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क्या हॉलीवुड फिल्म से भी सस्ता था भारत का मंगल मिशन? जानें दुनिया ने क्यों माना भारत के इस मिशन को चमत्कार

Editor Ritam HindiEditor Ritam Hindi24 Sept 2025, 09:00 am IST
क्या हॉलीवुड फिल्म से भी सस्ता था भारत का मंगल मिशन? जानें दुनिया ने क्यों माना भारत के इस मिशन को चमत्कार

“जब भारत मंगल पर पहुंचा, तो पूरी दुनिया ने देखा कि सपने केवल ताकतवर देशों की जागीर नहीं होते। सपने सीमित साधनों से भी साकार हो सकते हैं, यदि जज्बा और विश्वास हो।” 24 सितम्बर 2014 की सुबह भारत के लिए इतिहास रचने वाली थी। जैसे ही भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के नियंत्रण कक्ष से यह घोषणा हुई कि ‘मार्स ऑर्बिटर मिशन’ (MOM) या ‘मंगलयान’ मंगल की कक्षा में सफलतापूर्वक प्रवेश कर चुका है, वैसे ही वैज्ञानिकों की आंखें चमक उठीं और देश गर्व से भर गया।

मंगलयान : सपने से हकीकत तक

भारत ने लंबे समय से चांद और उपग्रह अभियानों में उल्लेखनीय काम किया था। 2008 का चंद्रयान-1 इसकी पहली बड़ी झलक थी। परंतु मंगल ग्रह तक पहुंचना कहीं अधिक कठिन और चुनौतीपूर्ण था। 2008 के अंत में जब इसरो ने मंगलयान की योजना पर गंभीरता से काम शुरू किया, तब वैज्ञानिकों के सामने तीन बड़े प्रश्न थे:

· क्या भारत अपने दम पर इंटरप्लेनेटरी मिशन (अंतरग्रहीय मिशन) कर सकता है?

· क्या इतनी कम लागत में मंगल तक पहुंचना संभव होगा?

· क्या पहली ही कोशिश में सफलता मिल सकती है?

इन सवालों का जवाब 24 सितम्बर 2014 को पूरे विश्वास और गर्व के साथ मिला। जब लगभग 300 दिनों की यात्रा के बाद ‘मार्स ऑर्बिटर’ मंगल की कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित हो गया। बता दें, ‘मार्स ऑर्बिटर मिशन’ (मंगलयान) ‘भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन’ (इसरो) का पहला अंतरग्रहीय मिशन था। इसे 5 नवंबर 2013 को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से PSLV-C25 रॉकेट के द्वारा लॉन्च किया गया। यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि भारत पहली ही कोशिश में मंगल पर पहुंचने वाला दुनिया का पहला देश बना। मंगलयान का वजन लगभग 1,350 किलोग्राम था। इसमें लगभग 850 किलोग्राम ईंधन और 475 किलोग्राम सूखा द्रव्यमान शामिल था।

मुख्य विशेषताएं:

· सौर पैनल : तीन पंखों वाले पैनल, जो 840 वॉट बिजली उत्पन्न कर सकते थे।

· बैटरी : 36Ah की लिथियम-आयन बैटरी।

· प्रणोदन प्रणाली: 440 न्यूटन का लिक्विड इंजन, जिसे दोबारा प्रज्वलित कर मंगल कक्षा में प्रवेश कराया गया।

· संचार: X-बैंड ट्रांसपोंडर के जरिए पृथ्वी से संपर्क।

वैज्ञानिक उपकरण (Payloads)

मंगलयान में केवल 5 वैज्ञानिक उपकरण लगे थे, जिनका कुल वजन महज 15 किलो था। लेकिन इन्हीं उपकरणों ने मिशन को दुनिया में चर्चित बना दिया। दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो इसे हॉलीवुड की फिल्म ‘ग्रैविटी’ के बजट से भी सस्ता बताया था।

1. MCC (Mars Colour Camera) – मंगल की सतह व मौसम की तस्वीरें

2. TIS (Thermal Infrared Imaging Spectrometer) – सतह के खनिज और तापमान का अध्ययन

3. MSM (Methane Sensor for Mars) – वायुमंडल में मीथेन गैस की खोज

4. MENCA (Mars Exospheric Neutral Composition Analyzer) – वायुमंडल की संरचना का अध्ययन

LAP (Lyman Alpha Photometer) – हाइड्रोजन और ड्यूटेरियम का अनुपात

इन उपकरणों से मिले आंकड़ों ने न केवल वैज्ञानिक शोध को आगे बढ़ाया, बल्कि मंगल का विस्तृत एटलस भी तैयार किया गया। ये मिशन इसलिए और भी खास था क्योंकि इसे महज 18 महीनों में डिजाइन और तैयार किया गया था। वहीं भारी-भरकम लॉन्चरों के बजाय साधारण PSLV का उपयोग कर मिशन को किफायती बनाया। जहां अमेरिका, रूस और यूरोपियन स्पेस एजेंसी को कई असफलताओं का सामना करना पड़ा, भारत ने पहली बार में ही सफलता हासिल की।

मार्स ऑर्बिटर मिशन की चुनौतियां

मंगल की दूरी : पृथ्वी से औसतन 225 मिलियन किमी

मंगल ग्रह की औसत दूरी पृथ्वी से लगभग 225 मिलियन किलोमीटर है। इतने लंबे सफर के दौरान किसी भी तकनीकी त्रुटि को ठीक करने का मौका लगभग न के बराबर होता है। एक बार यान ने यात्रा शुरू कर दी, तो सभी फैसले पहले से तय क्रम और सटीक गणनाओं पर ही आधारित होते हैं। भारत के सामने सबसे बड़ा दबाव यह था कि यदि किसी भी चरण में मामूली गलती होती, तो यान हमेशा के लिए खो जाता।

440 न्यूटन इंजन का पुन :  प्रज्वलन

मंगलयान के साथ लगा 440 न्यूटन लिक्विड इंजन इस मिशन का दिल था। इस इंजन को लॉन्च के बाद करीब 300 दिनों तक निष्क्रिय रहना था और फिर ठीक समय पर मंगल की कक्षा में प्रवेश कराने के लिए पुनः प्रज्वलित करना था। किसी भी मशीन को इतने लंबे समय तक ठंडे वातावरण में निष्क्रिय रखकर अचानक सक्रिय करना एक बहुत बड़ा जोखिम था।

 बिजली और बैटरियों की चुनौती

मंगलयान पूरी तरह सौर ऊर्जा पर आधारित था। इसके सौर पैनल 840 वॉट बिजली तक उत्पन्न कर सकते थे, लेकिन लगातार मिलने वाली धूप पर ही यह निर्भर था। समस्या तब आई, जब मंगल की कक्षा में यान को लंबे ग्रहणों का सामना करना पड़ा। ऐसे ग्रहणों में यान को धूप नहीं मिलती थी और बैटरी पर ही उसे जीवित रहना होता था। बैटरियां केवल 1 घंटा 40 मिनट तक बिजली दे सकती थीं।

अंतरग्रहीय संचार की कठिनाई

पृथ्वी और मंगल के बीच संदेश पहुंचने में औसतन 10 से 20 मिनट का समय लगता है। इसका मतलब यह था कि वैज्ञानिक यान को रियल-टाइम में नियंत्रित नहीं कर सकते थे। यान को इस तरह डिजाइन किया गया कि वह कई निर्णय स्वयं (ऑटोनॉमस सिस्टम) लेकर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर सके। यह क्षमता मिशन के लिए बेहद अहम बात थी।

तापमान और विकिरण का खतरा

अंतरग्रहीय यात्रा के दौरान यान को अत्यधिक तापमान और विकिरण का सामना करना पड़ा। कभी सूर्य के नजदीक तापमान बहुत बढ़ जाता, तो कभी दूर जाने पर जमने जैसी स्थिति बन जाती। ऐसे में यान की प्रणालियों को स्थिर रखना, ईंधन को सही स्थिति में बनाए रखना और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को सुरक्षित रखना बड़ी चुनौती थी। लेकिन इन सभी कठिनाइयों को भारतीय वैज्ञानिकों ने धैर्य और कौशल से पार किया।

इस मिशन में महिला वैज्ञानिकों की रही प्रेरणादायक भूमिका

मंगलयान मिशन की सबसे बड़ी प्रेरणा रही इसकी महिला वैज्ञानिकों की टीम।

· डॉ. ऋतु करिधाल – डिप्टी ऑपरेशंस डायरेक्टर, मिशन प्लानिंग और ऑर्बिट मैन्युवर्स की जिम्मेदारी।

· मीनल सम्पत – थर्मल कंट्रोल और सॉफ्टवेयर इंटीग्रेशन।

· अनुराधा टीके – सैटेलाइट संचार विशेषज्ञ।

· एन. वलार्मथी – PSLV लॉन्चिंग टीम में प्रमुख भूमिका।

इन वैज्ञानिकों की कहानियां आज भी देश की बेटियों को विज्ञान और तकनीकी शिक्षा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं।

मिशन के बाद अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया

इस मिशन ने भारत को ‘स्पेस पावर’ के रूप में नई पहचान दी। अमेरिका की नेशनल स्पेस सोसाइटी ने मंगलयान टीम को 2015 का स्पेस पायनियर पुरस्कार दिया। चीन ने इसे ‘प्राइड ऑफ एशिया’ की उपाधि दी। नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ने खुले दिल से भारत की दक्षता की सराहना की। यहां तक कि विश्व मीडिया ने भारत की कम लागत में सफलता को ‘साइंस का चमत्कार’ बताया।

आत्मनिर्भर भारत की मिसाल

मंगलयान पूरी तरह भारतीय तकनीक पर आधारित था। इस मिशन ने साबित किया कि भारत सीमित संसाधनों में भी विश्वस्तरीय उपलब्धि हासिल कर सकता है। MSMEs और देशी उद्योगों की बड़ी भागीदारी ने इसे ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की जीवंत मिसाल बना दिया।

वैज्ञानिक उपलब्धियां

· मंगल की सतह और वायुमंडल की 1100 से अधिक तस्वीरें।

· मंगल एटलस का निर्माण।

· वायुमंडलीय अध्ययन पर 35+ अंतरराष्ट्रीय शोधपत्र।

· MENCA द्वारा आर्गन और ऑक्सीजन जैसे गैसों की नई जानकारी।

· सौर घटनाओं और मंगल पर धूल भरी आंधियों का अध्ययन।

हालांकि मंगलयान को केवल 6 महीने के लिए डिजाइन किया गया था, परंतु इसने 8 साल से अधिक समय तक काम किया। 2022 में एक लंबे ग्रहण के कारण बैटरियों की चार्जिंग न हो पाने से संपर्क टूट गया। परंतु तब तक यह मिशन अपने उद्देश्यों से कहीं अधिक उपलब्धियां दे चुका था।

 

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