तिरंगे से लेकर काला पानी तक : नेताजी सुभाष चंद्र बोस की ऐतिहासिक मौन यात्रा

जब हम 23 जनवरी को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर उन्हें याद करते हैं, तो आइए, उस दिन को भी याद करें, जब उन्होंने खतरनाक काला पानी का दौरा किया था।
30 दिसंबर, 1943 को पोर्ट ब्लेयर में तिरंगा फहराने के बाद, नेताजी भीड़ से दूर अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में सेल्यूलर जेल की ओर चले गए। इस सेल्यूलर जेल को काला पानी की सजा भी कहा जाता था और इस नाम ने लंबे समय से भारतीय घरों में डर और दुख पैदा किया था। उन्होंने इसे ‘भारतीय बास्टिल’ कहा था, जो दुख का एक किला था जहां कई पीढ़ियों के स्वतंत्रता सेनानियो को अकेलेपन और यातना की सजा दी गई थी।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की सेल्यूलर जेल से बाहर आते हुए एक तस्वीर। इमेज सोर्स : Red Scarab
तो, काला पानी आखिर था क्या?
नेताजी जिस खौफनाक काला पानी में गए थे, वह ब्रिटिश क्रूरता के सबसे भयानक प्रतीकों में से एक है। इंसानी भावना को कुचलने के लिए जानबूझकर बनाई गई इस जेल को ‘सेल्यूलर’ कहा जाता था क्योंकि हर कैदी पूरी तरह से अकेले रहता था। इसके सात हिस्सों को इस तरह से बनाया गया था कि एक सेल का सामने का हिस्सा दूसरे सेल के पिछले हिस्से के सामने हो, जिससे यह पक्का हो सके कि कोई भी दो कैदी एक-दूसरे को देख या बात न कर सकें।

अंडमान में सेल्यूलर जेल, जिसे ‘काला पानी’ कहा जाता है, जहां नेताजी 1943 में गए थे। इमेज सोर्स : Andaman Love
कैदियों को और ज्यादा टॉर्चर करने के लिए, जेलर एक कैदी को लॉक करने के बाद चाबी सेल के अंदर फेंक देते थे, लेकिन ताला इस तरह से लगाने क गया था कि अंदर से कोई भी हाथ उस तक न पहुंच सके। इन तंग, दम घोंटने वाली कोठरियों में, कैदियों को कमर तोड़ मेहनत करने के बाद, कोड़े, भूख और अकेलेपन की सजा झेलनी पड़ती थी। कैदियों की कोठरियों का डिजाइन इस तरह से बनाया गया था कि कम से कम हवा हो, कोई सफाई नहीं और किसी भी तरह की कोई बातचीत किसी से न हो, ताकि कैदी टॉर्चर यानी प्रताड़ना को ज्यादा से ज्यादा महसूस कर सके। काला पानी ने अपनी डरावनी पहचान सिर्फ एक जेल के तौर पर नहीं, बल्कि एक ऐसी जगह के तौर पर बनाई, जहां अंग्रेजों ने भारत के सबसे बहादुर क्रांतिकारियों की पहचान, इज्जत और उम्मीद को मिटाने की कोशिश की।
जब काला पानी के शहीदों ने नेताजी से बात की
काला पानी जेल की धुंधली गलियों से गुजरते हुए, नेताजी सिर्फ दीवारों और लोहे की सलाखों से ही नहीं, बल्कि उन लोगों की डरावनी मौजूदगी से भी घिरे हुए थे, जिन्होंने कभी इसकी कोठरियों को भरा था। उन्होंने जरूर वीर सावरकर की कल्पना की होगी, जिन्हें 1911 से 1921 तक दो उम्रकैद की सजा के तहत जेल में रखा गया था, जो भारत के फिर से उठने पर लगातार ध्यान कर रहे थे।
नेताजी ने जरूर बटुकेश्वर दत्त के विद्रोही नारों को भी महसूस किया होगा। दत्त को 1929 में लाहौर साजिश के लिए काला पानी भेजा गया था। नेताजी ने जरूर बरिंद्र कुमार घोष को भी महसूस किया होगा, जो अलीपुर बम केस के लिए अपनी 12 साल की सजा काटते हुए चोरी-छिपे मोमबत्ती की रोशनी में डायग्राम बना रहे थे।

काला पानी की कोठरियों के बाहर के गलियारे। इमेज सोर्स : : Itihaas History
उन्होंने मुजफ्फरपुर बम कांड के बाद उल्हासकर दत्त को जान बचाने की कोशिश में पत्थर पर खरोंचते हुए और पेरिस में ट्रेनिंग पाए हेमचंद्र कानूनगो को अलीपुर साजिश के लिए उम्रकैद काटते हुए भी देखा होगा।
उन गलियारों में उपेंद्रनाथ बनर्जी की एकांत कारावास के दौरान धर्म के श्लोक लिखने की यादें भी जरूर होंगी। भाई परमानंद और दीवान सिंह ढिल्लों पर पड़े कोड़ों की तेज आवाज आज भी जेल के गलियारों में गूंज रही है। हर कोड़े के साथ वे पंजाबी राष्ट्रगान गा रहे थे।
1930 के दशक में योगेंद्र शुक्ला का भूख हड़ताल और विरोध प्रदर्शन करने का नजरिया भी काला पानी की दीवारों पर जरूर अंकित होगा।
नेताजी के दौरे के समय, उनकी अटूट हिम्मत ने उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया होगा। नेताजी जानते थे कि जो तिरंगा उन्होंने फहराया था, वह मंजिल नहीं बल्कि कार्रवाई का बुलावा था।
1943 में, उन्हें अभी भी उनकी अधूरी लड़ाई जारी रखनी थी, एक आजाद भारत का सपना, जहां सावरकर, दत्त, घोष, शुक्ला और अनगिनत अन्य लोगों के बलिदान का कोई मतलब होता।
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