1857 की क्रांति विफल होने के बाद वासुदेव बलवंत फड़के ने कैसे बनाई देश की पहली अस्थायी सरकार?

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक व्यक्ति ने 1879 में समानांतर ब्रिटिश सरकार की स्थापना की? उसने यह अद्भुत कार्य कैसे किया?
आइए, वासुदेव बलवंत फड़के के जीवन की इस घटना में गहराई से उतरें। यह कोई काल्पनिक कथा नहीं है, न ही अतिश्योक्ति है। यह इतिहास का वह जीवंत अध्याय है, जिसे जान-बूझकर भुला दिया गया। उस अध्याय के नायक थे वासुदेव बलवंत फड़के।

क्रांतिकारी वासुदेव बलवंत फड़के, इमेज सोर्स : loksatta.com
1857 के विद्रोह की विफलता के बाद ऐसा माना जाने लगा था कि अब अंग्रेजों को चुनौती देना असंभव है। शिक्षित वर्ग, ब्रिटिश शासन से समझौते की राह पर चल पड़ा था। आम जनता अकाल, करों और अत्याचारों से टूट चुकी थी। स्वतंत्रता का विचार एक दूर का स्वप्न बन चुका था। लेकिन बलवंत फड़के के लिए स्वाधीनता कोई सपना नहीं, बल्कि वह एक अनिवार्य संकल्प था। उनके मन में यह प्रश्न बार-बार उठता था, ‘क्या भारतवासी स्वयं पर शासन करने में सक्षम नहीं हैं? यदि कुछ सौ अंग्रेज पूरे देश पर शासन कर सकते हैं, तो करोड़ों भारतीय मिलकर अपने लिए सरकार क्यों नहीं बना सकते?’
1870 के दशक में महाराष्ट्र में पड़े भीषण अकाल के दौरान भी अंग्रेज सरकार भारतीयों से कर वसूली करती रही और अपना दमन जारी रखा। यहीं फड़के को समझ आ गया कि समस्या केवल अधिकारियों की नहीं, बल्कि पूरे ब्रिटिश शासन तंत्र की है। उन्होंने तय किया कि अंग्रेजी सरकार को केवल हटाना ही नहीं है, बल्कि उसके समानांतर स्वदेशी शासन खड़ा करना है। एक ऐसी शासन व्यवस्था, जो भारतीयों की शक्ति पर आधारित हो और उनकी पीड़ा को समझे।
लेकिन जब इस अभियान के लिए वासुदेव बलवंत फड़के ने भारतीय समाज के प्रभावशाली लोगों से समर्थन मांगा, तो निराशा हाथ लगी। उन्हें बताया गया और समझाया गया कि जिस ब्रिटिश साम्राज्य में सूर्य अस्त नहीं होता, उससे टकराना आत्महत्या करने के समान है। लेकिन फड़के के भीतर जो चिंगारी थी, वह अब ज्वाला बन चुकी थी। उन्होंने समाज के उस हिस्से की ओर रुख किया, जिसे अंग्रेजों ने सबसे अधिक उपेक्षित किया था। यह था, जनजातीय समाज। लाहुजी वस्ताद साल्वे के मार्गदर्शन में उन्होंने जनजातीय समाज के लोगों को संगठित किया। यही वह क्षण था, जब इतिहास ने करवट ली।
करीब 300 लोगों को जोड़कर वासुदेव बलवंत फड़के ने एक अनुशासित सेना खड़ी की। यह कोई सामान्य सेना नहीं, बल्कि प्रशिक्षित योद्धाओं का समूह था। उन्हें बंदूक चलाने, तलवारबाजी, घुड़सवारी और रणनीति बनाने का प्रशिक्षण दिया गया था। इस सेना का उद्देश्य केवल युद्ध नहीं था, बल्कि जनता में यह विश्वास जगाना था कि अंग्रेज अजेय नहीं हैं।
लेकिन सेना चलाने के लिए धन चाहिए था। फड़के ने धन के लिए जनता पर बोझ डालने के बजाय उस खजाने को निशाना बनाया, जो अंग्रेजों ने भारतीयों से कर के रूप में छीना था।

ब्रिटिश सरकार को चुनौती देने वाले क्रांतिकारी वासुदेव बलवंत फड़के: सोर्स- बेटर इंडिया
फड़के की सेना ने अंग्रेजी खजानों पर छापे मारे। पुणे जिले के गांवों में छापे में प्राप्त धन को अकाल पीड़ितों में बांटा गया। यह कोई साधारण छापेमारी नहीं थी, यह एक राजनीतिक संदेश था, अंग्रेजी सत्ता का धन अब भारतीय जनता का होगा। धीरे-धीरे गांवों में यह चर्चा फैलने लगी कि कोई है, जो अंग्रेजों से नहीं डरता। डर की दिशा बदल रही थी। अब जनता नहीं, अंग्रेज भयभीत होने लगे।
1879 में पुणे जिले के कई इलाकों से ब्रिटिश संचार पूरी तरह काट दिया गया। फड़के और उनकी सेना ने धामरी और तोरण जैसे किलों पर कब्जा कर लिया। अंग्रेजी प्रशासन वहां अब निष्क्रिय हो गया था। यहीं पर, बिना किसी घोषणा, बिना किसी ताज के, ब्रिटिश सत्ता के समानांतर भारत की पहली अस्थायी स्वदेशी सरकार अस्तित्व में आई। यह सरकार किसी कागज पर नहीं थी, यह जनता के विश्वास में थी। गांवों में फड़के का आदेश कानून बन चुका था। यह अंग्रेजों के लिए सबसे बड़ा खतरा था, जो यह सिद्ध कर रहा था कि भारतीय न केवल लड़ सकते हैं बल्कि शासन भी संभाल सकते हैं।

युद्ध का आह्वान, सोर्स : AI GENERATED
अंग्रेज यह समझ गए थे कि यदि बलवंत फड़के की अस्थायी सरकार वाला प्रयोग सफल हो गया, तो पूरे भारत में उनके खिलाफ माहौल तैयार हो जाएगा। इसलिए उन्होंने फड़के पर इनाम घोषित कर, उन्हें पकड़ने के लिए सेना और पुलिस की टीमें लगा दीं। अंततः बीमारी और विश्वासघात के बीच 20 जुलाई, 1879 को बलवंत फड़के पकड़े गए। जिसके बाद कालापानी की सजा, जेल में अमानवीय यातनाएं, अपमान सब कुछ झेलते हुए भी उनका संकल्प नहीं टूटा। जेल में भी उन्होंने हार नहीं मानी। अदन जेल में उनका शरीर कैद हुआ, लेकिन विचार आजाद रहे, जो अमर हो गए।
अंग्रेजों की यातनाओं का सामना करते हुए 17 फरवरी 1883 को फड़के ने जेल में प्राण त्याग दिए।
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