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अंत्योदय का अमर संदेश देने वाले दीनदयाल उपाध्याय जी, जिनके विचारों से प्रकाशित हो रही है देश की राजनीति!

Editor Ritam HindiEditor Ritam Hindi25 Sept 2025, 11:12 am IST
अंत्योदय का अमर संदेश देने वाले दीनदयाल उपाध्याय जी, जिनके विचारों से प्रकाशित हो रही है देश की राजनीति!

भारत की राजनीति में 31 दिसंबर 1967, वह दिन था, जब एक नई विचारधारा का उदय हो रहा था. धोती और कुर्ता पहने एक व्यक्ति, जो दिखने में तो बहुत साधारण था, लेकिन उनके विचार बहुत ही असाधारण. मंच से बोलते हुए उस व्यक्ति के भाषण की पहली लाइनें थीं…’जिनके सामने रोजी-रोटी का सवाल है, जिन्हें न रहने के लिए मकान है और न तन ढकने को कपड़ा. अपने मैले कुचैले बच्चों के बीच जो दम तोड़ रहे हैं, गांवों और शहरों के उन करोड़ों निराश भाई-बहनों को सुखी व संपन्न बनाना हमारा व्रत है.’ यह भाषण देने वाला कोई और नहीं बल्कि दीनदयाल उपाध्याय जी थे. और मौका था कालीकट में हुए भारतीय जनसंघ के अधिवेशन का. 31 दिसंबर 1967 को दीनदयाल जी को कालीकट में भारतीय जनसंघ का अध्यक्ष चुना गया. जिसके बाद उन्होंने यह भाषण दिया था. इस भाषण के बाद देश की राजनीति में अत्योंदय और एकात्म मानववाद की विचारधारा ने जन्म लिया.

भारत की राजनीति में अत्योंदय जैसी महान विचारधारा के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का जन्म 25 सितंबर 1916, को जयपुर-अजमेर रेलवे लाइन के किनारे स्थित धनकिया गांव में हुआ था. उनके पिता भगवती प्रसाद उपाध्याय जो ज्योतिषी थे. वहीं, माता रामप्यारी उपाध्याय ग्रहणी थीं.

शिक्षा

दीनदयाल जी ने 10वीं की परीक्षा सन 1935 में कल्याण हाई स्कूल सीकर से पास की. इसके बाद वह 12वीं की परीक्षा 1937 में बिड़ला कॉलेज पिलानी से, बीए 1939 में सनातन धर्म कॉलेज कानपुर से पास की. इसके बाद उन्होंने एमए की पढ़ाई के लिए सेंट जॉन्स कॉलेज आगरा में प्रवेश लिया, लेकिन आर्थिक परिस्थितियां ठीक न होने के कारण वह सिर्फ 1 साल की पढ़ाई कर सके.

पारिवारिक पृष्ठभूमि

दीनदयाल जी जब मात्र 3 साल के थे, तब उनके पिता भगवती प्रसाद जी का देहांत हो गया. जिसके बाद उनका पालन-पोषण नाना के घर पर हुआ. दीनदयाल जी के बाबा पंडित हरिराम मथुरा जिले के प्रसिद्ध ज्योतिषी थे. उनके निधन पर मथुरा व आगरा के सभी बाजार बंद रहे थे. दीनदयाल जी का पालन-पोषण उनके मामा राधा रमण शुक्ला ने किया. वह फ्रंटियर मेल गार्ड थे. साथ ही उनके चचेरे मामा नारायण शुक्ल रायगढ़ रेलवे स्टेशन के मास्टर थे.

संघ से परिचय

दीनदयाल जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में प्रचारक और भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे. वह भाऊराव देवरस जी के संपर्क में आकर 1937 में संघ के स्वयंसेवक बने. संघ का प्रशिक्षण और अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वह यूपी के लखीमपुर जिले के गोला गोकर्णनाथ कस्बे के प्रचारक बनें. बाद में उन्हें लखीमपुर का जिला प्रचारक नियुक्त किया गया. 1947 में उन्हें उत्तर प्रदेश में सह प्रांत प्रचारक का दायित्व मिला.

भारतीय जनसंघ की स्थापना

संघ के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरु जी) के कहने पर उन्होंने डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ मिलकर 21 सितंबर 1951 को लखनऊ में भारतीय जनसंघ नामक राजनीतिक संगठन की स्थापना की. वह इस संगठन के महामंत्री बने. दीनदयाल जी की कार्य कुशलता को देखते हुए 1967 में उन्हें भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी सौंपी गई.

वह किससे प्रभावित थे?

दीनदयाल जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरु जी) और संघ के प्रचारक भाऊराव देवरस जी से काफी प्रभावित थे. इन्हीं दोनों विभूतियों से प्रभावित होकर वह संघ के प्रचारक बने.

उनको लेकर कौन से सकारात्मक संदेश मौजूद हैं?

दीनदयाल जी को अंत्योदय का प्रणेता माना जाता है. उनका मानना था कि अंत्योदय के विचार से ही गरीब से गरीब व्यक्ति का कल्याण हो सकता है. वह हमेशा करते थे कि पंक्ति के अंत में खड़े व्यक्ति तक सरकार की योजनाओं का लाभ पहुंचे तभी अंत्योदय की भावना साकार हो सकती है. दीनदयाल जी ने अंत्योदय का दर्शन 1950 के दशक में दिया. क्योंकि मात्र तीन वर्ष की आयु में उनके सिर से पिता का साया उठ गया, जिसके चलते उन्होंने तमाम अभावों में जीवन बिताया. इसी के चलते उन्होंने गरीबी उन्मूलन के लिए अंत्योदय का दर्शन समाज के सामने रखा. वर्तनाम में भाजपा की सरकार उन्हीं के दर्शन के अनुरूप कार्य कर रही है.

वर्तनाम में केंद्र की भाजपा सरकार दीनदयाल जी के अंत्योदय के दर्शन को बढ़ा रही है. साथ ही जिन-जिन राज्यों में भाजपा की सरकार हैं, वहां भी पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम से गरीब कल्याण की कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं.

पंडित दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना

केंद्र सरकार पंडित दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना का संचालन कर रही है, जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों को गरीब युवाओं को उचित प्रशिक्षण देकर उन्हें नियमित रुप से नौकरी में उचित वेतन मिल सके. इस योजना के तहत अब तक 550 लाख ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षित किया जा सका है.

दीन दयाल उपाध्याय स्वावलंबन योजना

अरुणाचल प्रदेश सरकार गरीब युवाओं को स्टार्टअप्स के लिए कर्ज के रूप में वित्तीय सहायता दे रही है. जिस पर सब्सिडी भी मिलती है. स्वावलंबन योजना के तहत 10 लाख से लेकर 50 लाख रुपये तक का सब्सिडी पर ऋृण दिया जाता है. लाभार्थियों को 40% अग्रिम पूंजी निवेश सब्सिडी का प्रावधान है.

दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना

पीएम मोदी ने दिसंबर 2014 में इस योजना की शुरआत की थी. सरकार ने 1000 दिनों के भीतर 1 मई, 2018 तक 18,452 अविद्युतीकृत गांवों का विद्युतीकरण किया. जिसके बाद आजादी के 70 सालों बाद भी बिना बिजली के जीवन यापन कर रहे गरीब ग्रामीणों के जीवन में प्रकाश आया.

इसी प्रकार दीनदयाल उपाध्याय श्रमेव जयते कार्यक्रम, दीनदयाल उपाध्याय स्वनियोजन योजना का संचालन भी केंद्र सरकार द्वारा किया जा रहा है.

रोजगार व स्वरोजगार

1. पं. दीनदयाल ग्रामोद्योग रोजगार योजना 2. पं. दीनदयाल उपाध्याय स्वयं योजना 3. दीनदयाल उपाध्याय स्वरोजगार योजना

किसान व ग्रामीण कल्याण

4. दीनदयाल उपाध्याय किसान कल्याण योजना 5. दीनदयाल उपाध्याय गृह आवास (होम-स्टे) विकास योजना

सामाजिक कल्याण योजनाएं

6. दीनदयाल विकलांग पुनर्वास योजना 7. दीनदयाल उपाध्याय वरिष्ठ नागरिक तीर्थयात्रा योजना

लोकहित सेवाएं

8. दीनदयाल उपाध्याय रसोई योजना

दीनदयाल जी के नाम पर दिए जाने वाले पुरस्कार

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के नाम पर कई पुरस्कार दिए जाते हैं. जिसमें प्रमुख रूप से दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रीय कृषि विज्ञान प्रोत्साहन पुरस्कार का नाम शामिल है. इस पुरस्कार की शुरूआत 2016 में पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जन्म शताब्दी वर्ष पर हुई थी. यह पुरस्कार कृषि विज्ञान केंद्रों द्वारा उत्कृष्ट कार्य करने वालों को दिया जाता है.

दीनदयाल उपाध्याय पंचायत सतत विकास पुरस्कार: यह पुरस्कार 9 विषयगत क्षेत्रों में से प्रत्येक में शीर्ष स्थान प्राप्त करने वाली पंचायतों को दिया जाता है.

पंडित दीनदयाल उपाध्याय पंचायत सशक्तिकरण पुरस्कार: यह पुरस्कार पंचायती राज मंत्रालय ग्राम पंचायतों को सशक्त बनाने के उद्देश्य से देता है. इसके अलावा, पंडित दीनदयाल उपाध्याय टेलीकॉम स्किल एक्सीलेंस अवार्ड भी सरकार द्वारा दिया जाता है.

मान्यता प्राप्त कृतियां

दीनदयाल जी ने अपने जीवन काल में कई पुस्तकों का लेखन किया. जिसमें एकात्म मानववाद, दो योजनाएं, राजनीतिक डायरी, भारतीय अर्थनीति का अवमूल्यन, सम्राट चन्द्रगुप्त, जगद्गुरु शंकराचार्य, एकात्म मानववाद, राष्ट्र जीवन की दिशा आदि पुस्तकों का नाम शामिल है.

दीनदयाल जी के जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ क्या था?

वर्ष 1950 में जब डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर अलग राजनीतिक दल बनाने का संकल्प लिया, तब उन्होंने उस दौरान के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर से कुछ कार्यकर्ताओं की मांग की. जिस पर उन्होंने पंडित दीनदयाल उपाध्याय को राजनीति में भेजने का निर्णय लिया.

21 सितंबर 1951 को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आयोजित एक महत्वपूर्ण सम्मेलन में दीनदयाल जी के नेतृत्व में भारतीय जनसंघ की राज्य इकाई की स्थापना हुई. महज एक माह बाद, 21 अक्टूबर 1951 को डॉ. मुखर्जी की अध्यक्षता में भारतीय जनसंघ के प्रथम अखिल भारतीय अधिवेशन का आयोजन हुआ. यहीं से देश में वैचारिक रूप से राष्ट्रवादी राजनीति की नींव पड़ी.

दीनदयाल जी की संगठन क्षमता विलक्षण थी. समय के साथ जनसंघ एक सशक्त राजनीतिक विकल्प के रूप में उभरता गया और वर्ष 1968 में उन्हें दल का राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया गया. पार्टी की कमान संभालने के बाद उन्होंने देश भर का विशेषकर दक्षिण भारत का दौरा कर राष्ट्रवाद और एकात्म मानववाद का संदेश फैलाया.

उनके योगदान का सामाजिक प्रभाव क्या पड़ा है?

दीनदयाल उपाध्याय जी के एकात्म मानववाद दर्शन की झलक वर्तमान में केंद्र की भाजपा सरकार में दिखता है. मोदी सरकार की योजनाओं का समान रूप से सभी को लाभ मिल रहा है.

दीनदयाल जी का चर्चित भाषण कौन सा है?

दीनदयाल उपाध्याय ने ‘भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष के रूप में कालीकट अधिवेशन में ऐतिहासिक भाषण दिया था. उनके इस भाषण ने बडे़-बडे़ समाजवादी और साम्यवादी दातों तले अंगुली दबाने को मजबूर हो गए.

उनके भाषण की कुछ झलकियां इस प्रकार हैं….

जिनके सामने रोजी और रोटी का सवाल है. जिन्हें न रहने के लिए मकान है, न तन ढकने को कपड़ा. अपने मैले कुचैले बच्चों के बीच जो दम तोड़ रहे हैं, गांवों और शहरों के उन करोड़ों निराश भाई-बहनों को सुखी व संपन्न बनाना हमारा व्रत है.

आर्थिक योजनाओं तथा आर्थिक प्रगति का माप समाज की ऊपर की सीढ़ी पर पहुंचे व्यक्ति से नहीं बल्कि सबसे नीचे की सीढ़ी पर विद्यमान व्यक्ति से होगा. ग्रामों में जहां समय अचल खड़ा है. जहां माता और पिता अपने बच्चे के भविष्य को बनाने में असमर्थ हैं, वहां जब तक हम आशा और पुरुषार्थ का संदेश नहीं पहुंचा पाएंगे, तब तक राष्ट्र के चैतन्य को जाग्रत नहीं कर सकेंगे.

स्वतंत्रता तभी तक फल-फूल सकती है, जब तक कि वह राष्ट्रीय संस्कृति को पोषण देने के लिए आहार जुटाती रहती है. हमारी संस्कृति, समाज-जीवन में मूल आधारों के एक्य की बात करती है. इसके विपरीत पश्चिम विश्वास करता है कि जीवन में प्रगति का आधार संघर्ष है. वर्ग-संघर्ष का पश्चिमी विचार इस तथ्य पर आधारित है कि राज्य और व्यक्ति के मध्य सदैव संघर्ष चलता रहता है. हम राज्य और व्यक्ति को एक-दूसरे का पूरक नहीं, वरन सर्वांग का एक भाग मानते है. हमारे अनुसार परिवार, समुदाय, ग्राम पंचायत, स्थानीय शासन व राज्य-ये सभी संस्थाएं राष्ट्र की और सम्पूर्ण मानवता का ही अंग हैं. अतः यह नाता संघर्ष का नहीं, वरन् भाई-चारे का है.

लोकमत-परिष्कार का कार्य वही कर सकता है, जो लोकेषणाओं (सांसारिक अभ्युदय की कामना) से ऊपर उठ चुका हो. भारत ने इस समस्या का समाधान राज्य के हाथ से लोकमत निर्माण का साधन छीनकर किया है. लोकमत परिष्कार का कार्य है वीतरागी, द्वन्द्वातीत संन्यासियों का. लोकमत के अनुसार चलने का काम है राज्य का. संन्यासी सदैव धर्म के अनुसार, जनता के ऐहिक एवं आध्यात्मिक समुत्कर्ष की कामना लेकर अपने वचनों एवं निस्पृह आचरण से जन-जीवन के ऊपर संस्कार डालते रहते हैं, उन्हें धर्म की मर्यादाओं का ज्ञान कराते रहते हैं.

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