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कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों पर लाल किला ट्रायल : जब एक केस ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी

Editor Ritam HindiEditor Ritam Hindi21 Mar 2026, 08:00 am IST
कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों पर लाल किला ट्रायल : जब एक केस ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी

5 नवंबर 1945 को दिल्ली की हवा कुछ और ही कहानी सुना रही थी। लालकिले की प्राचीर से ब्रिटिश सरकार न्याय का ढोंग रच रही थी, लेकिन बाहर खड़ा पूरा भारत ब्रिटिश सरकार के अंत का फैसला सुना चुका था। यह वही किला था, जहां कभी मुगल आक्रातांओं के फरमान गूंजते थे। वहां अब ब्रिटिश साम्राज्य लाल किले से अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहा था।

कटघरे में खड़े थे आजाद हिंद फौज के कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों, उनके साथी कैप्टन शाहनवाज खान व कर्नल प्रेम कुमार सहगल और साथ में 17 हजार अन्य सैनिक। यह कोर्ट ट्रायल ही नहीं था, बल्कि ब्रिटिश राज और भारतीय चेतना के बीच सीधी टक्कर भी थी। जिसका भय इतना था कि क्रूर ब्रिटिश सामाज्य पहली बार सही फैसला सुनाने को मजबूर हुआ था।

कोर्ट ट्रायल

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, भारतीय सैनिकों ने भी ब्रिटिश सेना के साथ जापान के विरुद्ध लड़ाई लड़ी। जिसमें अनेक भारतीय सैनिक शाही जापानी सेना के युद्धबंदी बन गए। जब ​​जापान ने सिंगापुर पर कब्जा कर लिया, तो सुभाष चंद्र बोस ने 1943 में आजाद हिंद फौज की कमान संभाली। उन्होंने ब्रिटिश शासन से भारत को मुक्त कराने के लिए ‘दिल्ली चलो’ का नारा दिया। जिसके बाद नेता जी जापानी युद्धबंदी भारतीय सैनिकों को आजाद हिंद फौज में शामिल करने में सफल रहे। आजाद हिंद फौज ने ब्रिटिश सेना के साथ युद्ध करते हुए इम्फाल पर तिरंगा फहरा दिया। हालांकि, मुख्य शक्तियों की हार के बाद, ब्रिटिश सरकार भारत के उस क्षेत्र पर पुनः कब्जा करने में सफल रही। तब कर्नल ढिल्लों सहित करीब 17 हजार INA के सैनिकों को गिरफ्तार कर उन पर लाल किले में मुकदमा चलाया गया।

अंग्रेजों ने जान-बूझकर कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों और उनके साथियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए लाल किले को चुना था। उनके लिए यह किला केवल एक सैन्य परिसर ही नहीं था, बल्कि भारत पर उनके शासन की निरंतरता का प्रतीक भी था। चूंकि क्रांतिकारियों का हमेशा से यही उद्देश्य रहा था कि लाल किले पर तिरंगा फरहराना है, अतः अंग्रेज लाल किले में मुकदमा चलाकर यह भी दिखाना चाहते थे कि जो भी  ब्रिटिश ताज के विरुद्ध हथियार उठाएगा, उसे खुलेआम दंडित किया जाएगा। वे आजाह हिंद फौज के अधिकारियों पर ‘राजद्रोह’ का आरोप लगाकर यह साबित करना चाहते थे कि यह कोई मुक्ति सेना नहीं, बल्कि राष्ट्र विरोधियों का समूह है। उन्हें यह लगता था कि इस सार्वजनिक कोर्ट मार्शल से भारतीयों के मन में डर पैदा होगा।

अंग्रेजों का यह आकलन पूरी तरह गलत साबित हुआ। अदालत के भीतर जो बहस चल रही थी, उससे कहीं ज्यादा तेज बहस देश की गलियों, चौराहों और सड़कों पर थी। जैसे ही कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों और उनके साथियों के कोर्ट मार्शल ट्रायल की खबर फैली, पूरे भारत में उबाल आ गया। दिल्ली के लाल किले के बाहर हजारों लोग जमा होने लगे। कलकत्ता, बंबई, मद्रास, लाहौर जैसे शहरों में सड़कों पर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लोगों ने विरोध मार्च निकालना आरंभ कर दिया। कॉलेजों में छात्र हड़ताल पर चले गए और कारखानों में काम ठप हो गया।

यह माहौल सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि भावनात्मक भी था। क्योंकि आजाद हिंद फौज की ओर से लड़ते हुए कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों, कैप्टन शाहनवाज खान व कर्नल प्रेम कुमार सहगल ने ब्रिटिश सेना को कई मोर्चों पर पीछे हटने को मजबूर कर दिया था। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत की खबरों के बीच इन्हीं तीनों सैन्य अधिकारियों में भारतीयों को उनकी छवि दिख रही थी। गुलाम भारत के लोग आजाद हिंद सेना को अपना उद्धारक मानने लगे थे। जिसका परिणाम यह हुआ कि वर्षों से दबा हुआ क्रोध अब एक मुद्दे पर केंद्रित हो गया था।

फोटो क्रेडिट : hindi.scoopwhoop.com

5 नवंबर 1945 को शुरू हुआ। यह लाल किला ट्रायल, 3 जनवरी 1946 समाप्त हुआ, तो आईएनए के सभी सैन्य अधिकारियों व सैनिकों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। अंग्रेजों को यह लगता था कि उनके इस सख्त रुख से भारतीय डर जाएंगे और विद्रोह दब जाएगा। लेकिन, हुआ इसके ठीक विपरीत। इस अवधि के दौरान देशभर में आक्रोश बढ़ता चला गया। कर्नल ढिल्लों सहित आईएनए के सभी सैनिकों के समर्थन में आवाज बुलंद हो रही थी। सड़कों पर नारे लगा रहे थे,

‘लाल किले से आई आवाज, सहगल-ढिल्लों-शाहनवाज’,

‘चालीस करोड़ की ये आवाज, सहगल-ढिल्लों-शाहनवाज!’,

‘लाल किले को तोड़ दो, आजाद हिंद को छोड़ दो!’

यह सिर्फ नारे ही नहीं थे, बल्कि उस भय के खिलाफ खुली चुनौती भी थी, जिस पर ब्रिटिश राज टिका था। जिस समय देश मुस्लिम लीग की मजहबी अलगाव वाली सोच के चलते, विभाजन की ओर बढ़ रहा था, उस समय यह दृश्य एक दुर्लभ क्षण था।

लाल किला ट्रायल में अंग्रेजों द्वारा ढिल्लों और INA के अन्य सैनिकों को आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने के बाद, खुफिया रिपोर्टों में साफ चेतावनी दी जा रही थी कि अगर इन अधिकारियों की उम्रकैद जैसी कठोर सजा बरकरार रखी गई, तो हालात बेकाबू हो सकते हैं। यह सहानुभूति केवल आम जनता तक सीमित नहीं थी। बल्कि ब्रिटिश-भारतीय सेना जिसे साम्राज्य की रीढ़ माना जाता था, उसमें काम करने वाले भारतीय सैनिकों में भी गुस्सा देखा जा रहा था। सैनिकों के बीच यह सवाल उठने लगा था कि अगर ढिल्लों जैसे अफसर देशद्रोही हैं, तो देशभक्ति की परिभाषा क्या है? यही कारण था कि आखिर में फील्ड मार्शल सर क्लाउड ऑचिनलेक को INA के सभी सैनिकों की उम्रकैद की सजा निलंबित करनी पड़ी। लेकिन तब तक इस ट्रायल ने अप्रत्यक्ष रूप  से स्वतंत्र भारत की घोषणा कर दी थी।

जन्म और व्यक्तिगत जीवन

कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों का जन्म 18 मार्च, 1914 को पंजाब  के तरणतारण जिले में हुआ था। 1936 में उन्हें ब्रिटिश इंडियन आर्मी की 14वीं पंजाब रेजिमेंट में कमिशन मिला। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना की ओर से लड़ते हुए, जापानी सेना ने उन्हें युद्धबंदी बना लिया। बाद में वह, 1942 में नेताजी सुभाष चंद्र की नेतृत्व वाली आजाद हिंद फौज में शामिल हुए। नेताजी ने उन्हें आजाद हिंद फौज की नेहरू बटालियन की जिम्मेदारी सौंपी। उन्होंने अपने सैन्य पराक्रम और क्षमताओं से अंग्रेजी सेना को कई मोर्चों पर पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था। कर्नल ढिल्लों को 1998 में भारत सरकार ने पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। राष्ट्र सेवा करते हुए उनका निधन 6 फरवरी 2006 को हुआ।

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