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13 दिन की सरकार से 5 साल के स्वर्णिम युग तक: अटल जी के फैसलों की पढ़े बेमिसाल यात्रा

Editor Ritam HindiEditor Ritam Hindi16 Aug 2025, 09:00 am IST
13 दिन की सरकार से 5 साल के स्वर्णिम युग तक: अटल जी के फैसलों की पढ़े  बेमिसाल यात्रा

16 अगस्त, अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि वह दिन जब भारत अपने उस सपूत को याद करता है, जिसने शब्दों से दिल जीता और फैसलों से दुनिया का नजरिया बदल दिया।

2018 में जब अटल जी का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा हुआ दिल्ली की सड़कों से गुजरा, तो भारत के हर कोने से लोग उमड़ पड़े। “अटल जी अमर रहें” के नारों के बीच यह विदाई थी एक कवि, एक नेता, और एक ऐसे इंसान को जिसने अपनी पूरी जिंदगी राष्ट्र सेवा को समर्पित कर दी।

2015 में उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया, जो केवल एक पुरस्कार नहीं, बल्कि राष्ट्र की तरफ़ से उनके जीवन भर के योगदान की सार्वजनिक स्वीकृति थी।

शुरुआती जीवन और राजनीति में प्रवेश

25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर में जन्मे अटल जी बचपन से ही पढ़ाई और कविता लेखन में गहरी रुचि रखते थे। पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी संस्कृत के विद्वान थे और मां कृष्णा देवी धर्मनिष्ठा और सादगी की प्रतीक।

ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज से स्नातक और कानपुर के डीएवी कॉलेज से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर करने के बाद वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े।

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने भाग लिया और कुछ समय जेल में भी बिताया। कॉलेज के दिनों में उनके भाषण कौशल ने सबको प्रभावित किया। एक बार पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उनका संसद में भाषण सुनकर कहा था

“इस लड़के में एक दिन प्रधानमंत्री बनने की क्षमता है।”

1951 में वे भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य बने और 1957 में पहली बार लोकसभा पहुंचे।

बीजेपी का निर्माण और नेतृत्व

1977 में जनता पार्टी सरकार में वे विदेश मंत्री बने और संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण देकर इतिहास रचा। 1980 में जनसंघ का पुनर्गठन होकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) बनी, और अटल बिहारी वाजपेयी इसके पहले अध्यक्ष बने। 1984 के चुनाव में पार्टी को केवल 2 सीटें मिलीं, लेकिन उन्होंने हार को अवसर में बदल दिया। वे कहते थे “हमारा संघर्ष लंबा होगा, लेकिन जीत सुनिश्चित है।”

उनके नेतृत्व में बीजेपी एक मजबूत वैचारिक पार्टी से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति की निर्णायक शक्ति बनी। लोकसभा में 11 बार और राज्यसभा में 2 बार निर्वाचित होकर उन्होंने कुल 47 वर्षों तक संसद में सेवा दी। उनकी छवि “सर्वमान्य नेता” की बन गई मित्र और विपक्षी दोनों उनका सम्मान करते थे।

तीन बार प्रधानमंत्री  और हर बार अलग परिस्थितियों में

1996: 13 दिन के लिए प्रधानमंत्री, जब बहुमत न होने पर उन्होंने गरिमा के साथ इस्तीफा दे दिया।

1998: 13 महीने, एनडीए के नेतृत्व में स्थायी सरकार की शुरुआत।

1999–2004: पूर्ण कार्यकाल, जिसमें देश ने आधारभूत ढांचा, सुरक्षा और अर्थव्यवस्था में ऐतिहासिक कदम उठाए।

कारगिल युद्ध के दौरान उनका शांत और दृढ़ नेतृत्व देश के लिए सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय समर्थन दोनों लेकर आया। 2001 के संसद हमले के बाद उन्होंने सुरक्षा ढांचे में बड़े सुधार शुरू किए।

अटल जी की दूरदर्शी सोच और ऐतिहासिक योजनाएं

1. पोखरण-II: साहस की पहचान

मई 1998 में, अटल जी ने राजस्थान के पोखरण में पांच परमाणु परीक्षण कराए। यह पूरी तरह गुप्त मिशन था, जिसे वैज्ञानिक ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और रक्षा विशेषज्ञों के साथ मिलकर अंजाम दिया गया। CIA और अन्य खुफिया एजेंसियों को चकमा देते हुए भारत ने दुनिया को अपनी आत्मनिर्भर रक्षा क्षमता का परिचय दिया। अंतरराष्ट्रीय दबाव और आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद अटल जी ने साफ कहा

“भारत अब किसी के सामने झुकने वाला नहीं है।”

दिल्ली मेट्रो: भविष्य की जरूरत को समय पर पहचानना

90 के दशक में दिल्ली का ट्रैफिक संकट विकराल था। मेट्रो का सपना बहुतों को असंभव लगता था, लेकिन अटल जी ने इसे हकीकत बनाने की नींव रखी। उन्होंने ई. श्रीधरन को पूरा भरोसा और स्वतंत्रता दी। 24 दिसंबर 2002 को मेट्रो का उद्घाटन करते समय वे खुद लाइन में लगकर टिकट खरीदी और जनता को उस समय एक संदेश दिया कि नेता भी आम नागरिक जैसा होता है।

“योजनाएं कागज पर नहीं, लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में दिखनी चाहिए।”

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना: गांव-गांव विकास का रास्ता

25 दिसंबर 2000, अपने जन्मदिन पर, अटल जी ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना शुरू की। लक्ष्य हर गांव को ऑल-वेदर पक्की सड़क से जोड़ना। उनका मानना था

“सड़क होगी तो स्कूल आएंगे, अस्पताल आएंगे, बाजार आएंगे, और गांव बदलेगा।”

इस योजना से लाखों किलोमीटर नई सड़कें बनीं, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर गांव तक पहुंचे।

स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना

दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता को चारों दिशाओं में हाईवे से जोड़ने का सपना भी अटल जी का था। यह सिर्फ सड़क नहीं थी, बल्कि व्यापार, पर्यटन और रोजगार की नई संभावनाओं का रास्ता थी।

“भारतीय राजनीति के भीष्म-पितामह”

अटल जी के संसद में भाषण उतने ही प्रखर होते थे, जितने मर्यादित। मनमोहन सिंह ने उन्हें “भारतीय राजनीति के भीष्म-पितामह” कहा था। उनकी लोकप्रियता का कारण सिर्फ राजनीति नहीं था. वे कवि, विचारक और मानवीय संवेदनाओं से भरे व्यक्ति थे। उन्होंने जीवन भर अविवाहित रहकर अपना समय और ऊर्जा राष्ट्र सेवा को समर्पित की। उनके कुछ मशहूर उदाहरण

“सरकारें आएंगी-जाएंगी, पार्टियां बनेंगी-बिगड़ेंगी, लेकिन देश रहना चाहिए।”

“हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा।”

वे जीवन भर अविवाहित रहे, और आम लोगों से जुड़े रहे, चाहे सड़क किनारे ढाबे पर चाय पीना हो या बिना सुरक्षा घेरे के गांव में घूमना। अटल बिहारी वाजपेयी का जीवन हमें यह सिखाता है कि राजनीति केवल सत्ता पाने का साधन नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की सेवा का मार्ग है।

आज जब हम गांव की पक्की सड़क पर चलते हैं, मेट्रो से सफर करते हैं, या दुनिया में भारत की मजबूत छवि देखते हैं, तो कहीं न कहीं उसमें अटल जी की दूरदर्शी सोच और निर्णायक फैसलों की छाप है।

“अटल जी चले गए, पर उनके सपनों की सड़क पर भारत अब भी आगे बढ़ रहा है।”

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