Shivaram Rajguru Birthday: शहीद राजगुरु की जयंती पर जानें उनके बारे में जानने योग्य तथ्य

महान स्वतंत्रता सेनानी शिवराम हरि गुरु यानी राजगुरु का जन्म 24 अगस्त 1908, खेड़ा गांव (वर्तमान में राजगुरु नगर), पुणे जिला, महाराष्ट्र में मराठी के ब्राह्मण परिवार में हुआ था. शिवराम के पिता का नाम हरि नारायण और माता का नाम पार्वती बाई था. इनकी माता भगवान शिव की अनन्य भक्त थीं. उन्होंंने राजगुरु को भगवान शिव का प्रसाद समझकर ही उनका नाम शिवराम रखा था.
शुरुआती संघर्ष: उन्होंने 6 वर्ष की उम्र में अपने पिता को खो दिया था, जिसके बाद उनका लालन-पोषन उनकी मां और बड़े भाई दिनकर ने किया. वे पढ़ने में अच्छे थे. उनके लिए उनके परिवार ने कुछ सपने देखे थे लेकिन नियति कुछ और ही चाहती थी. वह लोकमान्य तिलक के क्रांतिकारी विचारों से प्रेरित थे.
एक महत्वपूर्ण घटना यह है कि केवल 14 वर्ष की आयु में अंग्रेजी परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने पर बड़े भाई द्वारा अपमानित किए जाने के बाद, वे केवल 11 पैसे लेकर घर से निकल गए थे. यह घटना उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और क्रांतिकारी आकांक्षाओं का प्रारंभिक संकेत थी, जो उन्हें सीधे काशी ले गई .
शिक्षा: राजगुरु की प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही एक मराठी स्कूल में हुई थी. 15 साल की उम्र में वे वाराणसी गए और संस्कृत के एक विद्यालय में दाखिला लिया.उन्होंने हिन्दू धर्म ग्रंथों तथा वेदों का अध्ययन तो किया ही, लघु सिद्धांत कौमुदी जैसा क्लिष्ट ग्रंथ बहुत कम आयु में कंठस्थ कर लिया. वहां उनकी मुलाकात कई क्रांतिकारियों से हुई. उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए वह पुणे के न्यू इंगलिश हाई स्कूल में दाखिल हुए.
रुचि: राजगुरु जन्म से ही नीडर, सहासी और नटखट थे. उनके अंदर देशभक्ति कुट-कुट कर भरी हुई थी.बचपन से ही वे ब्रिटिश राज द्वारा भारतीयों पर किए गए अत्याचारों से बहुत प्रभावित थे. वे हमेशा क्रांतिकारी आंदोलन में शामिल होना चाहते थे और न्याय के लिए लड़ना चाहते थे. साथ ही इन्हें कसरत (व्यायाम) का बेहद शौक था और छत्रपति शिवाजी की छापामार युद्ध शैली के बड़े प्रशंसक थे.
विचारधारा: राजगुरु वीर शिवाजी और बाल गंगाधर तिलक से बहुत प्रभावित थे. वे क्रांतिकारी तरीके से हथियारें के बल पर आजादी हासिल करने की विचार रखते थे, जो कि महात्मा गांधी के अहिंसा के विचारों से बिल्कुल विपरीत थे.
कैरियर और उपलब्धियां
1924 में उन्होंने चन्द्रशेखर आजाद प्रभावित होकर उनकी पार्टी हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी में जुड़ गए, उस वक्त उनकी उम्र केवल 16 साल थी. इनका और उनके साथियों का मुख्य मकसद था ब्रिटिश अधिकारियोंके मन में खौफ पैदा करना. साथ ही वे घूम-घूम कर लोगों को जागरूक करते थे और जंग-ए-आज़ादी के लिये जागृत करते थे.
हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी (HSRA) की स्थापना
1924 में राम प्रसाद बिस्मिल और उनके सहयोगियों द्वारा हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के रूप में स्थापित इस समूह को बाद में पुनर्गठित किया गया और आज़ाद के नेतृत्व में इसकी समाजवादी विचारधारा पर जोर देने के लिए इसका नाम बदलकर हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी (HSRA) रख दिया गया. HSRA की स्थापना 10 सितंबर1928 में चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और अन्य क्रांतिकारियों द्वारा की गई थी.
यह संगठन भारत में समाजवादी गणराज्य की स्थापना के प्राथमिक उद्देश्य के साथ उभरा, जिसने समाजवाद पर केंद्रित क्रांतिकारी गतिविधि में बदलाव को चिह्नित किया.
HSRA की विचारधारा
HSRA का यह मानना था कि अहिंसा अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध नहीं जीत सकती. राजगुरु स्वयं उग्र राष्ट्रवाद में विश्वास रखते थे और उनका मानना था कि उत्पीड़न का जवाब क्रूरता और हिंसा से दिया जाना चाहिए.
उनके दृढ़ निश्चय को दर्शाने वाली एक घटना तब हुई जब उन्होंने जानबूझकर अपने नंगे हाथों से एक गर्म लोहे को छुआ. जब चंद्रशेखर आज़ाद ने इस तरह के कृत्य की समझदारी पर सवाल उठाया, तो राजगुरु ने समझाया कि वे संभावित पुलिस क्रूरता के लिए तैयारी में अपने लचीलेपन का परीक्षण कर रहे थे.
काकोरी कांड 1925
1925 में काकोरी कांड के बाद क्रांतिकारी संघ लगभग खत्म-सा हो गया, इसलिए नेता पार्टी को दोबारा खड़ा करने के लिए नए-नए नौजवानों को अपने साथ जोड़ रहे थे और इसी समय इनकी मुलाकात मुनिशर अवस्थी से हुई और उनकी सहायता से राजगुरु इस संघ से जुड़ गए.आजाद की पार्टी में उन्हें रघुनाथ के छद्म के नाम से जाना जाता था. पार्टी में रहकर उन्होंने निशानेबाजी सीखी और HSRA के ‘गनमैन’ के रूप में प्रसिद्ध हुए.
19 दिसंबर 1928 को इस ब्रिटिश पुलिस को मार गिराया
भगत सिंह और सुखदेव के साथ मिलकर उन्होंने ब्रिटिश पुलिस ऑफिसर जेपी साण्डर्स की हत्या कर दी. यह हत्या लाला लाजपत राय की मौत के बदले में ली गई थी. लाला लाजपत राय जिनकी मौत साइमन कमीशन का विरोध करते वक्त हुई थी. हालांकि, गलत पहचान के एक मामले में, सॉन्डर्स मारा गया. फिर भी, क्रांतिकारियों ने घोषणा की कि उन्होंने लाला लाजपत राय की मौत का बदला ले लिया है. इसमें राजगुरु और भगत सिंह ने घातक गोली-बारी की थी.
हत्या के बाद, राजगुरु पुलिस से बचने के प्रयास में नागपुर भाग गए. दुर्भाग्य से, पुणे जाते समय उन्हें पकड़ लिया गया और बाद में गिरफ्तार कर लिया गया.
8 अप्रैल 1929, सेंट्रल असेम्बली बम विस्फोट
राजगुरु के जीवन की सबसे उल्लेखनीय घटनाओं में से एक, भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त के साथ दिल्ली में केंद्रीय विधान सभा में बमबारी में उनकी भागीदारी थी. उसके बाद 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली में सेंट्रल असेम्बली में हमला करने में राजगुरु का बड़ा हाथ था. राजगुरु, भगत सिंह और सुखदेव का खौफ ब्रिटिश प्रशासन पर इस कदर हावी हो गया था कि इन तीनों को पकड़ने के लिये पुलिस को विशेष अभियान चलाना पड़ा.
1929 में, राजगुरु, भगत सिंह और सुखदेव थापर के साथ लाहौर षडयंत्र मामले के सिलसिले में गिरफ़्तार हुए. बाद में उन पर मुकदमा चलाया गया और अंततः जेपी सॉन्डर्स की हत्या में उनकी भागीदारी के लिए उन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई. पुलिस ने इन तीनों पर लाहौर षड्यंत्र के तहत केस चलाया और 7 अक्तूबर, 1930 को राजगुरु को सांडर्स की हत्या के जुर्म में फांसी की सजा सुना दी. तीनों क्रांतिकारियों को 24 मार्च, 1931 को फांसी होनी थी जिसका पूरे देश में विरोध-प्रदर्शन होने लगा. इससे ब्रिटिश सरकार घबरा गई और समय से एक दिन पहले ही 23 मार्च, 1931 को भगत सिंह व सुखदेव सहित राजगुरु को लाहौर की जेल में फांसी दे दी गई और भारत मां के ये सपूत हमेशा के लिए अमर हो गए. राजगुरू केवल 22 साल के थे जब उनको फांसी की सजा दी गई.
भगत सिंह और सुखदेव के साथ अटूट संबंध
राजगुरु, भगत सिंह और सुखदेव भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक अविभाज्य तिकड़ी के रूप में जाने जाते हैं. उनकी दोस्ती और वैचारिक एकता ने उन्हें एक शक्तिशाली क्रांतिकारी बल बनाया. तीनों ने मिलकर ब्रिटिश राज के खिलाफ सशस्त्र क्रांति का मार्ग अपनाया और एक-दूसरे के प्रति अटूट निष्ठा रखी. वे युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गए, और उनकी सामूहिक शक्ति ने स्वतंत्रता आंदोलन को एक नई दिशा दी.
राजगुरु की अमर विरासत और स्मरण
शहीद दिवस का महत्व
पूरे भारत में इन वीर पुत्रों ( भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव) की पुण्यतिथि 23 मार्च को ‘शहीद दिवस’ के रूप में मनाई जाती है. यह दिन इन अमर शहीदों के बलिदान को याद करने और युवा पीढ़ी को उनके संघर्ष और आदर्शों से प्रेरित करने के लिए समर्पित है.
राजगुरुनगर का नामकरण और अन्य सम्मान
राजगुरु के सम्मान में उनके जन्मस्थान, पुणे के खेड़ा गाँव का नाम बदलकर ‘राजगुरुनगर’ कर दिया गया है. 2013 में उनकी स्मृति में एक डाक टिकट भी जारी किया गया था, जो राष्ट्रीय स्तर पर उनके सम्मान का प्रतीक है. लेखक अनिल वर्मा की पुस्तक ‘अजेय क्रांतिकारी राजगुरु’ (2008 में उनकी जन्म शताब्दी पर जारी) उनके योगदान और स्थायी विरासत पर प्रकाश डालती है .
राजगुरु के जन्मस्थान का नाम बदलकर राजगुरुनगर करना और उनके पैतृक घर को स्मारक के रूप में संरक्षित किया गया है. यह भीमा नदी के किनारे 2,788 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला एक स्मारक है.
हुतात्मा राजगुरु स्मारक समिति (HRSS) हर साल गणतंत्र दिवस पर यहां राष्ट्रध्वज फहराती है और 23 मार्च को शहीद दिवस तथा 24 अगस्त को राजगुरु की जयंती मनाती है.
महाराष्ट्र राज्य द्वारा 86 करोड़ रुपये की एक प्रस्तावित स्मारक योजना भी है, जिसमें राजगुरु, भगत सिंह और सुखदेव थापर पर एक संग्रहालय, शोधकर्ताओं और छात्रों के लिए एक पुस्तकालय और एक सभागार शामिल होगा. चूंकि राजगुरु एक फिटनेस उत्साही, पहलवान, निशानेबाज और तैराक थे, प्रस्तावित स्मारक में एक स्विमिंग पूल, ओलंपिक के निशानेबाजों को प्रशिक्षित करने के लिए एक व्यायामशाला और एक निशानेबाजी-तीरंदाजी रेंज भी होगी, जो उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को दर्शाएगी.















