पंजाब में अलगाववाद: पश्चिम क्यों एक ऐसे आंदोलन का घर बना, जो भारत में कभी सफल नहीं हुआ?

23 दिसंबर, 2020 को, ऑकलैंड (न्यूजीलैंड) के रेडियो होस्ट हरनेक सिंह, जो पंजाब अलगाववादी सोच के खिलाफ बोलने के लिए जाने जाते हैं, पर उनके ड्राइववे में धार्मिक कट्टरपंथियों के एक ग्रुप ने हिंसक हमला किया। इस हमले में उन्हें गंभीर चोटें आईं। दिसंबर 2023 में, न्यूजीलैंड की एक कोर्ट ने हमले में शामिल तीन कट्टरपंथियों को हत्या की कोशिश के लिए दोषी ठहराया। सर्वजीत सिद्धू (27) ने हत्या की कोशिश का जुर्म कबूल किया, सुखप्रीत सिंह (44) को उसकी मदद करने वाला पाया गया और साथ में एक 48 साल का ऑकलैंड का निवासी, जिसकी पहचान हमले के प्लानर के तौर पर हुई, जो हरनेक सिंह के प्रति गुस्से से प्रेरित था।
यह न्यूजीलैंड में पंजाब अलगाववाद से जुड़ी हिंसा के कुछ मामलों में से एक है। हाल ही में, सिख फॉर जस्टिस (SFJ), जो पंजाब के लिए एक अलग राज्य के लिए कैंपेन चलाने वाला एक यूएस बेस्ड ग्रुप है, ने 2024 में ऑकलैंड के आओटिया स्क्वायर में ऐसा ही एक जनमत-संग्रह आयोजित किया था। हालांकि ये जनमत-संग्रह आयोजित करना कानूनी तौर पर नहीं हुआ। यह हमें मुख्य सवाल पर वापस लाता है कि पंजाब अलगाववाद आंदोलन न्यूजीलैंड और दूसरे पश्चिमी देशों में कैसे फैला?
इस आर्टिकल में, हम बता रहे हैं कि ‘खालिस्तान’ नाम पहली बार भारत, यूके या कनाडा में नहीं, बल्कि न्यूयॉर्क में कैसे सामने आया। हम आपको साल 1971 के आरंभ हुए पंजाब अलगाववाद के शुरुआत बारे में यहां बता रहे हैं।
एक अलग देश की चाहत : पंजाब में नहीं, बल्कि न्यूयॉर्क में (खालिस्तान की मांग)
अक्तूबर 1971 की एक ठंडी पतझड़ की सुबह, द न्यूयॉर्क टाइम्स के हलचल भरे न्यूजरूम में एक ऐड था, जिसे बहुत कम अमेरिकी समझ पाए। इसे विदेश में रहने वाले, एक कम जाने-पहचाने भारतीय नेता, जगजीत सिंह चौहान ने दिया था, जो पंजाब प्रांत का पूर्व वित्त मंत्री था। भारत में लोकल चुनाव हारने के बाद, उसके मन में न्यूयॉर्क टाइम्स में एक ऐड देने का आइडिया आया, जिसमें ‘खालिस्तान’ नाम का एक अलग सिख देश बनाने की मांग की गई थी।

फोटो क्रेडिट : reddit.com/r/IndianDefense
भारत छोड़ने के बाद, चौहान 1971 में लंदन गया, उसका मकसद दुनिया भर की सिख पॉलिटिक्स को नया आकार देना था। पश्चिम का ध्यान खींचने के लिए, उसने दुनिया भर के मीडिया के सेंटर, न्यूयॉर्क में एक विज्ञापन पोस्ट किया। न्यूयॉर्क टाइम्स में ऐड के बाद, उसने यूनाइटेड नेशंस के सामने एक प्रदर्शन की भी मांग की। लेकिन, एक चिट्ठी से पता चला कि ज्यादा लोग नहीं आए।

फोटो क्रेडिट : reddit.com/r/IndianDefense
उसने ‘खालिस्तान’ के प्रेसिडेंट का रोल भी संभाला और अपनी ‘सरकार’ के लिए लेटरहेड और सिंबॉलिक पासपोर्ट, पोस्टेज स्टैम्प और करेंसी (खालिस्तानी डॉलर) भी छापे। इन सिंबॉलिक कामों के जरिए उसने अपने अलगावदी विचारों को और ज्यादा कानूनी मान्यता देने की कोशिश की। पर यह मूवमेंट कभी शुरू नहीं हुआ।
यह विचार सिर्फ एक प्रतीक बन गया है
1970 के दशक से लेकर अब तक, जब हम पश्चिमी दुनिया में इस अलगाववादी विचारों के विकास को देखते हैं, तो हम उन्हें सिर्फ 3 अलग-अलग मामूली हिस्सों में बांट सकते हैं। पहला, कनाडा और यूके में SFJ जैसे कुछ ऑर्गनाइजेशन का उभरना, जो भारतीय डिप्लोमैट्स और नेताओं को धमकाते हैं। दूसरा, ये ऑर्गनाइजेशन भारत को तोड़ने और एक अलग पंजाब राष्ट्र बनाने की अपनी प्रतीकात्मक इच्छाओं को बनाए रखने के लिए पश्चिमी देशों में राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक या नैतिक दबाव बनाने के लिए गैर मान्यता प्राप्त जनमत-संग्रह करवाते हैं। तीसरा, ये ऑर्गनाइजेशन कभी-कभी कनाडा, यूके, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भारतीय मंदिरों और डिप्लोमैटिक मिशन पर भी हमला करते हैं।
न्यूजीलैंड में हरनेक सिंह पर हमले की कोशिश ने इस प्रतीकात्मकता का सबसे खतरनाक पहलू दिखाया, जब पंजाब में बिना किसी बेस वाला विचार विदेशों में अत्यधिक उग्र, हिंसक कार्यों में बदल जाता है। ऐसी अलगाववादी विचारधारा अब पश्चिमी लोकतंत्र के गलियारों में भी फीकी पड़ती दिख रही है।
ये भी पढ़ें-₹4,000 की डकैती बनाम ₹8 लाख का मुकदमा : कैसे काकोरी ट्रेन डकैती जांच ने ब्रिटिश साम्राज्य को नुकसान पहुंचाया
ये भी पढ़ें-विरोध से प्रतिज्ञा तक: हिंदुत्व के प्रतीक के रूप में भगवद्गीता का उदय (2007-2025)















