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विजयादशमी ने डॉ. हेडगेवार के मन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीज कैसे बोये?

Editor Ritam HindiEditor Ritam Hindi31 Mar 2026, 08:00 am IST
विजयादशमी ने डॉ. हेडगेवार के मन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीज कैसे बोये?

यह पहली बार था, जब ब्रिटिश सरकार ने केशव बलिराम हेडगेवार को निगरानी में रखा था।

वह मुश्किल से टीनएज के अंतिम दिनों में थे।

यह दशहरा था, लगभग 1907-08 में, रामपायली गांव में, जहां उनके चाचा आबाजी रेवेन्यू इंस्पेक्टर के तौर पर काम करते थे। पूरा गांव वार्षिक उत्सव के लिए इकट्ठा हुआ था। ढोल गूंज रहे थे, दीये टिमटिमा रहे थे और बच्चे भीड़ के बीच दौड़ रहे थे। बीच में रावण का बहुत बड़ा पुतला खड़ा था, जो जलने का इंतजार कर रहा था, बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक।

किसी को उम्मीद नहीं थी कि वह दिन, कॉलोनियल रिकॉर्ड में दर्ज हो जाएगा।

जैसे-जैसे जुलूस आगे बढ़ा, युवा केशव चुपचाप खड़े होकर देख रहे थे। वह कठिन परिस्थितियों में पले-बढ़े थे, उनके माता-पिता जल्दी चले गए थे। उन्होंने अपने बड़े भाई महादेव शास्त्री को परिवार का पेट पालने के लिए संघर्ष करते देखा था, बिना किसी दोषारोपण के गरीबी झेलते हुए। संघर्षों ने उन्हें गंभीर, अनुशासित, अंदर से सुदृढ़ बना दिया था। स्कूल में वह शोर नहीं मचाते थे, फिर भी लोग उनके पीछे-पीछे चलते थे। वह ‘कैप्चर द फ्लैग’ जैसे खेलों में नेतृत्त्व करते थे। उनके लिए लीडरशिप नैचुरल थी, ड्रामेटिक नहीं। और अब तक, उनका मस्तिष्क जल रहा था।

जैसे-जैसे देश भर में राष्ट्रवादी विचार पनप रहे थे, उनके अंदर चुपचाप कुछ बन रहा था। ‘वंदे मातरम्’ अब केवल एक गाना नहीं था, यह एक बढ़ती हुई लहर थी। उन्होंने पढ़ा, सुना, और सोचा, लेकिन वह ऐसे कोई नहीं थे, जो बिना सोचे-समझे काम करें।

यह सब किसी चीज की ओर बढ़ रहा था।

जैसे रावण का पुतला जलने के लिए तैयार खड़ा था, केशव ने केवल पौराणिक कथाओं से अधिक कुछ देखा।

‘अगर रावण बुराई को दिखाता है’, उन्होंने सोचा, ‘तो विदेशी राज का क्या? इस दैनिक अपमान का क्या?’

अचानक, उनका स्वर त्योहार के शोर में दब गया, “वंदे मातरम्!”

शब्द उत्सव जैसे नहीं लग रहे थे। वे चुनौती जैसे लग रहे थे।

एक सेकंड के लिए भीड़ थम गई, फिर उनके दोस्त भी उनके साथ हो लिए, नारा फिर से गूंज उठा और जोरदार और तीखा और चुनौती भरा।

केशव आगे बढ़े और बोले, बिना सोचे-समझे नहीं। भावुक होकर नहीं। परंतु खरा-खरा।

उन्होंने कहा कि वर्ष में एक बार रावण जलाने का कोई मतलब नहीं है, अगर इससे भी बड़ा अन्याय, विदेशी राज बिना रोक-टोक के चलता रहा। उन्होंने महाकाव्य की सांकेतिक बुराई को औपनिवेशिक शासन की जीती-जागती सच्चाई से जोड़ा। संदेश साफ था।

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इलाके में मौजूद ब्रिटिश अधिकारियों ने तुरंत स्थिति की गंभीरता को समझ लिया। रिपोर्ट तैयार की गई। बयान दर्ज किए गए। इसमें शामिल लड़कों के खिलाफ देशद्रोह का केस आरम्भ किया गया।

पहली बार, औपनिवेशिक शासन ने केशव हेडगेवार पर नजर रखना आरंभ किया। केशव को पता था कि इसके नतीजे भुगतने होंगे। वह  कि अब उनपर दृष्टि रखी जा रही है। फिर भी वह पीछे नहीं हटे।

वह दशहरा की शाम केवल रावण जलाने के साथ खत्म नहीं हुई। इससे जिंदगी भर की यह समझ शुरू हुई कि सिंबॉलिज्म में ताकत होती है।

सालों बाद, 1925 में, जब केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के लिए विजयादशमी का दिन चुना, तो यह कोई संयोग नहीं था। यह वही दिन था, जिसने एक बार उनके पहले सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन को देखा था, वह दिन बन गया, जब उन्होंने संगठित होकर राष्ट्र-निर्माण का कार्य आरम्भ किया।

इसका बीज रामपायली में बोया गया था।

इस 1 अप्रैल को, हम केवल उनका जन्मदिन ही नहीं मनाते, बल्कि उस शाम का भी उत्सव मनाते हैं, जब एक युवा स्वर पहली बार एक साम्राज्य के रिकॉर्ड में सम्मलित हुआ और उसकी गूंज दूर तक सुनाई दी।

वंदे मातरम्।

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