लखनऊ की घेराबंदी: 1857 की क्रांति का खूनी घेरा…हिल गया था ब्रिटिश साम्राज्य, रेजीडेंसी में अंग्रेजों ने ली थी शरण!

प्रथम स्वाधीनता संग्राम के दौरान 30 जून 1857 को लखनऊ के चिनहट में क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी सेना को हरा दिया. इसके बाद अंग्रेजों ने रेजीडेंसी में शरण ली. क्रांतिकारियों ने यहां भी उनका पीछा नहीं छोड़ा. जिसके बाद जमकर युद्ध हुआ. 25 सितंबर को अंग्रेज अधिकारी हैवलॉक और आउटरम भारी सेना लेकर रेजीडेंसी पहुंचे थे. आखिरकार एक माह तक चले युद्ध के बाद 25 नवंबर 1857 को हैवलॉक और आउटरम ने रेजीडेंसी में फंसे अंग्रेजों को मुक्त कराया.
प्रथम स्वाधीनता संग्राम क्यों हुआ?
मेरठ से शुरू हुई 1857 की पहली स्वाधीनता क्रांति के दौरान, भारतीय क्रांतिकारियों ने लखनऊ स्थित रेजीडेंसी में रह रहे, अंग्रेज अफसरों और सैनिकों को घेर लिया था. क्रांतिकारियों द्वारा लखनऊ की घेराबंदी करने की मुख्य वजह भारतीय संस्कृति में दखल, भारतीयों पर पश्चिमीकरण का प्रभाव व राजाओं के अधिकारों के साथ छेड़खानी करना था. मेरठ से शुरू हुआ प्रथम स्वाधीनता संग्राम देखते ही देखते देश भर में फैल गया. विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में इसका व्यापक असर देखने को मिला. क्रांतिकारियों ने कानपुर, झांसी व लखनऊ सहित यूपी के कई शहरों में कंपनी शासन के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया, जिसकी चिंगारी गांव-गांव तक फैल गई.
लखनऊ की घेराबंदी का कारण क्या था?
11 फरवरी 1856 को अंग्रेजों द्वारा अवध राज्य का जबरन अधिग्रहण कर नवाब वाजिद अली शाह को गद्दी छोड़ने पर मजबूर कर दिया. जिससे जनता में आक्रोश उत्पन्न हुआ. अंग्रेज सैनिकों ने धार्मिक स्थलों और महलों पर कब्जा करने से लोगों की धार्मिक और सामाजिक भावनाएं आहत हुईं. जिससे जमींदारों के बीच भी असंतोष और गहरा होता गया.
मेरठ में विद्रोह भड़का और दिल्ली पर क्रांतिकारियों ने कब्जा कर लिया, तो लखनऊ में भी यह असंतोष आग की तरह फैल गया. इससे लखनऊ में भी खुला विद्रोह भड़क उठा और कई स्थानों पर क्रांतिकारियों और अंग्रेजों के बीच संघर्ष हुआ. लखनऊ के चिनहट, आलमबाग, सिकंदराबाद, ला-मार्टीनियर और रेजीडेंसी जैसे स्थानों पर भीषण युद्ध हुए. 30 जून 1857 को क्रांतिकारियों ने (विद्रोही सैनिकों) ने चिनहट की लड़ाई में हेनरी लॉरेन्स के नेतृत्व वाली अंग्रेजी सेना को परास्त कर दिया.
चिनहट की हार के बाद अंग्रेज अफसरों और सैनिक ने परिवार के साथ रेजीडेंसी में शरण ली. परंतु क्रांतिकारियों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. क्रांतिकारियों ने रेजीडेंसी को घेरकर भारी गोलीबारी शुरू कर दी. 1-2 जुलाई 1857 को क्रांतिकारियों ने भीषण हमले किए. रेजीडेंसी 86 दिनों तक क्रांतिकारियों के घेरे में रही. इसी दौरान अवध के चीफ कमिश्नर हेनरी लॉरेन्स की भी मौत हो गई.
राजकीय अभिलेखों के अनुसार, 30 जून 1857 को चिनहट की हार के बाद रेजीडेंसी में 2,994 लोगों ने शरण ली. इनमें 130 अंग्रेज अफसर, 700 भारतीय सिपाही (जो कंपनी शासन की फौज में थे), 237 महिलाएं, 260 बच्चे और अन्य नागरिक शामिल थे. 25 सितंबर को अंग्रेज अधिकारी हैवलॉक और आउटरम रेजीडेंसी पहुंचे, पर वह पूरी तरह से क्रांतिकारियों से मोर्चा नहीं संभाल सके. अंततः 25 नवंबर 1857 को सर कॉलिन कैम्पबेल ने रेजीडेंसी में फंसे अंग्रेजों को मुक्त कराया.
युद्ध में मारे गए लोगों की संख्या
लखनऊ की घेराबंदी में दोनों ओर से मारे गए सैनिकों की कोई स्पष्ट आंकड़ें उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन अनुमान के अनुसार 8,000 ब्रिटिश सैनिकों में से 2,500 सैनिक घायल हुए थे. वहीं, करीब इस युद्ध में 30,000 क्रांतिकारी (विद्रोही सैनिक) शामिल हुए थे. जिसने बारे में कोई जानकारी नहीं है. लेकिन ऐसी जानकारियां सामने आई हैं कि इस युद्ध में दोनों ओर से 2,000 से अधिक लोग मारे गए थे.
अंग्रेजों का मुख्यालय हुआ करता था रेजीडेंसी
1857 का विद्रोह लखनऊ में बहुत प्रचंड था, विशेष रूप से रेजीडेंसी में, जो उस जमाने में अंग्रेजों का मुख्यालय हुआ करता था. रेजीडेंसी की घेराबंदी 2 जुलाई 1857 से सितंबर 1857 तक चली. इस दौरान भीषण युद्ध हुआ. जिसमें जमकर गोली और तोप चलीं. 2,000 से अधिक लोग मारे गए. अंततः ब्रिटिश सेना क्रांतिकारियों पर भारी पड़ी. लखनऊ शहर लगभग खंडहर हो गया.
रेजीडेंसी की दीवारों पर गोलियों और तोप के गोलों के निशान आज भी मौजूद हैं. साथ ही युद्ध में बड़ी संख्या में अंग्रेजों की मौत हुई थी. जिनकी कब्रों को आज भी रेजीडेंसी परिसर में देखा जा सकता है.
लखनऊ की घेराबंदी के दौरान निर्णायक क्षण
1. 30 जून 1857 – चिनहट की लड़ाई 2. रेज़ीडेंसी की घेराबंदी (1 जुलाई – 25 नवंबर 1857) 3. लगातार बंदूक और तोपों से हमला और ब्रिटिश जनहानि 4. 25 सितंबर 1857 को पहला राहत अभियान (जनरल हेवलॉक और आउटरम रेजीडेंसी तक पहुंचे) 5. 25 नवंबर 1857: अंतिम निर्णायक मोड़ – कॉलिन कैंपबेल का आगमन 6. 5 मार्च 1858 – लखनऊ पर अंग्रेजों का पुनः अधिकार
प्रथम स्वाधीनता संग्राम के समाप्त होने के बाद क्या हुआ?
विद्रोह के बाद, अंग्रेजों ने सतारा, संबलपुर, झांसी, नागपुर और अंततः अवध जैसे महत्वपूर्ण राज्यों को स्थायी रूप से ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन कर लिया. अंतिम मुगल शासक बहादुर शाह ज़फ़र को गिरफ्तार कर बर्मा (अब म्यांमार) भेज दिया गया. 1857 के विद्रोह के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी को समाप्त कर दिया गया. भारत सरकार अधिनियम 1858 के तहत पूरी तरह से ‘ब्रिटिश राज’ के अधीन हो गया.
ब्रिटिश सरकार ने सेना में भारतीयों की संख्या सीमित कर दी गई, साथ ही जातीय और धार्मिक विविधता अपनाई गईं. मुस्लिम और ब्राह्मण सिपाहियों की संख्या कम कर दी गई. ब्रिटिश सरकार ने देशी रियासतों पर कोई डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स लागू न करने का निर्णय लिया. लेकिन शासकों को सीमित अधिकार वाले राजा के रूप में ही रखा. रेलवे, टेलीग्राफ और सड़कों के नेटवर्क का विस्तार किया गया, ताकि भविष्य में कहीं भी विद्रोह हो तो सेना तत्काल पहुंच सके.
















