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2008 का वो काला दिन, जब लगातार बम धमाकों से दहली दिल्ली

Editor Ritam HindiEditor Ritam Hindi13 Sept 2025, 10:00 am IST
2008 का वो काला दिन, जब लगातार बम धमाकों से दहली दिल्ली

भारत की राजधानी दिल्ली ने 13 सितम्बर 2008 को वह भयावह दिन देखा, जब शहर के बीचोबीच 31 मिनट के भीतर पांच सिलसिलेवार बम धमाके हुए। ये विस्फोट करोल बाग, कनॉट प्लेस और ग्रेटर कैलाश जैसे भीड़  भाड़ वाले बाजारों में हुए। इसने न केवल दिल्ली, बल्कि पूरे देश को दहला दिया। यह घटना भारत की सुरक्षा और खुफिया तंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई।

धमाकों का क्रम और स्थान

पहला धमाका शाम 6:07 बजे करोल बाग के गफ्फार मार्केट में हुआ। उसके बाद लगातार 6:34, 6:35, 6:37 और 6:38 बजे क्रमशः कनॉट प्लेस (बाराखंभा रोड, और राजीव चौक मेट्रो स्टेशन के ऊपर बने सेंट्रल पार्क) और ग्रेटर कैलाश-1 (एम ब्लॉक मार्केट) में विस्फोट हुए।

गफ्फार मार्केट : पहला धमाका करोल बाग इलाके में इलेक्ट्रॉनिक सामान के लिए मशहूर गफ्फार मार्केट में शाम 6:07 बजे हुआ। बताया जाता है कि विस्फोटक एक कार में था और उसके फटने से एक ऑटो में रखे सीएनजी सिलिंडर में आग लगने से उसमें भी धमाका हुआ। धमाका इतना जोरदार था कि ऑटो हवा में उछलकर बिजली के तारों से जा टकराया। इस धमाके में कम से कम 20 लोग जख्मी हुए और कई गाड़ियां क्षतिग्रस्त हो गईं।

कनॉट प्लेस : यहां दोनों बम कूड़ेदानों में रखे गए थे। भीड़भाड़ वाले सेंट्रल पार्क और बाराखंभा रोड पर एक के बाद एक विस्फोट हुए। इनमें से पहला धमाका बाराखंभा रोड पर, निर्मल टावर और गोपाल दास भवन के पास, शाम 6:34 बजे हुआ। इसके एक मिनट बाद, दूसरा बम दिल्ली मेट्रो के एक मुख्य स्टेशन राजीव चौक के ऊपर, कनॉट प्लेस गोल चक्कर के बीचों-बीच, बने सेंट्रल पार्क में फटा। एक व्यक्ति ने दावा किया और गवाही दी कि उसने दो लोगों को सेंट्रल पार्क के एक कूड़ेदान में बम रखते हुए देखा था।

ग्रेटर कैलाश (एम ब्लॉक मार्केट) : इस पॉश इलाके में भी दो धमाके हुए। यहां भी बम कार में ही रखे गए थे ताकि नुकसान अधिक से अधिक हो। ये धमाके ग्रेटर कैलाश-I के एम-ब्लॉक बाजार में शाम 6:37 और 6:38 बजे  हुए। पहला धमाका लोकप्रिय प्रिंस पान कॉर्नर के पास और दूसरा धमाका लेविज़ स्टोर के पास हुआ था। बाद वाले विस्फोट में 10 दुकानें क्षतिग्रस्त हो गई थीं।

इन सारे धमाकों में करीब 24 लोगों की मौत हुई और 90 से अधिक लोग बुरी तरह घायल हुए थे। इन बमों को बनाने में अमोनियम नाइट्रेट, गन पाउडर, बॉल बेयरिंग, कीलें और टाइमर डिवाइस का प्रयोग किया गया था। इन बमों का स्वरूप थोड़े दिन पहले हुए जयपुर, बेंगलुरु और अहमदाबाद धमाकों में इस्तेमाल हुए बमों से मिलता-जुलता था।

धमाकों के कुछ ही समय पहले मीडिया संस्थानों को इंडियन मुजाहिदीन की ओर से एक ईमेल भेजा गया था। इसमें लिखा था, “पांच मिनट में धमाके होने वाले हैं, रोक सको, तो रोक लो।” इस मेल के जरिए संगठन ने धमाकों की जिम्मेदारी ली। जांच में भी यही साबित हुआ कि इंडियन मुजाहिदीन इस साजिश के पीछे था। मेल आईडी थी– al_arbi_delhi@yahoo.com और भेजने वाले का नाम ‘अरबी हिंदी’ बताया गया।

पुलिस ने समय रहते चार जिंदा बम बरामद कर निष्क्रिय कर दिए थे, अन्यथा और भी भयानक क्षति होती। ये बम निम्न स्थानों से मिले- इंडिया गेट के पास, कनॉट प्लेस (रीगल सिनेमा के पास),  कनॉट प्लेस (सेंट्रल पार्क), करोल बाग (गफ्फार मार्केट के पास)।

धमाकों के बाद दिल्ली सहित आसपास के राज्यों उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया। बाजारों, मॉल्स, रेलवे स्टेशनों और भीड़-भाड़ वाले इलाकों में सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाई गई। पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों ने जांच तेज कर दी। घटनास्थलों से विस्फोटक अवशेष जुटाए गए। सीसीटीवी फुटेज खंगाले गए। मोबाइल कॉल डिटेल्स और ईमेल की जांच की गई।

19 सितम्बर 2008 को हुई मुठभेड़

इसी बीच जांच के दौरान दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल को सूचना मिली कि इंडियन मुजाहिदीन के आतंकी जामियानगर स्थित बटला हाउस की एल-18 बिल्डिंग में छिपे हुए हैं। पुलिस वहां पहुंची, तो उनकी आतंकियों से मुठभेड़ हुई, जिसमें आतंकी आतिफ अमीन और मोहम्मद साजिद मारे गए। दो आतंकी सैफ मोहम्मद और आरिज खान भाग निकले। एक आतंकी जीशान को गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन मुठभेड़ के दौरान स्पेशल सेल के इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा गंभीर रूप से घायल हो गए और 20 सितम्बर को उनका निधन हो गया। बाद में सरकार द्वारा उन्हें शहीद घोषित किया गया।

13 सितम्बर 2008 का दिन, भारतीय इतिहास का एक काला अध्याय है। इसने दिल्ली की गलियों को खून और दहशत से भर दिया। हालांकि पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने बाद में कई आतंकियों को ढेर किया और गिरफ्तारियां कीं, लेकिन मासूमों की जानें लौटाई नहीं जा सकती थीं।

ये बम धमाके जब हुए, तब दिल्ली में सरकार कांग्रेस की थी और केंद्र में भी उनकी ही सत्ता थी। कमजोर मानसिकता वाली इन सरकारों ने उन दिनों ऐसी हो रही घटनाओं से कोई सबक नहीं लिया था।

उसी वर्ष भारत में तीन बम हमले पहले ही हो चुके थे। इनमें से पहला 13 मई को जयपुर में हुआ था। 15 मिनट के अंतराल में हुए नौ बम विस्फोटों की श्रृंखला में 63 लोगों की जान चली गई थी और 216 घायल हो गए थे।

नौ बम विस्फोटों की दूसरी श्रृंखला 25 जुलाई को बैंगलोर में हुई, जिसमें 2 लोगों की जान गई और 20 घायल हुए थे।

अगले दिन, 26 जुलाई को अहमदाबाद में 21 विस्फोटों की श्रृंखला में 56 लोग मारे गए और 200 से अधिक घायल हुए थे। इंडियन मुजाहिदीन ने भारतीय मीडिया को भेजे एक ईमेल के माध्यम से जयपुर बम विस्फोटों की जिम्मेदारी ली थी और भारत के खिलाफ ‘खुले युद्ध’ की घोषणा की। लेकिन कांग्रेस की सरकार ने इन धमकियों को गंभीरता से नहीं लिया, जिसका परिणाम यह हुआ कि दिल्ली में अनेक निर्दोषों की जान चली गई।

 

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