीछा। भारतीय तटरक्षक बल ने मुंबई क्षेत्र से अपने जहाज ICGS वीरा (Veera) और एनी बेसेंट (Annie Besant) को बुलाया। भारतीय नौसेना ने भी सहायता दी, जिसमें INS प्रहार (Prahar) और एक इल्यूशिन-38 (Ilyushin-38) लंबी दूरी का गश्ती विमान शामिल था। 16 नवंबर 1999 को अरब सागर में लगभग 750 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद, INS प्रहार ने जहाज पर चेतावनी के रूप में गोलीबारी की। जहाज रुक गया, लेकिन डाकुओं ने विरोध किया।

तटरक्षक की बोर्डिंग टीम ने जहाज पर चढ़कर दस्तावेज, माल और चालक दल की जांच की। जहाज की पहचान पुष्ट हुई कि यह ‘अलोंद्रा रेनबो’ ही था। डाकू हथियारों से लैस थे, लेकिन भारतीय बलों की त्वरित कार्रवाई के कारण उन्हें सरेंडर करना पड़ा।

भारतीय जवानों ने ऐसे कराया सरेंडर

समुद्री लुटेरों ने हथियार उठाए, लेकिन भारतीय जवानों की तैयारी और साहस के सामने टिक नहीं पाए। सात इंडोनेशियाई डाकुओं को गिरफ्तार किया गया। जहाज को नुकसान हुआ था, फिर भी उसे सुरक्षित रूप से मुंबई लाया गया। अदालत में इन डाकुओं पर मुकदमा चला और 100 वर्षों में पहली बार समुद्री लुटेरों पर सफल अभियोजन हुआ। हालांकि बाद में तकनीकी वजहों से कुछ फैसले पलटे गए, लेकिन भारत ने यह साबित कर दिया कि उसके समुद्री सीमा में अब कोई अपराधी नहीं बच सकता।

‘ऑपरेशन अलोंद्रा रेनबो’ सिर्फ एक मिशन नहीं था, बल्कि यह भारत की समुद्री शक्ति, अनुशासन और अंतरराष्ट्रीय दायित्व की मिसाल भी बन गया। इस अभियान ने भारत-जापान के संबंधों को और मजबूत किया और दुनिया को दिखाया कि भारतीय नौसेना और तटरक्षक सिर्फ सीमाएं नहीं, बल्कि न्याय की भी रक्षा करते हैं।

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