एक Army Sepoy से ‘हॉकी जादूगर’ तक: मेजर ध्यानचंद की अद्भुत शुरुआत

गरीबी, सपने और सेना में प्रवेश
झांसी का एक गरीब लड़का, जिसके घर के आर्थिक हालात मुश्किलों भरे थे, 17 वर्ष की उम्र में रोजगार की तलाश में सेना में भर्ती हो गया। उसके पिता भी सेना में थे, इसलिए मिट्टी, अनुशासन और संघर्ष की भाषा उसे बचपन से ही समझ में आती थी। वह लड़का सेना में इसलिए नहीं आया था कि वह खेलों का सितारा बने, बल्कि इसलिए कि परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार हो सके। किसी ने नहीं सोचा था कि यही साधारण सा Army Sepoy भारतीय खेल इतिहास का सबसे चमकता नाम बनेगा, लेकिन कहानी यहीं से शुरू होती है।
बैरक का जीवन और खेल की पहली आहट
सेना की बैरकों में उसका जीवन कड़ा और अनुशासन भरा था। सुबह की परेड, घंटों की ड्रिल और लंबे मार्च उसके लिए दिनचर्या का हिस्सा बन गए। खेल सेना में ड्यूटी का हिस्सा था, शौक नहीं। लेकिन मैदान पर हॉकी की स्टिक हाथ में आते ही उसे एक अजीब-सी खुशी मिलती। न कोई घास का मैदान, न कोई प्रशिक्षित कोच, फिर भी वह शाम की थकान के बाद भी अभ्यास करता रहा। झांसी छावनी की खुरदरी जमीन, टूटी-फूटी स्टिक और कपड़ों से बनी गेंद उसके पहले शिक्षक बने।
चांदनी रातों की प्रैक्टिस और जुड़ गया “चंद” उपनाम
दिनभर की थकान के बाद जब बैरकें सो जातीं, वह चांदनी रात में अकेले अभ्यास करने निकल जाता। उसकी इस आदत को देखकर साथी सैनिक उसे “चंद” कहने लगे और धीरे-धीरे उसका नाम ध्यान सिंह से ध्यानचंद बन गया। सेना की कठिन राइफल ड्रिल, मीलों की दौड़, और शारीरिक अनुशासन ने उसके शरीर को मजबूत किया और मन को स्थिर। यही कठोर प्रशिक्षण आगे चलकर उसकी ड्रिब्लिंग, बॉल कंट्रोल और फुर्ती का असली आधार बना।
सेना में खेल और अनुशासन का मेल
वर्ष 1922 से 1926 के बीच उसने सिर्फ रेजिमेंटल और आर्मी के आंतरिक मैच खेले। कोई बाहरी पहचान नहीं, कोई विशेष सुविधा नहीं। लेकिन हर मैच में उसकी प्रतिभा झलकने लगी। उसके वरिष्ठ अधिकारी भी समझने लगे कि यह Army Sepoy मैदान पर कुछ अलग करता है। सेना ने उसे खेल जारी रखने की पूरी छूट दी, क्योंकि अनुशासन और कौशल दोनों एक जगह चमक रहे थे। धीरे-धीरे वह अपने साथियों के लिए प्रेरणा बन गया।
अवसर की दस्तक, सेना की हॉकी टीम में जगह

खेल की प्रतिभा ने ध्यानचंद को सेना का हीरो बना दिया (इमेज सोर्स: भारतीय हॉकी)
वर्ष 1926 में भारतीय सेना की हॉकी टीम न्यूजीलैंड के एक महत्वपूर्ण दौरे की तैयारी कर रही थी। टीम का चयन सख्त मानकों पर होता था और आमतौर पर अधिकारी ही मौका पाते थे। लेकिन लगातार अभ्यास, अद्भुत गेंद नियंत्रण और तेज फुटवर्क ने उसे चयनकर्ताओं का ध्यान खींचने पर मजबूर कर दिया। एक साधारण Army Sepoy के लिए यह सपना जैसा अवसर था विदेशी धरती पर भारत की ओर से खेलना।
न्यूजीलैंड दौरा, जहां असंभव संभव हुआ
ध्यानचंद को न्यूजीलैंड दौरे के लिए चुना गया और यह निर्णय भारतीय हॉकी इतिहास को बदलने वाला साबित हुआ। 21 मैचों की सीरीज में सेना की टीम ने 18 मैच जीते और ध्यानचंद ने अकेले सौ से अधिक गोल दागे। उनकी क्षमता ने अधिकारियों को इतना प्रभावित किया कि टीम के नियमित कप्तान के चोटिल होने पर उन्हें कप्तान बना दिया गया। जबकि सेना में यह एक अटल नियम जैसा था कि सेपॉय कभी कप्तान नहीं बनता।

(इमेज सोर्स: The Sports Tak)
यह वही क्षण था जिसने साबित किया कि रैंक नहीं, प्रतिभा असली पहचान बनाती है। यहीं से उनकी प्रतिभा दुनिया की नजर में आने लगी और आने वाले वर्षों में इसी खिलाड़ी ने तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास लिखा। लेकिन यह सफर शुरू हुआ था एक गरीब Army Sepoy के जुनून और सेना की बैरकों में गढ़े अनुशासन से।















