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भारत का चंद्रयान-2 अभियान : जब भारत ने असफलता से सीखी उड़ान

Editor Ritam HindiEditor Ritam Hindi07 Sept 2025, 07:00 am IST
भारत का चंद्रयान-2 अभियान : जब भारत ने असफलता से सीखी उड़ान

7 सितंबर 2019 की रात, भारत के अंतरिक्ष इतिहास की सबसे भावनात्मक रातों में से एक थी। चंद्रयान-2 का विक्रम लैंडर जब चांद की सतह से महज 2.1 किलोमीटर दूर था, तब उसका इसरो (ISRO) से संपर्क टूट गया। देश की उम्मीदें चांद के इतने करीब पहुंचकर ठिठक गईं।

लेकिन ये अंत नहीं था, यह एक नई शुरुआत थी। असफलता से मिले सबक को भारत ने ताकत बनाया और चार साल की अथक मेहनत के बाद, 23 अगस्त 2023 को चंद्रयान-3 ने इतिहास रच दिया, जब उसका लैंडर ‘विक्रम’ चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सफलतापूर्वक उतरा। आइए जानते हैं असफलता से सफलता तक की कहानी…

1. चंद्रयान-2 की असफलता : आखिर क्या हुआ था?

  • चंद्रयान-2  भारत का दूसरा चंद्र मिशन था, जिसका उद्देश्य चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ करना था। यह एक ऐसा क्षेत्र था, जहां अब तक कोई देश नहीं पहुंचा था।
  • इस मिशन के तीन मुख्य घटक थे- ऑर्बिटर, लैंडर (विक्रम), और रोवर (प्रज्ञान)। योजना के अनुसार, ऑर्बिटर को चंद्रमा की कक्षा में रहकर डेटा एकत्र करना था, जबकि लैंडर और रोवर को सतह पर उतरकर वैज्ञानिक प्रयोग करने थे।
  • सब कुछ ठीक चलता रहा, लेकिन जब 7 सितंबर 2019 की रात विक्रम लैंडर चंद्रमा की सतह से लगभग 2.1 किलोमीटर ऊपर था, तभी उससे संपर्क टूट गया।
  • मिशन के सबसे नाजुक और निर्णायक क्षण, जिसे वैज्ञानिक ‘15 मिनट ऑफ टेरर’ कहते हैं, इसमें तकनीकी गड़बड़ी सामने आई।
  • लैंडर की गति अपेक्षाकृत अधिक थी और इसे धीमा करने के लिए रेट्रो-रॉकेट्स द्वारा किया गया प्रयास, पूरी तरह सफल नहीं हो पाया।
  • लैंडिंग के अंतिम चरण में ‘डिसेंट प्रोफाइल’ (उतरने की योजना) में विचलन आ गया और लैंडर निर्धारित मार्ग से हट गया।
  • इसके अलावा, गाइडेंस सॉफ्टवेयर में लैंडिंग के लिए बहुत सीमित विकल्प थे, जिससे विक्रम खुद को परिस्थिति के अनुसार ठीक से नियंत्रित नहीं कर सका।
  • वहीं, बैकअप सिस्टम की क्षमताएं भी सीमित थीं और विक्रम लैंडर चंद्र की सतह पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। हालांकि इस मिशन का ऑर्बिटर अब भी सफलतापूर्वक काम कर रहा है और चंद्रमा की कक्षा से वैज्ञानिक आंकड़े भेज रहा है, लेकिन लैंडर और रोवर का भाग असफल रहा।
  • यही वह अनुभव था, जिसने इसरो को नई तकनीकी मजबूती और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से चंद्रयान-3 की ओर प्रेरित किया।

2. असफलता से सबक : क्या-क्या बदला गया?

इसरो ने चंद्रयान-2 की लैंडिंग विफलता की बारीकी से जांच की और इससे जुड़े सभी डेटा का गहराई से विश्लेषण किया। यहीं से शुरू हुई चार साल की वैज्ञानिक तपस्या, जिसमें पहले हुई गलतियों को दोहराया नहीं गया, बल्कि उसे नई ताकत में बदला गया।

आईए जानते हैं क्या-क्या बदला:-

A. लैंडिंग सिस्टम का फिर से डिजाइन

चंद्रयान-2 की असफलता के बाद इसरो ने सबसे पहले लैंडिंग सिस्टम को पूरी तरह से पुनः डिजाइन करने पर जोर दिया। चंद्रयान-3  के लिए नई नेविगेशन, गाइडेंस और कंट्रोल प्रणाली (NGC System) विकसित की गई, जो लैंडिंग के हर चरण को ज्यादा सटीकता और स्थिरता से नियंत्रित कर सकती थी। इसका उद्देश्य था कि लैंडर चंद्रमा की सतह पर उतरते समय किसी भी अप्रत्याशित स्थिति में खुद को संतुलित और सुरक्षित रख सके। इसके अलावा, लैंडर के लैंडिंग लेग्स (उतरने के पैर) को पहले से अधिक मजबूत और लचीला बनाया गया ताकि वह चंद्र सतह की अनियमितताओं, जैसे गड्ढों या ऊबड़-खाबड़ इलाके में भी संतुलन बना सके और लैंडिंग के समय के झटकों को सह सके। चंद्रयान-3  में एक नई और उन्नत तकनीक लेजर डॉप्लर वेलोसिटी मीटर (LDVM) जोड़ी गई, जो लैंडर की चंद्र सतह की ओर गति को बेहद सटीकता से माप सकती थी। यह प्रणाली लैंडिंग के समय गति और दिशा की जानकारी प्रदान कर सकती थी, जिससे लैंडर को अपने वेग और कोण को वास्तविक समय में नियंत्रित करने में मदद मिली। इन सभी सुधारों का उद्देश्य एक ऐसी प्रणाली को बनाना था, जो न केवल पहले से ज्यादा सक्षम हो, बल्कि आत्मनिर्भर भी हो ताकि मिशन की सफलता की संभावना अधिक हो सके।

B. रोवर और लैंडर पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित

चंद्रयान-3 मिशन की एक बड़ी विशेषता यह रही कि इसका लैंडर और रोवर, दोनों पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक पर आधारित हैं और अत्यधिक स्वायत्त (autonomous) बनाए गए। इसका मतलब था कि इसके लैंडर और रोवर को, बाहरी निर्देशों पर निर्भर रहने के बजाय, खुद से निर्णय लेने और स्थितियों के अनुसार प्रतिक्रिया देने की क्षमता दी गई। विशेष रूप से लैंडर को इस तरह डिजाइन किया गया कि वह चंद्रसतह पर उतरने से पहले कई संभावित लैंडिंग स्थलों को पहचान सके और उनमें से सबसे सुरक्षित स्थान का स्वतः चयन कर सके। इसके लिए लैंडर में अत्याधुनिक सेंसर, कैमरे और निर्णय-लेने वाला उन्नत सॉफ्टवेयर लगाया गया है। इसके अलावा, चंद्रयान-3 की प्रणाली को ‘फेल-सेफ डिजाइन’ के सिद्धांत पर विकसित किया गया। इसका तात्पर्य यह है कि यदि कोई एक प्रणाली तकनीकी रूप से विफल हो जाए, तो उसके स्थान पर एक वैकल्पिक प्रणाली स्वतः काम संभाल लेती, जिससे मिशन को आगे बढ़ाया जा सके और विफलता की संभावना न्यूनतम हो। इस तरह के डिजाइन और स्वायत्तता ने चंद्रयान-3 को अधिक लचीला, विश्वसनीय और अत्याधुनिक बनाया, जो उसकी ऐतिहासिक सफलता में निर्णायक सिद्ध हुआ।

C. ऑर्बिटर हटाया गया, मिशन को सरलीकृत किया गया

चंद्रयान-3 मिशन को पहले की तुलना में ज्यादा सटीक, लक्ष्य-केंद्रित और तकनीकी रूप से सरल बनाया गया। चंद्रयान-2 की असफलता के बाद इसरो ने यह समझा कि मिशन की जटिलता को घटाकर सफलता की संभावना को बढ़ाया जा सकता है। इसी विचार के तहत चंद्रयान-3 से ऑर्बिटर मॉड्यूल को पूरी तरह हटा दिया गया और मिशन का मुख्य उद्देश्य केवल ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ और रोवर संचालन तक सीमित कर दिया गया। इस सरलीकरण का एक बड़ा कारण यह भी था कि चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर पहले से ही चंद्रमा की कक्षा में सक्रिय था और वैज्ञानिक रूप से उपयोगी डेटा लगातार भेज रहा था। इस ऑर्बिटर ने चंद्रयान-3 के लैंडर की निगरानी और संचार में भी सहायता की, जिससे मिशन के लिए पृथक ऑर्बिटर की आवश्यकता नहीं रही। इसरो की यह रणनीति अत्यंत व्यावहारिक सिद्ध हुई। इससे मिशन की लागत और जटिलता दोनों कम हुई और वैज्ञानिक प्रयासों को लैंडिंग तकनीक पर पूरी तरह केंद्रित किया जा सका। यही सटीकता और सरलता अंततः चंद्रयान-3 की सफलता का एक प्रमुख कारण बनी।

D. सिमुलेशन और टेस्टिंग में कई गुना सुधार

चंद्रयान-3 की सफलता के पीछे इसरो की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतियों में से एक थी। व्यापक सिमुलेशन और टेस्टिंग, चंद्रयान-2 की लैंडिंग विफलता के बाद इसरो ने इस बात को गंभीरता से समझा कि असली परिस्थितियों के जितना करीब टेस्टिंग की जाए, उतना ही मिशन की सफलता सुनिश्चित की जा सकती है। इसी दृष्टिकोण से इसरो ने 100 से अधिक लैंडिंग टेस्ट किए, जिनमें लैंडिंग के हर पहलू को बार-बार दोहराया गया, परखा गया और सुधारा गया। इसके लिए वैज्ञानिकों ने विशेष सिमुलेशन सुविधाएं विकसित कीं, जो चंद्रमा जैसे कम गुरुत्वाकर्षण और धूल-भरे वातावरण की नकल कर सकें। जैसे कि टेरेन सिमुलेटर (Terrain Simulator), जो चांद की सतह के उबड़-खाबड़ इलाके की तरह विकसित किया गया था और मून डस्ट एनवायरनमेंट बनाया गया, जो चंद्रमा की महीन धूल और सतही गुणों का आभास देता था। इन परीक्षण स्थलों पर लैंडर और रोवर की हर हरकत को बारीकी से मापा गया और उसमें आवश्यक सुधार किए गए। इस गहन तैयारी और अभ्यास ने चंद्रयान-3  को वास्तविक लैंडिंग के समय के लिए पूरी तरह से तैयार और विश्वसनीय बना दिया।

3. इसरो की टीम का जज्बा

असफलता के बाद, जहां कई देश पीछे हट जाते हैं, वहीं भारत ने चंद्रयान-2 को अंत नहीं माना। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उस रात इसरो वैज्ञानिकों को गले लगाकर देश को यह संदेश दिया, “हम रुकेंगे नहीं”। इसरो की टीम ने बिना किसी बड़े शोर-शराबे के अपनी तैयारियों को दिन-रात अंजाम दिया। तत्कालीन इसरो चेयरमैन एस. सोमनाथ की अगुवाई में वैज्ञानिकों ने हर तकनीकी पहलू पर ध्यान दिया और हर छोटी कमी को सुधारा।

4. 23 अगस्त 2023 : वह ऐतिहासिक क्षण

शाम के करीब 6 बजकर 4 मिनट पर जैसे ही चंद्रयान-3 के तहत विक्रम लैंडर ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग की। तब भारत दुनिया का पहला ऐसा देश बन गया, जिसने इस कठिन इलाके में सफल लैंडिंग की। इससे पहले अमेरिका, रूस और चीन ने चांद पर लैंडिंग की थी, लेकिन कोई भी देश दक्षिणी ध्रुव पर नहीं उतरा था।

निष्कर्ष :

चंद्रयान-2 की असफलता ने भारत को तोड़ा नहीं, बल्कि निखारा। चंद्रयान-3 ने भारत की वैज्ञानिक प्रतिबद्धता, लचीलापन और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बनकर उभरते भारत का चेहरा पूरी दुनिया को दिखा दिया।

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