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नोआखाली नरसंहार: हिंदुओं को उजाड़ने और जमीन हड़पने की सुनियोजित साजिश का जाने काला अध्याय

Editor Ritam HindiEditor Ritam Hindi16 Aug 2025, 07:00 am IST
नोआखाली नरसंहार: हिंदुओं को उजाड़ने और जमीन हड़पने की सुनियोजित साजिश का जाने काला अध्याय

भारत के बंटवारे की कहानी हम अक्सर पंजाब, दिल्ली और बंगाल के दंगों के संदर्भ में सुनते हैं। लेकिन इस कहानी का एक खून से लथपथ पन्ना ऐसा भी है, जिसे जानना और समझना आज भी जरूरी है, वह है नोआखाली नरसंहार। यह घटना केवल सांप्रदायिक हिंसा नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित अभियान था, जिसमें हिंदू समाज को निशाना बनाया गया।

1940 के दशक में भारत की राजनीति दो बड़े ध्रुवों पर बंटी थी, कांग्रेस और मुस्लिम लीग। मुस्लिम लीग 1940 के लाहौर प्रस्ताव से ही यह मांग कर रही थी कि मुस्लिम बहुल इलाकों को अलग देश बना दिया जाए। 1946 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लिमेंट एटली ने सत्ता हस्तांतरण की योजना को अंतिम रूप देने के लिए कैबिनेट मिशन भारत भेजा।

कैबिनेट मिशन ने एक तीन,स्तरीय शासन संरचना का सुझाव दिया  केंद्र सरकार, प्रांतों के समूह, और अलग,अलग प्रांत। इस योजना से मुस्लिम लीग को उम्मीद थी कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को अलग देश बनाने का रास्ता मिलेगा। शुरू में कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने इस योजना को मान लिया। लेकिन जुलाई 1946 में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि कांग्रेस को इस योजना में बदलाव करने का अधिकार है।

यह बयान मुस्लिम लीग को रास नहीं आया। उन्हें डर था कि सत्ता हस्तांतरण के बाद हिंदू बहुसंख्यक ही केंद्र में हावी होंगे। इसके बाद जिन्ना ने संविधान सभा का बहिष्कार करने और सीधी कार्रवाई का आह्वान करने का फैसला किया।

डायरेक्ट एक्शन डे: हिंसा की चिंगारी

29 जुलाई 1946 को मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त को “सीधी कार्रवाई दिवस” घोषित किया। इस दिन देशव्यापी विरोध और कामबंदी का आह्वान किया गया। बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार थी और मुख्यमंत्री हुसैन शाहिद सुहरावर्दी ने इस आयोजन का खुला समर्थन किया।

कोलकाता की सड़कों पर इस दिन बड़े पैमाने पर रैलियां निकलीं, भड़काऊ भाषण हुए और नारे गूंजे – “लीग जिंदाबाद, पाकिस्तान जिंदाबाद, लड़ के लेंगे पाकिस्तान, मार के लेंगे पाकिस्तान।” रैली के दौरान हिंसा भड़क उठी। दुकानों पर पत्थर फेंके गए, आगजनी हुई, और निर्दोष नागरिकों पर हमले शुरू हो गए।

सिर्फ 72 घंटों में कोलकाता की धरती खून से लाल हो गई। अनुमान है कि 5,000 से 10,000 लोग मारे गए और लगभग 15,000 लोग घायल हुए। इस हिंसा की खबरें पूरे बंगाल में फैल गईं।

नोआखाली में आग भड़कना

कोलकाता से लगभग 400 किलोमीटर दूर नोआखाली जिला मुस्लिम बहुल इलाका था। यहां जमींदारों में हिंदुओं की संख्या ज्यादा थी, और कई वर्षों से वहां सांप्रदायिक तनाव पनप रहा था। मार्च 1940 के लाहौर प्रस्ताव के बाद से ही मौलाना सैयद गुलाम सरवर हुसैनी जैसे कट्टर नेताओं ने माहौल को और जहरीला बना दिया था।

सरवर हुसैनी ने हिंदू देवताओं के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया और भीड़ को हिंदुओं के खिलाफ भड़काया। 1930 के दशक में ही नोआखाली में खुलेआम गोमांस की बिक्री हिंदू बहुल बाजारों में शुरू कर दी गई थी। “मियार फौज” नामक इस्लामी भीड़ संगठन भी सक्रिय था, जो हिंसक हमले करता था।

नरसंहार की शुरुआत

नोआखाली नरसंहार की शुरुआत 10 अक्टूबर 1946 को कोजागरी लक्ष्मी पूजा के दिन हुई। उस दिन बेगमगंज क्षेत्र में हिंसा भड़की, जो तेजी से आसपास के इलाकों रामगंज, रायपुर, लक्ष्मीपुर, छगलनैया, संदीप और टिप्परा जिले के कई थाना क्षेत्रों तक फैल गई।

लगभग एक महीने तक हिंसा चलती रही और 2,000 वर्ग मील का इलाका प्रभावित हुआ। इस नरसंहार में हजारों हिंदू मारे गए, 20,000 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हुए और एक लाख से अधिक लोग बेघर हो गए। बड़ी संख्या में महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ, कई को जबरन धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया गया, और संपत्ति लूटकर घरों को आग के हवाले कर दिया गया।

प्रशासन की भूमिका और ब्रिटिश नीति

ब्रिटिश सरकार की ‘फूट डालो और राज करो’ नीति ने हिंदू,मुस्लिम संबंधों में अविश्वास को गहरा किया। सत्ता हस्तांतरण के दौरान प्रशासन ने संवेदनशील क्षेत्रों में कानून,व्यवस्था बनाए रखने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए।

नोआखाली जैसे इलाकों में हिंसा की खबरें आने के बावजूद ब्रिटिश प्रशासन ने समय पर हस्तक्षेप नहीं किया। हिंसा के बाद की गई जांच सतही रही और पीड़ितों को न्याय नहीं मिला।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की आवाज

नोआखाली नरसंहार के समय बंगाल विधानसभा में हिंदू महासभा के एकमात्र सदस्य डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे। उन्होंने अकेले हिंदू समाज की पीड़ा को विधानसभा में उठाया और ब्रिटिश सरकार तथा मुस्लिम लीग की भूमिका की कड़ी आलोचना की। उन्होंने मांग की कि पीड़ितों की सुरक्षा और पुनर्वास के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।

महात्मा गांधी का नोआखाली प्रवास

अक्टूबर 1946 में महात्मा गांधी कलकत्ता पहुंचे और वहां से 6 नवंबर को नोआखाली गए। उन्होंने तय किया कि वे हिंसा प्रभावित हर गांव में जाएंगे और लोगों के बीच विश्वास बहाल करने की कोशिश करेंगे।

गांधी नंगे पैर गांव,गांव घूमे। उनके साथियों ने उन्हें चप्पल पहनने को कहा, तो उन्होंने कहा “नोआखाली एक शमशान है। यहां हजारों निर्दोष लोगों की समाधियां हैं, और समाधि पर चप्पल पहनकर नहीं जाया जाता।” हालांकि कई जगह उनका स्वागत नहीं हुआ, बल्कि रास्तों में गड्ढे खोदकर गोबर भरा गया, लेकिन वे अपने मिशन पर डटे रहे।

हिंसा के पीछे चेहरे

नोआखाली और टिप्परा में हिंसा भड़काने के पीछे मौलाना सैयद गुलाम सरवर हुसैनी का नाम सामने आता है। वे लंबे समय से हिंदुओं के खिलाफ माहौल बना रहे थे।

16 अगस्त 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे पर कोलकाता में हुए दंगों में भी हिंदू सबसे ज्यादा मारे गए। उस समय बंगाल के मुख्यमंत्री सुहरावर्दी ने भीड़ को यह भरोसा दिलाया कि उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी।

एक भुला दिया गया सबक

नोआखाली नरसंहार सिर्फ एक सांप्रदायिक दंगा नहीं था, बल्कि एक सुनियोजित प्रयास था, जिसमें हिंदू समाज को डराकर वहां से भगाना, उनकी संपत्ति पर कब्जा करना और क्षेत्र का जनसांख्यिक संतुलन बदलना लक्ष्य था।

आजादी से पहले का यह अध्याय हमें याद दिलाता है कि धार्मिक नफरत और राजनीतिक स्वार्थ मिलकर कितनी बड़ी त्रासदी ला सकते हैं।

 

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