नेताजी से भी पहले बनी थी, भारत की पहली अस्थायी सरकार : जानिए क्रांतिकारी सूर्य सेन की वीर गाथा!

भारत की स्वतंत्रता की कथा में जब ‘अस्थायी सरकार’ की बात आती है, तो अधिकांश लोग नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद सरकार की बात करते हैं। लेकिन यह बहुत कम लोगों को ही पता है कि नेता जी से 13 साल पहले, यानी 1930 में ही, अविभाज्य बंगाल के चटगांव में देश की पहली ‘अस्थायी सरकार’ का गठन हुआ था। इस सरकार का गठन एक सामान्य शिक्षक से सेनापति बने ‘मास्टर दा’ सूर्य सेन के नेतृत्व में हुआ था। जब उनके नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने चटगांव से अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेंका था। वहां तिरंगा फहराया गया, सैनिकों की परेड निकाली गई और पहली सलामी ली गई।

‘मास्टर दा’ क्रांतिकारी सूर्य सेन, इमेज सोर्स- groundxero.in
भारत में पहली अस्थायी सरकार का गठन करने वाले क्रांतिकारी सूर्य सेन आखिर थे कौन? वह एक सामान्य शिक्षक से क्रांतिकारी कैसे बने? आखिर अंग्रेजों ने उन्हें फांसी देने के पहले उनके नाखून और दांत क्यों उखाड़े, उनके शव का अंतिम संस्कार करने की बजाए समुद्र में क्यों फेंका? आइए, जानते हैं हर प्रश्न का उत्तर…
पेशे से शिक्षक क्रांतिकारी सूर्य सेन का जन्म 22 मार्च 1894 को चटगांव (वर्तमान में बांग्लादेश) में हुआ। शिक्षक होने के चलते वह चटगांव में ‘मास्टर दा’ के नाम से जाने जाते थे। स्वभाव से क्रांतिकारी ‘मास्टर दा’ को लगा, अगर वह शिक्षक बने रहे, तो चॉक-डस्टर तक ही सीमित रहेंगे। देश की आजादी के लिए उन्होंने युवाओं को संगठित कर 500 सशस्त्रधारी लड़ाकों की फौज बनाई। जिसका नाम ‘भारतीय प्रजातांत्रिक सेना’ रखा। ‘मास्टर दा’ ने फौज में शामिल सभी युवाओं और किशोरों को आर्मी का कठिन प्रशिक्षण दिया, उन्हें अस्त्र-शस्त्र चलाने में पारंगत किया। अब वक्त अंग्रेजों को चुनौती देने का था।
18 अप्रैल 1930 को मास्टर दा की फौज ने वह कर दिखाया, जिसकी अंग्रेजों ने कभी कल्पना भी नहीं की थी। भारतीय प्रजातांत्रिक सेना के 500 सशस्त्रधारी लड़ाकों ने 6 टुकड़ियों में बंटकर चटगांव शस्त्रागार पर धावा बोला, फौज को देखकर अंग्रेज सैनिक भाग खड़े हुए। जो फिरंगी बचे, वे मारे गए। अब शस्त्रागार पर सूर्य सेन के नेतृत्व वाली फौज का कब्जा था। शस्त्रागार में क्रांतिकारियों को बड़ी संख्या में लुईस बंदूकें और 303 राइफलें मिलीं, लेकिन गोला-बारूद नहीं मिल सका। फिर भी क्रांतिकारियों ने पीछे हटने से इंकार कर दिया क्योंकि उनका उद्देश्य केवल हथियार नहीं, बल्कि सत्ता को चुनौती देना था। चटगांव शहर को औपनिवेशिक तंत्र से पूरी तरह से अलग करने के लिए क्रांतिकारियों ने वहां की संचार व्यवस्था और रेल-डाक-टेलीग्राफ के नेटवर्क को ध्वस्त कर दिया।

चटगांव शस्त्रागार छापे की खबर, इमेज सोर्स- द लल्लन टॉप
यही वह क्षण था, जब सूर्य सेन ने नेताजी से पहले अस्थायी स्वशासन का साहसिक प्रयोग किया। चटगांव से यूनियन जैक उतारकर तिरंगा फहराया। ‘भारतीय प्रजातांत्रिक सेना’ के सैनिकों ने शस्त्रागार के सामने परेड निकाली और तिरंगे को सलामी दी। सूर्य सेन ने चटगांव को स्वतंत्र घोषित करते हुए 18 अप्रैल 1930 को भारत की पहली अस्थायी सरकार बनाने की घोषणा की, जो इस बात का प्रतीक था कि अंग्रेजी हुकूमत का भय अब टूट चुका है। भले ही कुछ समय के लिए चटगांव भारत का स्वतंत्र भू-भाग बना और यहां पहली अस्थायी सरकार का गठन हुआ, लेकिन इस घटना ने भारतीयों में प्रशासनिक आत्मविश्वास की झलक जरूर दिखा दी थी।
हालांकि छापे के दौरान गोला-बारूद न मिलने से सूर्य सेन की लड़ाई कमजोर हुई। जिसके चलते उन्हें अपनी सेना के साथ जलालाबाद की पहाड़ियों पर शरण लेनी पड़ी। 22 अप्रैल 1930 को ब्रिटिश सैनिकों की एक बड़ी टुकड़ी ने पहाड़ियों की घेराबंदी की। इस दौरान दोनों सेनाओं के बीच युद्ध हुआ। जिसमें 12 क्रांतिकारी बलिदान हुए, वहीं 80 ब्रिटिश जवान मारे गए। अनेक प्रयासों के बाद भी अंग्रेज सूर्य सेन और उनकी सेना तक पहुंच नहीं सके। लेकिन 16 फरवरी, 1933 को सूर्य सेन के साथी नेत्र सेन ने इनाम के लालच में उनकी मुखबिरी की। जिससे अंग्रेज सूर्य सेन को गिरफ्तार करने में सफल रहे।
गिरफ्तारी के बाद सूर्य सेन को अनेक अमानवीय यातनाएं दी गईं, फिर भी वह वंदे मातरम् का जयघोष करते रहे। उनके नाखून उखाड़े गए, दांत तोड़ दिए गए, ताकि वह ‘वंदे मातरम्’ का उद्घोष न कर सके। सूर्य सेन ने हंसते हुए सब कुछ सहा।
आखिरकार 12 जनवरी, 1934 को चटगांव सेंट्रल जेल में उन्हें फांसी दे दी गई। अंग्रेजों ने उनके शव का अंतिम संस्कार करने के बजाए शव को बंगाल की खाड़ी में फेंक दिया। मास्टर दा हंसते-हंसते बलिदान हो गए, लेकिन अंग्रेजों के सामने झुके नहीं।

सूर्य सेन और उनके सेना के सैनिकों की फोटो के साथ इनाम की घोषणा वाले पोस्टर, इमेज सोर्स : द लल्लन टॉप
सूर्य सेन के वीरता की गाथा हमें यह सिखाती है कि स्वतंत्रता केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि कर्म और साहस से मिलती है। मास्टर दा ने हमें दिखाया कि जब बात राष्ट्र की हो, तो शिक्षक भी सेनापति बन सकता है और सीमित साधनों से भी साम्राज्य को चुनौती दी जा सकती है। यही कारण है कि वर्तमान में चटगांव भले भी बांग्लादेश में हो, लेकिन उनकी परेड की सलामी आज भी वहां गूंजती है।
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